उलूक टाइम्स

सोमवार, 2 जुलाई 2012

पहचान कौन

कभी समझ
में आता था
किस समय
आनी चाहिये

लेकिन अब
लगने लगा है
उस समय
समझ में नहीं
आ पाया था

किसी ने ठीक से
क्योंकि नहीं
कुछ बताया था

एक समय था
जब सामने से
लड़की को आता
देख कर ही
आ जाती थी

लड़की को
भी आती थी
उसका यूँ
ही सकुचाना
ये बता
कर जाती थी

घर से लेकर
स्कूल तक
स्कूल से
कालेज तक
कालेज से
नौकरी तक

नौकरी से
शादी तक
शादी से
बच्चों तक
टीचर से
होकर मास्टर
प्रोफेसर
और साहब
बीबी के
ऊपर से
निकलकर
बच्चों तक

कहीं ना
कहीं दिख
जाती थी
तेरे आने
ना आने पर
बहुत जगह
हमने डाँठ
खायी थी

बहुत जगह
डाँठ हमने
भी खिलाई थी

अरे तेरे को
क्यों नहीं
बिल्कुल भी
आती है

समय समय
पर ये बात
बहुत जगह
पर समझाई थी

अब जमाना
तो कुछ और
सीन दिखा
रहा है

हर कोई
कुछ भी
कैसे भी
कहीं भी
कर ले
जा रहा है

प्रधानमंत्री
हो या
उसका संत्री
पक्ष हो
या विपक्ष

अन्ना के
साथ हो
या गन्ने के
खेत में हो

अपने घर
में भी किसी
को आते हुए
अब नजर
नहीं आती है

बाहर तो
और भी
अजीब अजीब
से दृश्य
दिखलाती है

बच्चे हों या
उम्रदराज
दफ्तर का
चपरासी हो
या सबसे
बड़ा साहब

अब तेरे
को कोई
नहीं लाना
चाहता है

तेरे को
पहचानते
तक नहीं है
ये भी बताना
नहीं कोई
चाहता है

तेरा जमाना
अब लौट
के कभी
नहीं आ
पायेगा

शरम बहन

तेरे को
हर कोई बस
शब्दकोष का
एक शब्द
भर बनायेगा

कुछ सालों में
तेरी कब्र भी
बना ले जायेगा

फूल चढ़ाने
भी उसमे
शायद ही
कोई कभी
नजर आयेगा।