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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

दिसम्बर ने दौड़ना शुरु कर दिया तेजी से बस जल्दी ही साल की बरसी मनायी जायेगी

फिर
एक साल
निकल लिया

संकेत

होनी के
होने के
नजर आना
शुरु हुए

अपनी ही
सोच में

खुद की
सोच का ही

कुछ
गीला हिस्सा

शायद
फिर से
आग
पकड़ लिया

धुआँ
नहीं दिखा

बस
जलने की
खुश्बू
आती हुयी

जैसा कुछ
महसूस हुआ

निकल लिया
उसी ओर को

सोचता हुआ
देखने के लिये

अगर हुआ है
कुछ
तो क्या हुआ

लेकिन

इस
सब के बीच

बस
इतना सा
संतोष हुआ

कि
खुश्बू
सोच लिया

अच्छा किया

सकारात्मकता
की रेखा
को छूता रहा

सोच को
अपना पैर
बाहर को नहीं
रखने दिया

इससे
पहले
बदबू की
सोचती

सोच

टाँग
पकड़ कर

अन्दर का

अन्दर को
ही खींंच लिया

समझाकर

दिमाग
को खुद के

अपनी ही
मुट्ठी बनाकर

अपने ही हाथ की

जोर से ठोक लिया

हौले से
हो रहे
जोर के शोर से

कुछ
हिलने का

जैसा
अनुभव किया

फिर
झिझक कर

याद किया

जमाने पहले
गुरुजी का पढ़ाया
शिष्टाचार का पाठ

और वही
अपने आप
बड़बड़ते हुऐ
खुद ही
खुद के लिये
बोल लिया

अभी
सोच में
आया ही था

कि
सभी तो
लिख दिया

और
अभी अभी
फिर से

लिखने
लिखाने को

कोने से

कलम
दबा कर
खिसक लिया

एक पुरानी
किताब को
फिर बेमन से
खोल लिया

***********

रहने दे
मत खाया कर
कसम ‘उलूक’
नहीं लिखने की

लिख
भी देगा
तब भी

साल
इसी तरह
गुजरते
चले जायेंगे

करने
वालों की
ताकत और
सक्रियता में

वृद्धि
चक्रवृद्धि
होती रही है

लिखने
लिखाने की
कलमें घिसेंगी

घिसती
चली जायेंगी

अखबार
रोज का रोज

सबेरे
दरवाजे पर
टंका मिलेगा

खबरें
छपवाने वालों
की ही छपेंगी

साल भर
की समीक्षा
की किताब के
हर पन्ने पर
वही चिपकी हुई
नजर आयेंगी

हर साल
इसी तरह
दिसम्बर की
विदाई की जायेगी ।।

चित्र साभार: http://clipart-library.com/

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

पता ही नहीं चलता है कि बिकवा कोई और रहा है कुछ अपना और गालियाँ मैं खा रहा हूँ

शेर
लिखते होंगे
शेर
सुनते होंगे
शेर
समझते भी होंगे
शेर हैं
कहने नहीं
जा रहा हूँ


एक शेर
जंगल का देख कर
लिख देने से शेर
नहीं बन जाते हैं

कुछ
लम्बी शहरी
छिपकलियाँ हैं

जो आज
लिखने जा रहा हूँ

भ्रम रहता है
कई सालों
तक रहता है

कि अपनी
दुकान का
एक विज्ञापन

खुद ही
बन कर
आ रहा हूँ

लोग
मुस्कुराहट
के साथ मिलते हैं

बताते भी नहीं है
कि खुद की नहीं
किसी और की
दुकान चला रहा हूँ

दुकानें
चल रही हैं
एक नहीं हैं
कई हैं

मिल कर
चलाते हैं लोग

मैं बस अपना
अनुभव बता रहा हूँ

किस के लिये बेचा
क्या बेच दिया
किसको बेच दिया
कितना बेच दिया

हिसाब नहीं
लगा पा रहा हूँ

जब से
समझ में आनी
शुरु हुई है दुकान

कोशिश
कर रहा हूँ
बाजार बहुत
कम जा रहा हूँ

जिसकी दुकान
चलाने के नाम
पर बदनाम था

उसकी बेरुखी
इधर
बढ़ गयी है बहुत

कुछ कुछ
समझ पा रहा हूँ

पुरानी
एक दुकान के
नये दुकानदारों
के चुने जाने का

एक नया
समाचार
पढ़ कर
अखबार में
अभी अभी
आ रहा हूँ

कोई कहीं था
कोई कहीं था

सुबह के
अखबार में
उनके साथ साथ
किसी हमाम में
होने की
खबर मिली है
वो सुना रहा हूँ

कितनी
देर में देता
है अक्ल खुदा भी

खुदा भगवान है
या भगवान खुदा है
सिक्का उछालने
के लिये जा रहा हूँ

 ‘उलूक’
देर से आयी
दुरुस्त आयी
आयी तो सही

मत कह देना
अभी से कि
कब्र में
लटके हुऐ
पावों की
बिवाइयों को
सहला रहा हूँ ।

चित्र साभार: https://www.gograph.com

सोमवार, 23 जुलाई 2018

अपना वित्त है अपना पोषण है ‘उलूक’ तेरी खुजली खुद में किया तेरा अपना ही रोपण है

(21/07/2018 की पोस्ट:‘शरीफों की बस्ती है  कुछ नहीं होना है एक नंगे चने की बगावत से’ की अगली कड़ी है ये पोस्ट। इसका देश और देशप्रेम से कुछ लेना देना नहीं है। उलूक की अपनी दुकान की खबर है जहाँ वो भी कुछ सरकारी बेचता है )
पहले से
पता था

कुछ नया
नहीं होना था

खाली टूटी
मेज कुर्सियाँ
सरकार की
दुकान में

सरकारी
हिसाब किताब
जैसा ही
कुछ होना था

सरकारी
दुकान थी
सरकार के
दुकानदार थे

सरकारी
सामान था

 किसी के
अपने घर का
कौन सा
नुकसान
होना था

दुकानदार
को भी
आदेशानुसार

कुछ देर
घड़ियाली
ही तो रोना था

दुकान
फिर से
खुलने की
खुशखबरी
आनी थी

दो दिन बस
बंद कर रहे हैं
की खबर
फैलानी थी

दुकान
बंद हो रही है
दुकानदारों की
फैलायी खबर थी

अखबार वाले
भी आये थे
अच्छी पकी
पकायी खबर थी

दस्तखत की
जरूरत नहीं थी
दुकान वालों
की लगायी
दुकान की
ही मोहर थी

सरकारी
दुकान के अन्दर
खोली गयी
व्यक्तिगत
अपनी अपनी
दुकान थी

बन्द होने की
खबर छपने से
दुकानदारों की
निकल रही जान थी

तनखा
सरकारी थी
काम सरकारी था
समय सरकारी
के बीच कुछ
अपना निकाल
ले जाने की
मारामारी थी

‘उलूक’
देख रहा था
उल्लू का पट्ठा
उसे भी देखने
और देखने
के बाद लिखने
की बीमारी थी

बधाई थी
मिठाई थी
शरीफों की
बाँछे फिर से
खिल आयी थी
दुकान की
ऐसी की तैसी
पीछे के
दरवाजों में
बहुत जान थी ।

चित्र साभार: www.gograph.com

रविवार, 15 जुलाई 2018

किसी किसी आदमी की सोच में हमेशा ही एक हथौढ़ा होता है

दो और दो
जोड़ कर
चार ही तो
पढ़ा रहा है
किसलिये रोता है

दो में एक
इस बरस
जोड़ा है उसने
एक अगले बरस
कभी जोड़ देगा
दो और दो
चार ही सुना है
ऐसे भी होता है

एक समझाता है
और चार जब
समझ लेते हैं
किसलिये
इस समझने के
खेल में खोता है

अखबार की
खबर पढ़ लिया कर
सुबह के अखबार में

अखबार वाले
का भी जोड़ा हुआ
हिसाब में जोड़ होता है

पेड़
गिनने की कहानी
सुना रहा है कोई
ध्यान से सुना कर
बीज बोने के लिये
नहीं कहता है

पेड़ भी
उसके होते हैं
खेत भी
उसके ही होते हैं

हर साल
इस महीने
यहाँ पर यही
गिनने का
तमाशा होता है

एक भीड़ रंग कर
खड़ी हो रही है
एक रंग से
इस सब के बीच

किसलिये
उछलता है
खुश होता है

इंद्रधनुष
बनाने के लिये
नहीं होते हैं

कुछ रंगों के
उगने का
साल भर में
यही मौका होता है

एक नहीं है
कई हैं
खीचने वाले
दीवारों पर
अपनी अपनी
लकीरें

लकीरें खीचने
वाला ही एक
फकीर नहीं होता है

उसने
फिर से दिखानी है
अपनी वही औकात

जानता है
कुछ भी कर देने से
कभी भी यहाँ कुछ
नहीं होना होता है

मत उलझा
कर ‘उलूक’
भीड़ को
चलाने वाले
ऐसे बाजीगर से
जो मौका मिलते ही
कील ठोक देता है

अब तो समझ ले
बाजीगरी बेवकूफ

किसी किसी
आदमी की
सोच में
हमेशा ही एक
हथौढ़ा होता है ।

चित्र साभार: cliparts.co

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

नकारात्मकता फैला कर सकारात्मकता बेचने वालों के लिये सजदे में सर झुका जा रहा था

बिल्लियों के
अखबार में
बिल्लियों ने
फिर छ्पवाया

सुबह का
अखबार
रोज की तरह

आज भी
सुबह सुबह
उसी तरह से
शर्माता हुआ
जबर्दस्ती
घर के दरवाजे से
कूदता फाँदता
हुआ ही आया

खबर
शहर के कुछ
हिसाब की थी
कुछ किताब की थी
शरम लिहाज की थी
शहर के पन्ने में ही
बस दिखायी गयी थी

चूहों की पढ़ाई
को लेकर आ रही
परेशानियों की बात
बिल्लियों के
अखबार नबीस के द्वारा
बहुत शराफत के साथ
रात भर पका कर
मसाले मिर्च डाले बिना
कम नमक के साथ
बिना काँटे छुरी के
सजाई गयी थी

मुद्दा
दूध के बंटवारे
को लेकर हो रहे
फसाद का नहीं है

खबर में
समझाया गया था

बिल्लियाँ
घास खाना
शुरु कर जी रही हैं
बिल्लियों का
वक्तव्य भी
लिखवाया गया था

सफेद
चूहों को अलग
और
काले चूहों को
कुछ और अलग
बताया गया था

खबर जब
कई दिनों से
सकारात्मक सोच
बेचने वालों की
छपायी जा रही थी

पता नहीं बीच में
नकारात्मक उर्जा
को किसलिये
ला कर
फैलाया जा रहा था

बात
चूहों के
शिकार की
जब थी ही नहीं

बेकार में
दूध के बटवारे
को लेकर पता नहीं
किस बात का
हल्ला
मचवाया जा रहा था

चूहे चूहों को गिन कर
पूरी गिनती के साथ
बिल से निकल कर
रोज की तरह वापस
अपने ही बिल में
घुस जा रहे थे

दूध और
मलाई के निशान
बिल्लियों की मूँछों
में जब आने ही
नहीं दिये जा रहे थे

बिल्लियों के
साफ सुथरे धंधों को
किसलिये
इतना बदनाम
करवाया जा रहा था

ईमानदारी की
गलतफहमियाँ
पाला ‘उलूक’

बे‌ईमानी के
लफड़े में
अपने हिस्से का
गणित लगाता हुआ

रोज की तरह
चूहे बिल्ली के
खेल की खबर
खबरची
अखबार की गंगा
और डुबकी
सोच कर

हर हर गंगे
मंत्र के जाप के
एक हजार आठ
पूरे करने का
हिसाब लगा रहा था।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

रविवार, 21 जनवरी 2018

‘बीस साल तक आपके घर का कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी दीमक’ : जब इस तरह के समाचार को देखते हैं

कभी
अखबार
को देखते हैं

कभी
अखबार
में छपे
समाचार
को देखते हैं

पन्ने
कई होते हैं
खबरें
कई होती हैं 

पढ़ने वाले
अपने
मतलब के

छप रहे
कारोबार
को देखते हैं

सीधे चश्मे से
सीधी खबरों
पर जाती है
सीधे साधों
की नजर

केकड़े कुछ
टेढ़े होकर

अपने जैसी
सोच पर
असर डालने
वाली
टेढ़ी खबर
के टेढ़े
कलमकार
को देखते हैं

रोज ही कुछ
नया होता है
हमेशा खबरों में

आदत के मारे
कुछ पुरानी
खबरों
से बन रहे

सड़
रही खबरों
के अचार
को देखते हैं

‘हिन्दुस्तान’
लाता है
कभी कभी
कुछ
सदाबहार खबरें

कुछ
आती हैं
समझ में
कुछ
नहीं आती हैं 

समझे बुझे
ऐसी खबरों
के खबरची
खबर छाप कर
जब अपनी
असरदार
सरकार को
देखते हैं

‘उलूक’
और
उसके

साथी दीमक
आसपास की
बाँबियों के

चिलम
लिये हाथ में

फूँकते
समय को

उसके धुऐं से
बन रहे छल्लों
की धार
को देखते हैं ।

चित्र साभार: दैनिक ‘हिंदुस्तान’ दिनाँक 21 जनवरी 2018

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

दूरबीन सोच वाले कुछ कुछ ना कुछ पा जाते हैं

मजबूरियाँ
'आह' से
लेकर
'आहा'
तक की
होती हैं
कोशिश
करने वाले
भवसागर
पार कर
ही जाते हैं

खबर रोज
का रोज छपे
ताजी छपे
तभी तक
ठीक है
कुछ आदत
से मजबूर
होते हैं ठंडी
भी करते हैं
फिर धूप भी
दिखाते हैं

लिखना
मजबूरी
होती है
पढ़ना नहीं
होती है
रास्ते में
लिखे संदेश
आने जाने
वालों से
ना चाहकर
भी पढ़े जाते हैं

दो चार
कहते ही हैं
'वाह'
देखकर
दीवारों पर
बने चित्रों पर
बहुत होता है
कुछ ही सही
होते तो हैं जो
सब कुछ
समझ जाते हैं

'वाह' की आरजू
होती भी है
लिखने वाले को
समझ गये हैं
या नहीं समझे हैं
भी समझ में
आ जाता है

टिप्प्णियों की भी
नब्ज होती है

लिखने
पढ़ने वाले
चिकित्सक
साहित्यकार
नाप लेते हैं
कलम से ही
अपनी एक
आला बना
ले जाते हैं

लिखे गये की
कुन्जियाँ भी
उपलब्ध होती
हैं बाजार में

पुराने लिखे
लिखाये को
बहुत से लोग
कक्षाओं में
पढ़ते पढ़ाते हैं

कवि कविता
अर्थ प्रश्न और
उत्तर बिकते हैं
बने बनाये
दुकानों में
जिसे पढ़कर
परीक्षा देकर
पास फेल होने
वाले को मिलती
हैं नौकरियाँ
बताने वालों की
मजबूरी होती है
लिखे लिखाये
की ऊँच नीच
कान में चुपचाप
बता कर
चले जाते हैं

नौकरी कविता
नहीं होती है
किताबों में
सिमटे हुऐ
लिखे हुऐ और
लिखने वाले के
इतिहास भी
नहीं होते हैं

दो चार
लिखते ही हैं
सच अपने
आस पास के
जिनके बारे में
कुछ भी नहीं
लिखने वाले
लिख रहा है
लिख दिया है
की हवा
फैलाते हैं

सच ही है
हो तो रहा है
लिखना
है करके
कुछ भी
लिख
लिया जाये
लिखे गये और
हो रहे में
कोई रिश्ता
होना तो चाहिये
चिल्ला चिल्ला
कर बताते हैं

गुड़ गुरु लोग
अपनी अपनी
बनायी गयी
शक्करों को
पीठ थपथपा कर
मंत्र सच्चाई का
पढ़ा ले जाते हैं

दुनियाँ जहाँ
‘वाह’
पर लिख रही है

अपनी मर्जी से
अपनी मर्जी
लिखते चलने वाले
बेवकूफ
‘उलूक’ की
‘आह’
पर लिखने
की आदत
ठीक नहीं है

हर समय
अपनी
और अपने
घर की बातें
गलत बात है
कभी कभी
चाँद या मंगल
की बातें भी तो
लिखी जाती हैं

घर की बात
करने वाले
अपने घर में
रह जाते हैं
दूरबीन सोच
के लोग ही
घर गली
मोहल्ले शहर
रोटी कपड़ा
मकान और
पाखाने की
सोच से बाहर
निकल पाते हैं

कुछ
कुछ ना कुछ
पा जाते हैं
कुछ
तर जाते हैं
कुछ
अमर
हो जाते हैं ।

चित्र साभार : http://www.geoverse.co.uk

रविवार, 30 अप्रैल 2017

समझदारी है लपकने में झपटने की कोशिश है बेकार की “मजबूर दिवस की शुभकामनाएं”

पकड़े गये
बेचारे
शिक्षा
अधिकारी
लेते हुऐ
रिश्वत
मात्र पन्द्रह
हजार की

खबर छपी है
एक जैसी है
फोटो के साथ है
मुख्य पृष्ठ पर है
इनके भी है
और
उनके भी है
अखबार की

चर्चा
चल रही है
जारी
रहेगी बैठक

समापन की
तारीख रखी
गयी है अगले
किसी रविवार की

खलबली मची है
गिरोहों गिरोहों
बात कहीं भी
नहीं हो रही है
किसी के भी
सरदार की

सुनने में
आ रहा है
आयी है कमी
शेयर के
दामों में
रिश्वत के
बाजार की

यही हश्र
होता है
बिना
पीएच डी
किये हुओं का

उसूलों को
अन्देखा
करते हैं

फिक्र भी
नहीं
होती है
जरा सा भी
इतने
फैले हुऐ
कारोबार की

अक्ल
के साथ
करते हैं
व्यापार
समझदार
उठाईगीर

उठाते हैं
बहुत थोड़ा
सा रोज
अँगुलियों
के बीच

मुट्ठी नहीं
बंधती है
सुराही के
अन्दर कभी

किसी भी
सदस्य की
चोरों के
मजबूत
परिवार की

सालों से
कर रहे हैं
कई हैं

हजारों
पन्द्रह
भर रहे हैं

गागर भरने
की खबर
पहुँचती नहीं

फुसफुसाती
हुई डर कर
मर जाती है

पीछे के
दरवाजे में
कहीं आफिस
में किसी
समाचार की

उबाऊ ‘उलूक’
फिर ले कर
बैठा है एक
पकाऊ खबर

मजबूर दिवस
की पूर्व संध्या
पर सोचता हुआ

मजबूरों के
आने वाले
निर्दलीय एक
त्यौहार की ।

चित्र साभार: Shutterstock

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

हत्यारे की जाति का डी एन ए निकाल कर लाने का एक चम्मच कटोरा आज तक कोई वैज्ञानिक क्यों नहीं ले कर आया

शहर के एक
नाले में मिला
एक कंकाल
बेकार हो गया
एक छोटी
सी ही बस
खबर बन पाया
किस जाति
का था खुद
बता ही
नहीं पाया
खुद मरा
या मारा गया
निकल कर
अभी कुछ
भी नहीं आया
किस जाति
के हत्यारे
के हाथों
मुक्ति पाया
हादसा था
या किसी ने
कुछ करवाया
समझ में
समझदारों के
जरा भी नहीं
आ पाया
बड़ी खबर
हो सकती थी
जाति जैसी
एक जरूरी
चीज हाथ में
लग सकती थी
हो नहीं पाया
लाश की जाति
और
हत्यारे की जाति
कितनी जरूरी है
जो आदमी है
वो अभी तक
नहीं समझ पाया
विज्ञान और
वैज्ञानिकों को
कोई क्यों नहीं
इतनी सी बात
समझा पाया
डी एन ए
एक आदमी
का निकाल कर
उसने कितना
बड़ा और बेकार
का लफ़ड़ा
है फैलाया
जाति का
डी एन ए
निकाल कर
लाने वाला
वैज्ञानिक
अभी तक
किसी भी
जाति का
लफ़ड़े को
सुलझाने
के लिये
आगे निकल
कर नहीं आया
‘उलूक’
कर कुछ नया
नोबेल तो
नहीं मिलेगा
देश भक्त
देश प्रेमी
लोग दे देंगे
जरूर
कुछ ना कुछ
हाथ में तेरे
बाद में मत
कहना
किसी से
इतनी सी
छोटी सी
बात को भी
नहीं बताया
समझाया ।

चित्र साभार: Clipart Kid

बुधवार, 31 अगस्त 2016

मरे घर के मरे लोगों की खबर भी होती है मरी मरी पढ़कर मत बहकाकर

अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
दिख रही थी
घिरी हुई
राष्ट्रीय
खबरों से
सुन्दरी का
ताज पहने हुऐ
मेरे ही घर की
मेरी ही
एक खबर

हंस रही थी
बहुत ही
बेशरम होकर
जैसे मुझे
देख कर
पूरा जोर
लगा कर
खिलखिलाकर

कहीं पीछे के
पन्ने के कोने में
छुप रही थी
बलात्कार की
एक खबर
इसी खबर
को सामने
से देख कर
घबराकर
शरमाकर

घर के लोग सभी
घुसे हुऐ थे घर में
अपने अपने
कमरों के अन्दर
हमेशा की तरह
आदतन
इरादातन
कुंडी बाहर से
बंद करवाकर

चहल पहल
रोज की तरह
थी आँगन में
खिलखिलाते
हुऐ खिल रहे
थे घरेलू फूल
खेल रहे थे
खेलने वाले
कबड्डी
जैसे खेलते
आ रहे थे
कई जमाने से
चड्डी चड़ाये हुए
पायजामों के
ऊपर से
जोर लगाकर
हैयशा हैयशा
चिल्ला चिल्ला कर

खबर के
बलात्कार
की खबर
वो भी जिसे
अपने ही घर
के आदमियों
ने अपने
हिसाब से
किया गया
हो कवर
को भी कौन सा
लेना देना था
किसी से घर पर

‘उलूक’
खबर की भी
होती हैं लाशें
कुछ नहीं
बताती हैं
घर की घर में
ही छोड़ जाती हैं
मरी हुई खबर
को देखकर
इतना तो
समझ ही
लिया कर ।

चित्र साभार: worldartsme.com

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

होता है उलूक भी खबर लिये कई दिनों तक जब यूँ ही नदारत हो रहा होता है

होता है

सभी के
साथ होता है

कोई गा देता है
कोई रो देता है
कोई खुद के
खो गये होने के
आभास जैसा
मुँह बनाये लटकाये
शहर की किसी
अंधेरी गली की
ओर घूमने जाने
की बात करते हुए
चौराहे की किसी
पतली गली
की ओर हो
रहा होता है

कोई रख देता है
बोने के लिये बीज
सभी चीजों के
नहीं बनते हैं
जानते हुए
बूझते हुए
पेड़ पौंधे
जिनके

कुछ को
आनन्द आता है
जूझते हुए
हुए के साथ

होने ना होने का
बही खाता बनाये
हर खबर की
कबर खोदने वाला
भी भूल सकता है

खबरें भी लाशें
हो जाती है
सड़ती हैं
फूलती हैं
गलती हैं
पड़ी पड़ी

अखबार
समाचार टी वी
रेडियो पत्रकार
निकल निकल
कर गुजर जाते हैं
उसके अगल बगल से
कुछ उत्साहित
उसे उसी के
होंठों पर बेशरमी
के साथ सरे आम
भीड़ के सामने सामने
चूमते हुए भी

अपनी अपनी ढपली
पीटते सरोकारी लोग
झंडे दर झंडे जलाते
पीटते फटी आवाज
के साथ फटी किस्मत
के कुछ घरेलू बीमार
लोगों की तीमारदारी
के रागों को

शहर भी इन सब
सरोकारों के साथ
जहाँ लूला काना
अंधा हो चुका होता है

सरोकारी ‘उलूक’ भी
अपनी चोंच को
तीखा करता हुआ
एक खबर को
बगल में दबाये हुए
एक कबर को
खोदने में
कई दिनों से
लगा होता है

सब को सब
मालूम सब को
सब पता होता है
मातम होना है

पर मातम होने
तक का इंतजार
किसी को भी
नहीं होता है
ना खून होता है
ना आँसू होते हैं
ना ही कोई
होता है जो
जार जार रोता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

बुधवार, 16 मार्च 2016

जब जनाजे से मजा नहीं आता है दोबारा निकाला जाता है

लाश को
कब्र से
निकाल कर

फिर से
नहला
धुला कर

नये कपड़े
पहना कर

आज
एक बार
फिर से
जनाजा
निकाला गया

सारे लोग
जो लाश के
दूर दूर तक
रिश्तेदार
नहीं थे
फिर से
इक्ट्ठा हुऐ

एक कुत्ते
को मारा
गया था
शेर मारने
की खबर
फैलाई
गई थी
कुछ ही
दिन पहले

मजा नहीं
आया था
इसलिये
फिर से
कब्र
खोदी गई

कुत्ते की
लाश
निकाल कर
शेर के
कपड़े
पहनाये गये

जनाजा
निकाला गया
एक बार
फिर से

सारे कुत्ते
जनाजे
में आये

खबर
कल के सारे
अखबारों
में आयेगी
चिंता ना करें

समझ में
अगर नहीं
आये कुछ
ये पहला
मौका
नहीं है जब

कबर
खोद कर
लाश को
अखबार
की खबर
और फोटो
के हिसाब से
दफनाया और
फिर से
दफनाया
जाता है

कल का
अखबार
देखियेगा
खबर
देखियेगा

सच को
लपेटना
किसको
कितना
आता है

ठंड
रखा कर
'उलूक'
तुझे
बहुत कुछ
सीखना
है अभी

आज बस
ये सीख
दफनाये गये
एक झूठ को
फिर से
निकाल
कर कैसे
भुनाया
जाता है ।

http://www.fotosearch.com/

रविवार, 17 जनवरी 2016

लोगों की लोगों द्वारा लोगों के लिये

अब्राहम लिंकन
लोगों के लिये
बोल गये थे
लोगों की
समझ में
आज तक बात
नहीं घुस पाई है
धूर्तों की जय हो
नियम कानून
बना संवार कर
अपने साम्राज्य
की ईंटे क्या
चमकाई हैं
धूर्तों की महासभा
में फिर एक बार
धूर्तों ने अपनी
ताकत दिखलाई है
धूर्तों की, धूर्तों द्वारा,
धूर्तों के लिए
लाग़ू होता है
लोग की जगह
होना भी चाहिये
कोई बुराई नहीं है
खबर भी आई है
नियमावली नई
बनवाई है
बात धूर्तों के खुद
के अधिकारों की है
खुजली हो जाने
वालों को खुजली
होती ही है
होती आई है
कोई नई बात नहीं है
कई बार खुजलाई है
खुजलाने की आदत
पड़ ही चुकी है
अच्छा महसूस होता है
दवाई भी इसीलिये
नहीं कोई कभी खाई है
बैचेनी सी महसूस
होने लगती है हमेशा
पता चलता है जब
कई दिनों से उनकी
कोई खबर शहर के
पन्ने में अखबार
के नहीं आई है
‘उलूक’ तू लोगों में
वैसे भी नहीं
गिना जाता है
और धूर्तों से तेरा
हमेशा का छत्तीस
का नाता है

तुझे भी हर बात पर
खुजलाने के अलावा
और क्या आता है 

खुजला ले तमन्ना
से जी भर कर
यहाँ खुजली करने
की किसी को भी
दूर दूर तक कहीं 

नहीं 
कोई मनाही  है ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

सोमवार, 2 नवंबर 2015

खाली सफेद पन्ना अखबार का कुछ ज्यादा ही पढ़ा जा रहा था

कुछ ज्यादा
ही हलचल
दिखाई
दे रही थी
अखबार के
अपने पन्ने पर

संदेश भी
मिल रहे थे
एक नहीं
ढेर सारे
और
बहुत सारे
क्या
हुआ होगा
समझ में
नहीं आ
पा रहा था

पृष्ठ पर
आने जाने
वालों पर
नजर रखने
वाला
सूचकाँक
भी ऊपर
बहुत ऊपर
को चढ़ता
हुआ नजर
आ रहा था

और
ये सब
शुरु हुआ था
जिस दिन से
खबरें छपना
थोड़ा कम होते
कुछ दिन के
लिये बंद
हुआ था

ऐसा नहीं था
कि खबरें नहीं
बन रही थी

लूट मार हमेशा
की तरह धड़ल्ले
से चल रही थी
शरीफ लुटेरे
शराफत से रोज
की तरफ काम
पर आ जा रहे थे

लूटना नहीं
सीख पाये
बेवकूफ
रोज मर्रा
की तरह
तिरछी
नजर से
घृणा के
साथ देखे
जा रहे थे

गुण्डों की
शिक्षा दीक्षा
जोर शोर से
औने पौने
कोने काने
में चलाई
जा रही थी

पढ़ाई लिखाई
की चारपाई
टूटने के
कगार पर
चर्र मर्र
करती हुई
चरमरा रही थी

‘उलूक’
काँणी आँख से
रोज की तरह
बदबूदार
हवा को
पचा रहा था
देख रहा था
देखना ही था
आने जाने के
रास्तों पर
काले फूल
गिरा रहा था

कहूँ ना कहूँ
बहुत कह
चुका हूँ
सभी
कुछ कहा
एक ही
तरह का
कब तक
कहा जाये
सोच सोच
कर कलम
कभी
सफेद पानी में
कभी
काली स्याही में
डुबा रहा था

एक दिन
दो दिन
तीन दिन
छोड़ कर
कुछ नहीं
लिखकर
अच्छा कुछ
देखने
अच्छा कुछ
लिखने
का सपना
बना रहा था

कुछ नहीं
होना था
सब कुछ
वही रहना था
फिर लिखना
शुरु
किया भी
दिखा भी
अपनी सूरत
का जैसा ही
जमाने से
लिखा गया
आज भी
वैसा ही कुछ
कूड़ा कूड़ा
सा ही
लिखा जा
रहा था

जो है सो है
बस यही पहेली
बनी रही थी
देखने पढ़ने
वाला खाली
सफेद पन्ने को
इतने दिन
बीच में
किसलिये
देखने के लिये
आ रहा था ।

चित्र साभार: www.clker.com

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

लिखना सीख ले अब भी लिखने लिखाने वालों के साथ रहकर कभी खबरें ढूँढने की आदत ही छूट जायेगी

वैसे कभी सोचता
क्यों नहीं कुछ
लिख लेना सीख
लेने के बारे में भी
बहुत सी समस्याँऐं
हल हो जायेंगी
रोज एक ना एक
कहीं नहीं छपने
वाली खबर को
लेकर उसकी कबर
खोदने की आदत
क्या पता इसी
में छूट जायेगी
पढ़ना समझना
तो लगा रहता है
अपनी अपनी
समझ के
हिसाब से ही
समझने ना
समझने वाले
की समझ में
घुसेगी या
बिना घुसे ही
फिसल जायेगी
लिखने लिखाने
वालों की खबरें ही
कही जाती हैं खबरें
लिखना लिखाना
आ जायेगा अगर
खबरों में से एक
खबर तेरी भी शायद
कोई खबर हो जायेगी
समझ में आयेगा
तेरे तब ही शायद
‘उलूक’
पढ़े लिखे खबर वालों
को सुनाना खबर
अनपढ़ की बचकानी
हरकत ही कही जायेगी
खबर अब भी होती
है हवा में लहराती हुई
खबर तब भी होगी
कहीं ना कहीं लहरायेगी
पढ़े लिखे होने के बाद
नजर ही नहीं आयेगी
चैन तेरे लिये भी होगा
कुछ बैचेनी रोज का रोज
बेकार की खबरों को
पढ़ने और झेलने
वालों की भी जायेगी ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

भाई कोई खबर नहीं है खबर गई हुई है

सारे के सारे
खबरची
अपनी अपनी
खबरों के साथ
सुना गया है
टहलने चले गये हैं
पक्की खबर नहीं है
क्योंकि किसी को
कोई भी खबर बना
कर नहीं दे गये हैं
खबर दे जाते तब भी
कुछ होने जाने
वाला नहीं था
परेशानी बस
इतनी सी है
कि समझ में
नहीं आ पा रहा है
इस बार ऐसा
कैसे हो गया
खबर दे ही
नहीं गये हैं
खबर अपने
साथ ही ले गये हैं
अब ले गये हैं तो
कैसे पता चले
खबर की खबर
क्या बनाई गई है
कैसे बनाई गई है
किस ने लिखाई है
किस से लिखवाई गई है
किसका नाम
कहाँ पर लिखा है
किस खबरची को
नुकसान हुआ है
और किस खबरची को
फायदा पहुँचा है
बड़ी बैचेनी हो गई है
जैसे एक दुधारू भैंस
दुहने से पहले खो गई है
‘उलूक’ सोच में हैं तब से
खाली दिमाग को
अपने हिला रहा है
समझ में कभी भी
नहीं आ पाया जिसके
सोच रहा है
कुछ आ रहा है
कुछ आ रहा है
बहुत अच्छा हुआ
खबर चली गई है
और खबरची के
साथ ही गई है
खबर आ
भी जाती है
तब भी कहाँ
समझ में
आ पाती है
खबर कैसी
भी हो माहौल तो
वही बनाती है ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

समाचार बड़े का कहीं बड़ा कहीं थोड़ा छोटा सा होता है

बकरे और मुर्गे
चैंन की साँस
खींच कर
ले रहे हैं
सारे नहीं देश
में बस एक दो
जगह पर कहीं
वहीं मारिया जी की
पदोन्नति हो गई है
शीना बोरा को
आरूषि नहीं बनने दूँगा
उनसे कहा गया
उनके लिये लगता है 
फलीभूत हो गया है
मृतक की आत्मा ने
खुश हो कर
सरकार से उनको
अपने केस को छोड़
आगे बढ़ाने के लिये
कुछ कुछ बहुत
अच्छा कह दिया है
हेम मिश्रा बेल पर
बाहर आ गया है
सरकार का कोई
आदमी आकर इस
बात को यहाँ
नहीं बता गया है
खुद ही बाहर आया है
खुद ही आकर उसने
खुद ही फैला दिया है
बड़े फ्रेम की बडी खबरें
और उसके
फ्रेम की
दरारों से 
निकलती
छोटी खुरचने
रोज ही होती हैं
ऐसे में ही होता है और
बहुत अच्छा होता है
अपने छोटे फ्रेम के
बड़े लोगों की छोटी
छोटी जेबकतरई
उठाइगीरी के बीच
से उठा कर कुछ
छोटा छोटा चुरा
कर कुछ यहाँ
ले आना होता है
फिर उसे जी भर
कर अपने ही कैनवास
में बेफिक्र सजाना होता है
बड़े हम्माम से अच्छा
छोटे तंग गोसलखाने का
अपना मजा अपना
ही आनन्द होता है

उलूक करता रहता है
हमेशा कुछ ना कुछ
नौटंकी कुछ कलाकारी
कुछ बाजीगरी
उसकी रात की दुनियाँ
में इन्ही सब फुलझड़ियों
का उजाला होता है  ।

चित्र साभार:
earthend-newbeginning.com

सोमवार, 7 सितंबर 2015

खबर है खबर रहे प्रश्न ना बने ऐसा कि कोई हल करने के लिये भी कहे

क्या है ये

एक डेढ़ पन्ने
के अखबार
के लिये

रोज एक
तुड़ी मुड़ी
सिलवटें
पड़ी हुई खबर

उसे भी
खींच तान कर
लम्बा कर

जैसे
नंगे के
खुद अपनी
खुली टाँगों के
ना ढक पाने की
जद्दोजहद में

खींचते खींचते
उधड़ती हुई
बनियाँन के
लटके हुऐ चीथड़े

आगे पीछे
ऊपर नीचे
और इन
सब के बीच में

खबरची भी
जैसे
लटका हुआ कहीं

क्या किया
जा सकता है

रोज का रोज
रोज की
एक चिट्ठी
बिना पते की

एक सफेद
सादे पन्ने
के साथ
उत्तर की
अभिलाषा में

बिना टिकट
लैटर बाक्स में
डाल कर
आने का
अपना मजा है

पोस्टमैन
कौन सा
गिनती करता है

किसी दिन
एक कम
किसी दिन
दो ज्यादा

खबर
ताजा हो
या बासी

खबर
दिमाग लगाने
के लिये नहीं

पढ़ने सुनने
सुनाने भर
के लिये होती है

कागज में
छपी हो तो
उसका भी
लिफाफा
बना दिया
जाता है कभी

चिट्ठी में
घूमती तो
रहती है
कई कई
दिनों तक

वैसे भी
बिना पते
के लिफाफे को

किसने
खोलना है
किसने पढ़ना है

पढ़ भी
लिया तो

कौन सा
किसी खबर
का जवाब देना
जरूरी होता है

कहाँ
किसी किताब
में लिखा
हुआ होता है

लगा रह ‘उलूक’

तुझे भी
कौन सा
अखबार
बेचना है

खबर देख
और
ला कर रख दे

रोज एक
कम से कम

एक नहीं
तो कभी
आधी ही सही
कहो कैसी कही ?

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 5 जून 2015

सब कुछ सीधा सीधा हो हमेशा ऐसा कैसे हो

रख दे
अपना दिल
खोल कर
अपने सामने से

और पढ़ ले
हनुमान चालीसा

किसी को भी
तेरे दिल से
क्या लेना देना

सबके पास
अपना एक
दिल होता है

हाँ
हो सकता है
हनुमान जी
के नाम पर
कुछ लोग रुक जायें

ये बात
अलग है
कि हनुमान जी
किस के लिये
क्या कर सकते हैं

हो सकता है
हनुमान जी
के लिये भी
प्रश्न कठिन हो जाये

उन्हें भी
आगे कहीं
राम चंद्र जी के पास
पूछ्ने के लिये
जाना पड़ जाये

इसीलिये
हमेशा राय
दी जाती है
खबर के चक्कर में
पड़ना ठीक नहीं है

खबर
बनाने वाले
की मशीन
खबर वाले
के हाथ में
नहीं होती है

खबर
की भी एक
नब्ज होती है

एक
घड़ी होती है
जो टिक टिक
नहीं करती है

हनुमान जी ने
उस जमाने में
घड़ी देखी
भी नहीं होगी

देखी होती
तो तुलसीदास जी
की किताब में
कहीं ना कहीं
लिखी जरूर होती

इसलिये
ठंड रख
गरम मत हो
खा पी और सो

खबर को
अखबार
में रहने दे

अपने
दिल को उठा
और वापिस
दिल की जगह में
फिर से बो
हनुमान जी
की भी जय हो
जय हो जय हो ।

चित्र साभार: beritapost.info

गुरुवार, 14 मई 2015

समझदार एक जगह टिक कर अपनी दुकान नहीं लगा रहा है

किसलिये
हुआ जाये
एक अखबार

 क्यों सुनाई
जाये खबरें
रोज वही
जमी जमाई दो चार

क्यों बताई
जाये शहर
की बातें
शहर वालों को हर बार

क्यों ना
कुछ दिन
शहर से
हो लिया जाये फरार

वो भी यही
करता है
करता आ
रहा है

यहाँ जब
कुछ कहीं
नहीं कर
पा रहा है

कभी इस शहर
तो कभी उस शहर
चला जा रहा है

घर की खबर
घर वाले सुन
और सुना रहे हैं

वो अपनी खबरों
को इधर उधर
फैला रहा है

सीखना चाहिये
इस सब में भी
बहुत कुछ है
सीखने के लिये ‘उलूक’

बस एक तुझी से
कुछ नहीं
हो पा रहा है

यहाँ बहुत
हो गया है
अब तेरी
खबरों का ढेर

कभी तू भी
उसकी तरह
अपनी खबरों
को लेकर

कुछ दिन
देशाटन
करने को
क्यों नहीं
चला जा रहा है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

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