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शनिवार, 18 नवंबर 2017

टट्टी जिसे गू भी कहा जाता है

अजीब
सी बात है
पर पता नहीं

सुबह से
दिमाग में
एक शब्द
घूम रहा है
टट्टी

तेरी टट्टी
मेरी टट्टी से
खुशबूदार कैसे

या तेरी टट्टी
मेरी टट्टी से
ज्यादा
असरदार कैसे

पाठकों को भी
लग रहा होगा
टट्टी भी
कोई बात करने
का विषय
हो सकता है

सुबह उठता
है आदमी
खाता है
शाम होती है
फिर से खाता है

खाता है
कम या बहुत

लेकिन
रोज सबेरे
कुछ ना कुछ
जरूर हगने
चला जाता है

जो हगता है
उसे ही टट्टी
कहा जाता है

टट्टी बात
करने का
विषय नहीं है

हर कोई
हगने
और टट्टी
जैसे शब्दों के
प्रयोग से
बचना
चाहता है

टट्टी पर या
हगने जैसे
विषय पर
गूगल करने
वाला भी
कोई एक
कविता
लिखा हुआ
नहीं पाता है

कविता
और टट्टी
हद हो गई

कविता
शुद्ध होती है
शुद्ध मानी
जाती है

टट्टी को
अशुद्ध में
गिना जाता है

अपने
आस पास
हो रहा
कुछ भी

आज क्यों
इतना ज्यादा
टट्टी जिसे
गू भी
कहा जाता है
याद दिलाता है

‘उलूक’ को
हर तरफ
हर आदमी
अपने
आसपास का
 टट्टी पाने की
लालसा के साथ
दौड़ता हुआ
नजर आता है

पागल कौन हुआ
‘उलूक’
या दौड़ता
हुआ आदमी
टट्टी के पीछे

समझाने वाला
कोई कहीं
बचा नहीं
रह जाता है ।

चित्र साभार: Weclipart

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

आज कुछ टुकड़े पुराने जो पूरे नहीं हो पाये टुकड़े रह गये

(कृपया बकवास को
कवि, कविता और
हिंदी की किसी
विधा से ना जोड़ेंं
और
टुकड़ों को ना जोड़ें,
अभिव्यक्ति कविता से हो
और कवि ही करे
जरूरी नहीं होता है ) 


सोच खोलना
बंद करना भी
आना चाहिये
सरकारी
दायरे में
ज्यादा नहीं भी
कम से कम
कुछ घंटे ही सही
>>>>>>>>>>>>

बेहिसाब
रेत में
बिखरे हुऐ
सवालों को
रौंदते हुऐ
दौड़ने में
कोई बुराई
नहीं है
गलती
सवालों
की है
किसने
कहा था
उनसे उठने
के लिये
बेवजह
बिना सोचे
बिना समझे
बिना जाने
बिना बूझे
और
बिना पूछे
उससे
जिसपर
उठना शुरु
हो चले
>>>>>>

मालूम है
बात को
लम्बा
खींच
देने से
ज्यादा
समझ
में नहीं
आता है

खींचने की
आदत पड़
गई होती
है जिसे
उससे
फिर भी
आदतन
खींचा ही
जाता है
जानता है
ज्ञानी
बहुत अच्छी
तरह से
अपने घर में
बैठे बैठे भी
अपने
आस पास
दूसरों के
घरों के
कटोरों की
मलाई की
फोटो देख
देख कर
अपने फटे
दूध को
नहीं सिला
जाता है
>>>>>>>

कोई नहीं
खोलता है
अपनी खुद
की किताबें
दूसरों
के सामने

खोलनी
भी क्यों हैं
पढ़ाने की
कोशिश
जरूर
करते
हैं लोग
समझाने
के लिये
किताबें
लोगों को

 बहुत सी
किताबें
रखी हुई
दिखती
भी हैं
किताबचियों
के आस पास
कहीं करीने
से लगी हुई
कहीं बिखरी
हुई सी
कहीं धूल
में लिपटी
कहीं साफ
धूप
दिखाई गई
सूखी हुई सी ।

>>>>>>>>>

चित्र साभार: ClipartFest

बुधवार, 4 जनवरी 2017

कविता बकवास नहीं होती है बकवास को किसलिये कविता कहलवाना चाहता है

जैसे ही
सोचो
नये
किस्म
का कुछ
नया
करने की

कहीं
ना कहीं
कुछ ना
कुछ ऐसा
 हो जाता है
जो
ध्यान
भटकाता है
और
लिखना
लिखाना
शुरु करने
से पहले ही
कबाड़ हो
जाता है

बड़ी तमन्ना
होती है
कभी एक
कविता लिख
कर कवि
हो जाने की

लेकिन
बकवास
लिखने का
कोटा कभी
पूरा ही
नहीं हो
पाता है

हर साल
नये साल में
मन बनाया
जाता है

जिन्दे कवियों
की मरी हुई
कविताओं को
और
मरे हुऐ
कवियों की
जिंदा
कविताओं
को याद
किया जाता है

कविता
लिखना
और
कवि हो
जाना
इसका
उसका
फिर फिर
याद आना
शुरु हो
जाता है

कविता
पढ़
लेने वाले
कविता
समझ
लेने वाले
कविता
खरीद
और बेच
लेने वालों
से ज्यादा
कविता पर
टिप्प्णी कर
देने वालों के
चरण
पादुकाओं
की तरफ
ध्यान चला
जाता है

रहने दे
‘उलूक’
औकात में
रहना ही
ठीक
रहता है

औकात से
बाहर जा
कर के
फायदे उठा
ले जाना
सबको नहीं
आ पाता है

लिखता
चला चल
बकवास
अपने
हिसाब की

कितनी लिखी
क्या लिखी
गिनती करने
कोई कहीं से
नहीं आता है

मत
किया कर
कोशिश
मरी हुई
बकवास से
जीवित कविता
को निकाल
कर खड़ी
करने की

खड़ी लाशों
के अम्बार में
किस लिये
कुछ और
लाशें अपनी
खुद की
पैदा की हुई
जोड़ना
चाहता है ।

चित्र साभार: profilepicturepoems.com

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कविता और छंद से ही कहना आये जरूरी नहीं है कुछ कहने के लिये जरूरी कुछ उदगार होते हैं

बहुत अच्छे होते हैं
समझदार होते हैं
किसी अपने
जैसे के लिये
वफादार होते हैं
ज्यादा के लिये नहीं
थोड़े थोड़े के लिये
अपनी सोच में
खंजर और
बात में लिये
तलवार होते हैं
सच्चे होते हैं
ना खुदा के होते हैं
ना भगवान के होते हैं
ना दीन के होते हैं
ना ईमान के होते हैं
बहुत बड़ी बात होती है
घर में एक नहीं भी हों
चोरों के सरदार के
साथ साथ चोरों के
परिवार के होते हैं
रोज सुबह के
अखबार के होते हैं
जबाँ से रसीले
होठों से गीले
गले मिलने को
किसी के भी
तलबगार होते हैं
पहचानता है
हर कोई समाज
के लिये एक
मील का पत्थर
एक सड़क
हवा में बिना
हवाई जहाज
उड़ने के लिये
भी तैय्यार होते हैं
गजब होते हैंं
कुछ लोग
उससे गजब
उनके आसपास
मक्खियों की तरह
किसी आस में
भिनाभिनाते
कुछ कुछ के
तलबगार होते हैं
 कहते हैं किसी
तरह लिखते हैं
किसी तरह
ना कवि होते हैं
ना कहानीकार होते हैं
ना ही किसी उम्मीद
और ना किसी सम्मान
के तलबगार होते हैं
उलूक तेरे जैसे
देखने तेरे जैसे सोचने
तेरा जैसे कहने वाले
लोग और आदमी
तो वैसे भी नहीं
कहे जाने चाहिये
संक्रमित होते हैं
बस बीमार और
बहुत ही
बीमार होते हैं ।

चित्र साभार: cliparts.co

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

कविता को टेढ़ा मेढ़ा नहीं सीधे सीधे सीधा लिखा जाता है

मन करता है
किसी समय
एक सादे सफेद
पन्ने पर खींच
दी जायें कुछ
आड़ी तिरछी रेखायें
फिर बनाये जायें
कुछ नियम
उन आड़ी तिरछी
रेखाओं के आड़े पन
और तिरछे पन के लिये
जिससे आसान हो जाये
समझना किसी भी
आड़े और तिरछे को
कहीं से भी कभी भी
सीधे खड़े होकर
बहुत कुछ बहुत
सीधा सीधा
दिखता है
मगर बहुत ही
टेढ़ा होता है
बहुत कुछ टेढ़ा
दिखता है
टेढ़ा दिखाता है
जिसको सीधा
करने के चक्कर
में सीधा करने वाला
खुद ही टेढ़ा हो जाता है
टेढ़े होने ना होने
का कहीं कोई
नियम कानून भी
नजर नहीं आता है
ऐसा भी नहीं होता है
टेढ़ा हो जाने के
कारण कोई टेढ़ी
सजा भी पाता है
नियम कानून
व्यवस्था के सवाल
अपनी जगह
पर होते हैं
लेकिन सीधा
सीधा है का
पता टेढ़ों के साथ
रहने उठने बैठने
के साथ ही पता
चल पाता है
‘उलूक’ लिखने दे
सब को उन के
अपने अपने नियमों
के हिसाब से
सीधा होने की
कतई जरूरत नहीं है
कुछ चीजें टेढ़ी ही
अच्छी लगती हैं
उन्हें टेढा‌ ही
रहने दिया जाता है
क्यों झल्लाता है
अगर तेरे लिखे को
किसी से भूल वश
कविता है कह
दिया जाता है ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

सारे पढे‌ लिखे लिखते हैं कविता और कवि भी होते हैं

टेढ़ा मेढ़ा
लिखा हुआ
हो कहीं पर
जिसका कोई
मतलब नहीं
निकल रहा हो


जरूरी नहीं
होता है
कि वो एक
कवि का
लिखा हुआ
लिखा हो

जिसे कविता
कहना शुरु
कर दिया
जाये और
तुरन्त ही
कुछ लोग
दूसरे लिखने
पढ़ने वाले
करने लगें
चीर फाड़

जैसे गलत
तरीके
से मर गये
या
मार दिये
गये जानवर
या
आदमी को
खोल कर
देखा जाता है
मरने के बाद

जिसे कहा
जाता है
हिंदी में
शव परीक्षा

इसलिये यहाँ
पोस्ट मोर्टम
कहना उचित
प्रतीत होता है

चलन में है
और
पढ़ा लिखा
वैसे भी
हिंदी में
कहे गये को
कम ही
समझता है

अब ‘उलूक’
क्या जाने
ये भी कवि है
और
वो भी कवि है

सब कविता
लिखते हैं
अपनी अपनी
इसमें दोष
किसका है

उसका
जो कवि है
या उसका
जिसको
आदत है

वो मजबूरी
में किसी
रोज कुछ
ना कुछ
जो लिख
मारता है

कभी
कुत्ते पर
कभी
चूहे पर
और कभी
उसी तरह के
किसी
जानवर पर
जिसके
नसीब में
कुर्सी लिखी
होती है

लेकिन इन
सब में
एक बात
अटल सत्य है

टेढ़ा मेढ़ा
लिखने वाला
गलती से
लिखना पढ़ना
सीख भी
गया हो
कभी झूठ
नहीं बोलता है

उससे
कभी नहीं
कहा जाता
है कि
उसका
किसी कवि
से ही
ना ही किसी
कविता से ही

भगवान
कसम
कहीं कोई
रिश्ता
होता है

सब कवि
होते हैं
जो कविता
करते हैं

सबसे बड़े
बेवकूफ
तो वही
होते हैं  ।

चित्र साभार: www.stmatthiaschool.org

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

दो अप्रैल का मजाक

लिखे हुऐ के पीछे
का देखने की और
उस पीछे का
पीछे पीछे ही
अर्थ निकालने
की आदत पता नहीं
कब छूटेगी
इस चक्कर में
सामने से लिखी
हुई इबारत ही
धुँधली हो जाती है
लेकिन मजबूरी है
आदत बदली ही
कहाँ जाती है
हो सकता है
सुबह नींद से
उठते उठते
संकल्प लेने
से कोई कविता
नहीं लिखी जा
सकती हो
पर प्रयास करने
में कोई बुराई
भी नहीं है
कुछ भी नहीं
करने वाले लोग
जब कुछ भी
कह सकते हैं
और उनके इस
कहने के अंदाज का
अंदाज लगाकर
कौऐ भी किसी
भी जगह के
उसी अंदाज में
जब काँव काँव
कर लेते है
और जो कौऐ
नहीं होकर भी
सारी बात को
समझ कर
ताली बजा लेते हैं
तो हिम्मत कर
‘उलूक’ कुछ
लगा रह
क्या पता
किसी दिन
इसी तरह
करते करते
खुल जाये
तेरी भी लाटरी
किसी दिन
और तेरा लिखा
हुआ कुछ भी
कहीं भी
दिखने लगे
किसी को भी
एक कविता
हा हा हा ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

मंगलवार, 31 मार्च 2015

कोई नई कहानी नहीं अपना वही पुराना रोना धोना ‘उलूक’ आज फिर सुना रहा था

लाऊडस्पीकर से
भाषण बाहर
शोर मचा रहा था
अंदर कहीं मंच पर
एक नंगा शब्दों को
खूबसूरत कपड़े
पहना रहा था
अपनी आदत में
शामिल कर चुके
इन्ही सारे प्रपंचों को

रोज की पूजा में
एक भीड़ का
बड़ा हिस्सा
घंटी बजाने
प्रांंगण में ही बने
एक मंदिर की ओर
आ जा रहा था
कविताऐं शेर और
गजल से ढकने में
माहिर अपने पापों को
आदमी आदमी को
इंसानियत का पाठ
सिखा रहा था
एक दिन की बात
हो तो कही जाये
कोई नई बात है 
आज पता चला
फिर से एक बार
ढोल नगाड़ों के साथ
एक नंगा हमाम
में नहा रहा था
‘उलूक’ कब तक
करेगा चुगलखोरी
अपनी बेवकूफियों
की खुद ही खुद से
नाटक चालू था कहीं
जनाजा भी तेरे जैसों
का पर्दा खोल कर
निकाला जा रहा था
तालियांं बज रही थी
वाह वाह हो रही थी
कबाब में हड्डी बन कर
कोई कुछ नहीं फोड़
सकता किसी का
उदाहरण एक पुरानी
कहावत का पेश
किया जा रहा था
नंगों का नंगा नांंच
नंगो को अच्छी तरह
समझ में आ रहा था ।

चित्र साभार: pixshark.com

शनिवार, 22 नवंबर 2014

लिखता लिखता ही पढ़ना भी सीख लेगा

जिस दिन
सीख लेगा
लिखना
बता उस दिन
क्या लिखेगा
अभी बताने
में भी कोई
हर्ज नहीं है
कविता
लिखेगा
या फिर कोई
गजल
लिखेगा
तब तक
ऐसा वैसा
भी लिखेगा
वो भी चलेगा
लिखना सीखने
के लिये जो
भी लिखेगा
वही तो
एक दिन
लिखना
सिखाने
के लिये
भी लिखेगा
लिखना एक
अलग बात है
लिखने वाला
बस लिखेगा
पढ़ना एक
अलग बात है
पढ़ने वाला
बस पढ़ेगा
लिखना पढ़ना
साथ करने
की कोशिश
जो भी करेगा
ना लिख
पायेगा कुछ
ना ही पढ़ेगा
लिखना सीख
ले कुछ
लिख लिखा
कर कुछ
दिनों तक
लिखना
सीख लेगा
जब ‘उलूक’
पूरा का पूरा
आधा
कम से कम
पढ़ना भी
सीख लेगा ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

रविवार, 13 जुलाई 2014

क्या किया जाये कैसे बताऊँ कि कुछ नहीं किया जाता है

कहना तो नहीं
पड़ना चाहिये कि
मैं शपथ लेता हूँ
कि लेखक और
कवि नहीं हूँ
कौन नहीं लिखता है
सब को आता है लिखना
बहुत कम ही होते हैं
नाम मात्र के जो
लिख नहीं पाते हैं
लेकिन बोल सकते हैं
इसलिये कुछ ना
कुछ हल्ला गुल्ला
चिल्लाना कर ही
ले जाते हैं
अब लिखते लिखते
कुछ ना कुछ
बन ही जाता है
रेखाऐं खींचने वाला
टेढ़ी मेढ़ी तक
मार्डन आर्टिस्ट
एक कहलाता है
कौन किस मनोदशा
में क्या लिखता है
कौन खाली मनोदशा
ही अपनी लिख पाता है
ये तो बस पढ़ने और
समझने वाले को ही
समझना पड़ जाता है
एक ऐसा लिखता है
गजब का लिखता है
लिखा हुआ ही उसका
एक तमाचा मार जाता है
लात लगा जाता है
‘उलूक’ किसी की
 मजबूरी होती है
सब जगह से जब
तमाचा या लात
खा कर आता है
तो कुछ ना कुछ
लिखने के लिये
बैठ जाता है
बुरा और हमेशा बुरा
लिखने की आदत
वैसे तो बहुत
अच्छी नहीं होती है
पर क्या किया जाये
जब सड़क पर
पड़ी हुई गंदगी को
सौ लोग नाँक भौं
सिकौड़ कर थूक कर
किनारे से उसके
निकल जाते हैं
कोई एक होता ही है
जो उस गंदगी को
हाथ में उठाकर
घर ले आता है
और यही सब उसके
संग्राहलय का एक
महत्वपूर्ण सामान
हो जाता है
जो है सो है और
सच भी है
सच को सच
कहने से बबाल
हो ही जाता है
कविता तो कवि
लिखता है
उसको कविता
लिखना आता है ।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

मत परेशां हुआ कर

मत परेशां हुआ कर
क्या कुछ हुआ है कहीं
कुछ भी तो नहीं
कहीं भी तो नहीं
देख क्या ये परेशां है
देख क्या वो परेशां है
जब नहीं कोई परेशां है
तो तू क्यों परेशां है
सबके चेहरे खिले जाते हैं
तेरे माथे पे क्यों
रेशे नजर आते हैं
तेरी इस आदत से
तो सब परेशां है
वाकई परेशां है
तुझे देख कर ही तो
सबके चेहरे इसी
लिये उतर जाते हैं
कुछ कहीं कहाँ होता है
जो होता है सब की
सहमति से होता है
सही होता होगा
इसी लिये होता है
एक तू परेशां है
क्यों परेशां है
अपनी आदत को बदल
जैसे सब चलते हैं
तू भी कभी तो चल
कविता देखना तेरी
तब जायेगी कुछ बदल
सब फूल देखते हैं
सुंदरता के गीत
गाते हैं सुनाते हैं
तेरी तरह हर बात पर
रोते हैं ना रुलाते हैं
उम्रदराज भी हों अगर
लड़कियों की
तरफ देख कर
कुछ तो मुस्कुराते हैं
मत परेशां हुआ कर
परेशां होने वाले
कभी भी लोगों
में नहीं गिने जाते हैं
जो परेशांनियों
को अन्देखा कर
काम कर ले जाते हैं
कामयाब कहलाते हैं
परेशानी को अन्देखा कर
जो हो रहा है
होने दिया कर
देख कर आता है
कविता मत लिखा कर
ना तू परेशां होगा
ना वो परेशां होगा
होने दिया कर
जो कर रहे हैं कुछ
करने दिया कर
मत परेशां हुआ कर ।

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

फेसबुक पर मिले एक संदेश का जवाब

S.k. Srivastava
  • Joshi ji ajkal apki kavitayen nahi aa rahi hai.

    हाँ वो आजकल
    नहीं आ रही है
    पता ही नहीं
    लग पा रहा है
    कहाँ जा रही है
    वैसे रोज ही
    कुछ ना कुछ
    देने आ जाती थी
    कुछ दिन से
    लग रहा है
    सब नहीं
    दे जाती थी
    कुछ कुछ छुपा
    भी ले जाती थी
    वैसे वो आये
    या ना आये
    बहुत अंतर
    नहीं आता है
    आती है तो
    कोई ना कोई
    कुछ ना कुछ
    कह जाता है
    नहीं आती है
    तब भी खाना तो
    पच ही जाता है
    अब जब आपने कहा
    वो आजकल
    नहीं आ रही है
    हमे भी लगा
    वाकई वो नहीं
    आ रही है
    फिर अगर वो
    नहीं आ रही है
    तो पता तो लगना
    ही चाहिये कि वो
    कहाँ जा रही है
    अब आप ही पता
    लगा दीजिये ना
    कुछ हमारा भी
    भला हो जायेगा
    कुछ होगा या नहीं
    ये बाद में फिर
    देखा जायेगा
    कम से कम
    आप की तरह कोई
    मेहरबान उसको
    पकड़ कर वापिस
    मेरे पास ले आयेगा
    वापिस आ गयी
    फिर से आने
    जाने लग जायेगी
    जैसे पहले आया
    जाया कर रही थी
    करना शुरु हो जायेगी
    फिर आप भी
    नहीं कह पायेंगे
    वो आजकल क्यों
    नहीं आ रही है
    क्या करें जब
    वो हमको ही
    आजकल
    कुछ
    नहीं बता रही है ।

बुधवार, 12 सितंबर 2012

चित्रकार का चित्र / कवि की कविता

तूलिका के छटकने
भर से फैल गये रंग
चारों तरफ कैनवास पर
एक भाव बिखरा देते हैं
चित्रकार की कविता
चुटकी में बना देते हैं
सामने वाले के लिये
मगर होता है  बहुत
मुश्किल ढूँढ पाना
अपने रंग उन बिखरे हुवे
इंद्रधनुषों में अलग अलग

किसी को नजर आने
शुरु हो जाते हैं बहुत से
अक्स आईने की माफिक
तैरते हुऎ जैसे हो उसके
अपने सपने और कब
अंजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से वाह !
दूसरा उसे देखते ही
सिहर उठता है
बिखरने लगे हों जैसे
उसके अपने सपने
और लेता है एक
ठंडी सी आह !
दूर जाने की
कोशिश करता हुआ
डर सा जाता है
उसके अपने चेहरे का
रंग उतरता हुआ
सा नजर आता है
किसी का किसी से
कुछ भी ना
कहने के बावजूद
महसूस हो जाता है
एक तार का झंकृत
होकर सरगम सुना देना
और एक तार का
झंकार के साथ
उसी जगह टूट जाना
अब अंदर की
बात होती है
कौन किसी को
कुछ बताता है
कवि की कविता
और चित्रकार का
एक चित्र कभी कभी
यूँ बिना बात के
पहेली बन जाता है ।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

मान भी जाया कर इतना मत पकाया कर

अब
अगर
उल्टी
आती है
तो कैसे
कहें उससे
कम आ

पूरा मत
निकाल
थोड़ा सा
छोटे छोटे
हिस्सों में ला

पूरा निकाल
कर लाने का
कोई जी ओ
आया है क्या

कुछ पेट में भी
छोड़ कर आ

लम्बी कविता
बन कर के क्यों
निकलती है
कुछ क्षणिंका
या हाईगा
जैसी चीज
बन के आ जा

अब अगर
कागज में
लिखकर
नहीं होता हो
किसी से
हिसाब किताब
तो जरूरी
तो नहीं ऎसा
कि यहाँ आ आ
कर बता जा

अरे कुछ
बातों को रहने
भी दिया कर
परदे में
बेशर्मों की
तरह घूँघट
अपना उधाड़
के बात बात
पर मत दिखा
रुक जा

वहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
यहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
नक्कार खाने
में कितनी भी
तूती तू बजाता
हुआ चले जा

इस से
अच्छा है
कुछ अच्छी
सोच अपनी
अभी भी
ले बना

मौन रख
बोल मत
शांत हो

अपना भी
खुश रह
हमको भी
कभी चाँद
तारों सावन
बरसात
की बातों
का रस
भी लेने दे

बहुत
पका लिया
अब जा ।

रविवार, 15 जुलाई 2012

कविता कमाल या बबाल

अखबार में छपी
मेरी एक कविता

कुछ ने देख कर
कर दी अनदेखी

कुछ ने डाली
सरसरी नजर

कुछ ने की
कोशिश
समझने की
और दी
प्रतिक्रिया

जैसे कहीं पर
कुछ हो गया हो

किसी का
जवान लड़का
कहीं खो
गया हो

हर किसी
के भाव
चेहरे पर
नजर आ
जा रहे थे


कुछ
बता रहे थे
कुछ
बस खाली
मूँछों के पीछे
मुस्कुरा रहे थे


कुछ
आ आ कर
फुसफुसा रहे थे


फंला फंला
क्या
कह रहा था
बता के भी
जा रहे थे


ऎसा
जता रहे थे
जैसे मुझे
मेरा कोई
चुपचाप
किया हुआ
गुनाह
दिखा रहे थे

श्रीमती जी
को मिले
मोहल्ले के
एक बुजुर्ग

अरे
रुको
सुनो तो
जरा

क्या
तुम्हारा वो
नौकरी वौकरी
छोड़ आया है

अच्छा खासा
मास्टर
लगा तो था
किसी स्कूल में

अब क्या
किसी
छापेखाने
में काम पर
लगवाया है

ऎसे ही
आज जब
अखबार में
उसका नाम
छपा हुआ
मैंने देखा

तुम
मिल गयी
रास्ते में
तो पूछा

ना
खबर थी वो
ना कोई
विज्ञापन था
कुछ
उल्टा सुल्टा
सा लिखा था

पता नहीं
वो क्या था
अंत में
उसका
नाम भी
छपा था

मित्र मिल गये
बहुत पुराने
घूमते हुवे
उसी दिन
शाम को
बाजार में

लपक
कर आये
हाथ मिलाये
और बोले

पता है
अवकाश पर
आ गये हो
आते ही
अखबार
में छा गये हो

अच्छा किया
कुछ छ्प छपा
भी जाया करेगा
जेब खर्चे के लिये
कुछ पैसा भी हाथ
में आया करेगा

घर
वापस पहुंचा
तो पड़ोसी की
गुड़िया आवाज
लगा रही थी

जोर जोर से
चिल्ला रही थी

अंकल
आप की
कविता आज के
अखबार में आई है

मेरी मम्मी
मुझे आज
सुबह दिखाई है

बिल्कुल
वैसी ही थी
जैसी मेरी
हिन्दी की
किताब में
होती है

टीचर
कितनी भी
बार समझाये
लेकिन
समझ से
बाहर होती है

मैं उसे
देखते ही
समझ गयी थी
कि ये जरूर
कोई कविता है

बहुत ही
ज्यादा लिखा है
और उसका
मतलब भी
कुछ नहीं
निकलता है।

बुधवार, 27 जून 2012

विदाई

आज मैडम जी को
विदा कर के आया
उनके अवकाश ग्रहंण
के उपलक्ष्य में था
विभाग ने एक
समारोह करवाया
विदाई समारोह में
ऎसा महसूस होने
लग जाता है
मजबूत से मजबूत
आदमी भी थोड़ा
भावुक अपने को
जरूर दिखाता है
कौऎ मुर्गी कबूतर
भी होते हैं कहीं
आस पास में मौजूद
माहौल उन सबको भी
बगुला भगत बनाता है
एक के बाद एक
मँच पर बोलने
को बुलाया जाता है
कभी कुछ नहीं
कहने वाला भी
लम्बा एक भाषण
फोड़ ले जाता है
कोई शेर लाता है
शायर हो जाता है
कोई गाना सुनाता है
किशोर कुमार की
टाँग तोड़ने में जरा
भी नहीं घबराता है
कविता ले के आने वाला
अपने को सुमित्रा नन्दन पँत
हूँ कहने में नहीं शरमाता है
सेवा काल में सबसे ज्यादा
गाली खाने वाला जो होता है
सबसे बड़ी माला
वो ही तो पहनाता है
सारे गिले शिकवे भूल कर
नम आँखों से मुस्कुराता है
आँसू बनाने के लिये
कोई भी ग्लीसरीन
तक नहीं लगाता है
शब्दों का चयन देखने
लग जाये अगर कोई
अपने को अर्थ ढूढने में
असमर्थ पाता है
भावार्थ ढूँढने के लिये
घर वापस लौट कर
शब्दकोष ढूँढने
लग जाता है
इससे सिद्ध ये जरूर
लेकिन हो जाता है
कि अवकाश ग्रहण
करना माहौल को
ऊर्जावान जरूर ही
बना ले जाता है
फिर ये समझ में
नहीँ आ पाता है
कि विभागों में
शाँति व्यवस्था
कायम करने के लिये
अवकाश लेने देने को
हथियार क्यों नहीं
सरकार द्वारा एक
बना लिया जाता है ।

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

छ से छन्द

कविता सविता
तो तब लिखता
अगर गलती से
भी कवि होता

मैं सिर्फ
बातें बनाना
जानता हूँ
छंद चौपाई
दोहे नहीं
पहचानता हूँ

रोज दिखते
हैं यहां कई
उधार लेकर
जिंदगी बनाते

कुछ जुटे
होते हैं
फटती हुवी
जिंदगी में
पैबंद लगाते

जो देखता
सुनता
झेलता
हूँ अपने
आस पास
कोशिश कर
लिख ही
लेता हूँ
उसमें से
कुछ
खास खास

ऎसे में
आप कैसे
कहते हो
छंद बनाओ
हमारी तरह
कविता एक
लिख कर
दिखाओ

गुरु आप
तो महान हो
साहित्य जगत
की एक
गरिमामय
पहचान हो

खाली दिमाग
वालों पर
इतना जोर
मत लगाओ
बेपैंदे के
लोटे को तो
कम से कम
ना लुढ़काओ

क से कबूतर
लिख पा
रहा हो
अगर
कोई यहां
गीत लिखने
की उम्मीद
उससे तो
ना ही लगाओ

हो सके
तो उसे  

ख से
खरगोश
ही
सिखा जाओ

नहीं कर
सको
इतना भी
तो
कम से कम
उसके लिये
एक ताली ही
बजा जाओ।

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

वोट घुस गया

लम्बे इंतजार के बाद
हुवा आज मैं सपरिवार
वोट देने के लिये तैयार
बहुत खुश था जैसे
बनाने जा रहा था अपनी
केवल अपनी सरकार
वोटर आई डी कार्ड
लौकर से निकाला
बटुवे की चोर जेब
के अंदर डाला
जूते को पौलिश लगाया
सिर में तेल डाल
बालों को संवारा
छोटे बेटे को बताया
पड़ोसी को सुनाया
दरवाजा अंदर से
बंद जरूर कर लेना
वोट डालने जा रहा हूँ
यूँ गया और यूँ ही
वापस आ रहा हूँ
एक बूथ के बगल
से निकल रहा था
हर पार्टी का आदमी
बड़ी आशा भरी
निगाहो से हमे
तौल रहा था
हौले हौले अपने
बूथ पर पहुंच पाया
लिस्ट देखने वाले को
वोटर आई डी कार्ड
मैने हाथ में थमाया
पूरी लिस्ट जब छान
मारी तो अपना ही
नहीं पूरे परिवार के
नामों को गायब पाया
निराश हो कर
अगल बगल
के कुछ और बूथों में
चक्कर लगाया
मैं अपने परिवार के
सांंथ खो चुका था
किसी को कहीं
भी नहीं ढूंड पाया
वापस लौट के जब आ
रहा था चाल में वो
तेजी नहीं पा रहा था
मन ही मन चुनाव आयोग
को धन्यवाद देता जा रहा था
एक कविता अपनी भड़ास का
अंतिम हथियार कुड़ता हुवा
सोचता चला जा रहा था
आज शायद एक पाप
करने से ऊपर वाले
ने मुझे बचा लिया
इसीलिये मेरा
और मेरे परिवार
वालों के नाम को
वोटर लिस्ट से
ही हटा लिया ।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

पहचान

शब्दों के समुंदर
में गोते लगाना
और ढूँढ के लाना
कुछ मोती इतना
आसान कहां होता है
कविता बता देती है
तुम्हारे अंदर के
कव्वे का पता
जो सफेद शब्द
खोज के लाता
तो है हमेशा
पर कव्वे की
काली छाया
उन्हे भी
बना देती है काला
और कोयल की
कूँक होते हुवे भी
वो न जाने क्यूं
कांव कांव ही
सुनायी देते हैं
और लोग जान
जाते हैं मुझे ।

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