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शनिवार, 4 नवंबर 2017

बातों से खुद सुलगी होती हैं बातें कहाँ किसी ने जलाई होती हैं


ठीक बात
नहीं होती है

कह देना
अपनी बात
किसी से भी

कुछ बातें
कह देने की
नहीं होती हैं
छुपायी जाती हैं

बात के
निकलने
और
दूर तक
चले जाने
की बात पर
बहुत सी
बातें कही
और
सुनी जाती हैं
सुनाई जाती हैं

कुछ लोग
अपनी बातें
करना
छोड़ कर

बातों बातों
में ही
बहुत सारी
बात
कर लेते हैं

बातों बातों में
किसी की बातें
बाहर
निकलवाकर

उसी से
कर लेने
की निपुणता
यूँ ही हर
किसी को
नहीं आयी
होती है

एक
दो चार दिन के
खेल खेल में
सीख लेना
नहीं होता है
बातों को
लपेट लेना
सामने वालों की


उसकी
अलग से
कई साल 

सालों साल

बातों बातों में
बातों के स्कूलों में
पढ़ाई लिखाई होती है

‘उलूक’
नतमस्तक
होता है
बातों के ऐसे
शहनशाहों के
चरणों में
ठंड रख कर
खुद हिमालयी 

बर्फ की 

हमेशा अपनी
बातों में जिसने
दूसरे की
दिल की
बातों की
नरम आग
सुलगा
सुलगा कर
पानी में
भी आग
लगाई
होती है ।


चित्र साभार: ClipartFest

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

बुखार कैसा भी हो निकलता ही है कुछ बाहर बुदबुदाने में

बस चार
दिन की है
बची बैचेनी

फिर बजा
लेना बाँसुरी
लगा कर आग
रोम को पूरे

सब कुछ
बदल
जायेगा जब
बनेगी राख
देख लेना
मिचमिचाती
सी अगर
बन्द भी होगी
तब भी आँख

धुआँ खाँसेगा
खुद बूढ़ा
होकर जले
जंगल का
बहेगी नाक
आपदा के
पानी की
बहुत जोरों से

सारा हरा भूरा
और सारा भूरा
हरा हो लेगा
यूँ ही बातों
बातों के बीच

घुस लेंगे सारे
दीमक छोड़
कर कुतरना
जीते हुऐ और
मरे हुऐ को
जैसे थे जहाँ थे
की स्थिति में

उगना शुरु
होंगे जंगल
के जंगल
लदने लगेंगे
फल फूल
पौंधों में पेड़
बनने से
ही पहले

दौड़ेंगे उल्टे
पाँव बंदर
सुअर
और बाघ
घर वापसी
के लिये
खुशी से

दीवाली
के दीये
खनखनायेंगे
पुराने पीतल
के बने घर के
भरे लबलबा
तेल ही तेल से

उधरते घरों
के आंगन
में रम्भायेंगी
भैसें गायें और
बकरियाँ

सूखे खुरदरे
उधरते पहाड़ों
के हाड़ों से
निकलते
सारे के सारे
नदी धारे
दिखेंगे
छलछलाते

सपने बेचने
निकले हैं अपने
खुद के
लोग कुछ
थोड़े से
खरीददार
सारे सब
लगे हैं
साथ में
अपने

अपने
हिसाब से
अपनी
किताबें
पढ़ कर
समझ कर
गणित
दो में दो
जोड़ कर
करने पाँच
सात या
और
ज्यादा
जितना
हो सके
जहाँ तक

चल तैयार
हो ले तू भी
‘उलूक’
लगाने
स्याही
कहीं
थोड़ी सी
अपने भी
गवाही देगें
सुना हैं
रंग नाखूनों के
आने वाले
दिनो में
उत्सवों में
जीत के
पहाड़ों की।

चित्र साभार: Freepik

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ऊपर वाले के जैसे ही कुछ अपने अपने नीचे भी बना कर वंदना कर के आते हैं

आइये साथ
मिलकर
अपनी अपनी
समझ कुछ
और बढ़ाते हैं
दूर बज रहे
ढोल नगाड़ों
में अपने अपने
राग ढूँढ कर
अपनी सोच के
टेढ़े मेढ़े पेंच
अपनी अपनी
पसंद के झोल में
कहीं फँसाते हैं
अपने घर में
सड़ रहे फलों
पर इत्र डाल कर
चाँदी का वर्क लगा कर
अगली पीढ़ी के लिये
आइये साथ
साथ सजाते हैं
शोर नहीं है
नहीं है शोर
कविताएं हैं गीत हैं
झूमते हैं नाचते हैं गाते हैं
आइये सब मिल जुल कर
अपने अपने घर की
खिड़कियाँ दरवाजे के
साथ में अपनी
आँख बंद कर
दूर कहीं चल रहे
नाटक के लिये
जोर शोर से
तालियाँ बजाते हैं
कलाकारी कलाकार
की काबिले तारीफ है
आखिरकार उम्दा
कलाकारों में से
छाँटे गये कलाकार
के द्वारा सहेज कर
मुंडेर पर सजाया गया
एक खूबसूरत कलाकार है
आइये लच्छेदार बातों के
गुच्छों के फूलों को
मरी हुई सोचों के ऊपर
से जीवित कर सजाते हैं
बहुत कुछ है
दफनाने के लिये
लाशों को कब्र से
निकाल निकाल
कर जलाते हैं
कहीं कोई रोक कहाँ है
अपने अपने घर को
अपनी अपनी दियासलाई
दिखा कर आग लगाते हैं
रोशनी होनी है
चकाचौंध खुद कर के
चारों तरफ झूठ के
पुलिंदों पर सच के
चश्में लगा लगा कर
होशियार लोगों को
बेवकूफ बनाते हैं
नाराज नहीं होना है
‘उलूक’
आधे पके हुऐ को
मसाले डाल डाल कर
अपने अपने हिसाब से
अपनी सोच में पकाते हैं
स्वागत है आइये चिराग
ले कर अपने अपने
रोशनी ही क्यों करें
पूरी ही आग लगाते हैं ।

चित्र साभार: www.womanthology.co.uk

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

अपनी समझ से जो जैसा समझ ले जाये पर दीपावली जरूर मनाये

रोशनी
ही रोशनी
इतनी रोशनी
आँखें चुधिया जायें
शोर ही शोर
इतना शोर
सुनना सुनाना
कौन किस से कहे
कान के पर्दे
फटने से कैसे
बचाये जायें
घुआँ धुआँ
आसमान
रात के तारे
और चाँद
की बात
करना बेकार

जब लगे
सुबह का
सूरज
धीमा धीमा
शरमाता सा
जाड़ों में
जैसे
खुद ही
ठिठुरता
कंंपकपाता
शाम होने
से पहले ही
निढाल हो
ढल जाये

बूढ़ा साँस
लेने के
लिये तड़पे
निढाल हो जाये
चिड़िया कबूतर
डर कर प्राण
ही छोड़ जायें
घर के निरीह
जानवर
भयभीत से
दबाये हुऐ
पूँछें अपनी
इस चारपाई
के नीचे से
निकल कर
दूसरी चारपाई
किसी कोठरी के
अंधेरे कोने में
शरण लेते
हुऐ नजर आयें

लक्ष्मी घर की
करे इंतजार
बाहर की
लक्ष्मी के
आने का
नारायण
और आदमी
दोनो एक दिन
के आम
आदमी हो जायें

खुशी होनी
ही चाहिये
बाँटने के
लिये पास में
किसी को
जरूरत है
या नहीं
एक अलग
ही मुद्दा
हो जाये

दो रास्तों
के बीच के
पेड़ की सूखी
टहनी पर
बैठा ‘उलूक’
दूर शहर
में कहीं लगी
हुई आग
और रोशनी
के फर्क
को समझने
के लिये
दीपासन
लगाया हुआ
नजर आये

जैसा भी है
मनाना है
आईये दीप
जलायें
दीप पर्व
धूम धड़ाके
धूऐं से ही
सही मनायें ।

www.clipartsheep.com

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

आग लिखना सरल है बाकी फालतू की आग है

आग है
बहुत है
इधर भी है
उधर भी है
जल भी रहा
है बहुत कुछ
राख है और
बहुत है
इधर भी है
उधर भी है
लगा हुआ है
धौंकने में
चिंगारी कोई
इधर भी है
उधर भी है
हो भी रहा है
कुछ नहीं भी
हो रहा है
इधर भी कुछ
उधर भी कुछ
अलग अलग
है आग है
इधर की है अलग
अलग है आग
उधर की है
आग सोच की है
आग मोबाईल की है
आग फैशन की है
आग मोटर
साइकिल की है
आग पढ़ने की है
आग पढ़ाने की है
आग निभाने की है
आग पचाने की है
आग जमा करने की है
 आग जलने की है
आग जलाने की है
आग लकड़ियों की है
आग जंगल और
जंगलियों की है
आग सब्सीडी की है
आग मेहनत की है
आग हराम खोरी की है
‘उलूक’ रुक जा रुक जा
मत बाँट आग को
तो कम से कम
आग आग है
आँख आँख है
परेशान मत हुआ कर
हर आस्तीन में साँप है
जरूरी भी है जो है
काटने वाला नहीं है
बस दिखाने का साँप है ।

चित्र साभार: newyork.cbslocal.com

रविवार, 31 मई 2015

कहे बिना कैसे रहा जाये एक दिन की छुट्टी मना कर फिर शुरु हो जा रहा हूँ

महीना बीत रहा है
कल कुछ कहा नहीं
क्या आज भी कुछ
नहीं कह रहा है
कहते हुऐ तो आ रहा हूँ
आज से नहीं एक
जमाने से गा रहा हूँ
मेंढको के सामने
रेंक रहा हूँ
गधों के पास जा जा
कर टर्रा रहा हूँ
इसकी सुन के आ रहा हूँ
उसकी बात बता रहा हूँ
पन्ना पन्ना जोड़ रहा हूँ
एक मोटी सी
किताब बना रहा हूँ
रोज ही दिखता है कुछ
रोज ही बिकता है कुछ
शब्दों से उठा रहा हूँ
समझने की कोशिश
करता रहा हूँ
तुझको कुछ तब भी
नहीं समझा पा रहा हूँ
कल का दिन बहुत
अच्छा दिन था
कल की बात
आज बता रहा हूँ
एक दिन की दफ्तर
से छुट्टी लिया था
घर में बैठे बैठे
मक्खियाँ गिन रहा था
अखबार लेने ही
नहीं गया था
टी वी रेडियो भी
नहीं खुला था
वहाँ की रियासत का
वो नहीं दिखा था
यहाँ की रियासत का
ये नहीं मिला था
छोटे छोटे राजाओं की
राजाज्ञाओं से
कुछ देर ही सही
लगा बच जा रहा हूँ
बहुत मजा आ रहा था
महसूस हो रहा था
रोम में लगी है
लगती रहे आग
एक दिन का ही सही
नीरो बन कर बाँसुरी
चैन की बजा रहा हूँ ।



चित्र साभार : www.pinstopin.com

बुधवार, 6 मई 2015

क्यों कभी कोई कहीं आग से ही आग को गरम कर रहा होता है

आग होती है
थोड़ी सी कहीं
कहीं थोड़ी सी
बस राख होती है
कहीं धीमा सा
सुलगता हुआ
नरम एक
कोयला होता है
कहीं थोड़ा सा धुआँ
और बस कुछ
धुआँ होता है
कहीं जलता है
खुद का ही
कुछ खुद ही
के अंदर कहीं
जलने वाले को
पता होता है
कहीं कुछ कुछ
जल रहा होता है
कहीं दिखती है लपट
कहीं दिखता नहीं है
कुछ भी कहीं पर
कहीं कुछ बातों में
निकल बूँद बूँद
टपक रहा होता है
‘उलूक’ अपनी आग
लेकर साथ में अपने
इसकी आग से
उसकी आग में
आग लगने की
चिंता कर रहा होता है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

किसी दिन ना सही किसी शाम को ही सही कुछ ऐसा भी कर दीजिये

अपनी ही बात
अपने ही लिये
रोज ना भी सही
कभी तो खुल के
कह ही लीजिये
कोई नहीं सुनता
इस गली में कहीं
अपनी आवाज
के सिवा किसी
और की आवाज
खुद के सुनने
के लिये ही सही
कुछ तो कह दीजिये
कितना भी हो रहा हो
शोर उसकी बात का
अपनी बात भी
उसकी बातों के बीच
हौले हौले ही सही
कुछ कुछ ही कहीं
कुछ तो कह दीजिये
जो भी आये कभी
मन में चाहे अभी
निगलिये तो नहीं
उगल ही दीजिये
तारे रहते नहीं
कहीं भी जमीन पर
बनते बनते ही
उनको आकाश की
ओर हो लेने दीजिये
मत ढूँढिये जनाब
ख्वाब रोशनी के यहीं
जमीन की तरफ
नीचे यहीं कहीं
देखना ही छोड़ दीजिये
आग भी है यहीं
दिल भी है यहीं कहीं
दिलजले भी हैं यहीं
कोयलों को फिर से
चाहे जला ही लीजिये
राख जली है नहीं
दुबारा कहीं भी कभी
जले हुऐ सब कुछ
को जला देख कर
ना ही कुरेदिये
उड़ने भी दीजिये
सब कुछ ना भी सही
कुछ कुछ तो कभी
कह ही दीजिये
अपनी ही बात को
किसी और के लिये नहीं
अपने लिये ही सही
मान जाइये कभी
कह भी दीजिये ।

चित्र साभार: galleryhip.com

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

नदी में लगी आग और मछलियों की मटरगश्ती

नदी में आग
लगी हुई है
और मछलियाँ
पेड़ पर चढ़ कर
सोई हुई हैं
अब आप कहेंगे
नदी में किसने
आग लगाई
मछलियाँ पेड़ पर 
किसने चढ़ाई
अरे इतना भी नहीं
अगर जानते हो
तो इधर उधर
लिखे लिखाये को
छलनी हाथ में
लेकर क्यों छानते हो
होना वही होता है
जो राम ने रचा
हुआ होता है
राम कौन है
पूछने से पहले
सोच लेना होता है
रहना होता है या
नहीं रहना होता है
राम को तो
माननीय
कुरैशी जी
तक जानते हैं
और जो राम को
नहीं जानते हैं
उनको वो बहुत ही
बदनसीब मानते हैं
अब ये नहीं कहना
मुझको नहीं पता है
अखबार में मुख्य पृष्ठ
पर उनका ऐसा ही
कुछ वक्तव्य छपा है
उनका हर हितैशी
उस अखबार के
पन्ने को फ्रेम करवा
कर मंदिर की दीवार
में मढ़ रहा है
जिनको पता है
देवों की धरती पर
राम का जहाज
उतरवाने का कोई
जुगाड़ कर रहा है
राम तो ऊपर से
नीचे को आना
भी शुरु हो गये है
पर तबादले की
खबर सुनकर
भद्रजन ठीक समय
पर सड़कों को छोड़
पैदल सड़कों पर
चलना शुरु कर गये हैं
ऐन मौके पर राम के
जहाज के पैट्रोल का
पैसा देने वाले
मुकर गये हैं
राम भी सुना है
देवभूमी की ओर
आने के बजाये
पूरब की ओर
जाना शुरु हो गये हैं
कुछ भी हो
जब से आये हैं
पालने राज्य को
राम राम करते करते
राममय हो गये हैं
आते आते तो
किये ही कई काम
कई काम जाते जाते
भी जाने से पहले
की तारीखें लिख
कर कर गये हैं
कुछ छप्पर वालों
को छप्पर फाड़
कर दे गये हैं
कुछ पक्की
छत के मकान
छ्प्पर लगवाने
लायक भी नहीं
रह गये हैं
उन्ही की कृपा है
दो चार गधे घोड़े
की बिरादरी में
शामिल हो गये हैं
और दो चार घोड़े
गधों में मिलाने
के काबिल हो गये हैं
उनके आने पर
कौन कितना
खुश हुआ है और
उनके जाने पर
किस को कितना
दुख: हुआ है
जो है सो है
होनी को तो होना है
आप को लेकिन
परेशान नहीं होना है
पानी में लगी आग से
पानी का कुछ
नहीं होना है
और मछलियाँ
तो मछलियाँ है
कहीं भी चली जायेंगी
आज पेड़ पर
चढ़ी दिख रही है
कल को आसमान
में उड़ जायेंगी
तेरे को तेरे घर में
और मेरे को
मेरे घर में ही
बस रोना है ।

चित्र साभार: www.bigstockphoto.co

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

आज तो बस चिंगारी आग और राख की बात करनी है

चिंगारियाँ
उठने की बात
आग़ लगने
की बात
बात बात में
ही करनी है
इससे भी
पूछना है
उससे भी
पूछना है
आग से भी
पूछ कर ही
कुछ सुलगने
सुलगाने की
बात करनी है
जलाना कितना भी है
जलाना कुछ भी है
बस जलाने की
बात करनी है
आग लगनी है
ना लगानी है
बस आग दिखने
और दिखाने की
बात करनी है
धुँआ दिखना नहीं है
राख बचनी नहीं है
दिल को
जलना नहीं है
तूफान आने की
बात करनी है
कत्ल होना नहीं है
खून बहना नहीं है
क्राँतिकारियों की
बात करनी है
बहुत हो चुकी
इंसानों की बातें
पामेरियन ऐप्सो
एल्शेशियन की
बात करनी है
बहुत बेच दिये
आदमी ने आदमी
अब लाशें दफना कर
उनकी मूर्तियाँ
लगवाकर
कमीशन बनाने
की बात करनी है
सालों हो गये तुझको
बातें बनाते ‘उलूक’
सबको पता है
तुझे तो बस
माचिस की
बात करनी है
आग होती भी है
आग लगती भी है
मत करो जुल्म
उसपर बड़ा
उसे भी कभी
थोड़ा सा कुछ
सोने जाने की
बात करनी है ।


चित्र साभार: www.dreamstime.com

मंगलवार, 3 जून 2014

अपना समझना अपने को ही नहीं समझा सकता

उसने कुछ लिखा
और मुझे उसमें
बहुत कुछ दिखा
क्या दिखा
अरे बहुत ही
गजब दिखा
कैसे बताऊँ
नहीं बता सकता
आग थी आग
जला रही थी
मैं नहीं
जला सकता
उसके लिखे में
आग होती है
पानी होता है
आँधी होती है
तूफान होता है
नहीं नहीं
कोई जलजला
मैं यहाँ पर
लाने का रिस्क
नहीं उठा सकता
पता नहीं
वो लिखा भी
है या नहीं
जो मुझे दिखा है
किसी को बता
भी नहीं सकता
इसी तरह रोज
उसके लिखे
को पढ़ता हूँ
जलता हूँ
भीगता हूँ
सूखता हूँ
हवा में
उड़ता हूँ
और भी बहुत
कुछ करता हूँ
सब बता के
खुले आम
अपनी धुनाई
नहीं करवा सकता ।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

बहुत हैं माचिस के डब्बे चिंता की बात नहीं आग पक्का लगेगी

माचिस का एक
नया डिब्बा
कल गलती से
छूट गया
बाहर आँगन
की दीवार पर
और आज
उसका रंग
उतरा हुआ मिला
शायद ओस ने
या दिन की
तेज धूप ने
हो कुछ कह दिया
तीलियां उसी तरह
तरतीब से लगी हुई
महसूस हुआ
जो भी है आग है
कहीं ना कहीं
इस डब्बे में भी
और शायद
कुछ अंदर
भी कहीं
एक बहुत शाँत  
तीलियों से चिपकी
अनुशाशित
और
एक बिना धुऐं
और चिगारी के
आग होने की सोच
का ढोंग ओढ़े हुऐ
जहाँ बहुत से पागल
लगे हुऐ हैं
पागल बनाने में
जिनके पास
दिखाई देती है
मशाल बनाने
के लिये लकड़ी
पुराना कपड़ा
थोड़ा कैरोसिन
पानी मिला हुआ
और माचिस
ओस से भीग कर
तेज धूप में सुखाई हुई
सुलगने का एक
अहसास ही सही
तीलियाँ आग को
अपने में लपेटे हुऐ
कुछ भीगी कुछ सीली
पर आग तो आग है
कुछ ही दिन की
बस अब बात है
लगने वाली है आग
और उस आग में
सब भस्म हो जायेगा
आग की देवी या देवता
जो भी है कहीं सुना है
कोशिश कर रहा है
गीली तीलियों के
मसाले को सुखा कर
कुछ कुरकुरा बनाने
के जुगाड़ का 

उलूक तुझे कुछ 
नहीं करना है
तीली को रगड़ने
के लिये अगर कोई
माचिस का खाली
डब्बा माँगने  
आ जाये भूले भटके
धूप में सुखा के रखना है
बस एक माचिस का डब्बा ।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

पानी से अच्छा होता अगर दारू पर कुछ लिखवाता

हर कोई तो पानी
पर लिख रहा है
अभी अभी का
लिखा हुआ पानी पर
अभी का अभी उसी
समय जब मिट रहा है
तुझे ही पड़ी है
ना जाने क्यों
कहता जा रहा है
पानी सिमट रहा है
जमीन के नीचे
बहुत नीचे को
चला जा रहा है
पानी की बूंदे
तक शरमा रही हैं
अभी दिख रही हैं
अभी विलुप्त
हो जा रही हैं
उनको पता है
किसी को ना
मतलब है ना
ही शरम आनी है
सुबह सुबह की
ओस की फोटो
तू भी कहीं लगा
होगा खींचने में
मुझे नहीं लगता
किसी और को
पानी की कहीं भी
याद कोई आनी है
इधर आदमी लगा है
ईजाद करने में
कुछ ऐसी पाईप लाइने
जो घर घर में जा कर
पैसा ही पैसा बहाने
को बस रह जानी हैं
तू भी देख ना कहीं
पैसे की ही धार को
हर जगह आजकल
वही बात काम में
बस किसी के आनी है
पानी को भी कहाँ
पड़ी है पानी की
अब कोई जरूरत
आँखे भी आँखो में
पानी लाने से
आँखो को ही परहेज
करने को जब कहके
यहाँ अब जानी हैं
नल में आता तो है
कभी कभी पानी
घर पर नहीं आता है
तो कौन सा गजब
ही हो जाना है
बस लाईनमैन की
जेब को गरम
ही तो करवाना है
तुरंत पानी ने
दौड़ कर आ जाना है
मत लिया कर इतनी
गम्भीरता से किसी
भी चीज को
आज की दुनियाँ में
हर बात नई सी
जब हो जा रही है
हवा पानी आग
जमीन पेड़ पौंधे
जैसी बातें सोचने
वाले लोगों के कारण
ही आज की पीढ़ी
अपनी अलग पहचान
नहीं बना पा रही है
पानी मिल रहा है पी
कुछ मिलाना है मिला
खुश रह
बेकार की बातें
मत सोच
कुछ कमा धमा
होगा कभी
युद्ध भी
अगर पानी को
लेकर कहीं
वही मरेगा
सबसे पहले
जो पैसे का नल
नहीं लगा पायेगा
पैसा होगा तो वैसे भी
प्यास नहीं लगेगी
पानी नहीं भी
होगा कहीं
तब भी कुछ अजब
गजब नहीं हो जायेगा
ज्यादा से ज्यादा
शरम से जमीन के
थोड़ा और नीचे
की ओर चला जायेगा
और फिर एक बेशरम
चीर हरण करेगा
किसी को भी
कुछ नहीं होगा बस
पानी ही खुद में
पानी पानी हो जायेगा ।

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

याद नहीं रहा आज से पहले खतड़ुवा कब था हुआ

बरसात जब
कुछ कम हो गई
घर की सफाई
कुछ शुरु हो गई
काम पर लगे नंदू
से पूछ बैठा यूं ही
ठंड भी शुरु
हो गई ना
हां होनी ही है
खतड़ुवा भी हो गया
उसका ये बताना
जैसे मुझे धीरे से
छोटा करते हुऐ
कहीं बहुत
पीछे पहुंचाना
याद आने लगा मुझे
पशु प्रेमी ग्वालों
का पारंपरिक पर्व
का हर वर्ष अश्विन
माह की संक्रांती
को मनाना और
याद आया
भूलते चले जाना
घास का एक
त्योहार पशुधन
की कुशलता और
गौशालाऐं गाय से
भरी रहने की कामना
गाय के मालिकों की
वंशवृद्धि होती रहे
गाय का सम्मान भी
करती रहे की भावना
त्योहार मनाना
ना होता हो जैसे
कोई खेल होता हो
भांग के पौंधे के एक
सूखे से डंडे को
सुबह से घास फूल
पत्तियों से सजाना
गाय के जाने के
रास्ते के चौराहे पर
घास के चार हाथ पैर
बनाकर फुलौरी
एक बनाना
शाम ढले सपरिवार
उस आकृति
को आग लगाना
सुबह बनायी गई
सजायी गई
लकड़ी से आग को
पीटते चले जाना
'भैल्लो जी भैल्लो
भैल्लो खतड़ुवा
भाग खतड़ुवा भाग'
साथ साथ चिल्लाते
भी चले जाना
जली आग का एक
हिस्सा ले जा कर
गाय के गौठ और
घर पर ला
कर घुमाना
पीली ककड़ी
काट कर बांटना
और मिलकर खाना
फिर याद आया
खो जाना शहर के
पेड़ और घास
घर से गायों
का रंभाना
गायों का
कारें हो जाना
दूध का
यूरिया हो जाना
हर हाथ का
कान से जा कर
चिपक जाना
सड़क पर
चलते चलते
बोलते चले जाना
पड़ोसी की
मौत की खबर
अखबार से
पता चल पाना
ऐसे में बहुत
 बड़ी बात है
खतड़ुऐ की याद
भर आ जाना ।

रविवार, 18 अगस्त 2013

हर कोई जानता है वो क्यों जल रहा है

कहीं कुछ जल रहा है कहीं कुछ जल रहा है
कहीं लग चुकी है आग कहीं धुआँ निकल रहा है

तेरा दिल जल रहा है मेरा दिल जल रहा है
इसका दिल जल रहा है उसका दिल जल रहा है 

कोई आग पी रहा है कोई धुआँ उगल रहा है
कहीं शहर जल रहा है कहीं गाँव जल रहा है 

आग ही आग है सामने अपना घर जल रहा है
जैसा वहाँ जल रहा है वैसा यहाँ जल रहा है 

हर कोई जानता है कितना क्या जल रहा है
क्यों जल रहा है और कहाँ जल रहा है

वो इससे जल रहा है ये उससे जल रहा है
उतनी आग दिख रही है जिसका जितना जल रहा है 

अपनी आग लेकर आग से कोई कहाँ मिल रहा है
जिसको जहाँ मिल रहा है वो वहां जल रहा है 

कितनी आग उसकी आग है पता कहाँ चल रहा है
हर कोई ले एक मशाल अपने साथ चल रहा है 

इसके लिये जल रहा है उसके लिये जल रहा है
अपने भोजन के लिये बस उसका चूल्हा जल रहा है

कौन अपनी आग से कहीं कुछ बदल रहा है
किसको पड़ी है इस बात की कि देश जल रहा है

कहीं कुछ जल रहा है कहीं कुछ जल रहा है
कहीं लग चुकी है आग कहीं धुआँ निकल रहा है ।

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

सदबुद्धि दो भगवान

एक बुद्धिजीवी
का खोल
बहुत दिन तक
नहीं चल पाता है
जब अचानक वो
एक अप्रत्याशित
भीड़ को अपने
सामने पाता है
बोलता बोलता
वो ये भी भूल
जाता है कि
दिशा निर्देशन
करने का दायित्व
उसे जो उसकी
क्षमता से ज्यादा
उसे मिल जाता है
यही बिल्ला उसका
उसकी जबान के
साथ फिसल कर
पता नहीं लगता

किस नाली में
समा जाता है
सरे आम अपनी
सोच को कब
नंगा ऎसे में वो
कर जाता है
जोश में उसे
कहाँ समझ
में आता है
एक भीड़ के
सपने को अपने
हित में भुनाने
की तलब में
वो इतना ज्यादा
गिर जाता है
देश के टुकडे़
करने की बात
उठाने से भी
बाज नहीं आता है
उस समय उसे
भारत के इतिहास
में हुआ बंटवारा भी
याद नहीं रह जाता है
ऎसे बुद्धिजीवियों से
देश को कौन
बचा पाता है
जो अपने घर
को बनाने के लिये
पूरे देश में
आग लगाने में
बिलकुल भी नहीं
हिचकिचाता है ।

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

धुआँ

जरूरी नहीं
कुछ जले
और धुआँ
भी उठे

धुऎं का
धुआँ बनाना
तो और भी
मुश्किल
काम है

कब कौन
क्या जला
ले जाता है
किसी को
पता नहीं
चल पाता है

हर कोई
अपना धुआँ
बनाता है

हर कोई
अपना धुआँ
फैलाता है

कहते हैं
आग होगी
तो धुआँ
भी उठेगा

माहिर
लोग
इन सब
बातो को
नहीं
मानते हैं

वो तो
धुऎं का
धुआँ
बनाना
बहुत ही
अच्छी तरह
जानते हैं

बहुत बार
धुआँ
धुऎं में
ही मिल
जाता है

कौन
किसका
धुआँ था
पता नहीं
लग पाता है

ये भी
जरूरी नहीं
हर चीज
जल कर
धुआँ हो जाये

बिना जले
भी कभी
कभी धुआँ
देखा जाता है

धुऎं
का धुआँ
बनाकर
धुआँ
देखने
वाला

खुद कब
धुआँ हो
जाता है

ये धुआँ
जरूर
बताता है।

चित्र साभार: imgarcade.com

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