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सोमवार, 6 मार्च 2017

सुना है फिर से आ गयी है होली

चल बटोरें रंग
बिखरे हुऐ
इधर उधर
यहाँ वहाँ
छोड़ कर
आ रहा है
आदमी आज
ना जाने सब
कहाँ कहाँ

सुना है फिर से
आ गयी है होली
बदलना शुरु
हो गया है मौसम

चल
करें कोशिश
बदलने की
व्यवहार को अपने
ओढ़ कर हंसी
चेहरे पर दिखाकर
झूठी ही सही
थोड़ी सी खुशी
मिलने की
मिलाने की

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
दिखायें रास्ते
शब्दों को
भटके हुऐ
बदलें मतलब
वक्तव्य के
दिये हुए
अपनों के
परायों के
करें काबू
जबानें
लोगों की
सभी जो
आते
हैं नजर
इधर और
उधर सटके हुऐ

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल चढ़ाये भंग
उड़ायें रंग
जगायें ख्वाब
सिमटे हुऐ
सोते हुऐ
यहाँ से
वहाँ तक
के सभी के
जितने भी दिखें
समय के
साथ लटके हुऐ

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
करें दंगा
करें पंगा
लेकिन निकल
बाहर हम्माम से
कुछ ही दिन सही
सभी नंगों के
साथ हो नंगा

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
उतारें रंग
चेहरे के
मुखौटों के
दिखायें रंग
अपने ही
खुद के होठों के
कहें उसकी नहीं
बस अपनी ही
कहें अपनों से कहें
किसलिये
लुढ़कना
हर समय
है जरूरी
साथ लोटों के

सुना है फिर से
आ गयी है होली
सुना है फिर से
आ गयी है होली ।


चित्र साभार: Happy Holi 2017

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

एक रंग से सम्मोहित होते रहने वाले इंद्रधनुष से हमेशा मुँह चुरायेंगे

अपने सुर पर
लगाम लगा
अपनी ढपली
बजाने से अब
बाज भी आ
बजा तो रहा हूँ
मैं भी ढपली
और गा
भी रहा हूँ कुछ
बेराग ही सही
सुनता क्यों नहीं
अब सब
अपनी अपनी
बजाना शुरु
हो जायेंगे तो
समझता क्यों नहीं
काँव काँव
करते कौए
हो जायेंगे
और
साफ सफेद
दूध से धुले हुऐ
कबूतर फिर
मजाक उड़ायेंगे
क्या करेगा
उस समय
अभी नहीं सोचेगा
समय भूल जायेगा
तुझे
और मुझे
फिर
हर खेत में
कबूतरों की
फूल मालाऐं
पहने हुऐ
रंग बिरंगे
पुतले
नजर आयेंगे
पीढ़ियों दर
पीढ़ियों के लिये
पुतलों पर
कमीशन
खा खा कर
कई पीढ़ियों
के लिये
अमर हो जायेंगे
कभी सोचना
भी चाहिये
लाल कपड़ा
दिखा दिखा
कर लोग
क्या बैलों
को हमेशा
इसी तरह
भड़काऐंगे
इसी तरह
बिना सोचे
जमा होते
रहेंगी सोचें
बिना सोचे समझे
किसी एक
रंग के पीछे
बिना रंग के
सफेद रंग
हर गंदगी को
ढक ढका कर
हर बार
की तरह
कोपलों को
फूल बनने
से पहले ही
कहीं पेड़ की
किसी डाल पर
एक बार
फिर से
बार बार
और
हर बार
की तरह ही
भटका कर
ले जायेंगे ।

चित्र साभार: www.allposters.com

बुधवार, 29 जुलाई 2015

समझदारी है सफेद को सफेद रहने देकर वक्त रहते सारा सफेद कर लिया जाये

छोड़ दिया जाये
कभी किसी समय
खींच कर कुछ
सफेद लकीरें
सफेद पन्ने के
ऊपर यूँ ही
हर वक्त सफेद
को काला कर
ले जाने की मंशा
भी ठीक नहीं
रंग रहें रंगीन रहें
रंगीनियों से भरे रहें
रहने दिया जाये
काले में सफेद भी
और सफेद में
काला भी होता है
कहीं कम कहीं
ज्यादा भी होता है
रहने भी दिया जाये
ढकने के लिये सब
कुछ नजर सफेद
पर टिकी रहे
रहनी ही चाहिये
मौका मिले ओढ़ने का
सफेदी को कभी
अच्छा होता है अगर
खुद ही ओढ़ लिया जाये
सर से शुरु होती है
सफेदी जहाँ सब
सफेद दिखता है
पाँवो के तले पर भी
सफेद ही कर लिया जाये
सफेद पर ही चलना हो
सब कुछ सफेद ही रहे
सफेद पर ही
रुक लिया जाये
इससे पहले किसी को
ढकना पढ़े तेरा भी कुछ
सफेद सफेद से ‘उलूक’
वक्त को समझ कर
जितना कर सकता है
कोई सफेद सफेदी के साथ
सफेद कर लिया जाये ।

चित्र साभार: itoon.co

रविवार, 12 जुलाई 2015

थोड़े बहुत शब्द होने पर भी अच्छा लिखा जाता है

अब कैसे
समझाया जाये
एक थोड़ा सा
कम पढ़ा लिखा
जब लिखना ही
शुरु हो जाये
अच्छा है
युद्ध का मैदान
नहीं है वर्ना
हथियारों की
कमी हो जाये
मरने जीने की
बात भी यहाँ
नहीं होती है
छीलने काटने
को घास भी
नहीं होती है
लेकिन दिखता है
समझ में आता है
अपने अपने
हथियार हर
कोई चलाता है
घाव नहीं दिखता
है कहीं किसी
के लगा हुआ
लाल रंग का
खून भी निकल
कर नहीं
आता है
पर कोशिश
करना कोई
नहीं छोड़ता है
घड़ा फोड़ने
के लिये कुर्सी
दौड़ में जैसे
एक भागीदार
आँख में पट्टी
बाँध कर
दौड़ता है
निकल नहीं
पाता है
खोल से अपने
उतार नहीं
पाता है
ढोंग के कपड़े
कितना ही
छिपाता है
पढ़ा लिखा
अपने शब्दों
के भंडार के
साथ पीछे
रह जाता है
कम पढ़ा लिखा
थोड़े शब्दों में
समझा जाता है
जो वास्तविक
जीवन में
जैसा होता है
लिखने लिखाने
से भी कुछ
नहीं होता है
जैसा वहाँ होता है
वैसा ही यहाँ आ
कर भी रह जाता है
‘उलूक’ ठीक है
चलाता चल
कौन देख रहा है
कोई अपनी नाव
रेत में रखे रखे ही
चप्पू चलाता है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 7 मार्च 2015

मुझे ही लगा या तुझे भी कुछ महसूस हुआ

किसी ने गौर
भी नहीं किया
मीडिया भी
चुप चाप रहा
हर बार इसकी
और उसकी
तलवार लेकर
वार करने की
फितरत वाला
इस बार की
होली में आखिर
क्यों कहीं
भी नहीं दिखा
होली में देश
नहीं होता है क्या
होली में प्रेम
नहीं होता है क्या
उसके चेहरे पर
किसी ने कोई रंग
आखिर क्यों नहीं लिखा
ज्वलंत है प्रश्न
पर उत्तर कहीं भी
लिखा हुआ नहीं बिका
ऐसा क्या बस
मुझे ही लगा
या किसी और ने भी
इस बात को सोचा
झाडू‌ तक उठा
ले गया था किसीका
रंग देख कर क्यों
और कहाँ खिसक गया
हिंदू मुसलमान
सिख और ईसाई
को भूल गया
समझ में सच में
नहीं आ रहा है कोई
समझाये मुझे क्या
इसी बीच कुछ दिनों
कश्मीर जाकर क्या
वो आदमी हो गया
रंगीन चेहरे बनाने
में माहिर रंग हीन
किसलिये हो गया ?

चित्र साभार: www.disneyclips.com

बुधवार, 4 मार्च 2015

रंग बहुत हो गये इधर उधर रहने दे इस बार मत उड़ा बस रंग बिरंगे चुटकुले कुछ रोज सुना

रंग भरिये प्रतियोगिता 
राजा और रानी
राजकुमार और
राजकुमारी
चंपकवन और
खरगोश
शेर लोमड़ी
जंगल पेड़ पौंधे
और कुछ
खानाबदोश
कितना कुछ
है सतरंगी
चल शुरु हो जा
खोज और
कुछ नया खोज
बाहर निकल
बीमार मन
की कमजोर
दीवारों को
मत खोद
बना कोई
मजबूत लेप
सादा सफेद
गीत भी गा
अपने फटे हुऐ
गले और
राग तरन्नुम
को मत देख
मुस्कुरा
बेनूर हंसी
को छिपाने के
प्रयास में होंठों
को मत हिला
जरा थोड़ा जोर
से तो बड़बड़ा
सुना है
इस बार भी
हमेशा के जैसा
रंगो का त्योहार
आ गया है
होली खेल
रंग बिरंगे
सपने देख
बेच सकता है
तो बेच
झूठ खरीद
सच में लपेट
और झूठ झूठ
में ही सही बेच
खुश रह
होली खेल
रंग उड़ा
रंगीन बातों
पर मत जा
अपनी फटी
धोती उठा
हजार करोड़ का
टल्ला लगा
इधर उधर
मत देख
गाना गा
बिना पिये
जमीन पर
लोट लगा
बहुत साल
खेल लिया
‘उलूक’
रंगो को मिला
मिला कर
रंग बिरंगी होली
कभी एक रंग
की भी खेल
किसी को
हरा लगा
किसी को
गेरुआ चिपका
बदल दे टोपी
इस बार सफेद
काली करवा
बहुत हो गया
बहुत हो गया
सफेद सफेद
झका झक सफेद
कर दे उलट फेर
नयी कर कुछ
नौटंकी
जी भर कर
चुटकुले सुना
दे दना दन
एक के बाद एक
पीटने के लिये
खड़ा है तालियाँ
डेढ़ सौ करोड़
का देश
बुरा सोच
बुरा कर
बुरा ना मानो
होली है
का ट्वीट
कर तुरंत
उसके बाद
एक संदेश ।
चित्र साभार: cliparts.co

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

रंग देखना रंग पढ़ना रंग लिखना रंग समझना या बस रंग से रंग देना कुछ तो कह दे ना

रंग दिखाये
माँ बाप ने
चलना शुरु
किया जब
पावों पर अपने
लड़खड़ाते हुऐ
सहारे से
उँगलियों के
उनकी ही
हाथों की

रंग कम
समझ में आये
उस समय पर
आई समझ में
तितलियाँ
उड़ती उड़ती
पेड़ पौंधे फूल
एक नहीं
बहुत सारे
कौआ काला
कबूतर सफेद

अच्छाई और बुराई
खुशी और दुख:
प्यार और दुलार
रंगीन तोते मोर
और होली में
उड़ते अबीर
और गुलाल

रंग बने इंद्र के
धनुष भी पर
युद्ध कभी भी नहीं
हमेशा उमड़े
भाव रंगीन

रंगों के साथ
रंगों को देखकर
छूकर या
आत्मसात कर
बिना भीगे भी
रंगों से रंगों के
रंगो का देवत्व
कृष्ण का हरा
या राम का हरा

कभी नहीं हरा सका
रंगो को रंगों
के साथ खेलते हुऐ
जैसे अठखेलियाँ
रंगों के ही
धनुष तीर और
तलवार होने
के बावजूद
लाल रंग देख
कर कभी
याद नहीं आया
खून का रंग तक

सालों गुजर गये
ना माँ रही
ना बाप रहे
पूछें किससे
सब बताते बताते
क्यों छिपा गये
रंगों के उस रंग को

जिसे देख कर
निकलने लगें
आँसू उठे दिल
में दर्द और
महसूस होने लगे
रंग का रंग से
अलग होना
समझ में आने लगे
काले का काला
और सफेद का
बस और बस
सफेद होना
रंग का टोपी
झंडा मफलर
और कपड़ा होना

एक नटखट
परी सोच का
बेकाबू बदरंग
जवान होना
रंग जीवन
के लिये
या जीवन
रंग के लिये
हो सके तो
तुम्हीं पूछ लेना
समझ में आ जाये
कभी कुछ इसी तरह
‘उलूक’

रंग को समझना
अगर कुछ भी
तो कुछ रंगों को
मुझे भी एक बार
फिर से समझा देना ।

चित्र साभार:
background-pictures.picphotos.net

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

कहने को कुछ नहीं है ऐसे हालातों में कैसे कोई कुछ कहेगा

दिख तो रहा है
अब मत कह देना
नहीं दिख रहा है
क्यों दिख रहा है
दिखना तो
नहीं चाहिये था
क्या हुआ ऐसा
दिखाई दे गया
और जो दिखा
वही सच है
ऐसे कई सच
हर जगह
सीँच रहे हैं
खून से
जिंदा लाशों को
और बेशरम लाशें
खुश हैं व्यस्त हैं
बंद आँखों से
मरोड़ते हुऐ
सपने अपने भी
और सपनों के भी
ये दिखना दिखेगा
कोई कुछ कहेगा
कोई कुछ कहेगा
मकान चार खंभों पे
टिका ही रहेगा
खंभा खंभे
को नोचेगा
एक गिरेगा
तीन पर हिलेगा
दो गिरेंगे
दो पर चलेगा
लंगड़ायेगा
कोई नहीं देखेगा
लंगड़ा होकर भी
गिरा हुआ खंभा
मरेगा नहीं
खड़ा हो जायेगा
फिर से मकान
की खातिर नहीं
खंभे की खातिरदारी
के लिये
ऐसे ही चलेगा
कल मकान में
जलसा मिलेगा
दावत होगी
लाशें होंगी
मरी हुई नहीं
जिंदा होंगी
तालियाँ बजेंगी
एक लाल गुलाब
कहीं खिलेगा
आँसू रंगहीन
नहीं होंगे
हर जगह रंग
लाल ही होगा
पर लाली नहीं होगी
खून पीला हो चुकेगा
कोई नहीं कुछ कहेगा
कुछ दिन चलेगा
फिर कहीं कोई
किसी और रंग का
झंडा लिये खड़ा
झंडे की जगह ले लेगा
खंबा हिलेगा
हिलते खंबे को देख
खंबा हिलेगा
मकान में जलसा
फिर भी चलेगा।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

रविवार, 6 जुलाई 2014

साँप जहर और डर किसका ज्यादा कहर

साँप को देखकर
अत्यधिक भयभीत
हो गई महिला के
उड़े हुऐ चेहरे
को देखकर
थोड़ी देर के लिये
सोच में पड़ गया
दिमाग के काले
श्यामपट में
लिखा हुआ सारा
सफेद जैसे काला
होते हुऐ कहीं
आकाश में उड़ गया
साँप आ ही रहा
था कहीं से उसी
तरह सरसराता
हुआ निकल गया
हुआ कुछ किसी
को नहीं बस
माहौल थोड़ी देर
के लिये उलटा पुल्टा
होते होते डगमगाता
हुआ जैसे संभल गया
जहर था साँप के अंदर
कहीं रखा हुआ
उसे उसी तरह वो
कंजूस अपने साथ
लेकर निकल गया
महिला ने भी चेहरे
का रंग फिर बदला
पहले जैसा ही
कुछ ही देर में
वैसा ही कर लिया
रोज बदलता है
मेरे चेहरे का रंग
किसी को देखकर
अपने सामने से
शीशे ने भी
देखते देखते इससे
सामंजस्य कर लिया
साँप के अंदर के जहर
के बारे में सब ने
सब कुछ पता कर लिया
उसके अंदर कुछ भी नहीं
फिर कैसे साँप के जहर
से भी बहुत ज्यादा
बहुत कुछ करते ना
करते कर लिया
‘उलूक’ समझा कर
रोज मरने वाले से
अच्छा होता है
एक ही बार मर कर
पतली गली से जो
एक बार में ही
निकल लिया ।

रविवार, 16 मार्च 2014

रंगों को समझने का स्कूल कहाँ पाया जाता है

होते होते एक
जमाना ही
गुजर जाता है
रंगों को समझने
बूझने में ही
कहाँ से कहाँ
पहुँचा जाता है
पिछले साल ही
तो लाल दिखा
था एक रंग
एक ही साल में
क्या से क्या
हो जाता है
कल ही मिला था
वही रंग होली में
लगा जैसे कुछ
हरा और कुछ
नीला सा कहीं
नजर आता है
पूरा जीवन एक
होली ही तो होती है
होली दर होली
रंग के ऊपर
रंग की परत
चढ़ाना भी सीख
ही लिया जाता है
कई सालों से
साथ रहते रहते भी
नहीं पता चलता है
कोई एक बेरंग
रंग अपना कितनी
खूबी के साथ
छिपा ले जाता है
रंग का रंग रूप
चुराना बहुत ही
आसानी से
किसी से भी
सीखा जाता है
एक सीधा साधा
रंग ही कभी
अपना रंग नहीं
बदल पाता है
रंगो की दुनिया में
ही बनते हैं इंद्रधनुष
रंगो को लेकर
छ्ल कपट
छीना झपट
कर लेने वाला ही
रंगबाज कहलाता है
प्रकृति कभी नहीं
छेड़ती है रंगो को
रंग खेलने का
तरीका किसी को
तो आता है
श्याम का रंग भी
राधा ही जानती थी
“उलूक” ताजिंदगी
रंगो को समझने
की कोशिश में
ही एक उल्लू
बन जाता है ।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

इस बार भी चढ़ जायेगा रंग कहाँ कुछ नहीं बतायेगा

होली के
रंगो के बीच
भंग की
तरँगो के बीच
रंग में रंग
मत मिला
मान जा
एक ही
रंग में रह
कोशिश कर
तिरंगा रंगों
का मत फहरा
रंगो का भी
होता है ककहरा
हरे को रहने
ही दे हरा
लाल बोल कर
रँग को रंग
से मत लड़ा
जिस रंग
में रंगा है
उसी रंग
से खेल
दो चार दिन
का सब्र कर
सालों साल
की मेहनत
पर ना डाल
मिट्टी या तेल
एक दिन
मुस्कुरायेगा
गले से लगायेगा
आशीर्वाद ढोलक
की थापों के साथ
एक नहीं कई
कई दे जायेगा
हो हो होलक रे
करता हुआ रंग
हवा में उड़ेगा
कुछ ही देर
फिर थोड़ा
मिट्टी में मिलेगा
कुछ पानी की
फुहारों के साथ
बह जायेगा
रंग बदलने वाला
क्या करेगा
बस यही नहीं
किसी के समझ
में आ पायेगा
रेडियो कुछ कहेगा
टी वी कुछ दिखायेगा
रंगों का गणित
बहुत सरल तरीके
से हल किया हुआ
अखबार भी बतायेगा
हर कोई कहेगा
जायेगा तो “आप”
के साथ ही
इस बार जायेगा
रंग रंग में मिलेगा
पता भी नहीं चलेगा
होली हुई नहीं
सब कुछ बदल जायेगा
जिसका चढ़ेगा रंग
वही बस वही
बाप हो जायेगा
रंग को रंग
ही रहने दे
अगर मिलायेगा
समझ ले बाद में
तेरे ही सर
चढ़ के बोलेगा
होली का होला
कब हो गया
“उलूक” तू बस
ऊपर से नीचे
देखता रह जायेगा ।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

रंगो का त्यौहार क्या कुछ रंगहीन हो गया है

कहाँ हैं रंग
कहाँ है इंद्रधनुष
कहाँ है पानी
की बौछारें
भीगता बाहर
का ही नहीं
था सब कुछ
अंदर भी छूटती
थी कुछ फुहाँरे
दो चार दिन
का नहीं कोई
खेल होता था
महीने महीने का
जमता था अखाड़ा
सुनाई देती थी
ढोलक की थापें
और मजीरे की
मीठी मीठी आवाजें
रात रात भर
बिना पिये ही
होता था नशा
उतरता कब था
नहीं  होता था
किसी को पता
घर घर से
निकाल निकाल
कर बच्चे जवान
और बूढ़ो का
किया जाता था
गलियों में जमावाड़ा
गालियाँ भी होती थी
गीतों की टोली
भी होती थी
चंदा भी माँगा
जाता था
दे देता था
हर कोई
खुशी खुशी कभी
मुँह भी टेड़ा
नहीं बनाता था
पता नहीं
क्या हो गया है
समय के साथ
जैसे सब कुछ
कहीं खो गया है
कह रहे हैं
सब के सब
रंग भी हैं
फुहारें भी हैं
होली भी है
पर शायद
“उलूक”
तुझे ही
कुछ कुछ
कहीं हो गया हैं
इंद्रधनुष ही नहीं
बनता है कहीं
भी आसपास तेरे
रंगों का सब कुछ
जैसे बस काला
सफेद हो गया है
जाकर अपनी
आँखों का टेस्ट
करवा ले
मुझे पक्का
लगने लगा है
होली अपनी
जगह पर
अपनी जैसी ही
हो रही है
बस एक तू
ही शायद
कलर ब्लाइंड
हो गया है ।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

चेहरे पर भी लिखा होता है

चेहरे पर भी
तो कुछ कुछ
लिखा होता है
ना कहे कुछ
भी अगर कोई
तब भी थोड़ा
थोड़ा सा तो
पता होता है
अपना चेहरा
सुबह सुबह ही
धुला होता है
साफ होता है
कुछ भी कहीं
नहीं कहता है
चेहरा चेहरे
के लिये एक
आईना होता है
अपना चेहरा
देखकर कुछ
कहाँ होता है
बहुत कम
जगहों पर
ही  एक आईना
लगा होता है
अंदर बहुत
कुछ चल
रहा होता है
चेहरा कुछ
और ही तब
उगल रहा
होता है
दूसरे चेहरे
के आते ही
चेहरा रंग
अपना बदल
रहा होता है
चेहरे पर
कुछ लिखा
होता है
ऎसा बस
ऎसे समय
में ही तो
पता चल
रहा होता है ।

बुधवार, 12 सितंबर 2012

चित्रकार का चित्र / कवि की कविता

तूलिका के छटकने
भर से फैल गये रंग
चारों तरफ कैनवास पर
एक भाव बिखरा देते हैं
चित्रकार की कविता
चुटकी में बना देते हैं
सामने वाले के लिये
मगर होता है  बहुत
मुश्किल ढूँढ पाना
अपने रंग उन बिखरे हुवे
इंद्रधनुषों में अलग अलग

किसी को नजर आने
शुरु हो जाते हैं बहुत से
अक्स आईने की माफिक
तैरते हुऎ जैसे हो उसके
अपने सपने और कब
अंजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से वाह !
दूसरा उसे देखते ही
सिहर उठता है
बिखरने लगे हों जैसे
उसके अपने सपने
और लेता है एक
ठंडी सी आह !
दूर जाने की
कोशिश करता हुआ
डर सा जाता है
उसके अपने चेहरे का
रंग उतरता हुआ
सा नजर आता है
किसी का किसी से
कुछ भी ना
कहने के बावजूद
महसूस हो जाता है
एक तार का झंकृत
होकर सरगम सुना देना
और एक तार का
झंकार के साथ
उसी जगह टूट जाना
अब अंदर की
बात होती है
कौन किसी को
कुछ बताता है
कवि की कविता
और चित्रकार का
एक चित्र कभी कभी
यूँ बिना बात के
पहेली बन जाता है ।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

बहुत कम होते हैं

अपने ही बनाये
पोस्टर का
दीवाना हो जाना
बिना रंग भरे भी
क्योंकि पोस्टर अपना
कूची अपनी रंग अपने
और सोच भी अपनी
कभी भी उतारे
जा सकते हैं
अपनी इच्छा के सांचे में
जिस तरह चाहो
बस मूड अच्छा
होना चाहिये
उसके चश्में की
जरूरत होती है
उसके कैनवास पर
आड़ी तिरछी रेखाओं
से बने हुऎ चित्र को
देखने के लिये
हर कोई रख देता है
अपना कैनवास
समझने के लिये
किसी के भी सामने
पर उसे देखने के लिये
अपना चश्मा देने वाले
बहुत ही कम
लोग होते हैं
और ऎसे लोगों के
कैनवास भी
उनकी सोच ही के
बराबर उतने ही
बडे़ भी होते हैं

लेकिन ऎसे भी
कुछ लोग होते हैं।

रविवार, 20 नवंबर 2011

रंग

आदमी भी
तो बदलता
है कई रंग
पर नहीं सुना
कभी उसे
किसी के द्वारा
बुलाते हुवे
'ऎ इन्द्र धनुष'
आज जब
वो पारंगत
हो चुका है
कई रंग
बदलने में
फिर भी
कहलाया जा
रहा है
केवल एक
'गिरगिट'।

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