उलूक टाइम्स: स्थापना दिवस
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शनिवार, 1 दिसंबर 2018

पुर्नस्थापितं भव


समर्पित समाज के लिये समर्पित
करता रहता है समय बे समय
अपना सब कुछ अर्पित

छोटे से गाँव से शुरु किया सफर 
शहर का हो गया कब
रहा हमेशा इस सब से बेखबर

नाम बदलता चलता चला गया

स्कूल से कालेज कालेज से विद्यालय
विद्यालय से विश्वविद्यालय हो गया

अचानक सफर के बीच का एक मुसाफिर
आईडिया अपना एक दे गया काफिर

स्थापना दिवस स्थापित का मनाना शुरु हो गया
एक तारा दो तारा से पाँच सितारा की तरफ
उसे खिसकाया जाना शुरु हो गया

देश के विकास की तरफ दौड़ने की कहानी
उसी बीच कोई आ कर सुनाना शुरु हो गया

नाक की खातिर किसी की नाक को
कुछ खुश्बू सी महसूस हुई
ना जाने किस मोड़ पर

नाक के ए बी सी डी से
ए को उठा ले आने का
जोड़ तोड़ करवाना शुरु हो गया

ए आया जरा सा भी नहीं शर्माया

बेशरम का रोज का ही
जगह जगह छप कर आना शुरु हो गया

निमंत्रण समर्पित जनता को
कब किसने दिया ना जाने

गायों को अपनी सुबह सुबह
छोड़ने आना शुरु हो गया

कारें स्कूटर घर की
जगह जगह खड़ी होने लगी

गैराज मुफ्त का
सब के काम आना शुरु हो गया

कुत्ते बकरियाँ बन्दर
सब दिखायी देने लगे घूमते
शौक से बिना जंगल का
चिड़ियाघर नजर आना शुरु हो गया

खेल कूद के मैदान में खुशियाँ बटने लगी
समय समय पर 
शादी विवाह कथा भागवत का पंडाल
बीच बीच में कोई बंधवाना शुरु हो गया

तरक्की के रास्ते खुलते चले गये

हर तीन साल में ऊँचाइयों की ओर ले जाने के लिये
एक कुछ और ऊँचा आ कर
ऊँचाईयाँ समझाना शुरु हो गया

क्या कहे क्या छोड़ दे कुछ कहता ‘उलूक’ भी

भीड़ में शामिल हो कर भीड़ के गीत में 
भीड़ का सिर नजर आने से

पुनर्मूषको भव: कथा को याद करते हुऐ
सब कुछ कहने से कतराना शुरु हो गया

जो भी हुआ जैसा हुआ
निकल गया दिन स्थापना का

फिर से स्थापित हो कर एक मील का पत्थर
अगले साल के स्थापना दिवस की आस लेकर

फिर से उल्टे पाँव भागना शुभ होता है
समझाना शुरु हो गया ।