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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

सच

क्या किया जाये
जब देर से
समझ में आये

खिड़कियाँ
सामने
वाले की
जिनमें
घुस घुस
कर देखने
समझने
का भ्रम
पालता
रहा हो कोई

खिड़कियाँ
थी ही नहीं
आईने थे

यही होता है
यही गीता है
यही कृष्ण है
और
यही अर्जुन है
बहुत सारी

गलतफहमियाँ
खुद की
खुद को
पता होती हैं
देखना कौन
चाहता है

पर सामने
वाले की
खिड़कियाँ
जो आईना
होती है
हर कोशिश
में देखने की
अपना सच
बिना किसी
लाग लपेट के
बहुत साफ
साफ
दिखाता है
समझ में
आता है
घुसना
समझ में
आता है
दिखना
सब कुछ
साफ साफ

नहीं समझ
में आता है
आईने में
दिखी
परछाइयाँ
खुद की
खुद की
कमजोरियाँ

कृष्ण भी
खुद मे ही है
अर्जुन भी
खुद में ही है
खिड़कियाँ
नहीं हैं
बस आईने हैं

कौन क्या
देखना
चाहता है
खुद बता
देता है
खुद को
उसका सच

देखने की
कोशिश में
तेरे सारे झूठ
तुझे नजर
आते हैं
‘उलूक’
खुश मत
हुआ कर

आईना हटा
कर कुछ
खिड़कियों में
झाँकना सीख

लोग
खिड़कियाँ
खुली तो
रखते हैं
पर आईना
भी रखते
हैं साथ में ।

सोमवार, 17 नवंबर 2014

खुद का आईना है खुद ही देख रहा हूँ

अपने आईने
को अपने
हाथ में लेकर
घूम रहा हूँ
परेशान होने
की जरूरत
नहीं है
खुद अपना
ही चेहरा
ढूँढ रहा हूँ
तुम्हारे पास होगा
तुम्हारा आईना
तुमसे अपने
आईने में कुछ
ढूँढने के लिये
नहीं बोल रहा हूँ
कौन क्या
देखता है जब
अपने आईने में
अपने को देखता है
मैंने कब कहा
मैं भी झूठ
नहीं बोल रहा हूँ
खयाल में नहीं
आ रहा है
अक्स अपना ही
जब से बैठा हूँ
लिखने की
सोचकर
उसके आईने में
खुद को देखकर
उसके बारे में
ही सोच रहा हूँ
सब अपने
आईने में
अपने को
देखते हैं
मैं अपने आईने
को देख रहा हूँ
उसने देखा हो
शायद मेरे
आईने में कुछ
मैं उसपर पड़ी
हुई धूल में
जब से
देख रहा हूँ
कुछ ऐसा
और
कुछ वैसा
जैसा ही
देख रहा हूँ ।

चित्र साभार: vgmirrors.blogspot.com

रविवार, 24 अगस्त 2014

आईने के पीछे भी होता है बहुत कुछ सामने वाले जिसे नहीं देख पाते हैं

कहा जाता रहा है
आज से नहीं
कई सदियों से
सोच उतर
आती है शक्ल में
दिल की बातें
तैरने लगती हैं
आँखों के पानी में
हाव भाव चलने बोलने
से पता चल जाता है
किसी के भी
ठिकाने का अता पता
बशर्ते जो बोला या
कहा जा रहा हो
वो स्वत: स्फूर्त हो
बस यहीं पर वहम
होना शुरु हो जाता है
दिखने लगता है
पटेल गाँधी सुभाष
भगत राजगुरु और
कोई ऐसी ही
शख्सियत उसी तरह
जैसे बैठा हो कोई
किसी सनीमा हॉल में
और चल रही हो
पर्दे पर कोई फिल्म
हो रही हो विजय
सच की झूठ के ऊपर
वहम वहम बने रहे
तब तक सब कुछ
ठीक चलता है
जैसे रेल चल रही
होती है पटरी पर
लेकिन वहम टूटना
शुरु होते ही हैं
आईने की पालिश
हमेशा काँच से
चिपकी नहीं
रह पाती है
और जिस दिन से
काँच के आर पार
दिखना शुरु
होने लगता है
काँच का टुकड़ा
आईना ही
नहीं रहता है
काँच का टुकड़ा
एक सच होता है
जो आईना कभी भी
नहीं हो सकता है
उसे एक सच
बनाया जाता है
एक काँच पर
पालिश चढ़ा कर
बहुत कम होते हैं
लेकिन होते हैं
कुछ बेवकूफ लोग
जो कभी भी कुछ
नहीं सीख पाते हैं
जहाँ समय के साथ
लगभग सभी लोग
थोड़ा या ज्यादा
आईना हो ही जाते हैं
उनके पार देखने की
कितनी भी कोशिश
कर ली जाये
वो वही दिखाते हैं
जो वो होते ही नहीं है
और ऐसे सारे आईने
एक दूसरे को
समझते बूझते हैं
कभी एक दूसरे के
आमने सामने
नहीं आते हैं
जहाँ भी देखिये
एक साथ एक दूसरे
के लिये कंधे से कंधा
मिलाये पाये जाते हैं ।

शनिवार, 29 मार्च 2014

विषय ‘बदलते समाज के आईने में सिनेमा और सिनेमा के आईने में बदलता समाज’ अवसर ‘पंचम बी. डी. पाण्डे स्मृति व्याख्यान’ स्थान ‘अल्मोड़ा’ वक्ता 'श्री जावेद अख्तर'

कौन छोड़ता स्वर्णिम
अवसर सुनने का
समय से पहले
इसीलिये जा पहुँचा
खाली कुर्सियाँ
बहुत बची हुई थी .
एक पर पैर फैला
कर आराम से बैठा
समय पर शुरु
हुआ व्याख्यान
रोज किसी ना किसी
मँच पर बैठे
दिखने वाले दिखे
सुनने वालों में आज
नजर आये कुछ
असहज हैरान और
थोड़ा सा परेशान
सिनेमा कब देखा
ये तो याद नहीं आया
पर मेरा समाज
सिनेमा के समाज
की बात सुनने
के लिये ही है
यहाँ पर आया
ऐसा ही जैसा कुछ
मेरी समझ में
जरूर आ पाया
बोलने वाला
था वाकपटु
घंटाभर बोलता
ही चला गया
नदी पहाड़ मैदान
से शुरु हुई बात
कुछ इस तरह
समाज को सिनेमा
और सिनेमा को
समाज से
जोड़ता चला गया
कवि गीतकार
पटकथा लेखक
के पास शब्दों
की कमी नहीं थी
बुनता चला गया
सुनने वाला भी
बहुत शांत भाव से
सब कुछ ही
सुनता चला गया
नाई की दुकान के
आमने सामने के
शीशों में एक
को सिनेमा और
एक को समाज
होने का उदाहरण
पेश किया गया
समझने वाले
ने क्या समझा
पर उससे
किस शीशे ने
किस शीशे को
पहले देखा होगा
जरूर पूछा गया
सामाजिक मूल्यों के
बदलने के साथ
सिनेमा के बदलने
की बात को
समाज की सहमति
की तरह देखा गया
कोई सामजिक और
राजनीतिक मुद्दा
अब नहीं झलकता है
इसीलिये अब वहाँ भी
समाज को इस
जिम्मेदारी का ही
तोहफा दिया गया
किताबें कौन सी
खरीद कर अपने
शौक से पढ़ता है
कोई आजकल
इंटीरियर डेकोरेटर
किताबों को परदे
और सौफे के रंग
से मैच करते हुऐ
किताबों के कवर
छाँट कर जब हो
किसी को दे गया
आठ घंटे में एक
सिनेमा  बन रहा
हो जिस देश में
पैसा सिनेमा से
बनाने के लिये तो
बस साबुन तेल
और कारों का ही
विज्ञापन बस
एक रह गया
हर जमाने के
विलेन और हीरो
के क्लास का
बदलना भी एक
इत्तेफाक नहीं रहा
जहाँ कभी एक
गरीब हुआ करता था
अब वो भी पैसे वाला
एक मिडिल क्लास
का आदमी हो गया
कविता भी सुनाई
अंत में चुनाव
की बेला में
किसी सुनने वाले
की माँग पर
शतरंज का उदाहरण
देकर सुनने वालों
को प्यादा और
नेताओं को
राजा कह गया
आईना ले के आया
था दिखाने को
उस समाज को
अपने आईनों में ही
कब से जिससे
खुद का चेहरा
नहीं देखा गया
खुश होना ही था

उलूक को भी
सुन के उसकी
बातों को मजबूरन
बहुत कुछ था
जिसे पूरा कहना
मुश्किल हुआ
थोड़ा उसमें से
जो कहा गया
यहाँ 
आ कर के
वो भी कह गया । 

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

मुआ आईना कुछ नहीं कर पा रहा था

हाथ में
आईना
उठाये हुऐ
बाजार
की तरफ
निकलते हुऐ
मैंने जब
उसे देखा
तो बस
यूं ही
पूछ बैठा

भाई
क्या बात है
कहाँ को
जा रहे हो

क्या आईने को
फ्रेम पहनाना
चाह रहे हो

थोड़ा सा
झेंपते हुऐ
उसने आईने
को पीठ की
तरफ पहुँचाया

आगे आकर
कुछ
फुसफुसाते
हुऐ ये बताया

अब क्या
करूं जनाब
समझ में नहीं
आ रहा था

मैं तो रोज
सुबह सुबह
उठ कर
साबुन से मुंह
धोता ही
जा रहा था

बीच बीच में
बाजार से
फेशियल भी
कभी कभी
करवा रहा था

आईने
को भी हमेशा
कोलिन से
चमका रहा था

आईने
की बेशर्मी
तो देखिये जरा

जैसा दिखता
था मैं सालों
साल पहले
आज भी मुझे
वैसा ही दिखाये
जा रहा था

हीरो बनने
की तमन्ना
कभी
रही नहीं
पर मैं तो
हीरो के
अर्दली का
रोल भी
नहीं पा
पा रहा था

और
जिसने
जिंदगी में
आईना नहीं
देखा कभी

साहब उस
मोहतरमा की
फिलम
बनाने के लिये
पैसे लगाने
को तैयार
नजर आ
रहा था

इसीलिये
आज मैं
इस बेकार
आईने को
बेच कर
एक नया
आईना
खरीदने
को बाजार
तक जा
रहा था ।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

चेहरे पर भी लिखा होता है

चेहरे पर भी
तो कुछ कुछ
लिखा होता है
ना कहे कुछ
भी अगर कोई
तब भी थोड़ा
थोड़ा सा तो
पता होता है
अपना चेहरा
सुबह सुबह ही
धुला होता है
साफ होता है
कुछ भी कहीं
नहीं कहता है
चेहरा चेहरे
के लिये एक
आईना होता है
अपना चेहरा
देखकर कुछ
कहाँ होता है
बहुत कम
जगहों पर
ही  एक आईना
लगा होता है
अंदर बहुत
कुछ चल
रहा होता है
चेहरा कुछ
और ही तब
उगल रहा
होता है
दूसरे चेहरे
के आते ही
चेहरा रंग
अपना बदल
रहा होता है
चेहरे पर
कुछ लिखा
होता है
ऎसा बस
ऎसे समय
में ही तो
पता चल
रहा होता है ।

बुधवार, 2 मई 2012

सरकार का आईना

उन्होंने
जैसे ही
एक बात
उछाली
मैने तुरंत
अपने मन
की जेब
में संभाली
घर आकर
चार लाईन
लिख ही डाली
कह रहे थे
जोर लगाकर
किसी राज्य की
सरकार का
चेहरा देखना
हो अगर 
उस राज्य के
विश्वविद्यालय 
पर सरसरी
नजर डालो
कैसी चल
रही है सरकार
तुरत फुरत में
पता लगालो
वाह जी
क्या इंडीकेटर
ढूंढ के चाचा
जी लाये हैं
अपनी पोल
पट्टी खुद ही
खोलने का
जुगाड़ बनाये हैं
मेरी समझ
में भी बहुत
दिनों से ये नहीं
आ रहा था
हर रिटायर
होने वाला शख्स
कोर्ट जा जा
कर स्टे
क्यों ले
आ रहा था
अरे जब
बूढ़े़ से बूढ़ा़
सरकार में
मंत्री हो
जा रहा था
इतने बड़े राज्य
का बेड़ा गर्क
करने में
बिल्कुल भी
नहीं शर्मा
रहा था
तो मास्टर जी
ने क्या
बिगाड़ा था
किसी का
क्यों उनको साठ
साल होते ही
घर चले जाओ
का आदेश दिया
जा रहा था
काम धाम के
सपने खाली पीली
जब राजधानी
में जा कर
सरकार जनता
को दिखाती है
उसी तरह
विश्विद्यालय की
गाड़ी भी तो
खरामे खरामे
बुद्धि का
गोबर बनाती है
जो कहीं
नहीं हो सकता
उसे करने की
स्वतंत्रता भी
यहाँ आसानी से
मिल ही जाती है
बहुत सी बाते तो
यहाँ कहने
की मेरी भी
हिम्मत नहीं
हो पाती है
सुप्रीम कोर्ट
भी केवल
बुद्धिजीवियों
के झांसे
में ही आ
पाती है
वाकई में
सरकार का
असली चेहरा
तो हमें
ये ही
दिखाती है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

दोस्त

आईना क्यों
नहीं दिखाता
मेरा सच मुझे
उसे देखने
के लिये
कहां से लाऊं
मैं तुम्हारी
पैनी नजर
आईना मेरा
दोस्त तो कभी
नहीं रहा
फिर भी
उसने कभी
नहीं दिखाया
मुझे मेरे अंदर
का हैवान
मैने सोचा
आईना दिखाता
है हमेशा सच
तुम्हारी पैनी
नजर बड़ी
कमाल की
है मेरे दोस्त
जो मेरा
आईना कभी
नहीं देख
पाया मेरे
अंदर छुपा
तुमने देख
ही डाला
अपनी इस
बाजीगरी को
देश के नाम
कर डालो
और दिखा,
दो दुनिया को
सारे वो सच
जो सामने
नहीं आते
किसी के
कभी भी
तुम्हें देख
कर छुप
नहीं पाते
आओ कुछ
करो देश
के लिये
मेरे तो झूट
बहुत छोटे हैं
इस देश
के सामने।

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

आईना

आज एक लम्बे
अर्से के बाद
पता नहीं कैसे मैं
जा बैठा घर के
आईने के सामने
मेरे दिमाग की तरह
आईने ने कोई अक्स
नहीं दिखलाया
मैं थोड़ा घबराया
नजर को फिराया
सामने कैलेण्डर में
तो सब नजर
आ रहा था
तो ये आईना
मुझसे मुझको
क्यों छिपा रहा था
सोचा किसी को बुलाउं
आईना टेस्ट करवाउं
बस कुता भौंकता
हुवा आया थोडा़ ठहरा
फिर गुर्राया जब
उसने अपने को आईने
के अंदर भी पाया
मुझे लगा आईना
भी शायद समय
के सांथ बदल रहा होगा
इसी लिये कबाड़ का
प्रतिबिम्ब दिखाने से
बच रहा होगा
विज्ञान का हो भी
सकता है ऎसा
चमत्कार
जिन्दा चीजों का ही
बनाता हो आईना
इन दिनो प्रतिबिम्ब
और मरी हुवी चीजों
को देता हो चेतावनी
कि तुम अब नहीं हो
कुछ कर सकते हो
तो कर लो अविलम्ब।

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