उलूक टाइम्स: जून 2016

मंगलवार, 14 जून 2016

क्या और क्यों नहीं कितनी बार बजाई बताना जरूरी होता है

सियार होना
गुनाह नहीं
होता है
कुछ इस तरह
का जैसा ही
कभी सुना या
पढ़ा हुआ कहीं
महसूस होता है
शेर हूँ बताना
गुनाह होता है
या नहीं होता है
किसी को
पता होता है
किसी को पता
नहीं भी होता है
गजब होता है
तो कभी कहीं
बस यूँ ही
किसी सियार
के शेर हो
जाने से होता है
उसके बाद
फिर किसी को
कुछ बताने
सुनाने के लिये
कुछ कहाँ होता है
अब जमाने के
हिसाब से ही
होना इतना
जरूरी अगर
ये होता है
तो साफ साफ
एक सरकारी
आदेश कलम से
लिखा हुआ
सरकारी कागज
में सरकार की
ओर से क्यों
नहीं होता है
कोई नहीं देखता
है कि कौन
कह रहा है
गालिब के शेर
को दहाड़ते हुए
तालियों की
गड़गड़ाहट से
अब शोर भी
नहीं होता है
ध्यान सुनने
सुनाने में लगाने
के दिन लद गये
‘उलूक’
खींच कर खींसे
निपोरने वालों को
तालियाँ गिनना
आना ही सबसे
जरूरी होता है ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

रविवार, 5 जून 2016

विश्व पर्यावरण दिवस चाँद पर मनाने जाने को दिल मचल रहा है

कल रात चाँद
सपने में आया
बहुत साफ दिखा
जैसे कोई दूल्हा
बारात चलने
से पहले रगड़
कर हो नहाया
लगा जैसे
किसी ने कहा
आओ चलें
 चाँद पर जाकर
लगा कर आयें
कुछ चित्र
कुछ पोस्टर
कुछ साफ पानी के
कुछ स्वच्छ हवा के
कुछ हरे पेड़ों के
शोर ना करें
हल्ला ना मचायें
बस फुसफुसा
कर आ जायें
कुछ गीत
कुछ कवितायें
फोड़ कर आयें
हौले से हल्के
फुल्के कुछ भाषण
जरूरी भी है
जमाना भी यहाँ का
बहुत संभल
कर चल रहा है
अकेले अब कुछ
नहीं किया जाता है
हर समझदार
किसी ना किसी
गिरोह के साथ
मिल बांट कर
जमाने की हवा
को बदल रहा है
घर से निकलता है
जो भी अंधेरे में
काला एक चश्मा
लगा कर
निकल रहा है
सूक्ष्मदर्शियों की
दुकाने बंद
हो गई हैंं
उनके धंधों
का दिवाला
निकल रहा है
दूरदर्शियों की
जयजयकार
हो रही है
लंका में सोना
दिख गया है
की खबर रेडियो
में सुना देने भर से
शेयर बाजार में
उछालम उछाला
चल रहा है
यहाँ धरती पर
हो चुका बहुत कुछ
से लेकर सब कुछ
कुछ दिनों में ही इधर
चल चलते हैं ‘उलूक’
मनाने पर्यावरण दिवस
चाँद पर जाकर
इस बार से
यहाँ भी तो
बहुत दूर के
सुहाने ढोल नगाड़े
बेवकूफों को
दिखाने और
समझाने का
बबाला चल रहा है ।

चित्र साभार: islamicevents.sg

बुधवार, 1 जून 2016

मुश्किल है बहुत अच्छी भली आँखों के अंधों का कोई करे तो क्या करे


अच्छा है 
सफेद पन्ने पर खींचना कुछ लकीरें
सफेद कलम से सफाई के साथ

किसे समझनी होती हैं लकीरें
फकीरों के रास्ते में हरी दूब हो या मिट्टी
शिकायत चाँद और चाँदनी की भी
करे कोई तो क्या करे

अपनी अपनी आँखों से 
हर कोई देखता है नीम को
अब देख कर भी नीम की हरियाली से
कढ़वाहट आ रही है कहे कोई
तो कोई क्या कहे और क्या करे

व्हिस्की दिवस है सुना आज
पीने वाले क्या कर रहे होंगे
कौन पता करे 
किससे पता करे कितना पता करे

घोड़े दबाने के शौक रखने वाले
बड़े शौक से बनाते हैं आदमी को बंदूक
घर से लेकर गली मोहल्ले और शहर में

घोड़े हर जगह
चार टाँग और एक पूँछ वाले मिलें
ये भी कौन सा जरूरी है
मिलें भी तो घोड़े भी करें तो क्या करें

सारी आग लिखने की सोचते सोचते
बची हुई राख लिख लेने के बाद

कौन ढूँढे चिंगारी
बचे खुचे जले बुझे में क्यों ढूँढे सब कुछ

पता होना जानना देखना
वो सब जो सब देखते हैं
देखने वाले भी क्या करेंं

बेवकूफों की तरह
रोज का रोज कह देने वालों की लाईन

अकेला बना कर
खुद अपनी छाती पीटने
वालों का कोई करे तो क्या करे

कोई इलाज नहीं है उलूक तेरा
शरीफों के बीच शरीफ कुछ करें
तो तेरा क्या करें

नंगों के बीच में जा कर भी
देख कभी
कौन किस तरीके से करे
क्या करे और कैसे करे ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com