उलूक टाइम्स: गिरगिट
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रविवार, 31 मई 2026

तिलचट्टे तिलचट्टे तिलचट्टे बस तिलचट्टे



सभी यहीं हैं कई कई हैं
यट्टे बट्टे सट्टे कट्टे
कितने कितने गिनते गिनते
मौज मनाते तिलचट्टे

इसने लिक्खे उसने लिक्खे
शब्द जोड़ कर हट्टे कट्टे
हवा में उड़ते फर फर फिरते
खिल खिलाते तिलचट्टे

इसके खाए उसके खाए
राजा लाए चोखे लिट्टे
खुशबू पाए घर घर जाए
पाले पोसे तिलचट्टे

किसने पढ़ने किसने लिखने
ढोल बजाते गिरगिट गिट्टे
आंख मूद कर कूद कूद कर
गाने गाएं तिलचट्टे

जिसकी सुलगी उसने उगली
गली गली कित्ते कित्ते
तुलसी सूर कबीर जायसी
लगते आज बित्ते बित्ते

छोड़ ‘उलूक’ मना मौज
रहने दे खुजली
घिस घर पर ही सिलबट्टे
लिखने दे लिखते रहते हैं
उड़ते गिरते चिढ़ते चिढ़ते
तिलचट्टे ही तिलचट्टे |

चित्र साभार: https://www.vecteezy.com/

मंगलवार, 19 मार्च 2019

इस होली पर दिखा देता हजार रंग गिरगिट क्या करे मगर चुनाव उसके सामने से आ जाता है

होली

खेल
तो सही

थोड़ी सी

हिम्मत की
जरूरत है

सात रंग
तेरे
बस में नहीं

तेरी
सबसे बड़ी
मजबूरी है

बातों
में तेरे
इंद्र भी
दिखता है

धनुष भी

तू
किसी तरह
भाषण में
ले आता है

इन्द्र धनुष
लेकिन
कहीं भी

तेरे
आस पास
दूर दूर तक
नजर
नहीं आता है

रंग ओढ़ना

कोई
तुझसे सीखे

इसमें कोई
शक नहीं है

होने भी
नहीं देगा
तू

तेरे
शातिर
होने का

असर
और पता

मेरे
घर में

मेरे
अपनों की

हरकत से
चल जाता है

कुत्तों
की बात

इन्सानों
के बीच में

कहीं पर
होने लगे

अजीब
सी बात
हो जाती है

आठवाँ
आश्चर्य
होता है

जब
आदमी भी

किसी
के लिये

कुत्ते
की तरह
भौंकना

शुरु
हो जाता है

सारे रंग
लेकर
चले कोई
उड़ाने
भी लगे

किसे
परेशानी है

घर का
मुखिया
ही बस

एक लाल
रंग के लिये

वो भी
पर्दा
डाल कर

पीछे
पड़ जाता है

तो
रोना आता है

मुबारक
हो होली

सभी
चिट्ठाकारों को

टिप्पणी
करने
वालों

और
नहीं करने
वालों को भी

टिप्पणी
के साथ
मुफ्त
टिप्पणी
के ऑफर
के साथ

इन्सान
ही होता है

गलती
से चिट्ठा भी
लिखने लगता है

चिट्ठाकारों
में शामिल
भी हो जाता है

‘उलूक’
को तो
वैसे भी

नहीं
खेलनी है
होली

इस होली में

बिरादरी में
किसी का
मर जाना

त्यौहार ही
उठा
ले जाता है ।

चित्र साभार:
https://www.theatlantic.com/

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

सारे कुकुरमुत्ते मशरूम नहीं हो पाते हैं

जंगल
में उगते हैं

कुकुरमुत्ते

कोई
भाव नहीं
देता है

उगते
चले
जाते हैं


बिना
खाद
पानी के

शहर
में सब्जी
की दुकान पर

मशरूम
के नाम पर

बिक जाते हैं
कुकुरमुत्ते

अच्छे
भाव के साथ

चाव से
खाते हैं लोग

बिना
किसी डर के

गिरगिट
की तरह
रंग
बदल लेना

या फिर

कुकुरमुत्ता
हो जाना

होते
नहीं हैं
एक जैसे

बहुत से
गिरगिट

रंग बदलते
चले जाते हैं

इंद्रधनुष
बनने की
चाह में

पर उन्हेंं
पता ही
नहीं चल
पाता है

कि
वो

कब
कुकुरमुत्ते
हो गये

कुकुरमुत्तों
की भीड़
में उगते हुवे

मशरूम
भी नहीं
हो पाये।

रविवार, 20 नवंबर 2011

रंग

आदमी भी
तो बदलता
है कई रंग
पर नहीं सुना
कभी उसे
किसी के द्वारा
बुलाते हुवे
'ऎ इन्द्र धनुष'
आज जब
वो पारंगत
हो चुका है
कई रंग
बदलने में
फिर भी
कहलाया जा
रहा है
केवल एक
'गिरगिट'।