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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

होता है उलूक भी खबर लिये कई दिनों तक जब यूँ ही नदारत हो रहा होता है

होता है

सभी के
साथ होता है

कोई गा देता है
कोई रो देता है
कोई खुद के
खो गये होने के
आभास जैसा
मुँह बनाये लटकाये
शहर की किसी
अंधेरी गली की
ओर घूमने जाने
की बात करते हुए
चौराहे की किसी
पतली गली
की ओर हो
रहा होता है

कोई रख देता है
बोने के लिये बीज
सभी चीजों के
नहीं बनते हैं
जानते हुए
बूझते हुए
पेड़ पौंधे
जिनके

कुछ को
आनन्द आता है
जूझते हुए
हुए के साथ

होने ना होने का
बही खाता बनाये
हर खबर की
कबर खोदने वाला
भी भूल सकता है

खबरें भी लाशें
हो जाती है
सड़ती हैं
फूलती हैं
गलती हैं
पड़ी पड़ी

अखबार
समाचार टी वी
रेडियो पत्रकार
निकल निकल
कर गुजर जाते हैं
उसके अगल बगल से
कुछ उत्साहित
उसे उसी के
होंठों पर बेशरमी
के साथ सरे आम
भीड़ के सामने सामने
चूमते हुए भी

अपनी अपनी ढपली
पीटते सरोकारी लोग
झंडे दर झंडे जलाते
पीटते फटी आवाज
के साथ फटी किस्मत
के कुछ घरेलू बीमार
लोगों की तीमारदारी
के रागों को

शहर भी इन सब
सरोकारों के साथ
जहाँ लूला काना
अंधा हो चुका होता है

सरोकारी ‘उलूक’ भी
अपनी चोंच को
तीखा करता हुआ
एक खबर को
बगल में दबाये हुए
एक कबर को
खोदने में
कई दिनों से
लगा होता है

सब को सब
मालूम सब को
सब पता होता है
मातम होना है

पर मातम होने
तक का इंतजार
किसी को भी
नहीं होता है
ना खून होता है
ना आँसू होते हैं
ना ही कोई
होता है जो
जार जार रोता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

सोमवार, 23 मई 2016

लिखना हवा से हवा में हवा भी कभी सीख ही लेना

कफन मरने के
बाद ही खरीदे
कोई और मरने
वाले के लिये
अच्छा है
सिला सिलाया
मलमल का
खूबसूरत सा
खुद पहले से
खरीद लेना
और
जरूरी है
थोड़ा सा कुछ
सम्भाल कर
जेब में उधर
ऊपर के लिये
भी रख लेना
सब कुछ इधर
का इधर ही
निगल लेने से
भी कुछ नहीं होना
अंदाज आ ही
जाना है तब तक
पूरा नहीं भी तो
कुछ कुछ ही सही
यहाँ कितना कुछ
क्या क्या
और किसका
सभी कुछ
है हो लेना
रेवड़ियांं होती
ही हैं हमेशा से
बटने के लिये
हर जगह ही
अंधों के
बीच में ही
खबर होती
ही है अंधों के
अखबारों में
अंधों के लिये ही
आँख वालों
को इसमें
भी आता है
ना जाने
किसलिये इतना
बिलखना रोना
लिखने वाले
लिख गये हैं
टुकडे‌ टुकड़े में
पूरा का पूरा
आधे आधे का
अधूरा भी
हिसाब सारा
सब कुछ कबीर
के जमाने से ही
कभी तो माना
कर जमाने के
उसूलों को
‘उलूक’
किसी एक
पन्ने में पूरा
ताड़ का पेड़
लिख लेने से
सब कुछ
हरा हरा
नहीं होना ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कविता और छंद से ही कहना आये जरूरी नहीं है कुछ कहने के लिये जरूरी कुछ उदगार होते हैं

बहुत अच्छे होते हैं
समझदार होते हैं
किसी अपने
जैसे के लिये
वफादार होते हैं
ज्यादा के लिये नहीं
थोड़े थोड़े के लिये
अपनी सोच में
खंजर और
बात में लिये
तलवार होते हैं
सच्चे होते हैं
ना खुदा के होते हैं
ना भगवान के होते हैं
ना दीन के होते हैं
ना ईमान के होते हैं
बहुत बड़ी बात होती है
घर में एक नहीं भी हों
चोरों के सरदार के
साथ साथ चोरों के
परिवार के होते हैं
रोज सुबह के
अखबार के होते हैं
जबाँ से रसीले
होठों से गीले
गले मिलने को
किसी के भी
तलबगार होते हैं
पहचानता है
हर कोई समाज
के लिये एक
मील का पत्थर
एक सड़क
हवा में बिना
हवाई जहाज
उड़ने के लिये
भी तैय्यार होते हैं
गजब होते हैंं
कुछ लोग
उससे गजब
उनके आसपास
मक्खियों की तरह
किसी आस में
भिनाभिनाते
कुछ कुछ के
तलबगार होते हैं
 कहते हैं किसी
तरह लिखते हैं
किसी तरह
ना कवि होते हैं
ना कहानीकार होते हैं
ना ही किसी उम्मीद
और ना किसी सम्मान
के तलबगार होते हैं
उलूक तेरे जैसे
देखने तेरे जैसे सोचने
तेरा जैसे कहने वाले
लोग और आदमी
तो वैसे भी नहीं
कहे जाने चाहिये
संक्रमित होते हैं
बस बीमार और
बहुत ही
बीमार होते हैं ।

चित्र साभार: cliparts.co

रविवार, 17 जनवरी 2016

लोगों की लोगों द्वारा लोगों के लिये

अब्राहम लिंकन
लोगों के लिये
बोल गये थे
लोगों की
समझ में
आज तक बात
नहीं घुस पाई है
धूर्तों की जय हो
नियम कानून
बना संवार कर
अपने साम्राज्य
की ईंटे क्या
चमकाई हैं
धूर्तों की महासभा
में फिर एक बार
धूर्तों ने अपनी
ताकत दिखलाई है
धूर्तों की, धूर्तों द्वारा,
धूर्तों के लिए
लाग़ू होता है
लोग की जगह
होना भी चाहिये
कोई बुराई नहीं है
खबर भी आई है
नियमावली नई
बनवाई है
बात धूर्तों के खुद
के अधिकारों की है
खुजली हो जाने
वालों को खुजली
होती ही है
होती आई है
कोई नई बात नहीं है
कई बार खुजलाई है
खुजलाने की आदत
पड़ ही चुकी है
अच्छा महसूस होता है
दवाई भी इसीलिये
नहीं कोई कभी खाई है
बैचेनी सी महसूस
होने लगती है हमेशा
पता चलता है जब
कई दिनों से उनकी
कोई खबर शहर के
पन्ने में अखबार
के नहीं आई है
‘उलूक’ तू लोगों में
वैसे भी नहीं
गिना जाता है
और धूर्तों से तेरा
हमेशा का छत्तीस
का नाता है

तुझे भी हर बात पर
खुजलाने के अलावा
और क्या आता है 

खुजला ले तमन्ना
से जी भर कर
यहाँ खुजली करने
की किसी को भी
दूर दूर तक कहीं 

नहीं 
कोई मनाही  है ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

सोमवार, 2 नवंबर 2015

खाली सफेद पन्ना अखबार का कुछ ज्यादा ही पढ़ा जा रहा था

कुछ ज्यादा
ही हलचल
दिखाई
दे रही थी
अखबार के
अपने पन्ने पर

संदेश भी
मिल रहे थे
एक नहीं
ढेर सारे
और
बहुत सारे
क्या
हुआ होगा
समझ में
नहीं आ
पा रहा था

पृष्ठ पर
आने जाने
वालों पर
नजर रखने
वाला
सूचकाँक
भी ऊपर
बहुत ऊपर
को चढ़ता
हुआ नजर
आ रहा था

और
ये सब
शुरु हुआ था
जिस दिन से
खबरें छपना
थोड़ा कम होते
कुछ दिन के
लिये बंद
हुआ था

ऐसा नहीं था
कि खबरें नहीं
बन रही थी

लूट मार हमेशा
की तरह धड़ल्ले
से चल रही थी
शरीफ लुटेरे
शराफत से रोज
की तरफ काम
पर आ जा रहे थे

लूटना नहीं
सीख पाये
बेवकूफ
रोज मर्रा
की तरह
तिरछी
नजर से
घृणा के
साथ देखे
जा रहे थे

गुण्डों की
शिक्षा दीक्षा
जोर शोर से
औने पौने
कोने काने
में चलाई
जा रही थी

पढ़ाई लिखाई
की चारपाई
टूटने के
कगार पर
चर्र मर्र
करती हुई
चरमरा रही थी

‘उलूक’
काँणी आँख से
रोज की तरह
बदबूदार
हवा को
पचा रहा था
देख रहा था
देखना ही था
आने जाने के
रास्तों पर
काले फूल
गिरा रहा था

कहूँ ना कहूँ
बहुत कह
चुका हूँ
सभी
कुछ कहा
एक ही
तरह का
कब तक
कहा जाये
सोच सोच
कर कलम
कभी
सफेद पानी में
कभी
काली स्याही में
डुबा रहा था

एक दिन
दो दिन
तीन दिन
छोड़ कर
कुछ नहीं
लिखकर
अच्छा कुछ
देखने
अच्छा कुछ
लिखने
का सपना
बना रहा था

कुछ नहीं
होना था
सब कुछ
वही रहना था
फिर लिखना
शुरु
किया भी
दिखा भी
अपनी सूरत
का जैसा ही
जमाने से
लिखा गया
आज भी
वैसा ही कुछ
कूड़ा कूड़ा
सा ही
लिखा जा
रहा था

जो है सो है
बस यही पहेली
बनी रही थी
देखने पढ़ने
वाला खाली
सफेद पन्ने को
इतने दिन
बीच में
किसलिये
देखने के लिये
आ रहा था ।

चित्र साभार: www.clker.com

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

बेचिये जो भी बिक सकता है और जो तैयार है

पिछले महीने से
निकल रहे हैं
जलूस मेरे
शहर में
क्यों निकल
रहे हैं
कोई पूछने
वाला नहीं है
ना ही कोई
अखबार में
कोई खबर है
जिलाधीश भी
सो रहा है
थानेदार भी
बहुत होशियार है
निमंत्रण मिला है
मुजफ्फर नगर
काण्ड के खलनायकों
पर बहस करने का
बहुत पुरानी बात
हो गई है सुनने को
अभी की बात
को कौन तैयार है
नहीं देखा मंजर
इस तरह का
अभी तक की
जिंदगी में कभी
लोग कह रहे हैं
अच्छे दिन हैं
अच्छी बयार है
बुलाया गया है
निमंत्रण भी है
मुजफ्फर नगर
काण्ड के खलनायक
व उत्तराखण्ड पर
बहस के लिये
बतायें जरा अपने
घर के काण्डों पर
बात करने को
कौन तैयार है
माना कि ‘उलूक’
को अंधों मे
गिना जाता है
फिर भी दिखता है
कोने से कहीं
उसको भी कुछ
कहना ही है
मानकर कि
कहना है और
कहना भी
बेकार है।

चित्र साभार: www.anninvitation.com

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

पागलों के साथ कौन खड़ा होना चाहता है ?

किसी को कुछ
समझाने के लिये
नहीं कहता है
‘उलूक’ आदतन
बड़बड़ाता है
देखता है अपने
चश्मे से अपना
घर जैसा
है जो भी
सामने से
नजर आता है
बक बका जाता
है कुछ भी
अखबार में जो
कभी भी
नहीं आता है
तेरे घर में नहीं
होता होगा
अच्छी बात है
उसके घर में
बबाल होता है
रोज कुछ ना
कुछ बेवकूफ
रोज आकर
साफ साफ
बता जाता है
रुपिये पैसे का
हिसाब कौन
करता है
सामने आकर
पीछे पीछे
बहुत कुछ
किया जाता है
अभी तैयारियाँ
चल रही है
नाक के लिये
नाक बचाने
के लिये झूठ
पर झूठ
अखबार में दिखे
सच्चों से बोला
जाता है
कौन कह रहा है
झूठ को झूठ
कुछ भी कह
दीजिये हर कोई
झूठ के छाते के
नीचे आकर खड़ा
होना चाहता है
किसी में नहीं है
हिम्मत सच के
लिये खड़े होने
के लिये हर कोई
सच को झूठा
बनाना चाहता है
‘उलूक’ के साथ
कोई भी नहीं है
ना होगा कभी
पागलों के साथ
खड़ा होना भी
कौन चाहता है ।

 चित्रसाभार: www.clipartsheep.com

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

समाचार बड़े का कहीं बड़ा कहीं थोड़ा छोटा सा होता है

बकरे और मुर्गे
चैंन की साँस
खींच कर
ले रहे हैं
सारे नहीं देश
में बस एक दो
जगह पर कहीं
वहीं मारिया जी की
पदोन्नति हो गई है
शीना बोरा को
आरूषि नहीं बनने दूँगा
उनसे कहा गया
उनके लिये लगता है 
फलीभूत हो गया है
मृतक की आत्मा ने
खुश हो कर
सरकार से उनको
अपने केस को छोड़
आगे बढ़ाने के लिये
कुछ कुछ बहुत
अच्छा कह दिया है
हेम मिश्रा बेल पर
बाहर आ गया है
सरकार का कोई
आदमी आकर इस
बात को यहाँ
नहीं बता गया है
खुद ही बाहर आया है
खुद ही आकर उसने
खुद ही फैला दिया है
बड़े फ्रेम की बडी खबरें
और उसके
फ्रेम की
दरारों से 
निकलती
छोटी खुरचने
रोज ही होती हैं
ऐसे में ही होता है और
बहुत अच्छा होता है
अपने छोटे फ्रेम के
बड़े लोगों की छोटी
छोटी जेबकतरई
उठाइगीरी के बीच
से उठा कर कुछ
छोटा छोटा चुरा
कर कुछ यहाँ
ले आना होता है
फिर उसे जी भर
कर अपने ही कैनवास
में बेफिक्र सजाना होता है
बड़े हम्माम से अच्छा
छोटे तंग गोसलखाने का
अपना मजा अपना
ही आनन्द होता है

उलूक करता रहता है
हमेशा कुछ ना कुछ
नौटंकी कुछ कलाकारी
कुछ बाजीगरी
उसकी रात की दुनियाँ
में इन्ही सब फुलझड़ियों
का उजाला होता है  ।

चित्र साभार:
earthend-newbeginning.com

सोमवार, 7 सितंबर 2015

खबर है खबर रहे प्रश्न ना बने ऐसा कि कोई हल करने के लिये भी कहे

क्या है ये एक डेढ़
पन्ने के अखबार
के लिये रोज एक
तुड़ी मुड़ी सिलवटें
पड़ी हुई खबर
उसे भी खींच तान
कर लम्बा कर जैसे
नंगे के खुद अपनी
खुली टाँगों के
ना ढक पाने की
जद्दोजहद में
खींचते खींचते
उधड़ती हुई बनियाँन
के लटके हुऐ चीथड़े
आगे पीछे ऊपर नीचे
और इन सब के बीच में
खबरची भी जैसे
लटका हुआ कहीं
क्या किया जा सकता है
रोज का रोज रोज की
एक चिट्ठी बिना पते की
एक सफेद सादे पन्ने
के साथ उत्तर की
अभिलाषा में बिना टिकट
लैटर बाक्स में डाल कर
आने का अपना मजा है
पोस्टमैन कौन सा
गिनती करता है
किसी दिन एक कम
किसी दिन दो ज्यादा
खबर ताजा हो या बासी
खबर दिमाग लगाने
के लिये नहीं पढ़ने सुनने
सुनाने भर के लिये होती है
कागज में छपी हो तो
उसका भी लिफाफा
बना दिया जाता है कभी
चिट्ठी में घूमती तो रहती है
कई कई दिनों तक
वैसे भी बिना पते के
लिफाफे को किसने
खोलना है किसने पढ़ना है
पढ़ भी लिया तो कौन सा
किसी खबर का जवाब
देना जरूरी होता है
कहाँ किसी किताब में
लिखा हुआ होता है
लगा रह ‘उलूक’
तुझे भी कौन सा
अखबार बेचना है
खबर देख और
ला कर रख दे
रोज एक कम से कम
एक नहीं तो कभी
आधी ही सही
कहो कैसी कही ?

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

सोमवार, 20 जुलाई 2015

अब क्या बताये क्या समझायें भाई जी आधी से ज्यादा बातें हम खुद भी नहीं समझ पाते हैं

कोई नयी
बात नहीं है
पिछले साल
पिछले के
पिछले साल

और
उससे पहले के
सालो साल
से हो रही
कुछ बातों पर

कोई प्रश्न अगर
नहीं भी उठते हैं

उठने भी
किस लिये हैं

परम्पराऐं
इसी तरह
से शुरु होती हैं
और
होते होते
त्योहार
हो जाती हैं

मनाना
जरूरी भी
होता है
मनाया भी
जाता है
बताया भी
जाता है
खबर भी
बनाई जाती है
अखबार में
भी आती है

बस कुछ
मनाने वाले
इस बार
नहीं मनाते हैं
उनकी जगह
कुछ नये
मनाने वाले
आ जाते हैं

त्योहार मनाना
किस को
अच्छा नहीं
लगता है

पर
परम्परा
शुरु कर
परम्परा को
त्योहार
बनने तक
पहुचाने वाले
कहीं भी
मैदान में
नजर नहीं
आते हैं

अब
‘उलूक’
की आखों से
दिखाई देने
वाले दिवास्वप्न
कविता
नहीं होते हैं

समझ में
आते हैं
तो बस
उनको ही
आ पाते हैं

जो मैदान
के किसी
कोने में
बैठे बैठे
त्योहार
मनाने वालों
की मिठाईयों
फल फूल
आदि के लिये
धनराशि
उपलब्ध
कराने हेतु
अपने से
थोड़ा ऊपर
की ओर
आशा भरी
नजरों से
अपने अपने
दामन
फैलाते हैं

किसी की
समझ में
आये या
ना आये
कहने वाले
कहते ही हैं

रोज कहते हैं
रोज ही
कहने आते हैं
कहते हैं
और
चले जाते हैं

तालियाँ
बजने बजाने
की ना
उम्मीद होती है
ढोल नगाड़ों
और नारों
के शोर में
वैसे भी
तालियाँ
 बजाने वाले
कानों में
थोड़ी सी
गुदगुदी ही
कर पाते हैं ।

चित्र साभार: wallpoper.com

गुरुवार, 14 मई 2015

समझदार एक जगह टिक कर अपनी दुकान नहीं लगा रहा है

किसलिये
हुआ जाये
एक अखबार

 क्यों सुनाई
जाये खबरें
रोज वही
जमी जमाई दो चार

क्यों बताई
जाये शहर
की बातें
शहर वालों को हर बार

क्यों ना
कुछ दिन
शहर से
हो लिया जाये फरार

वो भी यही
करता है
करता आ
रहा है

यहाँ जब
कुछ कहीं
नहीं कर
पा रहा है

कभी इस शहर
तो कभी उस शहर
चला जा रहा है

घर की खबर
घर वाले सुन
और सुना रहे हैं

वो अपनी खबरों
को इधर उधर
फैला रहा है

सीखना चाहिये
इस सब में भी
बहुत कुछ है
सीखने के लिये ‘उलूक’

बस एक तुझी से
कुछ नहीं
हो पा रहा है

यहाँ बहुत
हो गया है
अब तेरी
खबरों का ढेर

कभी तू भी
उसकी तरह
अपनी खबरों
को लेकर

कुछ दिन
देशाटन
करने को
क्यों नहीं
चला जा रहा है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

रविवार, 12 अप्रैल 2015

जय हो जय हो कह कह कर कोई जय जय कार कर रहा था

पहले दिन की खबर
बकाया चित्र के साथ थी
पकड़ा गया था एक
सरकारी चिकित्सक
लेते हुऐ शुल्क मरीज से
मात्र साढ़े तीन सौ रुपिये
सतर्क सतर्कता विभाग के
सतर्क दल के द्वारा
सतर्कता अधिकारी था
मूँछों में ताव दे रहा था
पैसे कम थे पर खबर
एक बड़ी दे रहा था
दूसरे दिन वही
चिकित्सक था
लोगों की भी‌ड़ से
घिरा हुआ था
अखबार में चित्र
बदल चुका था
चिकित्सक था मगर
मालायें पहना हुआ था
न्यायधिकारी से
डाँठ खा कर
सतर्कता अधिकारी
खिसियानी हँसी कहीं
कोने में रो रहा था
ऐसा भी अखबार
ही कह रहा था
दो दिन की एक
ही खबर थी
लिखे लिखाये में
कुछ इधर का
उधर हो रहा था
कुछ उधर का
इधर हो रहा था
‘उलूक’ इस सब पर
अपनी कानी आँख से
रात के अंधेरे में
नजर रख रहा था
उसे गर्व हो रहा था
कौम में उसकी
जो भी जो कुछ
कर रहा था
बहुत सतर्क हो
कर कर रहा था
सतर्कता से
करने के कारण
साढ़े तीन सौ का
साढ़े तीन सौ गुना
इधर का उधर
कर रहा था
चित्र, अखबार,
उसके लोगों का
खबर के साथ
खबरची हमेशा
भर रहा था
सतर्क सतर्कता
विभाग के
सतर्क दल का
सतर्क अधिकारी
पढ़ाना लिखाना
सिखाने वालों के
पढ़ने पढ़ाने को
दुआ सलाम
कर रहा था
पढ़ने पढ़ाने के
कई फायदे में से
असली फायदे का
पता चल रहा था
कोई पाँव छू रहा था
कोई प्रणाम कर रहा था
ऊपर वाले का गुणगाँन
विदेश में जा जा कर
देश का प्रधान कर रहा था ।

चित्र साभार: www.clipartheaven.com

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

खबरची और खबर कर ना कुछ गठजोड़

जरूरत है एक
खबरची की
जो बना सके
एक खबर
मेरे लिये
और बंटवा दे
हर उस पन्ने
पर लिख कर
जो देश के
ज्यादातर
समझदार
लोगों तक
पहुँचता हो
खबर ऐसी
होनी चाहिये
जिसके बारे में
किसी को कुछ
पता नहीं हो
और जिसके होने
की संभावना
कम से कम हो
शर्त है मैं खबर
का राकेट छोड़ूंगा
हवा में और वो
उड़ कर गायब
हो जायेगा
खबर खबरची
फैलायेगा
फायदा
जितना भी
होगा राकेट
के धुऐं का
पचास पचास
फीसदी पी
लिया जायेगा
कोई नहीं पूछता
है खबर के बारे में
ज्यादा से ज्यादा
क्या होगा
बहस का एक
मुद्दा हो जायेगा
वैसे भी ऐसी चीज
जिसके बारे में
किसी को कुछ
मालूम नहीं होता है
वो ऐसी खबर के
बारे में पूछ कर
अज्ञानी होने का
बिल्ला अपने
माथे पर क्यों
लगायेगा
इसमें कौन सी
गलत बात है
अगर एक
बुद्धिजीवी
दूध देने वाले
कुत्तों का कारखाना
बनाने की बात
कहीं कह जायेगा
कुछ भी होना
संभव होता है
वकत्वय अखबार
से होते हुऐ
पाठक तक तो
कम से कम
चला जायेगा
कारखाना बनेगा
या नहीं बनेगा
किसको सोचना है
कबाड़ी अखबार
की रद्दी ले जायेगा
हो सकता है
आ जाये सामने से
फिर खबरची की
खबर भविष्य में
कहीं सब्जी की
दुकान में सामने से
जब सब्जी वाला
खबर के अखबार से
बने लिफाफे में
आलू या टमाटर
डाल कर हाथ
में थमायेगा
जरूरत है एक
खबरची की
जो मेरे झंडे को
लेकर एवरेस्ट पर
जा कर चढ़ जायेगा
ज्यादा कुछ
नहीं करेगा
बस झंडे को
एक एक घंटे के
अंतर पर
हिलायेगा ।

चित्र साभार: funny-pictures.picphotos.net

रविवार, 23 नवंबर 2014

कुछ नहीं किया जा सकता है उस बेवकूफ के लिये जो आधी सदी गुजार कर भी कुछ नहीं सीख पाता है

रोज की बात है
रोज चौंकता है
अखबार पर
छपी खबर
पढ़ कर के
फिर यहाँ आ आ
कर भौंकता है
बिना आवाज के
कुत्ते की तरह
ऐसा चौंकना
भी क्या और
ऐसा भौंकना
भी क्या
अरे क्या हुआ
अगर एक चोर
कहीं सम्मानित
किया जाता है
ये भी तो देखा कर
एक चोर ही
उसके गले में
माला पहनाता है
अब चोर चोर के
बीच की बात में
तू काहे अपनी
गोबर भरे
दिमाग की
बुद्धी लगाता है
क्या होता है
अगर किसी
बंदरिया को
अदरख़ बेचने
खरीदने का
ठेका दे भी
दिया जाता है
और क्या होता है
अगर किसी
जुगाड़ी का जुगाड़
किसी की भी
हो सरकार
सबसे बड़ा जुगाड़
माना जाता है
बहुत हो चुका
तेरा भौंकना
तेरा गला भी
लगता है
कुछ विशेष है
खराब भी
नहीं होता है
थोड़ा बहुत
कुछ भी
कहीं भी
होता है
खरखराना
शुरु हो
जाता है
समय के
साथ साथ
बदलना
क्यों नहीं
सीखना
चाहता है
खुद का समय
तो निकल गया
के भ्रम से भ्रमित
हो भी चुका है
तो भी अपनी
अगली पीढ़ी को
ये कलाबाजियाँ
क्यों नहीं
सिखाता है
जी नहीं पायेगी
मर जायेगी
तेरी ही आत्मा
गालियाँ खायेगी
तेरी समझ में
इतना भी
नहीं आता है
कौन कह रहा है
करने के लिये
सिखाना है
समझा कर
समझने के लिये
ही उकसाना है
समझने के लिये
ही बताना है
चोरी चकारी
बे‌ईमानी भ्रष्टाचारी
किसी जमाने में
गलत मानी
जाती होंगी
अब तो बस
ये सब नहीं
सीख पाया तो
गंवारों में
गिना जाता है
वैसे सच तो ये है
कि करने वालों
का ही कुछ
नहीं जाता है
नहीं करने वाला
कहीं ना कहीं
कभी ना कभी
स्टिंग आपरेशन
के कैमरे में
फंसा दिया जाता है
इसी लिये ही तो
कह रहा है ‘उलूक’
गाँठ बाँध ले
बच्चों को अपने ही
मूल्यों में ये सब
बताना जरूरी
हो जाता है
करना सीख
लेता है जो
वो तो वैसे भी
बच जाता है
नहीं सीख पाता है
लेकिन जानता है
कम से कम
अपने आप को
बचाने का रास्ता तो
खोज ही ले जाता है ।

चित्र साभार: poetsareangels.com

रविवार, 2 नवंबर 2014

रात में अपना अखबार छाप सुबह उठ और खुद ही ले बाँच

बहुत अच्छा है
तुझे भी पता है
तू कितना सच्चा है
अपने घर पर कर
जो कुछ भी
करना चाहता है
कर सकता है
अखबार छाप
रात को निकाल
सुबह सवेरे पढ़ डाल
रेडियो स्टेशन बना
खबर नौ बजे सुबह
और नौ बजे
रात को भी सुना
टी वी भी दिखा
सकता है
अपनी खबर को
अपने हिसाब से
काली सफेद या
ईस्टमैन कलर
में दिखा सकता है
बाहर तो सब
सरकार का है
उसके काम हैं
बाकी बचा
सब कुछ
उसके रेडियो
उसके टी वी
उसके और उसी का
अखबार उसी के
हिसाब से ही
बता सकता है
सरकार के आदमी
जगह जगह पर
लगे हुऐ हैं
सब के पास
छोटे बड़े कई तरह
के बिल्ले इफरात
में पड़े हुऐ हैं
किसी की पैंट
किसी की कमीज
पर सिले हुऐं है
थोड़े बहुत
बहुत ज्यादा बड़े
की कैटेगरी में आते हैं
उनके माथे पर
लिखा होता है
उनकी ही तरह के
बाकी लोग बहुत
दूर से भी बिना
दूरबीन के भी
पढ़ ले जाते हैं
ताली बजाने वालों
को ताली बजानी
आती है
ऊपर की मंजिल
खाली होने के
बावजूद छोटी सी
बात कहीं से भी
अंदर नहीं घुस पाती है
ताली बजाने से
काम निकल जाता है
सुबह की खबर में
क्या आता है और
क्या बताया जाता है
ताली बजाने के बाद
की बातों से किसी
को भी इस सब से
मतलब नहीं रह जाता है
‘उलूक’ अभी भी
सीख ले अपनी खबर
अपना अखबार
अपना समाचार
ही अपना हो पाता है
बाकी सब माया मोह है
फालतू में क्यों
हर खबर में तू
अपनी टाँग अढ़ाता है ।

चित्र साभार: clipartcana.com

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

विवेकानन्द जी आपसे कहना जरूरी है बधाई हो उस समय जब आपकी सात लाख की मूर्ति हमने अपने खेत में आज ही लगाई हो

अखबार खरीद कर
रोज घर लाने की
आदत पता नहीं
किस दिन तक
यूँ ही आदत
में शामिल रहेगी
पहले दिन से ही
पता रहती है जबकि
कल किसकी कबर
की खबर और
किस की खबर
की कबर बनेगी
मालूम रहता है
आधा सच हमेशा
आधे पन्ने में
लिख दिया जाता है
वैसे भी पूरी बात
बता देने से
बात में मजा भी
कहाँ रह जाता है
एक पूरी कहानी
होती है
एक मंदिर होता है
और वो किसी
एक देवता के
लिये ही होता है
देवता की खबर
बन चुकी होती है
देवता हनीमून से
नहीं लौटा होता है
मंदिर की भव्यता
के चर्चे से भरें होंगे
अखबार ये बात
अखबार खरीदने
वाले को पता होता है
मंदिर बनने की जगह
टाट से घिरी होती है
और एक पुराना
कैलैण्डर वहाँ
जरूर टंका होता है
वक्तव्य दर वक्तव्य
मंदिर के बारे में भी
और देवता
के बारे में भी
उनके होते हैं
जिनका देवताओं
पर विश्वास कभी
भी नहीं होता है
रसीदें अखबार में
नहीं होती हैं
भुगतान किस को
किया गया है
बताना नहीं होता है
किस की
निविदा होती है
किस को
भुगतान होता है
किस का
कमीशन होता है
किस ने
देखना होता है
कुत्तों की
जीभें होती हैं
बिल्लियों का
रोना होता है
‘उलूक’
तेरी किस्मत है
तुझे तो हमेशा
ही गलियों में
मुहँ छिपा कर
रोना होता है |

चित्र साभार : http://marialombardic.blogspot.com/

शनिवार, 27 सितंबर 2014

छोटी चोरी करने के फायदों का पता आज जरूर हो रहा है

चोर होने की
औकात है नहीं
डाकू होने की
सोच रहा है
तू जैसा है
वैसा ही ठीक है
तेरे कुछ भी
हो जाने से
यहाँ कुछ नया
जैसा नहीं
हो रहा है
थाना खोल ले
घर के किसी
भी कोने में
और सोच ले
कुर्सी पर बैठा
एक थानेदार
मेज पर अपना
सिर टिका कर
सो रहा है
देख नहीं रहा है
दूरदर्शन आज का
कुछ अनहोनी सी
खबर कह रहा है
चार साल के लिये
अंदर हो जाने वाली है
और ऊपर से सौ करोड़
जमा करने का आदेश
भी न्यायालय उसको
साथ में दे रहा है
बेचारी को बहुत
महँगा पड़ रहा है
दोस्त देश के
बाहर गया हुआ भी
दो शब्द साँत्वना के
नहीं कह रहा है
समझ में ये नहीं
आ पा रहा है कि
पुराना घास खा
गया घाघ
अभी तक अंदर है
या बाहर कहीं
किसी जगह अब
मौज में सो रहा है
खबर ही नहीं
आती है उसकी
कुछ भी मालूम
नहीं हो रहा है
आज कुछ कुछ
कोहरे के पीछे
का मंजर थोड़ा सा
कुछ साफ जैसा
हो रहा है
बहुत समझदार है
मध्यम वर्गीय चोर
मेरे आस पास का
ये आज ही सालों साल
सोचने के बाद भी
बिना सोचे बस
आज और आज
ही पता हो रहा है
हाथ लम्बे होने
के बाद भी
लम्बे हाथ मारने
का खतरा कोई
फिर भी क्यों
नहीं ले रहा है
बस थोड़ा थोड़ा
खुरच कर दीवार
का रंग रोगन
अपने आने वाले
भविष्य की संतानों
के लिये बनने वाले
सपने के ताजमहल
की पुताई का
मजबूत जुगाड़
ही तो हो रहा है
‘उलूक’ बैचेन है
आज जो भी
हो रहा है
किसी के साथ
इस तरह का
बहुत अच्छा जैसा
तो नहीं हो रहा है
थोड़ी थोड़ी करती
रोज कुछ करती
हमारी तरह करती
तो पकड़ी भी
नहीं जाती
शाबाशियाँ भी कई
सारी मिलती
जनता रोज का रोज
ताली भी साथ में बजाती
सबकी नहीं भी होती तो भी
दो चार शातिरों की फोटो
खबर के साथ अखबार में
रोज ही किसी कालम में
नजर आ ही जाती
दूध छोड़ कर बस
मलाई चोर कर खाने का
बिल्कुल भी अफसोस
आज बिल्कुल भी
नहीं हो रहा है ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

सोमवार, 18 अगस्त 2014

नहीं लिख पाउंगा उसके लिये कुछ भी जिसके जलवे में आदमी बन के कोई शामिल होता है

दिमाग से
लिखना
मन की
बात
लिखना
किताब से
लिखना
अखबार में
छपने छपाने
के लिये
लिखना

अलग अलग
होता है भाई
क्यों परेशान
होता है

डाक्टर ने
नहीं कहा है
पढ़ने के लिये

वो सब कुछ
जो इस
दुनिया में
हर जगह
किसी भी
दीवार पर
ऐरे गैरे
नत्थू खैरे
ने लिखा
या लिखवा
दिया होता है

पैजामे और
टोपी देख कर
लिखने वाले
की बात पर
क्यों चला जाता है

यहाँ
हर कोई
बिना कपड़े
का ही आता है

जैसा होता है
उसी तरह
आता है

अपने हिसाब
किताब को
देख कर
दुनियाँ को
पागल बनाता है

कपड़े के बिना
जो होता है उसे
गूगल का
शब्द कोश
क्या कहता है
उससे क्या करना
सीधे सीधे कह देना
अच्छा नहीं होता है

दुनियाँ
ऐसे लोगों
से ही चल रही है

एक तू है
‘उलूक’
अपनी
बेवकूफियों को
हरे पत्तों से ढकने
में लगा रहता है

अखबार
में छपे
कबूतरों
के मनन
चिंतन से
परेशान
मत हुआ कर

कबूतर अपने
घोंसले में
अपनी ही बीट
पर सोता है

जनता
उस की
तरह की ही
उस की
वाह वाही मे
लगी रहती है

जिनको पता
सब होता है
वो उनकी तरह
का ही होता है

अल्पसंख्यक
बस एक
संख्या है
उसी ने
बिल्ली की
तरह खंभा ही
तो बस एक
नोचना होता है ।

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

सरकार की नहीं सोच पा रहा हूँ सरकार

तेरी वोट से ही
बनने जा रही है
इस बार की सरकार
सुन नहीं रहा है
अब की बार बस
उसकी सरकार
सुन तो रहा हूँ पर
गणित में कमजोर हूँ
समझ नहीं पा रहा हूँ
फिर भी जितना है
बचा खुचा दिमाग
गुणा भाग करके
लगा रहा हूँ
उसकी तो ऐसे
कह रहा है जैसे
तेरे को बता
कर गया हो वो
सरकार बस मैं
ही बना रहा हूँ
किसी जमाने में
इसकी बनती थी
या उसकी बनती थी
जमाने ने तक कर
दिया अब पलटवार
देख क्यों नहीं लेता
आज का ही अखबार
तीन चार चुनाव
लड़ लड़ा कर
एक दूसरे को
जिता हरा कर
अब दोनों एक ही
मंच में साथ साथ
गले में बाहें डाल
कर हैं एक दूसरे
को बहुत प्यार
एक बार ये
ले गया था वोट
उसकी बन गई
थी सरकार
दूसरी बार वो
ले गया था वोट
इसकी बन गई
थी सरकार
वोटर
उलूक
फाड़ कर रख ले
अपनी वोट को
आधी इसके लिये
और आधी उसके
लिये इस बार
कोई भी बनेगी
कहीं एक सरकार
तेरी की जायेगी
जै जै कार
बुद्धिजीवियों के बस में
है नहीँ करना कुछ
परजीवियों का फल रहा
हो जहाँ सारा कारोबार
अब की बार इसकी भी
और उसकी भी सरकार
बहस करना है बेकार ।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

क्यों परेशाँ रहे कोई रात भर सुबह के अखबार से सब पता चल जाता है

कैसे काट लेता है
कोई बिना कुछ कहे
एक पूरा दिन यहाँ
जहाँ किसी का बोरा
गले गले तक शाम
होने से पहले
ही भर जाता है
सब कुछ सबको
दिखाने लायक
भी नहीं होता है
थोड़ा कुछ झाड़ पोछ
कर पेश कर
ही दिया जाता है
घर से निकलता है
बाहर भी हर कोई
रोज ही काम पर
कपड़े पहन कर आता है
कपड़े पहने हुऐ ही
वापस चला जाता है
आज का अभी
कह दिया जाये
ठीक रहता है
कल कोई सुनेगा
भरौसा ही कहाँ
रह पाता है
भीड़ गुजर जाती है
बगल से उसके
सब देखते हुऐ हमेशा
एक तुझे ही पता नहीं
उसे देखते ही
क्या हो जाता है
उसको भी पता है
बहुत कुछ तेरे बारे में
तभी तो तेरा जिक्र भी
ना किसी नामकरण में
ना ही किसी जनाजे में
कभी किया जाता है
इधर कुछ दिन तूने भी
रहना ही है बैचेन बहुत
उनकी बैचेनी के पते का
पता भी चल ही जाता है
डबलरोटी के मक्खन को
मथने के लिये कारों का
काफिला कर तो रहा है
मेहनत बहुत जी जान से
रोटी के सपने देखने वालों
की अंगुली में लगे
स्याही के निशान का फोटो
अखबार में एक जगह पर
जरूर दिखाया जाता है
कौन बनाने की सोच रहा है
एक नया रास्ता तुझे पता है
पुराने रास्तों की टूट फूट कि
निविदाओं से ही कागज का
मजबूत रास्ता रास्तों पर
मिनटों में बन जाता है
इसको जाना है इस तरफ यहाँ
उसको जाना है उस तरफ वहाँ 

उलूक बस एक तू ही अभी तक 
असमंजस में नजर आता है । 

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