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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

असली सब छिपा कर रोज कुछ नकली हाथ में थमा जाता है

सब कुछ
लिख देने
की चाह में
नकली कुछ
लिख दिया
जाता है

बहुत कुछ
असली लिखा
जाने वाला
कहीं भी नजर
नहीं आता है

कहीं नहीं
लिखा जाता
है वो सब जो

लिखने के लिये
लिखना शुरु
करने से पहले
तैयार कर
लिया जाता है

सारा सब कुछ
शुरु में ही कहीं
छूट जाता है
दौड़ने लगता है
उल्टे पाँँव
जैसे लिखने वाले
से ही दूर कहीं
भागना चाहता है

जब तक
समझने की
कोशिश करता है
लिखते लिखते
लिखने वाला

कलम पीछे
छूट जाती है
स्याही जैसे
फैल जाती है

कागज हवा में
फरफराना शुरु
हो जाता है
ना वो पकड़
में आता है ना
दौड़ता हुआ
खयाल कहीं
नजर आता है

कितनी बार
समझाया गया है
सूखने तो दिया कर
स्याही पहले दिन की

दूसरे दिन
गीले पर ही
फिर से लिखना
शुरु हो जाता है

कितना कुछ लिखा
कितना कुछ
लिखना बाकी है
कितना कुछ बिका
कितना बिकेगा
कितना और
बिकना बाकी है

हिसाब
लगाते लगाते
लिखने वाला
लेखक तो नहीं
बन पाता है
बस थोड़ा सा
कुछ शब्दों को
तोलने वाली मशीन
हाथ में लिये एक
बनिया जरूर
हो जाता है

कुछ नहीं किया
जा सकता है ‘उलूक’

देखते हैं एक
नये सच को
खोद कर
निकाल कर
समझने के
चक्कर में

रोज एक नया
झूठ बुनकर
आखिर कब तक
कोई हवा में
उसकी पतंग
बना कर उड़ाता है

पर सलाम है
उसको जो ये
देखने के लिये
हर बार

हर पन्ने में किनारे से
झाँकता हुआ फिर भी
कहीं ना कहीं जरूर
नजर आ जाता है ।

चित्र साभार: www.istockphoto.com

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

बिना डोर की पतंग होता है सच हर कोई लपेटता है अपनी डोर अपने हिसाब से


सोचने
सोचने तक
लिखने
लिखाने तक
बहुत दूर
चल देता है
सोचा हुआ

भूला
जाता है
याद नहीं
रहता है
खुद ने
खुद से
कुछ कहा
तो था

सच के
बजूद पर
चल रही
बहस
जब तक
पकड़ती
है रफ्तार

हिल जाती है
शब्द पकड़ने
वाली बंसी

काँटे पर
चिपका हुआ
कोई एक
हिलता हुआ
कीड़ा

मजाक
उड़ाता है
अट्टहास
करता हुआ

फिर से
लटक
जाता है
चुनौती दे
रहा हो जैसे

फिर से
प्रयास
करने की

पकड़ने की
सच की
मछली को
फिसलते हुऐ
समय की
रेत में से

बिखरे हुऐ हैं
हर तरफ हैं
सच ही सच हैं

झूठ कहीं
भी नहीं हैं

आदत मगर
नहीं छूटती है
ओढ़ने की
मुखौटे सच के

जरूरी भी
होता है
अन्दर का
सच कहीं
कुढ़ रहा
होता है

किसने
कहा होता है
किस से
कहा होता है

जरूरत ही
नहीं होती है
आईने के
अन्दर का
अक्स नहीं
होता है

हिलता है
डुलता है
सजीव
होता है

सामने से
होता है
सब का
अपना अपना
बहुत अपना
होता है

सच पर
शक करना
ठीक नहीं
होता है

‘उलूक’

कोई कुछ
नहीं कर
सकता है
तेरी फटी
हुई
छलनी का

अगर
उसमें
थोड़ा सा
भी सच
दिखाने भर
और
सुनाने भर
का अटक
नहीं रहा
होता है ।

चित्र साभार: SpiderPic

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

आओ खेलें झूठ सच खेलना भी कोई खेलना है

प्रतियोगिता
झूठ
बोलने
की ही
हो रही है

हर
तरफ
आज
के दिन
पूरे
देश में

किसी
एक झूठे
के
बड़े झूठ
ने ही
जीतना है

झूठों में
सबसे
बड़े झूठे
को
मिलना
है ईनाम
किसी
नामी
बेनामी
झूठे
ने ही
खुश
हो कर
अन्त में
उछलना है
कूदना है

झूठे ने
ही
देना
है 
झूठे
को 
 
सम्मान

सारे झूठे
नियम बन
चुके हैं
झूठे
सब कुछ
झूठ पर
पारित कर
चुके हैं
झूठों की
सभा में

उस पर
जो भी
बोलना है
जहाँ
बोलना है
किसी झूठे
को ही
बोलना है

सामने से
होता हुआ
नजर आ
रहा है जो
कुछ भी
कहीं पर भी
वो सब
बिल्कुल भी
नहीं देखना है
उस पर
कुछ भी नहीं
कुछ बोलना है

झूठ देखने
से नहीं
दिखता है
इसलिये
किसलिये
आँख को
अपनी
किसी
ने क्यों
खोलना है

झूठ के
खेल को
पूरा होने
तक
खेलना है

झूठ ने ही
बस स्वतंत्र
रहना है

झूठ पकड़ने
वालों पर
रखनी हैं
निगाहें

हरकत
करने से
पहले उनको
पकड़ पकड़
उसी समय
झूठों ने
साथ
मिलकर
पेलना है

जिसे
खेलना है
झूठ
उसे ही
झूठ के
खेल पर
करनी है
टीका टिप्पणी
झूठों के
झूठ को
झूठ ने ही
झेलना है

‘उलूक’
तेरे पेट में
होती ही
रहती है
मरोड़
कभी भरे
होने से
कभी
खाली
होने से

लगा क्यों
नहीं लेता
है दाँव
ईनाम
लेने के लिये
झूठ मूठ
में ही
कह कर
बस कि
पूरा कर
दिया तूने
भी कोटा
झूठ
बोलने का

हमेशा सच
बोलना भी
कोई बोलना है ।

चित्र साभार: www.clipartkid.com

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ऊपर वाले के जैसे ही कुछ अपने अपने नीचे भी बना कर वंदना कर के आते हैं

आइये साथ
मिलकर
अपनी अपनी
समझ कुछ
और बढ़ाते हैं
दूर बज रहे
ढोल नगाड़ों
में अपने अपने
राग ढूँढ कर
अपनी सोच के
टेढ़े मेढ़े पेंच
अपनी अपनी
पसंद के झोल में
कहीं फँसाते हैं
अपने घर में
सड़ रहे फलों
पर इत्र डाल कर
चाँदी का वर्क लगा कर
अगली पीढ़ी के लिये
आइये साथ
साथ सजाते हैं
शोर नहीं है
नहीं है शोर
कविताएं हैं गीत हैं
झूमते हैं नाचते हैं गाते हैं
आइये सब मिल जुल कर
अपने अपने घर की
खिड़कियाँ दरवाजे के
साथ में अपनी
आँख बंद कर
दूर कहीं चल रहे
नाटक के लिये
जोर शोर से
तालियाँ बजाते हैं
कलाकारी कलाकार
की काबिले तारीफ है
आखिरकार उम्दा
कलाकारों में से
छाँटे गये कलाकार
के द्वारा सहेज कर
मुंडेर पर सजाया गया
एक खूबसूरत कलाकार है
आइये लच्छेदार बातों के
गुच्छों के फूलों को
मरी हुई सोचों के ऊपर
से जीवित कर सजाते हैं
बहुत कुछ है
दफनाने के लिये
लाशों को कब्र से
निकाल निकाल
कर जलाते हैं
कहीं कोई रोक कहाँ है
अपने अपने घर को
अपनी अपनी दियासलाई
दिखा कर आग लगाते हैं
रोशनी होनी है
चकाचौंध खुद कर के
चारों तरफ झूठ के
पुलिंदों पर सच के
चश्में लगा लगा कर
होशियार लोगों को
बेवकूफ बनाते हैं
नाराज नहीं होना है
‘उलूक’
आधे पके हुऐ को
मसाले डाल डाल कर
अपने अपने हिसाब से
अपनी सोच में पकाते हैं
स्वागत है आइये चिराग
ले कर अपने अपने
रोशनी ही क्यों करें
पूरी ही आग लगाते हैं ।

चित्र साभार: www.womanthology.co.uk

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

सच

क्या किया जाये
जब देर से
समझ में आये

खिड़कियाँ
सामने
वाले की
जिनमें
घुस घुस
कर देखने
समझने
का भ्रम
पालता
रहा हो कोई

खिड़कियाँ
थी ही नहीं
आईने थे

यही होता है
यही गीता है
यही कृष्ण है
और
यही अर्जुन है
बहुत सारी

गलतफहमियाँ
खुद की
खुद को
पता होती हैं
देखना कौन
चाहता है

पर सामने
वाले की
खिड़कियाँ
जो आईना
होती है
हर कोशिश
में देखने की
अपना सच
बिना किसी
लाग लपेट के
बहुत साफ
साफ
दिखाता है
समझ में
आता है
घुसना
समझ में
आता है
दिखना
सब कुछ
साफ साफ

नहीं समझ
में आता है
आईने में
दिखी
परछाइयाँ
खुद की
खुद की
कमजोरियाँ

कृष्ण भी
खुद मे ही है
अर्जुन भी
खुद में ही है
खिड़कियाँ
नहीं हैं
बस आईने हैं

कौन क्या
देखना
चाहता है
खुद बता
देता है
खुद को
उसका सच

देखने की
कोशिश में
तेरे सारे झूठ
तुझे नजर
आते हैं
‘उलूक’
खुश मत
हुआ कर

आईना हटा
कर कुछ
खिड़कियों में
झाँकना सीख

लोग
खिड़कियाँ
खुली तो
रखते हैं
पर आईना
भी रखते
हैं साथ में ।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

झूठ सारे सोने से मढ़ कर सच की किताबों पर लिख दिये जायें

रोज का
ना लिखना
जैसा
लिखना छोड़
कभी
कुछ लिखना
जैसा
लिख दिया जाये

कतरा कतरा
खून
अँधेरे का
अँधेरे में
ही बहने
दिया जाये

पहना कर
कंकाल
की हड्डियों
को माँस
किसी के
बदन से
नोचा
उतारा हुआ
शनील के
कपड़े से
ढक ढका
कर जिंदा
होने की
मुनादी
की जाये

देखने वालों
के आँखों
के बहुत
नजदीक से
फुलझड़ियाँ
झूठ की
जला जला
कर कई
आधा अंधा
कर दिया जाये

जमाने से
सड़ गल गये
बदबू मारते
कुछ
कूड़े कबाड़
पर अपने
इत्र
विदेशी महंगी
खरीद कर
छिड़की जाये

मैय्यत निकलनी
चाहिये थी
जिसकी जमाने
पहले कभी
इस जमाने
में ढक कर
पाँच सितारों
से सजा
शाबाशी दी जाये

बहुत हो गया
जलते सुलगते
धुआँ देते दिल
‘उलूक’ के
तुझे झेलते हुऐ
अब थोड़ी सी
राख डाल
कर बुझा
लेने की
कोशिश भी
कर ली जाये ।

चित्र साभार: www.theemotionalinvestor.org

शनिवार, 22 अगस्त 2015

सच कभी अपने झूठ नहीं कहता है

ऐसा नहीं होता है
ऐसा भी होता है
सारे सचों को
सच सच कह
देने का भी कभी
कभी मन होता है
रोज ही झूठ बोलने
से जायका भी
खराब होता है
सब रखते हैं
अपने अपने
सबके सामने से
उसमें क्या सच
क्या झूठ होता है
किसी को कुछ
पता होता है
किसी को कुछ
पता नहीं होता है
ऐसा भी नहीं होता है
खुद का सच खुद को
ही पता नहीं होता है
कौन सा सच
सच होता है
कौन सा सच
झूठ होता है
कौन सा झूठ
सच होता है
कौन सा झूठ
झूठ होता है
सोच कर देख
‘उलूक’ किसी दिन
दुनियाँ दिखाती है
बहुत कुछ दिखाती है
उसमें कितना कुछ
बहुत कुछ होता है
कितना कुछ कुछ
भी नहीं होता है
जो कुछ भी कहीं
भी नहीं देखता है
जो कुछ भी कभी
भी नहीं सोचता है
आज सब से आगे
बस वही और
वही होता है
सच और झूठ के
चक्कर में पड़ना
इस जमाने में वैसे भी
ठीक नहीं होता है ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

सोमवार, 22 जून 2015

वाशिंगटन से चली है खबर ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ ने की है कवर

झूठ बोलने वाले
होते हैं दिमाग के तेज
‘दैनिक हिन्दुस्तान’ का
सबसे पीछे का है पेज
बच्चों पर शोघ कर
खबर बनाई गई है
दूर की एक कौड़ी जैसे
मुट्ठी खोल के बहुत
पास से दिखाई गई है
शोध करने वाले
बेवकूफ नजर आते हैं
बच्चे भी कभी कोई
बात सच बताते हैं
यही शोध कुछ बड़ों
पर भी होना चाहिये
बिना पढ़े और पढ़े
लिखों पर होना चाहिये
सारा सच खुल कर
सामने आ जायेगा
पढ़ा लिखा पक्का
बाजी मार ले जायेगा
वाशिंगटन महंगी जगह है
डालर बेकार में रुलायेगा
दिल्ली में रुपिया सस्ता है
सस्ते में काम हो जायेगा
शोघ करने की
जरूरत नहीं पड़ेगी
निष्कर्ष पहले
मिल जायेगा
सबको पता है
सब जानते है
झूठ जहाँ सच
कहलाता है
सच को झूठा
कहा जायेगा
झूठ बड़े अक्षर में
पहले पन्ने में
सच छोटे शब्दों में
पीछे के पन्ने में
मुँह अपना छुपायेगा
संविधान है और विधान है
मुहर लगा सच की माथे पर
अपने जैसों के कांधे पर
सच की अर्थी उठायेगा
कंधा देने उमड़ पड़ेगा
एक एक सच्चा
बच्चा बच्चा
सच्चे दिमाग का
कच्चे झूठ का परचम
चारों दिशा में फहरायेगा
जय जय होगी बस जय होगी
‘उलूक’ बिना दिमाग
झूठ देख कर सच है सच है
यही सच है यही सच है
गली में जाकर अपने घर की
जोर जोर से चिल्लायेगा
सच बोलने वालों के
दिमाग में नहीं होते हैं पेंच
अपने आप बिना शोध
सिद्ध हो जायेगा ।

चित्र साभार: wallpaper.mohoboroto.com

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

हैरान क्यों होना है अगर शेर बकरियों के बीच मिमियाने लगा है

पत्थर होता होगा
कभी किसी जमाने में
इस जमाने में
भगवान कहलाने लगा है
कैसे हुआ होगा ये सब
धीरे धीरे कुछ कुछ अब
समझ में आने लगा है
एक साफ सफेद झूठ को
सच बनाने के लिये
जब से कोई भीड़ अपने
आस पास बनाने लगा है
झूठ के पर नहीं होते हैं
उसे उड़ना भी कौन सा है
किसी सच को
दबाने के लिये
झूठा जब से जोर से
चिल्लाने लगा है
शक होने लगा है
अपनी आँखों के
ठीक होने पर भी कभी
सामने से दिख रहे
खंडहर को हर कोई
ताजमहल बताने लगा है
रस्में बदल रही हैं
बहुत तेजी से
इस जमाने की
‘उलूक’ शर्म
को बेचकर
बेशर्म होने में
तुझे भी अब
बहुत मजा
आने लगा है
तेरा कसूर है
या नहीं
इस सब में
फैसला कौन करे
सच भी भीड़
के साथ
जब से आने
जाने लगा है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

जोकर बनने का मौका सच बोलने लिखने से ही आ पायेगा

व्यंग करना है
व्यंगकार
बनना है
सच बोलना
शुरु कर दे
जो सामने से
होता हुआ दिखे
उसे खुले
आम कर दे
सरे आम कर दे
कल परसों में ही
मशहूर कर
दिया जायेगा
इसकी समझ में
आने लगा है कुछ
करने कराने वाला
भी समझ जायेगा
पोस्टर झंडे लगवाने
को नहीं उकसायेगा
नारे नहीं बनवायेगा
काम करने के
बोझ से भी बचेगा
और नाम भी
कुछ कमा खायेगा
 बातों में बोलना
अच्छा नहीं
लगता हो
तो सच को
सबके सामने
अपने आप करना
शुरु कर दे
खुद भी कर और
दूसरों को करने
की नसीहत भी
देना शुरु कर दे
एक दो दिन भी
नहीं लगेंगे
तेरे करने
करने तक
जोकर तुझे
कह दिया जायेगा
किसी ना किसी
अखबार में
छप छपा जायेगा
अपने आस पास
के सच को देख कर
आँख में दूरबीन
लगा कर चाँद को
देखने वालों को
चाँद का दाग
फिर से नजर आयेगा
बनेगी कोई गजल
कोई गीत देश प्रेम
का सुनायेगा
 प्रेम और उसके दिन
की बात भूलकर
रामनामी दुप्ट्टा
ओढ़ कर
कोई ना कोई
संत बाबा जेल
भी चला जायेगा
बचेगी संस्कृति
बचेगा देश
कुछ नहीं भी बचा
तब भी तेरे खुद का
थोड़ा बहुत किसी
छोटे मोटे अखबार
या पत्रिका में
बिकने बिकाने
का जुगाड़ हो जायेगा ।

चित्र साभार: www.picturesof.net

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

लिख कोई भी किताब बिना इनाम बिना सम्मान की कभी भी जिसमें सभी पाठ हों बस तेरे सामने के हो रहे झूठों के


किसी दिन
शायद दिखे
बाजार में
गिनी चुनी
किताबों की
कुछ दुकानों में
एक ऐसी
किताब

जिसमें
दिये गये हों
वो सारे पाठ
जो होते तो हैं
 पर हम
पढ़ाते नहीं हैं
कहीं भी
कभी भी

प्रयोगशाला
में किये
जाने वाले
प्रयोग नहीं
हों जिसमें

होंं झूठ के साथ
किये गये प्रयोग
जो हम
सब करते हैं
रोज अपने लिये
या
अपनो के लिये
ग़ाँधी के सत्य के
साथ किये गये
प्रयोगों की तरह
रोज

किताबों
का होना
और
उसमें लिखी
इबारत का
एक
इबारत होना
देखता
आ रहा है
सदियों से
हर पढ़ने
और नहीं
पढ़ने वाला

लिखने
वाले की
कमजोर
कलम
उठती तो
है लिखने
के लिये
अपनी
बात को
जो उठती
है शूल
की तरह
कहीं उसके
ही अंदर से

पर लिखना
शुरु करने
करने तक
चुन लेती
है एक
अलग रास्ता
जिसमें
कहीं कोई
मोड़
नहीं होता

चल देता
है लेखक
कलम के
साथ स्याही
छोड़ते हुऐ
रास्ते रास्ते
अपनी
बात को
हमेशा
की तरह
ढक कर
पीछे छोड़
जाते हुऐ

जिसे देखने
का मौका
मुड़कर
एक जिंदगी
में तो नहीं
मिलता

फिर भी
हर कोई
लिखता है
एक किताब
जिसमें होते
हैं कुछ
जिंदगी के पाठ

जो बस
लिखे होते
हैं पन्नों में
उतारे जाते हैं
सुनाये जाते हैं
उसी पर प्रश्न
पूछे जाते हैं
उत्तर दिये
जाते हैं
और
जो हो रहा
होता है
सामने से
वो पाठ
कहीं किसी
किताब में
कभी
नहीं होता

क्या पता
किसी दिन
कोई
हिम्मत करे
नहीं हो
एक कायर

’उलूक’
की तरह का
और
लिख डाले
एक किताब
उन सारे
झूठों के
प्रयोगों की
जो हम
तुम और वो
कर रहे हैं रोज
सच को
चिढ़ाने
के लिये
गाँधी जी
की फोटो
चिपका कर
दीवार से
अपनी पीठ
के पीछे ।

चित्र साभार: galleryhip.com

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

आशा का एक दिया जलाना है जरूरी सोच में ही जलायेंगे

एक ही सच
से हट कर
कभी सोचें
कुछ देर के
लिये ही सही
जरूरी है
सोचना
एक दिया
और उससे
बिखरती रोशनी
अपने ही
अंदर कहीं
पालना और
बचाना भी
सोच की ही
हवा के थपेड़ों से
बहुत सारे हों
बहुत रोशनी हो
जरूरी नहीं है
एक ही हो
छोटा सा ही हो
मिट्टी से बना
ना भी हो
तेल भी नहीं
और बाती
भी नहीं हो
बस जलता
हुआ हो
सोच की
ही लौ से
सोच की ही
रोशनी हो
जरूरी है
झूठ से भरे
बाहर के दिये
बेचते हुऐ
रोशनी हर जगह
दीपावली आयेगी
दीपावली जायेगी
बाजार दीपों
के जलेंगे
रोशनी के लिये
रोशनी में ही
रोशनी से बिकेंगे
समेट कर रोशनी
के धन को कुछ
रोशनी से
चमक उठेंगे
रोशनी सिमट जायेगी
रोशनी में ही कहीं
कुछ देर में ही
दिये भी समेटे जायेंगे
बहुत जरूरी है
दिया अंतर्मन का
जला रहना
अगले साल की
दीपावली में
नहीं तो शायद
दिये जलाना भी
क्या पता
भूल जायेंगे
दिया एक
सोच का
सोच में जला
रहना जरूरी है बहुत
जलायेंगे तो ही
समझ पायेंगे ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

शनिवार, 5 जुलाई 2014

रस्म है एक लिखना लिखाना जो लिखना होता है वो कभी नहीं लिखना होता है



रोज लिखना
जरूरी है क्या
क्यों लिखते हो रोज
ऐसा कुछ जिसका
कोई मतलब नहीं होता है
कभी देखा है
लिखते लिखते लेखक
खुद के लिखे हुऐ का
सबसे पुराना सिरा
बहुत पीछे
कहीं खो देता है
क्या किया
जा सकता है
वैसे तो एक
लिखने वाले ने
कुछ कहने के
लिये ही लिखना
शुरु किया होता है
लिखते लिखते
कलम बहुत दूर
तक चली आती है
कहने वाली बात
कहने से ही
रह जाती है
सच कहना कहाँ
इतना आसान होता है
कायर होता है बहुत
कहने वाला
कुछ कहने के लिये
बहुत हिम्मत और
एक पक्का जिगर
चाहिये होता है
लगता नहीं है
खुद को इस
नजर से देखने में
उसे कहीं कोई
संकोच होता है
उसे बहुत अच्छी
तरह से पता होता है
सच को सच सच
लिख देने का
क्या हश्र होता है
किसी का उसी के
अपने ही पाले पौसे
उसके ही चारों ओर
रोज मडराने वाले
चील कौओं गिद्धों के
नोच खाये जाने की
खबर आने में कोई
संदेह नहीं होता है
बाकी जोड़ घटाना
गुणा भाग
जो कुछ भी होता है
इस आभासी दुनियाँ में
सब कुछ आभासी
लिखने तक ही
अच्छा होता है
सच को देखने
सच को समझने
और सच को सच
कहने की इच्छा
रखने वाला ‘उलूक’
तेरे जैसे की ही बस
सोच तक ही
में कहीं होता है
उसके अलावा अगर
ऐसा ही कोई दूसरा
कहीं ओर होता है
तो उसके होने से
कौन सा कहीं
कुछ गजब होता है
लिखना लिखाना
तो चलता रहता है
जो कहना होता है
वो कौन कहाँ
किसी से सच में
कह रहा होता है ।

गुरुवार, 20 मार्च 2014

आवारा होगा तभी तो उसने कह दिया होगा

शायद सच कहा होगा 
या गफलत में ही 
कह गया होगा 
उसने कहा और 
मैंने सुना मेरे बारे में 
मुझ से कुछ इस तरह 
आवारा हो जाना सबके 
बस में नहीं होता 
जो हो लेता है बहुत 
बड़ी शख्सियत होता है 
तू अंदर से आवारा 
आवारा हो गया है 
सुनी सुनाई गजल 
तक जैसे दिल 
धीरे से चल दिया 
"ये दिल ये पागल 
दिल मेरा क्यों 
बुझ गया आवारगी"
फिर लगा आवारा का 
मतलब उसका कहीं 
उठाईगीर से तो नहीं होगा 
या कामचोर या आलसी 
या फिर इधर उधर 
घूमने वाला जैसा ही
उसे कहीं कुछ दिखा होगा
वाह क्या उसने 
मुझ में मेरे अंदर 
का ढूँढ निकाला होगा 
सब कुछ सही बस 
सही बता डाला होगा
पहले लगा था बहुत 
मासूमियत में उसने 
कुछ कह दिया होगा 
हुआ थोड़ा सा 
आश्चर्य फिर अपने में 
नहीं पहुँच पाया 
जिस जगह तक 
आज तक भी कभी 
वो कैसे इतनी 
आसानी से 
पहुँच गया होगा 
कुछ भी कभी भी
लिख लेने का 
मतलब शायद
आवारगी हो गया होगा
तुझे नहीं पता होगा
उसे पता हो गया होगा ।

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

जो सच है उसको उल्टा कर उस के पीठ पर कुछ काम करें

चलिये देश पर
चर्चा करते हैं 
देश के नेता पर
चर्चा करते हैं
चर्चा करने में
क्या जाता है 
किसे पता है
हम अपने घर
अपने शहर
अपने कार्यालय
अपने विश्वविद्यालय
में क्या करते हैं
देश का नेता
जो बनेगा
वो कौन सा
हमारी सोच
हमारे कामों को
देखने के लिये
हमारे घर पर
आ रहा है
घर पर चलो
पड़ोसी का जीना
कुछ हराम करें
आफिस में किसी
पर कोई  ऐक्ट
को लगा कर
चलो किसी को
बदनाम करें
जातिवाद होता
ही है फैलाने
के लिये हमेशा
उसके लिये कुछ
पढ़े लिखे लोग
भी कुछ काम करें
स्कूल की कक्षाओं
का नाश करें
कौन सा मोदी
राहुल या केजरीवाल
देखने आ रहा है
हो रही हैं कि नहीं
परीक्षाओं का
भी इंतकाल करें
एक टोपी या झंडा
उठा कर जोर शोर से
कुछ लोगों का
जीना हराम करें
कुछ बहस करें
देश के बारे में
काम करने की
किसको पड़ी है
काम करने वाले
को बेकाम करें
किसी दल का
सदस्य बन कर
अपने दुश्मन का
जीना हराम करें
चलो भी देश का
पाठ पढ़ें कुछ
लोगों को पढ़ायें
अखबार में अपने
लोगों के साथ
मिलकर कुछ
खबर बनायें
बातें किताब की
सारी फैलायें
काम अपने
हिसाब से
अपने अपने
परिवार के नाम
के लिये करें
किसे फुरसत है
सोचने की
क्या हो रहा है
उसके आस पास
चलो चाँद और
सूरज की कुछ
बात करें ।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

सच सामने लाने में बबाल क्यों हो जाता है

सच कड़वा
होता है
निगला
नहीं जाता है

गांंधी के
मर जाने से
क्या हो जाता है
गांंधीवाद क्या
उसके साथ में
चला जाता है

उसका
सिखाया गया
सत्य का प्रयोग
जब किया जाता है
तो बबाल हो गया
करके क्यों बताया
और
दिखाया जाता है

बहुत बहुत
शाबाशी
का काम
किया जाता है
जब जैसा मन में
होता है वैसा कर
लेने की हिम्मत
कोई कर ले जाता है

उस के लिये
एक उदाहरण
हो जाता है
जो सोचता
वहीं पर है
पर करने
को कहीं
पीछे गली में
चला जाता है

सारे देश में
जब हर जगह
कुछ माहौल
एक जैसा
हो जाता है
ऐसे में  कहीं
किसी जगह से
निकल कर
कुछ बाहर
आ ही जाता है

सच बहुत
दिनों तक
छिपाया
नहीं जाता है

मिर्चा पाउडर का
प्रयोग तो आँसू
लाने के लिये
किया जाता है

देश का दर्द
बाहर ला
कर दिखाने
के लिये कुछ
तो करना ही
पड़ जाता है

संविधान में ही
इस सब
की व्यवस्था
कर लेने में
किसकी
जेब से
पता नहीं
क्या चला
जाता है

जैसा माहौल
सारे देश में
अंदर ही अंदर
छुपा छुपा के
हर दिल में
पाला जाता है

उसे किसी
के बाहर
ला कर
सच्चाई से
दिखा देने
पर क्यों
इतना बबाल
हो जाता है

भारत रत्न
ऐसे ही
लोगों को
देकर
कलयुगी
गांंधी का
अवतार
क्यों नहीं
कह दिया
जाता है

अगर
नहीं हो पा
रहा होता है
इस तरह का
किसी से कहीं

कुछ
सीखने सिखाने
के लिये मास्टर के
पास क्यों नहीं
भेज दिया जाता है

हाथ पैर
चलाये बिना
जिसको बहुत कुछ
करवा देने का
अनुभव होता है
जब ऐसा माना
ही जाता है ।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

कभी होता है पर ऐसा भी होता है

मुश्किल
हो जाता है
कुछ
कह पाना
उस
अवस्था में
जब सोच
बगावत
पर उतरना
शुरु हो
जाती है
सोच के
ही किसी
एक मोड़ पर

भड़कती
हुई सोच
निकल
पड़ती है
खुले
आकाश
में कहीं
अपनी मर्जी
की मालिक
जैसे एक
बेलगाम घोड़ी
समय को
अपनी
पीठ पर
बैठाये हुऐ
चरना शुरु
हो जाती है
समय के
मैदान में
समय को ही

बस
यहीं
पर जैसे
सब कुछ
फिसल
जाता है
हाथ से

उस समय
जब लिखना
शुरु हो
जाता है
समय
खुले
आकाश में
वही सब
जो सोच
की सीमा
से कहीं
बहुत बाहर
होता है

हमेशा
ही नहीं
पर
कभी कभी
कुछ देर के
लिये ही सही
लेकिन सच
में होता है

मेरे तेरे
उसके साथ

इसी बेबसी
के क्षण में
बहुत चाहने
के बाद भी
जो कुछ
लिखा
जाता है
उसमें
बस
वही सब
नहीं होता है
जो वास्तव में
कहीं जरूर
होता है

और जिसे
बस समय
लिख रहा
होता है
समय पढ़
रहा होता है
समय ही
खुद सब कुछ
समझ रहा
होता है ।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

सबूत होना जरूरी है ताबूत होने से पहले

छोटी हो
या बड़ी
आफत कभी
बता कर
नहीं आती है
और
समझदार लोग
हर चीज के
लिये तैयार
नजर आते है

आफत बाद
में आती है
उससे पहले
निपटने के
हथियार लिये
हजूर
दिख जाते हैं

जिनके लिये
पूरी जिंदगी
प्रायिकता का
एक खेल हो
उनको किस
चीज का डर

पासा फेंकते
ही छ:
हवा में ही
ले आते है

जैसे सब
कुछ बहुत
आसान होता है

एक लूडो
साँप सीढ़ी
या
शतरंज का
कोई खेल

ऐसे में ही
कभी कभी
खुद के अंदर
एक डर सा
बैठने लगता है

जैसे कोई
उससे
उसके होने
का सबूत
मांगने लगता है

पता होता है
सबूत सच का
कभी भी
नहीं होता है

सबूतों से तो
सच बनाया
जाता है

कब कौन कहाँ
किस हालत में
क्या करता हुआ
अखबार के मुख्य
पृष्ठ पर दिख जाये

बहुत से
ज्योतिष हैं यहाँ
जिनको इस
सबकी
गणना करना
बहुत ही सफाई
के साथ आता है

बस एक बात
सब जगह
उभयनिष्ठ
नजर आती है
जो किसी भी
हालत में
एक रक्षा कवच
फंसे हुऐ के लिये
बन जाती है

कहीं ना कहीं
किसी ना किसी
गिरोह से 

जुड़ा होना

नहीं तो क्या
जरूरत है
किसी सी सी
टी वी के
फुटेज की

जब कोई
स्वीकार
कर रहा हो
अपना अपराध
बिना शर्म बिना
किसी लिहाज

ऐसे में ही
महसूस होता है
किसी गिरोह से
ना जुड़ा होना
कितना दुख:दायी
हो सकता है

कभी भी कोई
पूछ सकता है
तेरे होने या ना
होने का सबूत

उससे पहले
कि बने
तेरे लिये भी
कहीं
कोई ताबूत

सोच ले
अभी भी
है कोई
सबूत कहीं
कि तू है
और
सच में है
बेकार
ही सही
पर है
यहीं कहीं ।

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

सबसे बड़ा सच तो झूठ होता है

सच को
बस
छोड़कर
सब कुछ
चलता हुआ
दिखाई
देता है

सच सबके
पास होता है

जेब में कमीज
और पेंट की
हाथ में कापी
और किताब में

एक के सच
से दूसरे को
कोई मतलब
नहीं होता है

अपने अपने
सच होते हैं
सब का
आकार
अलग
होता है
जैसे
किसी के
पैर की
चप्पल या
जूता होता है

एक का सच
दूसरे के
काम का
नहीं होता है

कोई किसी
के सच के
बारे में
किसी से
कुछ नहीं
कहता है

हाँ झूठ
बहुत ही
मजेदार
होता है

सब बात
करते हैं
झूठ की
झूठ का
आकार
नहीं होता है

एक का झूठ
दूसरे के भी
बहुत काम
का होता है

पर किसी
को पता
नहीं होता है
झूठ कहाँ
होता है

सूचना का
अधिकार
झूठ को ही
ढूंढने का
ही हथियार
होता है

सबसे ज्यादा
चलता हुआ
वही पाया
जाता है

सच बेवकूफ
मैं सच हूं
सोच सोच कर
एक जगह ही
बैठा रह जाता है

जहाँ पहुचने
की कोई
सोच भी
नहीं सकता
झूठ जरूर
पहुंच जाता है

झूठ के पैर
नहीं होते है
बहकाने के
लिये ही
शायद कह
दिया जाता है ।

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

मान लीजिये नया है दुबारा नहीं चिपकाया है

हर दिन का
लिखा हुआ
कुछ अलग
हो जाता है
दिन के ही
दूसरे पहर
में लिखे हुऐ
का तक मतलब
बदल जाता है
सुबह की कलम
जहां उठाती सी
लगती है सोच को
शाम होते होते
जैसे कलम के
साथ कागज
भी सो जाता है
लिखने पढ़ने और
बोलने चालने को
हर कोई एक सुंदर
चुनरी ओढ़ाता है
अंदर घुमड़
रहे होते हैं
घनघोर बादल
बाहर सूखा पड़ता
हुआ दिखाता है
झूठ के साथ
जीने की इतनी
आदत हो जाती है
सच की बात
करते ही खुद
सच ही
बिफर जाता है
कैसे कह देता है
कोई ऐसे में
बेबाक अपने आप
आज की लिखी
एक नई चिट्ठी
का मौजू उतारा
हुआ कहीं से
नजर आता है
जीवन के शीशे
में जब साफ
नजर आता है
एक पहर से
दूसरे पहर
तक पहुंचने
से पहले ही
आदमी का
आदमी ही
जब एक
आदमी तक
नहीं रह पाता है
हो सकता है
मान भी लिया
वही लिखा
गया हो दुबारा
लेकिन बदलते
मौसम के साथ
पढ़ने वाले के लिये
मतलब भी तो
बदल जाता है ।

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