उलूक टाइम्स: सरगोशियों के स्वर
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बुधवार, 26 अगस्त 2026

एक छात्र की समीक्षा "सरगोशियों के स्वर" की

 

          

पुस्तक समीक्षा : सरगोशियों के स्वर
समीक्षक : गौरव कांडपाल
एम0 एससी 0 भौतिक विज्ञान,
बी0 एड0 अध्ययनरत

हाल ही में मुझे अपने विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार जोशी जी द्वारा लिखित कविता-संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ पढ़ने का अवसर मिला। इस संग्रह को पढ़ते हुए मेरे मन में बार-बार यह बात आई कि ये कविताएँ आखिर किन परिस्थितियों में लिखी गई होंगी। हो सकता है इनमें से कई कविताएँ पाँच-दस साल पहले लिखी गई हों और उस समय की किसी खास घटना या परिस्थिति से जुड़ी रही हों। मुझे उन सभी संदर्भों की जानकारी नहीं है, लेकिन पढ़ते समय मुझे बार-बार लगा कि इनमें उठाए गए सवाल आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं। कई जगह ऐसा लगा जैसे कवि ने उस समय नहीं, बल्कि आज के समय को देखकर लिखा हो।

यह कविता-संग्रह केवल प्रकृति या व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित नहीं है। इसमें समाज, राजनीति, धर्म, व्यवस्था, भ्रष्टाचार, पर्यावरण और इंसान की बदलती संवेदनाओं से जुड़ी बातें भी आती हैं। कवि हर जगह सीधे-सीधे अपनी बात नहीं कहता, बल्कि कई बार व्यंग्य के जरिए ऐसी बात कह जाता है जिस पर पढ़ने के बाद रुककर सोचना पड़ता है। यही बात मुझे इस संग्रह की खास बात लगी।

मिसाल के तौर पर ‘आपदा’ कविता को पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह सिर्फ किसी प्राकृतिक आपदा की बात नहीं करती। इसके पीछे उस व्यवस्था पर भी सवाल है जो आपदा आने के बाद अचानक सक्रिय दिखाई देती है—घोषणाएँ होती हैं, नेता आते हैं, भाषण होते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब फिर पहले जैसा हो जाता है। आज भी जब किसी बड़ी घटना के बाद ऐसा ही देखने को मिलता है, तो यह कविता अपने आप आज के समय से जुड़ जाती है।

इसी तरह कुछ कविताएँ धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर पैदा होने वाले विरोधाभासों पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। ‘किसी को कैसे बताऊँ अपना धर्म’ और ‘राम ही राम हैं चारों ओर’ जैसी कविताओं में धार्मिक पहचान और उसके आसपास के सामाजिक व्यवहार पर व्यंग्य दिखाई देता है। मुझे यह अच्छा लगा कि कवि पाठक को यह नहीं बताता कि उसे क्या सोचना चाहिए। वह बस एक स्थिति सामने रख देता है और सवाल अपने आप मन में आने लगते हैं।

संग्रह की कुछ कविताएँ पढ़ते हुए मुझे आज की व्यवस्था और आम आदमी की स्थिति भी दिखाई दी। एक जगह कवि लिखते हैं कि “असली सब छिपा कर रोज कुछ नकली हाथ में थमा जाता है।” यह पंक्ति मुझे आज के समय की एक बड़ी विडंबना जैसी लगी। कई बार असली समस्याएँ और जरूरी सवाल पीछे छूट जाते हैं और हमारे सामने कुछ ऐसा रख दिया जाता है जो शायद देखने में बहुत महत्वपूर्ण लगे, लेकिन असली मुद्दों से ध्यान हटा दे। इसी तरह कविताओं में आम आदमी की वह बेबसी भी महसूस होती है जो रोजमर्रा की परेशानियों और व्यवस्था के बीच कहीं फँसा हुआ है। शायद यही वजह है कि ये कविताएँ आज भी इतनी सटीक लगती हैं।

इस संग्रह में मुझे सबसे ज्यादा इसका व्यंग्य प्रभावित करता है। यह ऐसा व्यंग्य नहीं है जो सिर्फ हँसाने के लिए हो। कई बार कविता पढ़कर हल्की-सी मुस्कान आती है, लेकिन फिर लगता है कि बात कहीं न कहीं हमारे समाज और शायद हम पर ही हो रही है। कई कविताओं में आने वाला ‘उलूक’ भी मुझे एक ऐसे पात्र की तरह लगा जो चीजों को देखता है, सवाल करता है और कई बार खुद पर भी कटाक्ष कर देता है।

भाषा की बात करूँ तो मुझे यह संग्रह पढ़ने में कठिन नहीं लगा, लेकिन कुछ कविताओं का मतलब पहली बार में पूरी तरह समझ में नहीं आता। उन्हें दोबारा पढ़ने पर कुछ और अर्थ निकलते हैं। कवि रोजमर्रा की चीजों, प्रकृति और परिचित प्रतीकों का इस्तेमाल करता है।

पानी, रोशनी, आसमान, बीज, राम, रावण और हिमालय जैसी चीजें कविता में सिर्फ अपने सामान्य अर्थ तक सीमित नहीं रहतीं। हिमालय और बर्फ से जुड़ी कविताओं में बदलते पर्यावरण और खोते हुए प्राकृतिक सौंदर्य की चिंता भी दिखाई देती है।

मेरे लिए इस पुस्तक की सबसे बड़ी बात इसकी आज के समय में प्रासंगिकता रही। आज भी हम भ्रष्टाचार, व्यवस्था की कमियों, धार्मिक तनाव, पर्यावरण और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता जैसी बातों से जूझ रहे हैं। संग्रह की कई कविताएँ पढ़ते हुए लगा कि ये विषय पुराने नहीं हुए हैं। हो सकता है कविता किसी खास घटना को ध्यान में रखकर लिखी गई हो, लेकिन उसके पीछे जो समस्या थी, वह किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद है।

यह भी सच है कि संग्रह की हर कविता पहली बार पढ़ते ही पूरी तरह समझ में नहीं आती। कुछ कविताएँ सीधी हैं, जबकि कुछ को पढ़कर थोड़ा रुकना और दोबारा सोचना पड़ता है। लेकिन मुझे यह इसकी कमी नहीं लगी। कई जगह कविता खत्म होने के बाद भी उसका सवाल दिमाग में बना रहता है।

‘सरगोशियों के स्वर’ को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि यह संग्रह उन बातों की ओर ध्यान दिलाता है जिन्हें हम रोज देखते तो हैं, लेकिन शायद उन पर रुककर सोचते नहीं हैं। समाज के कई विरोधाभास हमारे सामने होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे इतने सामान्य लगने लगते हैं कि हम उन पर सवाल करना ही छोड़ देते हैं। यह संग्रह उन्हीं सवालों को फिर से हमारे सामने रखता है।

अंत में, मेरे विचार से डॉ. सुशील कुमार जोशी का ‘सरगोशियों के स्वर’ ऐसा कविता-संग्रह है जिसे पढ़ते हुए सिर्फ कविता नहीं पढ़ी जाती, बल्कि अपने आसपास के समाज को भी थोड़ा अलग नजर से देखने का मन करता है। इसमें व्यंग्य है, सवाल हैं, बेचैनी है और कई जगह एक गहरी पीड़ा भी महसूस होती है।

मुझे इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात यही लगी कि इसकी कई कविताएँ अपने लिखे जाने के समय से आगे निकलकर आज भी अर्थपूर्ण लगती हैं। शायद यही किसी रचना की ताकत होती है—समय और घटनाएँ बदल जाएँ, लेकिन उसके सवाल पूरी तरह पुराने न पड़ें। ‘सरगोशियों के स्वर’ पढ़ने के बाद मेरे मन में यही बात सबसे ज्यादा रह गई।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

"सरगोशियों के स्वर" का विमोचन


बिन्सर की सुरम्य वादियों में बादलों वाले आसमान के नीचे
'फारेस्ट विस्प' में एक साहित्यिक चर्चा !

गिर्दा कहते थे :=
“सावनी साँझ आकाश खुला है ओ हो रे ओ दिगौ लाली।
छानी खरीकों में धुआं लगा है ओ हो रे ओ दिगौ लाली।
थन लागी बाछी कि गै पंगुरी है द्वी - द्वा, द्वी - द्वा दुधी धार छूटी है
दुहने वाली का हिया भरा है ओ हो ये मन धौ धिनाली ओ हो रे ओ दिगौ लाली”।
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             ऐसी ही एक सावनी सांझ में एक बहुत अच्छी पुस्तक, जिसको एक बहुत अच्छे इंसान ने रचा है, के विमोचन समारोह में शामिल होने का अवसर मिला।  साहित्य में अगर आज के समय की चिन्ताएं नहीं हैं तो वह साहित्य, साहित्य नहीं है। वो बस काले या नीले किये पन्ने मात्र हैं।
             इस तरह प्रो0 सुशील जोशी जी का कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ अपने आप में एक वक्तव्य है बदले हुए समाज में फैलती विद्रूपताओं के खिलाफ़। सुशील सर का रचना संसार नया नहीं है। वे काफी समय में अपने समय की चिंताओं पर बात करते आये हैं। सुमित्रा नन्दन पन्त कहते हैं “आह से उपजा होगा गान”। ये जो आह है ये जो पीड़ा है, ये ही कविता बनती है। जब आप जिया हुआ सच लिखते हैं तो वो और प्रभावी हो जाता है। ऐसी ही कुछ बात ‘सरगोशियों के स्वर’ में है। 
              आज की इस साहित्यिक चर्चा में कुमाऊं विश्वविद्यालय के हिंदी के आचार्य डॉ देव सिंह पोखरिया जी को सुनने के अवसर मिला। उन्होंने कहा कि कवि को अपने लिए और दूसरों के लिए निर्मम होना होगा। तभी सच लिखा जा  सकेगा। कविता और साहित्य का समाज को बदलने में क्या योगदान है इस पर भी उन्होंने बात की। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर जगत सिंह बिष्ट जी ने कविता संग्रह की बहुत सारी कविताओं को हमारे सामने रखा और उनके भाव पर बातचीत की। बदलते हुए समय में ये कवितायें कैसे महत्वपूर्ण हैं इस पर भी बिष्ट सर ने दृष्टि डाली। इसके बाद मशहूर रंगकर्मी और कवि नवीन बिष्ट जी ने सुशील सर के रचना संसार पर बात की। उनके ब्लॉग उलूक टाइम्स की चर्चा की। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में सांख्यिकी विभाग के विभागाध्यक्ष  प्रोफेसर नीज तिवारी जी ने इन कविताओं के समसामयिकता पर बात की और बताया कि ये रचनायें कैसी आज प्रासंगिक हैं।
               इसी क्रम में प्रधानाचार्य इंटर कॉलेज स्यालीधार श्री उमेश पाण्डे जी ने वर्तमान समय में शिक्षक और विद्यार्थियों के सम्बन्धों और सुशील जोशी सर की जीवन शैली और सिद्धांतों पर बात की। साथ उनके पिता के जीवन चरित्र पर भी प्रकाश डाला। फोटोग्राफर और अध्येता श्री जय मित्र बिष्ट जी ने सुशील सर के बहु आयामी व्यक्तित्व और डॉ शमशेर सिंह बिष्ट जी के साथ उनके सम्बन्धों को याद किया। साथ ही अपनी फोटो ग्राफी की पुस्तक भी उन्हें भेंट की। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में जनसंचार एवं पत्रकारिता के प्राध्यापक डा0 ललित जोशी ने आज की बातचीत को अंतरानुशासनिक बताते हुए ये उम्मीद जताई कि ऐसी चर्चाएं भविष्य में होती रहेंगे। सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय प्राणिविज्ञान के प्राध्यापक डॉ अरुण ने अपनी बातचीत में कविता संग्रह को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ा और संग्रह की प्रशंसा की।
              सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय के छात्र और एक अच्छे पाठक गौरव कांडपाल ने कविता संग्रह से कुछ कवितायें बहुत उतार-चढाओं के साथ पढ़ी और उनको समकालीन स्थितियों से जोड़ा। युवा साईक्लिस्ट दिनेश दानु ने युवाओं के जीवन में खेलों और फिट रहने और अपनी संस्कृति, धरोहर के संरक्षण पर चर्चा की। अंत में 'फारेस्ट विस्प' के संचालक और सुशील सर के पुत्र अभिषेक ने अपने पिता की  कविताओं पर बात की और सबको  धन्यवाद दिया।
              आज की ये चर्चा बिलकुल अनौपचारिक थी जिसमें सबको खुलकर बोलने का अवसर मिला। साहित्य की यही विशेषता है कि वह वाचाल को मृदुभाषी और कम बोलने वाले को विचार व्यक्त करना सिखा देता है। सुशील सर के कारण आज ये सम्भव हो सका। चर्चा में सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो
0 ज्योति जोशी, साहित्यकार शम्भु राणा जी, एडवोकेट श्रीमती विभा पांडे, डी आर डी ओ के वैज्ञानिक डा0 हेमंत पांडे, वरिष्ठ पत्रकार जगदीश जोशी जी तथा डॉ पूरन जोशी भी शामिल रहे।                                                                           
 रिपोर्ताज --- डा0 पूरन जोशी

प्रधानमंत्री जी के पूर्व सलाहकार आई ए एस श्री भास्कर खुल्बे जी
कुलपति जी सोबनसिंह जीना विश्वविद्यालय प्रो0 एस पी एस बिष्ट
श्री विनीत कांडपाल केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण मुंबई न्यायपीठ में अनुवाद अधिकारी

               
                                                                 वीडियो साभार श्री सागर रौतेला


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