http://blogsiteslist.com
सिपाही लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सिपाही लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

खेल भावना से देख चोर सिपाही के खेल

वर्षों से
एक साथ
एक जगह
पर रह
रहे होते हैं

लड़ते दिख
रहे होते हैं
झगड़ते दिख
रहे होते हैं

कोई गुनाह
नहीं होता है
लोग अगर
चोर सिपाही
खेल रहे होते हैं

चोर
खेलने वाले
चोर नहीं हो
रहे होते हैं
और
सिपाही
खेलने वाले भी
सिपाही नहीं
हो रहे होते हैं

देखने वाले
नहीं देख
रहे होते हैं
अपनी आँखें

शुरु से
अंत तक
एक ही लेंस से
उसी चीज को
बार बार

अलग अलग
रोज रोज
सालों साल
पाँच साल

कई बार
अपने ही
एंगल से
देख रहे
होते हैं

खेल खेल में
चोर अगर कभी
सिपाही सिपाही
खेल रहे होते है

ये नहीं समझ
लेना चाहिये
जैसे चोर
सिपाही की
जगह भर्ती
हो रहे होते हैं

खेल में ही
सिपाही चोर
को चोर चोर
कह रहे होते है

खेल में ही
चोर कभी चोर
कभी सिपाही
हो रहे होते हैं

खबर चोरों के
सिपाहियों में
भर्ती हो जाने
की अखबार
में पढ़कर

फिर
किस लिये
‘उलूक’
तेरे कान
लाल और
खड़े हो
रहे होते हैं

खेल भावना
से देख
खेलों को
और समझ
रावणों में ही
असली
रामों के
दर्शन किसे
क्यों और कब
हो रहे होते हैं

ये सब खेलों
की मायाएं
होती हैं

देखने सुनने
पर न जा
खेलने वालों
के बीच और
कुछ नहीं
होता है
खेल ही हो
रहे होते हैं ।

चित्र साभार: bechdo.in

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ताजी खबर है देश के एन जी ओ ऑडिट नहीं करवाते हैं

चोर सिपाही
खेल
खेलते खेलते
समझ में
आना शुरु
हो जाते हैं

चोर भी
सिपाही भी
थाना और
कोतवाल भी

समझ में
आ जाना
और
समझ में
आ जाने
का भ्रम
हो जाना
ये अलग
अलग
पहलू हैं

इस पर
अभी चलो
नहीं जाते हैं

मान लेते हैं
सरल बातें
सरल
होती हैं

सब ही
सारी बातें
खास कर
खेल
की बातें
खेलते
खेलते ही
बहुत अच्छी
तरह से
सीख ले
जाते हैं

खेलते
खेलते
सब ही
बड़े होते हैं
होते चले
जाते हैं

चोर
चोर ही
हो पाते हैं
सिपाही
थाने में ही
पाये जाते हैं

कोतवाल
कोतवाल
ही होता है

सैंया भये
कोतवाल
जैसे मुहावरे
भी चलते हैं
चलने भी
चाहिये

कोतवाल
लोगों के भी
घर होते हैं
बीबियाँ
होती हैं
जोरू का
गुलाम भी
बहुत से लोग
खुशी खुशी
होना चाहते हैं

पता नहीं
कहाँ से
कहाँ पहुँच
जाता है
‘उलूक’ भी
लिखते लिखते

सुनकर
एक
छोटी सी
सरकारी
खबर
कि
देश के
लाखों
एन जी ओ
सरकार का
पैसा लेकर
रफू चक्कर
हो जाते हैं

पता नहीं
लोग
परिपक्व
क्यों
नहीं हो
पाते हैं

समझ में
आना
चाहिये

बड़े
होते होते
खेल खेल में
चोर भी चोर
पकड़ना
सीख जाते हैं

ना थाने
जाते हैं
ना कोतवाल
को बुलाते हैं
सरकार से
शुरु होकर
सरकार के
हाथों
से लेकर
सरकार के
काम
करते करते
सरकारी
हो जाते हैं ।

चित्र साभार: Emaze

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

तू आये निकले दिवाला वो आये होये दिवाली

एक तू है
कभी कहीं
जाता है
किसी को
कुछ भी
पता नहीं
चल पाता है
क्यों आता है
क्यों चला जाता है
ना कोई
आवाज आती है
ना कोई
बाजा बजाता है
क्या फर्क पड़ता है
अगर तुझे कुछ या
बहुत कुछ आता है
पढ़ाई लिखाई की
बात करने वाले
के पास पैसे का
टोटा हो जाता है
चंदे की बात करता है
जगह जगह
गाली खाता है
नेता से सीखने में
काहे शरमाता है
कुछ ना भी बताये
किसी को कभी भी
अखबार में आ जाता है
शहर में लम्बी चौड़ी
गाड़ियों का मेला
लग जाता है
ट्रेफिक का सिपाही
कुछ कहना छोड़ कर
बस अपना सिर
खुजलाता है
चुनाव की बात
करने के लिये
किसी भी गरीब
को कष्ट नहीं
दिया जाता है
राजनैतिक
सम्मेलनों से
साफ नजर आता है
देश में गरीबों का
बहुत खयाल
रखा जाता है
दूर ही से नहीं
बहुत दूर से भी
सिखा दिया जाता है
क्यों परेशान होता है
काहे चुनावों में खड़ा
होना चाहता है
सूचना या समझने के
आधिकार से किसी भी
गरीब का नहीं
कोई नाता है
वोट देने का अधिकार
दिया तो है तुझे
खुश रह मौज कर
अगले साल
आने के लिये
अभी से बता
दिया जाता है
हम पे नजर
रखना छोड़
आधार कार्ड
बनाने के लिये
भीड़ में घुसने
का जुगाड़
क्यों नहीं
लगाता है
समझा कर
गरीबी की
रेखा का सम्मान
इस देश में हमेशा
ही किया जाता है
सेहत के लिये जो
अच्छा नहीं होता
ऐसा कोई भी ठेका
उनको नहीं
दिया जाता है ।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

राजा लोग

कुछ साल
पहले ही
की बात है

हर शाखा
का
होता था
एक राजा

प्रजा भी
होती थी
चैन से
सोती थी

खुशहाली
ना सही
बिकवाली
तो नहीं
होती थी

राजा
आज भी
हुवा करता है

पर प्रजा
अब
पता नही
कहाँ है

अब तो
हर शख्स
राजा बना
बैठा है

कोई
राजा भी
कभी
राजा की
सुनता है

इसलिये
हर एक
अपना
किला
बुनता है

हर तरफ
किलों कि
भरमार है

लेकिन
सिपाही
फिर भी
ना
जाने क्यों
रहे हार हैं ?

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...