चिट्ठा अनुसरणकर्ता

सोमवार, 18 जनवरी 2010

मन प्रदूषण

मेरे मन
के ग्लेशियर
से निकलने
वाली गंगा
तेरे प्रदूषण
को
घटते बढ़ते
हर पल
हर क्षण
महसूस किया
है मैंने
भोगा है
तेरे गंगाजल
के काले भूरे
होते हुवे
रंग को
विकराल
होते हुवे
तेरी शांत
लहरों को
बदलते हुवे
सड़ांध में
तेरी
भीनी भीनी
खुश्बू को
और ऎसे
में अब
मेरी
सांस्कृ्तिक
धरोहर
मैं खुद
ही चाहूंगा
ये ग्लेशियर
खुद बा खुद
सूख जाये
ताकि मेरे
मन से
बहने वाली
पवित्र गंगे
तू मैली
ना कहलाये ।

16 टिप्‍पणियां:

  1. bahut shiddat se mehsoos kiya hai aapne ganga ko... ganga ke bahane aapne prakriti ke prati ho rahe durvyavhar ki oar aapne dhyan aakrshit kiya hai... sundar aur saarthak rachna !

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  2. Bahut khoob. Behtareen rachna hai. Ganga ke pratee yah asstha koi Prakriti Anuragee hi rakh sakta hai.

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  3. मगर फिर भी जुमला यही दोहराते हैं......
    हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है......बहुत अच्छा लेख.....

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  4. वाह बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी! इस उम्दा रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

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  5. आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

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  6. comment ke liye sabd chahiye, jo mere pas nahi hain so main to yahi kahunga ki 'no comment'

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  7. ...taaki Pachouree jaise fraud are amerika jaise dhadhebaajon ko mauka hee n mile. bahut khoob!!!!

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  8. वाह...क्या कहने. मन के ग्लेशियर से निकलने वाली गंगा.अच्छी कल्पना है

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  9. क्‍या इसके लिए अब किसी डिटर्जेन्‍ट की तलाश कर ली है

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-08-2014) को "गणपति वन्दन" (चर्चा मंच 1721) पर भी होगी।
    --
    श्रीगणेश चतुर्थी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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