उलूक टाइम्स: कविता को टेढ़ा मेढ़ा नहीं सीधे सीधे सीधा लिखा जाता है

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

कविता को टेढ़ा मेढ़ा नहीं सीधे सीधे सीधा लिखा जाता है


मन करता है किसी समय
एक सादे सफेद पन्ने पर
खींच दी जायें कुछ आड़ी तिरछी रेखायें

फिर बनाये जायें कुछ नियम
उन आड़ी तिरछी
रेखाओं के आड़े पन और तिरछे पन के लिये

जिससे आसान हो जाये समझना
किसी भी आड़े और तिरछे को
कहीं से भी कभी भी सीधे खड़े होकर

बहुत कुछ बहुत सीधा सीधा दिखता है
मगर बहुत ही टेढ़ा होता है
बहुत कुछ टेढ़ा दिखता है
टेढ़ा दिखाता है
जिसको सीधा करने के चक्कर में
सीधा करने वाला खुद ही टेढ़ा हो जाता है

टेढ़े होने ना होने का
कहीं कोई नियम कानून भी नजर नहीं आता है
ऐसा भी नहीं होता है
टेढ़ा हो जाने के कारण कोई टेढ़ी सजा भी पाता है

नियम कानून व्यवस्था के सवाल
अपनी जगह पर होते हैं
लेकिन सीधा सीधा है का पता
टेढ़ों के साथ रहने उठने बैठने के साथ ही
पता चल पाता है

‘उलूक’ लिखने दे
सब को उन के अपने अपने नियमों के हिसाब से
सीधा होने की कतई जरूरत नहीं है
कुछ चीजें टेढ़ी ही अच्छी लगती हैं
उन्हें टेढ़ा ही रहने दिया जाता है

क्यों झल्लाता है
अगर तेरे लिखे को किसी से भूल वश
कविता है कह दिया जाता है ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 61 पृ144 

7 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (12-07-2015) को
      "उलूक टाइम्स की एक पोस्ट का पोस्टमार्टम" (चर्चा अंक-2034)
      (चर्चा अंक- 2034) पर भी होगी।
      --
      सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
      --
      चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
      जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
      हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
      सादर...!
      डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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