उलूक टाइम्स: जुलाई 2026

रविवार, 19 जुलाई 2026

कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए

 

इंतहा है बेशरमी की होनी भी चाहिए
शरम निगोड़ी कभी धोनी भी चाहिए

मुहं खोलते ही फैलता है रायता जिसका
ककड़ी हरी हो पीली हो धोनी ही चाहिए

पढ़े लिखे होने का घमंड लिखे में भी दिखे
एक अनपढ़ की जी हजूरी होनी ही चाहिए

गिरना जरूरी है गिरे हुए को और कहीं नीचे
ऊंचाइया देखने में सिर से टोपी गिरनी ही चाहिए

इतिहास में दर्ज होगी फेंकी गई स्याही सरेआम
अनपढ़ सरदार की कलम कबाड़ में बिकनी ही चाहिए

कितना कुछ लिखे कोई क्या लिखे किसपर लिखे 
सब उतार के बैठे की खाल भी  उतरनी ही चाहिए

‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 

चित्र साभार: https://www.reddit.com/

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार



चोरी डकैती हत्या बलात्कार भ्रष्टाचार व्यभिचार
कौन सा आज का है एक नया समाचार
इतिहास में भी होता आया हो जो कई कई बार
उसका किसलिए जिक्र करना बार बार

चोर घर का हो अपना हो
किसलिए उसपर बात करना
किसलिए बैठाया है हर थाने में एक थानेदार
चोर चोर चिल्लाए जो चोर के सामने सामने
उसका श्राद्ध बहुत जरूरी हो गया है करना इस बार

खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार
सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार
क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की
सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार

किसी को कुछ नहीं आता है समझ में
दिमाग रखता है बस एक हजूर का ठेकेदार
सारी निविदाएं होती हैं उसकी
उसी को लिखनी होती है खबर उसी का होता है अखबार

‘उलूक’ समझ को ठोक लिया कर अपनी हथौड़े से
कुछ भी पढ़ने से पहले हर बार
भगवान जब लिख रहा हो कुछ
बिना पढे ही लिख क्यों नहीं देता
दंडवत प्रणाम और नमस्कार ?

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

बुधवार, 15 जुलाई 2026

फिर हुई खुजली अंगुलियों में मगर कलम की स्याही आजकल जाम है

 

वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है

सौ झूठ बोलते
दिव्य दर्शन सच के हो जाना
सुना आज बहुत आम है
कहीं कितने भी हों विलाप भक्तो
मूल्यों का आलाप जरूरी सुबहो शाम है

सही की परिभाषा गढ़ रहा है नई कोई
समझा करो बहुत ही विद्वान है
गिरोह से प्रेम रखता है तो क्या
गिरोह के कत्लेआम में ही तो सम्मान है

बतला रहा है
टांग पर खड़ा है एक बरसों से
क्या हुआ अगर हम्माम है
कपड़े खुद के उतरे हुए हैं सारे सभी
आईने में तो दिख रहा सब गुलफाम है

किसलिए करें बात शर्म करने की
लाशों के ढेर हैं ठहाके भी हैं
बस रोना हराम है
लिखे में दिख रहा है चेहरा किसी का
और लिखा माथे पर भी गुलाम है

‘उलूक’ गिनना मोतियाबिंद सोच पर पड़े
और बिखरे हुए कागजों पर
एक बड़ा काम है
किसको देखनी है अब रोशनी सुबह की भगत
अंधेरे का ही बस करना जब गुणगान है?

चित्र साभार: https://pixabay.com/