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गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ताजी खबर है देश के एन जी ओ ऑडिट नहीं करवाते हैं

चोर सिपाही
खेल
खेलते खेलते
समझ में
आना शुरु
हो जाते हैं

चोर भी
सिपाही भी
थाना और
कोतवाल भी

समझ में
आ जाना
और
समझ में
आ जाने
का भ्रम
हो जाना
ये अलग
अलग
पहलू हैं

इस पर
अभी चलो
नहीं जाते हैं

मान लेते हैं
सरल बातें
सरल
होती हैं

सब ही
सारी बातें
खास कर
खेल
की बातें
खेलते
खेलते ही
बहुत अच्छी
तरह से
सीख ले
जाते हैं

खेलते
खेलते
सब ही
बड़े होते हैं
होते चले
जाते हैं

चोर
चोर ही
हो पाते हैं
सिपाही
थाने में ही
पाये जाते हैं

कोतवाल
कोतवाल
ही होता है

सैंया भये
कोतवाल
जैसे मुहावरे
भी चलते हैं
चलने भी
चाहिये

कोतवाल
लोगों के भी
घर होते हैं
बीबियाँ
होती हैं
जोरू का
गुलाम भी
बहुत से लोग
खुशी खुशी
होना चाहते हैं

पता नहीं
कहाँ से
कहाँ पहुँच
जाता है
‘उलूक’ भी
लिखते लिखते

सुनकर
एक
छोटी सी
सरकारी
खबर
कि
देश के
लाखों
एन जी ओ
सरकार का
पैसा लेकर
रफू चक्कर
हो जाते हैं

पता नहीं
लोग
परिपक्व
क्यों
नहीं हो
पाते हैं

समझ में
आना
चाहिये

बड़े
होते होते
खेल खेल में
चोर भी चोर
पकड़ना
सीख जाते हैं

ना थाने
जाते हैं
ना कोतवाल
को बुलाते हैं
सरकार से
शुरु होकर
सरकार के
हाथों
से लेकर
सरकार के
काम
करते करते
सरकारी
हो जाते हैं ।

चित्र साभार: Emaze

सोमवार, 9 नवंबर 2015

जब पकाना ही हो तो पूरा पकाना चाहिये बातों की बातों में बात को मिलाना आना चाहिये

अब
चोर होना
अलग बात है

ईमानदार होना
अलग बात है

चोर का
ईमानदार होना
अलग बात है

चोरी करने
के लिये
कुछ सामने
से होना
अलग बात है

बिना कुछ
उठाये
छिपाये भी
चोरी हो जाना
अलग बात है

कहने का
मतलब
ऐसे तो कुछ
भी नहीं है
पर
वैसे कहो
तो कुछ है
और
नहीं भी है

बात कहने में
क्या जाता है
बातें बताना
अलग बात है
बातें बनाना
अलग बात है

जैसे बात
दिशा बताने
की हो तो भी
बिल्कुल
जरूरी नहीं है
दिशा का ज्ञान हो

बच्चे का
चेहरा हो
शरीर
जवान हो
अधेड़ की
सोच हो
बुढ़ापे की
झुर्रियों
के पहले
से ही छिपे
हुऐ निशान हो

इसकी जीत में
उसकी हार हो
किसी के लिये
हार और जीत
दोनो बेकार हों

समय के
निशानों पर
छिपाये
निशान हों

जन्मदिन हो
जश्न हो
शहर हो
प्रदेश हो
ईमानदार
का ईमान हो
झूठ बस
बे‌ईमान हो

ईमानदारी
पर भाषण हो
झूठ का
सच हो
सच का
झूठ हो
शासन का
राशन हो
योगा का
आसन हो
बात का
बात से
बात पर
प्रहार हो
मुस्कुराता

अंदर
ही अंदर
अंदर का
व्यभिचार हो

पर्दा खुला
रहने रहने
तक तो
कम से कम
नाटक हो
और
जोरदार हो ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

औरों के जैसे देख कर आँख बंद करना नहीं सीखेगा किसी दिन जरूर पछतायेगा

थोड़ा कुछ सोच कर
थोड़ा कुछ विचार कर
लिखेगा तो शायद
कुछ अच्छा कभी
लिख लिया जायेगा
गद्य हो या पद्य हो
पढ़ने वाले के शायद
कुछ कभी समझ
में आ ही जायेगा
लेखक या कवि
ना भी कहा गया
कुछ लिखता हैं तो
कम से कम कह
ही दिया जायेगा
देखे गये तमाशे
को लिखने पर
कैसे सोच लेता है
कोई तमाशबीन
आ कर अपने ही
तमाशे पर ताली
जोर से बजायेगा
जितना समझने
की कोशिश करेगा
किसी सीधी चीज को
उतना उसका उल्टा
सीधा नजर आयेगा
अपने हिसाब से
दिखता है अपने
सामने का तमाशा
हर किसी को
तेरे चोर चोर
चिल्लाने से कोई
थानेदार दौड़ कर
नहीं चला आयेगा
आ भी गया गलती से
किसी दिन कोई
भूला भटका
चोरों के साथ बैठ
चाय पी जायेगा
बहुत ज्यादा उछल
कूद करेगा ‘उलूक’
इस तरह से हमेशा
लिखना लिखाना
सारा का सारा
धरा का धरा
रह जायेगा
किसी दिन
चोरों की रपट
और गवाही पर
अंदर भी कर
दिया जायेगा
सोच कर लिखेगा
समझ कर लिखेगा
वाह वाह भी होगी
कभी चोरों का
सरदार इनामी
टोपी भी पहनायेगा ।

चित्र साभार: keratoconusgb.com

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

चोर है बस चोर है चारों ओर चोर है और चोर है

जमाना चोरों का है
कुछ इधर चोर
कुछ उधर चोर
लड़ाई है
होती है
दिखती भी है
हो रही है
चोरों की लड़ाई
चोरों के बीच
तू भी चोर
और मैं भी चोर
इधर भी चोर
उधर भी चोर
कुर्सी में बैठा
एक बड़ा चोर
घिरा हुआ
चारों ओर से
सारे के सारे चोर
तू भी चोर
और मैं भी चोर
घर घर में चोर
बाजार में चोर
स्कूल में चोर
अखबार के सारे
समाचार में चोर
चोर चोर
चारों ओर चोर
हड़ताल करते
हुऐ चोर
कुछ छोटे से चोर
बताते हुऐ चोर
मनाते हुऐ चोर
कुछ बड़े बड़े चोर
अंदाज कैसे आये
किसलिये खड़ा है
एक बड़े चोर के
सामने एक
छोटा सा चोर
सच बस यही है
चोर है चोर है
चोर के सामने
है एक चोर
एक दूसरा चोर
चोर चोर सारे
के सारे चोर
तू भी चोर
मैं भी चोर
कोई छोटा चोर

कोई बड़ा चोर । 


चित्र साभार: www.clipartsheep.com

सोमवार, 29 जून 2015

चोर की देश भक्ति से भाई कौन परेशान होता है

चोर हो तो 
होने से भी
क्या होता है
देश भक्ति
की पाँत में

तो सबसे आगे 

ही खड़ा होता है 

देश भक्ति अलग
एक बात होती है
चोरी करने के
साथ और नहीं
करने के भी
साथ होती है
एक देश भक्त
पूरा ही पर खाली
भगत होता है
एक देश भक्त
होने के साथ साथ
चोर भी छोटा सा
या बहुत बड़ा
भी कोई होता है
समझना देश को
फिर भक्ति को
चोरी चकारी के
साथ होना गजब
और बहुत ही
गजब होता है
संविधान उदार
देश का बहुत ही
उदार होता है
चोर जेल में रहे
या ना रहे
देश का भगत
होने से कुछ भी
कहीं भी कुछ
कम नहीं होता है
क्यों नहीं समझता
है कोई कितना ढेर
सारा काम होता है
सुबह से लेकर
शाम तक कहाँ
आराम होता है
देशभक्ति के
साथ साथ चोरी
चकारी भी कर
ले जाना बस में
सबके नहीं होता है
‘उलूक’ शर्म होनी
चाहिये उसे जो
ना भगत होता है
ना चोर होता है
खाली रोज जिस
नक्कारे के हाथ में
दूसरों को चाटने
के वास्ते काला
रंग भरा हुआ बस
एक कलम होता है
ऐसे ही कुछ देश
भक्तों की खाली
भक्ति के कारण
ही सारा देश
बदनाम होता है ।

चित्र साभार: anmolvachan.in

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

जो जैसा था वैसा ही निकला था गलती सोचने वाले की थी उसकी सोच का पैर अपने आप ही फिसला था

भीड़ वही थी
चेहरे वही थे
कुछ खास
नहीं बदला था
एक दिन इसी
भीड़ के बीच
से निकल कर
उसने उसको
सरे आम एक
चोर बोला था
सबने उसे कहते
हुऐ देखा
और सुना था
उसके लिये उसे
इस तरह से
ऐसा कहना
सुन कर बहुत
बुरा लगा था
कुछ किया
विया तो नहीं था
बस उस कहने
वाले से किनारा
कर लिया था
पता ही नहीं था
हर घटना की तरह
इस घटना से भी
जिंदगी का एक नया
सबक नासमझी का
एक बार फिर
से सीखना था
सूरज को हमेशा
उसी तरह सुबह
पूरब से ही
निकलना था
चाँद को भी हमेशा
पश्चिम में जा
कर ही डूबना था
भीड़ के बनाये
उसके अपने नियमों
का हमेशा की तरह
कुछ नहीं होना था
काम निकलवाने
के क्रमसंचय
और संयोजन को
समझ लेना इतना
आसान भी नहीं था
मसला मगर बहुत
छोटा सा एक रोज
के होने वाले मसलों
के बीच का ही
एक मसला था
आज उन दोनों का
जोड़ा सामने से ही
हाथ में हाथ
डाल कर
जब निकला था
कुछ हुआ था या
नहीं हुआ था
पता ही नहीं
चल सका था
भीड़ वही थी
चेहरे वही थे
कहीं कुछ हुआ भी है
का कोई भी निशान
किसी चेहरे पर
बदलता हुआ
कहीं भी नहीं दिखा था
‘उलूक’ ने
खिसियाते हुऐ
हमेशा की तरह
एक बार फिर
अपनी होशियारी
का सबक
उगलते उगलते
अपने ही थूक के साथ
कड़वी सच्चाई
की तरह
ही निगला था ।

चित्र साभार: davidharbinson.com

रविवार, 23 नवंबर 2014

कुछ नहीं किया जा सकता है उस बेवकूफ के लिये जो आधी सदी गुजार कर भी कुछ नहीं सीख पाता है

रोज की बात है
रोज चौंकता है
अखबार पर
छपी खबर
पढ़ कर के
फिर यहाँ आ आ
कर भौंकता है
बिना आवाज के
कुत्ते की तरह
ऐसा चौंकना
भी क्या और
ऐसा भौंकना
भी क्या
अरे क्या हुआ
अगर एक चोर
कहीं सम्मानित
किया जाता है
ये भी तो देखा कर
एक चोर ही
उसके गले में
माला पहनाता है
अब चोर चोर के
बीच की बात में
तू काहे अपनी
गोबर भरे
दिमाग की
बुद्धी लगाता है
क्या होता है
अगर किसी
बंदरिया को
अदरख़ बेचने
खरीदने का
ठेका दे भी
दिया जाता है
और क्या होता है
अगर किसी
जुगाड़ी का जुगाड़
किसी की भी
हो सरकार
सबसे बड़ा जुगाड़
माना जाता है
बहुत हो चुका
तेरा भौंकना
तेरा गला भी
लगता है
कुछ विशेष है
खराब भी
नहीं होता है
थोड़ा बहुत
कुछ भी
कहीं भी
होता है
खरखराना
शुरु हो
जाता है
समय के
साथ साथ
बदलना
क्यों नहीं
सीखना
चाहता है
खुद का समय
तो निकल गया
के भ्रम से भ्रमित
हो भी चुका है
तो भी अपनी
अगली पीढ़ी को
ये कलाबाजियाँ
क्यों नहीं
सिखाता है
जी नहीं पायेगी
मर जायेगी
तेरी ही आत्मा
गालियाँ खायेगी
तेरी समझ में
इतना भी
नहीं आता है
कौन कह रहा है
करने के लिये
सिखाना है
समझा कर
समझने के लिये
ही उकसाना है
समझने के लिये
ही बताना है
चोरी चकारी
बे‌ईमानी भ्रष्टाचारी
किसी जमाने में
गलत मानी
जाती होंगी
अब तो बस
ये सब नहीं
सीख पाया तो
गंवारों में
गिना जाता है
वैसे सच तो ये है
कि करने वालों
का ही कुछ
नहीं जाता है
नहीं करने वाला
कहीं ना कहीं
कभी ना कभी
स्टिंग आपरेशन
के कैमरे में
फंसा दिया जाता है
इसी लिये ही तो
कह रहा है ‘उलूक’
गाँठ बाँध ले
बच्चों को अपने ही
मूल्यों में ये सब
बताना जरूरी
हो जाता है
करना सीख
लेता है जो
वो तो वैसे भी
बच जाता है
नहीं सीख पाता है
लेकिन जानता है
कम से कम
अपने आप को
बचाने का रास्ता तो
खोज ही ले जाता है ।

चित्र साभार: poetsareangels.com

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

अभी ये दिख रहा है आगे करो इंतजार क्या और नजर आता है

हमाम के चित्र
बाहर ही बाहर
तक दिखाना तो
समझ में आता है
पता नहीं कैमरे
वाला क्यों किसी दिन
अंदर तक पहुँच जाता है
कब कौन सी बात को
कितना काँट छाँट
कर दिखाता है
सामने बैठे
ईडियट बाक्स के
ईडियट ‘उलूक’ को
कहाँ कुछ समझ
में आता है
बहुत बार बहुत से
झाडु‌ओं की कहानी
झाडू‌ लगाने वालों
के मुँह से सुन चुका
होना ही काफी
नहीं होता है
गजब की बात होती है
जब झाडू‌ लगाने वाला
झाडू‌ लगाने से पहले
खुद ही कूड़ा फैलाता है
बहुत अच्छी तरह
से आती है कुछ बाते
कभी कभी समझ में
बेवकूफों को भी
पर क्या किया जाये
कुछ बेवकूफों के
कहने कहाने पर
बेवकूफ कह रहा है
क्यों सुनते हो
बात में दम नजर
नहीं आता है
जैसा ही कुछ कुछ
कह दिया जाता है
और कुछ लोग
कुछ भी नहीं
समझते हैं
या समझना ही
नहीं चाहते हैं
भेड़ के रेहड़ के
भेड़ हो लेते हैं
पता होता है
उनको बहुत ही
अच्छी तरह से
भीड़ की भगदड़
में मरने में भी
मजा आता है
कोई माने
या ना माने
बहुत बोलने से कुछ
नहीं भी होता है
फिर भी बोलते बोलते
कलाकारी से
एक कलाकार
बहुत सफाई से
मुद्दे चोरों के भी
चुरा चुरा कर
चोरों को ही
बेच जाता है ।

चित्र साभार: imageenvision.com

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

तोते के बारे में तोता कुछ बताता है जो तोते को ही समझ में आता है

तोते
कई तरह
के पाये
जाते है

कई रंगों में
कई प्रकार के

कुछ छोटे
कुछ
बहुत ही बड़े

तोतों का
कहा हुआ
तोते ही
समझ पाते हैं

हरे तोते
पीले तोते
की बात
समझते हैं
या पीले
पीले की
बातों पर
अपना ध्यान
लगाते हैं

तोतों को
समझने
वाले ही
इस सब पर
अपनी राय
बनाते हैं

किसी किसी
को शौक
होता है
तोते पालने का

और
किसी को
खाली
पालने का
शौक दिखाने का

कोई मेहनत
कर के
तोतों को
बोलना
सिखा ले
जाता है
उसकी
अपनी सोच
के साथ
तोता भी
अपनी सोच
को मिला
ले जाता है

किसी घर से
सुबह सवेरे
राम राम
सुनाई दे
जाता है

किसी घर
का तोता
चोर चोर
चिल्लाता है

कोई
सालों साल
उल्टा सीधा
करने के
बाद भी
अपने तोते
के मुँह से
कोई आवाज
नहीं निकलवा
पाता है

‘उलूक’ को
क्या करना
इस सबसे

वो जब
उल्लुओं
के बारे में
ही कुछ
नहीं कह
पाता है तो
हरों के हरे
और
पीलों के पीले
तोतों के बारे में
कुछ पूछने पर
अपनी पूँछ को
अपनी चोंच पर
चिपका कर चुप
रहने का संकेत
जरूर दे जाता है

पर तोते तो
तोते होते हैं
और
तोतों को
तोतों का
कुछ भी
कर लेना
बहुत अच्छी
तरह से
समझ में
आ जाता है ।

चित्र साभार: http://www.www2.free-clipart.net/

शनिवार, 27 सितंबर 2014

छोटी चोरी करने के फायदों का पता आज जरूर हो रहा है

चोर होने की
औकात है नहीं
डाकू होने की
सोच रहा है
तू जैसा है
वैसा ही ठीक है
तेरे कुछ भी
हो जाने से
यहाँ कुछ नया
जैसा नहीं
हो रहा है
थाना खोल ले
घर के किसी
भी कोने में
और सोच ले
कुर्सी पर बैठा
एक थानेदार
मेज पर अपना
सिर टिका कर
सो रहा है
देख नहीं रहा है
दूरदर्शन आज का
कुछ अनहोनी सी
खबर कह रहा है
चार साल के लिये
अंदर हो जाने वाली है
और ऊपर से सौ करोड़
जमा करने का आदेश
भी न्यायालय उसको
साथ में दे रहा है
बेचारी को बहुत
महँगा पड़ रहा है
दोस्त देश के
बाहर गया हुआ भी
दो शब्द साँत्वना के
नहीं कह रहा है
समझ में ये नहीं
आ पा रहा है कि
पुराना घास खा
गया घाघ
अभी तक अंदर है
या बाहर कहीं
किसी जगह अब
मौज में सो रहा है
खबर ही नहीं
आती है उसकी
कुछ भी मालूम
नहीं हो रहा है
आज कुछ कुछ
कोहरे के पीछे
का मंजर थोड़ा सा
कुछ साफ जैसा
हो रहा है
बहुत समझदार है
मध्यम वर्गीय चोर
मेरे आस पास का
ये आज ही सालों साल
सोचने के बाद भी
बिना सोचे बस
आज और आज
ही पता हो रहा है
हाथ लम्बे होने
के बाद भी
लम्बे हाथ मारने
का खतरा कोई
फिर भी क्यों
नहीं ले रहा है
बस थोड़ा थोड़ा
खुरच कर दीवार
का रंग रोगन
अपने आने वाले
भविष्य की संतानों
के लिये बनने वाले
सपने के ताजमहल
की पुताई का
मजबूत जुगाड़
ही तो हो रहा है
‘उलूक’ बैचेन है
आज जो भी
हो रहा है
किसी के साथ
इस तरह का
बहुत अच्छा जैसा
तो नहीं हो रहा है
थोड़ी थोड़ी करती
रोज कुछ करती
हमारी तरह करती
तो पकड़ी भी
नहीं जाती
शाबाशियाँ भी कई
सारी मिलती
जनता रोज का रोज
ताली भी साथ में बजाती
सबकी नहीं भी होती तो भी
दो चार शातिरों की फोटो
खबर के साथ अखबार में
रोज ही किसी कालम में
नजर आ ही जाती
दूध छोड़ कर बस
मलाई चोर कर खाने का
बिल्कुल भी अफसोस
आज बिल्कुल भी
नहीं हो रहा है ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

गुरुवार, 15 मई 2014

बहुत जोर की हँसी आती है जब चारों तरफ से चोर चोर की आवाज आती है

सारे हैं शायद
चोर ही हैं
चोर जैसे
दिख तो
नहीं रहे हैं
पर लग रहा है
कि चोर हैं
इसलिये क्योंकि
सब मिलकर
चोर चोर
चिल्ला रहे हैं
किसको कह रहे
हैं चोर चोर
बस यही नहीं
बता रहे हैं
कुछ ऐसा जैसा
महसूस हो रहा है
चोर उसको चोर
कह रहा है
जो चोरों को
बहुत लम्बे
समय से चोरी
करते हुऐ
देख रहा है
कौन क्या क्या
चोर रहा है
उसको सब
पता है
उसको क्या
पता है
ये चोरों को
भी पता है
अब चोरों की
दुनियाँ में
जो चोर नहीं है
सबसे बड़ा
चोर तो वही है
अच्छा है चोरों
की दुनियाँ में
पुलिस नहीं होती है
चोर के पास ही
चोर को सजा में
ईनाम देने की
एक धड़ी होती है
घड़ी घंटी तभी
बजाती है जब
कहीं किसी दिन
चोरी नहीं होने की
खबर आती है
‘उलूक’ को वैसे तो
रात में ही आँख
खोलने में
विश्वास होता है
दिन में उसका
देखा हुआ
देखा जैसा भी
नहीं होता है
उसके घर से
शुरु होते हैं चोर
और कोई भी
मैं चोर हूँ
बिल्कुल भी
नहीं कहता है
मौका मिलता है
जैसे ही थोड़ा
सा कहीं भी
किसी के साथ
मिलकर चोर चोर
जरूर कह लेता है ।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नये साल आना ही है तुझको मुझसे बुलाया नहीं जा रहा है

सोच कुछ और है
लिखा कुछ अलग
ही जा रहा है
हिम्मत ही नहीं
हो रही है कुछ भी
नहीं कहा जा रहा है
केजरीवाल बनने की
कोशिश करना
बहुत महंगा
पड़ता जा रहा है
आम आदमी की
टोपी वाला कोई
भी साथ देने
नहीं आ रहा है
ऐसा ही कुछ अंदाज
पता नहीं क्यों
आ रहा है
ऐसा नहीं है
मैं एक
चोर नहीं हूँ
कह देना
मान लेना
बस इतनी ही
हिम्मत जुटाना
नहीं हो
पा रहा है
कह दिया जाये
यहाँ क्या
हो रहा है
और क्या
बताया
जा रहा है
किसी को
क्या नजर
आ रहा है
कहाँ पता
चल पा रहा है
मुझे जो
दिख रहा है
उसे कैसे नजर
नहीं आ रहा है
बस यही
समझ में
नहीं आ
पा रहा है
कुत्ते की
फोटो दिखा
दिखा कर
शेर कह दिया
जा रहा है
कुत्ता ही है
जो जंगल को
चला रहा है
बस मुझे ही
दिख रहा है
किसी और को
नजर नहीं आ
पा रहा है
हो सकता है
मोतिया बिंद
मेरी आँख में
होने जा रहा है
सफेद पोश होने
का सुना है एक
परमिट अब
दिया जा रहा है
कुछ ले दे के
ले ले अभी भी
नहीं तो अंदर
कर दिया
जा रहा है
है बहुत कुछ
उबलता हुआ
सा कुछ
लिखना भी
चाह कर
नहीं लिखा
जा रहा है
नये साल में
नया एक
करिश्मा
दिखे कुछ
कहीं पर
सोचना चाह
कर भी
नहीं सोच
पा रहा है
साल के
अंतिम दिन
'उलूक'
लगता है
खुद शिव
बनना चाह
रहा है
थर्टी फर्स्ट
के दिन
बस दो पैग
पी कर ही
जो लुढ़क
जा रहा है ।

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

तिनका दाढ़ी और चोर

अब अपने खेत
में भी अपना
अनाज उगाना
जैसे कोई गुनाह
होते जा रहा है
जिसे देखो जोर
लगा कर पूछते
हुऎ जरा भी
नहीं शरमा रहा है
भाई तू आजकल
दाढ़ी रखे हुऎ
शहर के अंदर
खुले आम क्यों
नजर आ रहा है
दाढ़ी रखना जैसे
मातम का कोई
निशां हुऎ जा रहा है
कोई मुँह के कोने
से मुस्कुरा रहा है
जैसे मेरा कुलपति
मेरे लिये अलग से
कोई 
दाढ़ी इंक्रीमेंट
का जी ओ लेकर
अभी अभी
आ रहा है
दूसरा 
दाढ़ी और
मेरी उम्र का
हिसाब लगा रहा है
बगल वाले से कह
रहा है ये शायद
अवकाश गृहण कर
के घर आ रहा है
तीसरे को भी बहुत
मजा सा आ रहा है
दाढ़ी को काला
करने का सस्ता
जुगाड़ मुफ्त में
समझा रहा है
एक तो इतना
गुस्ताख हुआ
जा रहा है
दाढ़ी तुमपर
बिल्कुल नहीं
जम रही है
कहे जा रहा है
हद देखिये
तुम्हारी पत्नी
तुम्हारी पुत्री
नजर आने लगी है
तक कहने से
बाज नहीं आ रहा है
आगे पता नहीं
कौन कौन से
प्रश्न ये 
दाढ़ी
सामने लेकर
आ रही है
लोगों को पता
नहीं साफ साफ
क्यों नहीं बता
पा रही है
दाढ़ी वाला भारी
तिनका अब
अपनी जेब में
नहीं छुपा पा
रहा है
इसलिये 
दाढ़ी
उगाये चला
जा रहा है
यही तिनका अब
दाढ़ी में सारे
शरीफों को
दूर ही से नजर
आ रहा है
इसलिये कुछ ना
कुछ राय 
दाढ़ी पर
जरूर ही दे कर
जा रहा है ।

शनिवार, 5 मई 2012

चोर ना ना कामचोर

बहाने के ऊपर
जब बहाने
को चढ़ाते हैं
बहाने का समुंदर
कब वो लबालब
भर ले जाते हैं
पता कुछ कहाँ
कोई कर पाते हैं
अंदाज उस समय
ही आ पाता है
जब बहानेबाज
के जाने के बाद
हर कोई अपने को
बहाने में बहा
हुआ पाता है
ठगा सा
रह जाता है
बहाने बनाते बनाते
कुछ बहानेबाज
इतना भावुक
हो जाते हैं कि
सामने वाले
की आँखों
में आंसूँ भर
ही आते हैं
बहाने कितनी
आसानी से
किस समय
सच्चाई में
ढाल ले जाते हैंं
कितने
कलाकार हैं
उस समय
बताते है
हम देखते
रह जाते हैं
भावावेग प्रबल
हो जाता है
हर बहाना
सामने वाले
की समझ
में आता है
वो बेवकूफ
की तरह
ये दिखाता है
बहाना बनाया
तो जा रहा है
पर उसकी
समझ में
बिलकुल भी
नहीं आ रहा है
इसी तरह बहाना
बनाया जाता है
फिर भी
अन्जाने में वो
बहाना कब
सामने वाले को
बहा ले जाता है
अन्दाज ही नहीं
कोई लगा पाता है
मालूम रहता है 
वो जब भी आता है
बहाना बनाता है
बहुत अच्छा बनाता है।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

बदल भी जाइये

बातों को हलके से लेना
अब तो सीख भी जाइये
इतना गौर जो फरमाया
करते थे भूल भी जाइये
छोटे छोटे थाने अब तो
ना ही खुलवाइये
जो खुल चुके हैं पहले से
हो सके तो बंद करवाइये
छोटे चोर उठाईगीरों को
बुला बुला के समझाइये
समय बदल चुका है
स्कोप बढ़ते जा रहा है
कोर्स करके आइये
और तुरंत प्लेसमेंट
भी पाईये
ऎसे मौके बार बार
नहीं आते एक
मौका आये तो
हजारों करोड़ो पर
खेल जाइये।
चोरी डाके की कोचिंग
हुवा करती है कहीं दिल्ली में
एक बार जरूर कर ही आइये
अब ऎसे भी ना शर्माइये
काम वाकई में आपका
गजब का हुवा करता है
लोगों को मत बताइये
खुले आम मैदान में
खुशी से आ जाईये
जेल नहीं जाईये
मैडल पे मैडल पाइये।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

आशा है

समय के साथ
कितने माहिर
हो जाते हैं हम
चोरी घर में
यूँ ही
रोज का रोज
करते चले
जाते हैं हम
दिल्ली में चोर
बहुत हो गये हैं
जागते रहो
की आवाज भी
बड़ी होशियारी से
लगाते हैं हम
बहुत सारे चोर
मिलकर बगल
के घर में लगा
डालते हैं सेंघ
पर कभी कभी
पड़ोस में ही
होकर हाथ मलते
रह जाते हैं हम
चलो चोरी में
ना मिले हिस्सा
कोई बात नहीं
बंट जायेगा चोरी
का सामान कल
कुछ लोगों में जो
हमारे सांथ नहीं
फिर भी आशा
रखूंगा नहीं
घबराउंगा
बड़े चोर पर ही
अपना दांव
लगाउंगा
आज कुछ भी
हाथ नहीं
आया तो भी
बिल्कुल नहीं
पछताउंगा
कभी तो बिल्ली
के भाग से
छींका जरुर
टूटेगा और
मैं भी अपनी
औकात से
ज्यादा लपक के
ले ही आउंगा।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

हिम्मत कर छाप

कुछ
सोचते हैं
कुछ
छांटते हैं
फिर
छलनी से
उठा कुछ
छापते हैं
क्योंकि
सच
छन जाते हैं
छोटे होते हैं
छनित्र में
चले जाते हैं

चलिये
करते हैं कुछ
उलटफेर
थोड़ा अंधेर

सभी
करना करें
शुरू
स्टेटस अपडेट
छलनी से नहीं
छनित्र से
उठा
दें कुछ
छाप यहां
बिना किसी
लाग लपेट

बबाल शुरू
हो जायेंगे
बगलें
झांकते हुवे
एक एक कर
ज्यादातर
फरमायेंगे
गलत चीजें
यहां छापी
जा रही हैं
संविधान की
फलाँ फलाँ
धारा बेशरमी
से लाँघी
जा रही है

एक सच
को
बता कर
स्पैम
रिपोर्ट
फटाफट
कर दी
जायेगी
पोस्ट
तुरन्त
डीलिट कर
सूचना
प्रसारित
की जायेगी

हो गयें है
प्रोफाईल
चोरी
चोर हैं जो
छाप
रहे हैं
अपने ही
अंदर की
कमजोरी ।

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