उलूक टाइम्स: उलझना
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

खा गालियाँ गिन नाले बनते बड़े छोटी होती नालियों से क्या उलझना

 

१९४७ और उससे पहले का देखा नहीं कुछ भी कही
बस कुछ पढ़ा कुछ सुना
किससे सुना ये ही मत पूछ बैठना
दिखा बना बैठा कुछ तुनतुना कुछ भुनभुना

नहीं देखा ना सुना जैसा है आसपास अभी अपने
तू गीत तरन्नुम में गा गुनगुना
लिखे में तेरे दिख रहा है साफ़ साफ़
कहीं तो बटा है और इफरात में झुनझुना

शब्द आते हैं जुबां तक बहुत ही सड़े गले
सारे रोक ले कुछ भी मत सुना
निगल ले गरल बन शिव कर तांडव घर के अन्दर
बस बाहर ना निकलना

कुत्ते को सिखा योग और आसन
खुद सीख ले कुछ काटना कुछ भौंकना
भगवान में ढूंढ थोड़ा सा आदमी और सीख ले
आदमी में भगवान को चेपना

‘उलूक’ हो जो भी दिखा कुछ और ही
सबसे बड़ा है आज का लपेटना
खा गालियाँ गिन नाले बनते बड़े
छोटी होती नालियों से क्या उलझना

चित्र साभार: https://www.alamy.com/

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

सपने लिखने के लिये नहीं देखने के लिये रखना

इतना सब
उट पटांग
लिखने से
अच्छा ये नहीं है
कि कुछ सपने
ही देख लो
कुछ सपने
ही लिख लो
क्या सपने भी
नहीं आते हैं अब
किसे क्या
बताया जाये
किसे क्या
समझाया जाये
सपने किसे
नहीं आते हैं
कहने को सभी
कोशिश करते हैं
बड़े सपने
देखने के लिये
उकसाते भी हैं
पर सपने भी तो
वही सब कुछ
दिखाते हैं जैसा
आस पास अपने
सब देख सुन कर
रोज सो जाते हैं
फिर भी कुछ
सपने अपने
होते ही हैं
किसी से भी
साझा नहीं
किये जाते हैं
रोज बनते हैं
एक नहीं कई
हो जाते हैं
जमा होते रहते हैं
जैसे बैंक के खाते
में चले जाते हैं
कुछ लोग याद
नहीं रखते हैं
कुछ बार बार
देखना चाहते हैं
जैसे एक पुराने
रद्दी अखबार के
ढेर में से कभी
पुराना एक
अखबार निकाल कर
एक पुरानी खबर
ढूँढना शुरु हो जाते हैं
मनमाफिक मिल
गया होता है
चले आते हैं
नहीं मिलता है अगर
अखबार के ढेर से
फिर उलझ जाते हैं
अच्छे होते हैं सपने
ढेर सारे सपनों के
ढेर से उलझना
एक निकालकर उसे
उलटना पलटना
फिर जहाँ से
उठाया गया हो
वहीं उसी जगह
एक तह किये गये
कपड़े की तरह
रख देना
फिर कभी किसी दिन
निकाल कर देख
लेने के लिये
बाकी करने को
बहुत कुछ होता है
करते चले जाना
कुछ इसका गिराना
कुछ उसका लुढ़काना
बस इस सब में
सपने कभी मत
लिख देना
गलती से भी
ऐसी बेवकूफी
भूल कर भी कभी
मत कर जाना
लिखना रोज
यहाँ भी आना | 

सोमवार, 11 नवंबर 2013

उलझन उलझी रहे अपने आप से तो आसानी हो जाती है

उलझाती है
इसीलिये तो
उलझन
कहलाती है

सुलझ गई
किसी तरह
किसी की तो
किसी और
के लिये यही
बात एक
उलझन
हो जाती है

अब उलझन का
क्या किया जाये
कुछ फितरत में
होता है किसी के
उलझना किसी से

कुछ के नहीं होती है
अगर कोई उलझन
पैदा कर दी जाती हैं
उलझने एक नहीं कई

कहीं एक सवाल
से उलझन
कहीं एक बबाल
से उलझन

किसी के लिये
आँखें किसी की
हो जाती हैं उलझन

किसी के लिये
जुल्फें ही बन
जाती हैं उलझन

सुलझा हुआ
है कोई कहीं
तो आँखिर है कैसे
बिना यहां
किसी उलझन

उलझनों का
ना होना किसी
के पास ही
एक आफत
हो जाती है

अपनो को तक पसंद
नहीं आती है ये बात

इसीलिये पैर
उलझाये जाते है
किसी के किसी से

घर ही के अपने
बनाते हैं कुछ
ऐसी उलझन

सबकी होती है
और जरूर होती है
कुछ ना कुछ उलझन

अपनी अपनी अलग
तरह की उलझन
देश की उलझन
राज्य की उलझन
शहर की उलझन
मौहल्ले घर
गली की उलझन

उलझन होती है
होने से भी
कुछ नहीं होता है
वो अपनी जगह
अपना काम करती है
उलझाने का

पर उलझने को कौन
कहाँ तैयार होता है
अपनी उलझन से
उसे तो किसी
और की उलझन
से प्यार होता है

सारी जिंदगी
उलझने यूं ही
उलझने रह जाती हैं

सबकी अपनी
अपनी होती हैं
कहाँ फंसा पाती हैं

अपनी जुल्फों को
देखने के लिये
आईना जरूरी होता है
सामने वाले की जुल्फ
साफ नजर आती है

आसानी से
सुलझाई जाती हैं
अपनी उलझन
अपने में ही
उलझी रह जाती है ।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

पैंतरे


चाँदनी में मिलने की बात
अब करने लगे हैं वो ।
जान गये हैं शायद
दिये से घबराने लगा हूँ मैं ।।


साँथ उड़कर समंदर पार
करने का वादा भी है ।
मेरे पर कटने की खबर
भी मिल गयी है उनको ।। 


अपने गेसू मे उलझा के
आँखों में डुबोने को हाँ कह गये ।
जालिम ने महसूस कर लिया
मेरा खुद से उलझना शायद ।।


वो हँसते खिलखिलाते हैं
शहनाईयों सा अब ।
मेरे कानों मे अब तो
मेरी आवाज ही नही जाती ।।


सालों इसी बात का
इंतजार किया उसने ।
अब जाकर कहीं बरबादी
का नज़ारा लूंगी जीभर ।।