उलूक टाइम्स: 2020

रविवार, 13 दिसंबर 2020

चैन लिखना बेचैनी होते हुऐ किसलिये सोचना क्या रखी है और कहाँ रखी है

सारे बेचैनो ने
लिख दिये हैं चैन
दरो दीवार छोड़िये सड़क मैदानों तक में 

लिखे को पढ़िये पन्ने दर पन्ने
किसलिये  ढूंढनी है 
कलम किस की है और कहाँ रखी है 

कुछ कहां हो रहा है
किसलिये बैचेन है
चैन ढूंढ और जमा कर पैमाने तक में 

लिखते चले जा
खाली गिलास खाली बोतल
किसने देखनी है किसकी है और कहाँ रखी है 

चैन और बेचैनी
रिश्ता बहुत पुराना है
खोज ना जा कर घर से लेकर मैखाने तक में 

मिलेगा जरूर
कुछ राख कुछ धुआँ
कुछ टुकड़े बचे बीड़ी के भी
कौन लिखता है हिसाब बही कहाँ रखी है 

बेचैनी  लिखने में भी दिख जाता है चैन
चैन से नहीं लिखा कर बैचनी यूँ ही खदानों तक में 

खोदना तुम को आता है
किसे मालूम है जरूरी है कुदालें भी किसे पता है कहाँ रखी हैं 

‘उलूक’ जानता है
चैन है ही नहीं कहीं सारे 
बेचैन हैं बताते नहीं हैं 

लिखा करना जरूरी है चैन
अपने लिये ना सही
बेचैन के लिये सही बेचैनी है पता है कहाँ रखी है।

चित्र साभार: https://webstockreview.net/

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

पता नहीं कैसे कम बोला इस साल बमबोला बदजुबान

मेहरबान कद्रदान
बनी रहे
आन बान और शान

खुदा
मुआफ करे
किसी तरह छूटे
छूटे तो सही
गधे सी हो चुकी
ये लम्बी जुबान

काम की ना काज की
दुश्मन कलम दवात की

किसलिये
फिर फिर खोल बैठती है
पाँच दस दिन छोड़ कर
बन्द होती होती नजर आ रही
कबाड़ से भर चुकी
एक दशक पुरानी
फटे हाल बिन किताब की
पुस्तकालय का घूँघट ओढ़ी हुई
ये दुकान

राम नाम सत्य है
मुर्दा मगर मस्त है
जैसी बन चुकी हो जिसकी
शहर दर शहर श्मशान दर श्मशान
भूत प्रेतों के बीच
एक जबरदस्त पहचान

देखते हुऐ

जाते हुऐ
साल दो हजार बीस के
बनाये गये मुर्गों का
भूलना बाँग देना
और
दिखाई देना उनका
सपनों में भी
टाँग के नीचे से चोंच डालकर
कहते चले जाना
खींचो जरा जोर से खींचो
दो गज की दूरी बनाकर
अपने ना सही
पड़ोसी के ही कान

समझ में
आ ही गयी
ढोल पीटती अपनी बड़बड़ाहट
खींचती हुई नाक को
समझ कर झंडा देश का

मान कर फुसफुसाती हवा
कान में डालती जैसे मंत्र

अब तो बोल ‘उलूक’
जोर लगा कर
जय जवान जय किसान

अर्ध शतक पूरा हुआ
घबड़ाहट का ही मान लो
हड़बड़ाहट के साथ
बड़ी मुश्किल से

पता नहीं
कैसे
कम बोला इस साल
बमबोला बदजुबान ।

चित्र साभार: https://memegenerator.net/

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

तेरा लिखा जरा सा भी समझ में नहीं आता है कह लेने में क्या जाता है?

 

शिकायत है कि समझ में नहीं आता है

‘उलूक’ पता नहीं क्या लिखता है क्या फैलाता है 

प्रश्न है
किसलिये पढ़ा जाता है वो सब कुछ
जो समझ में नहीं आता है 

समझ में नहीं आने तक
भी ठीक है
नहीं आता है नहीं आता है
पता नहीं फिर
कोई इतना कोई क्यों गाता है 

पढ़ने की आदत अच्छी है
कुछ अच्छा पढ़ने के लिये
किसलिये नहीं जाता है
समझ में अच्छा लिखा
बहुत ही जल्दी चला जाता है 

घर से
मतलब रखता है
गली में हो रहे शोर से ध्यान हटाता है
शहर में बहुत कुछ होता है
अखबार में उसमें से थोड़ा तो आता है 

अखबार दो रुपिये का
अब कौन खरीदता है
बात बस
खबर और समाचार के बीच की
समझाता है बताता है 
समस्या और समाधान
बेकार की बातें हैं
व्यवधान
इसी से होता चला जाता है 

पैसा बहुत जरूरी है

हर महीने की
पहली तारीख को
आ गयी है
का
एस एम एस चला आता है 

किसलिये देखना
क्या होता है अपने आसपास
अपनी ही गली में पास की ही सही
रात में भी बहुत सारे
भौंकते चले जाते हैं कुत्ते गली के
कौन अपनी नींद
खराब करना चाहता है

‘उलूक’ तेरी तरह के बेवकूफ
नहीं हैं हर जगह
कूड़े कचरे पर लिखना
कौन सा गजब हो जाता है 

हम ना देखेंगे
ना देखने देंगे किसी को
अपनी आँख से कुछ भी आसपास अपने

तेरा लिखा
जरा सा भी समझ में नहीं आता है
कह लेने में
क्या जाता है?

चित्र साभार:
 http://search.coolclips.com/m/vector/cart1864/business/avoiding-getting-hit/

सोमवार, 30 नवंबर 2020

कुछ भी कभी भी कहीं भी सबके लिये नहीं चिट्ठे जिंदा रहें सभी हमेशा ही टिप्पणी जरूरी नहीं रहें कहीं भी

 



लगातार
एक लम्बे समय तक
एक जैसी ही बकवास
करते चले जाने के अनुभव
के प्रयोग
किसी प्रयोगशाला में
परखनली के अन्दर से
निकलते फूटते बुलबुले नहीं हो पाते हैं

ना ही कहीं
कोई रंग बदलता हुआ
नजर आता है
स्याही का पन्ने से लिपटते समय

कागजों के अनुभवों के
हिसाब से
कागज और कलम हैं कहीं
सोये हुऐ भी अगर

सपने
उतर कर चले आते हैं
उनके भी अब
यहीं स्क्रीन पर
सामने से टिमटिमाते से
उभरते शब्दों के साथ
टंकण के लिये
उंगलियों को भी आदत हो गयी हो
जिस मैदान पर नाचने की
यूँ ही बेमतलब

जहाँ
निरंतरता बनाये रखने के
जुगाड़ पर लगे हुऐ
लिखने वाले लेखकों कवियों से इतर
कुछ कथित
खुद को स्थापित करने में लगे हुऐ
रात के अंधेरे के सिपाही जाने जाने वाले

ठूँठ पर
समय बिता बिता कर
समय की भी ऐसी की तैसी
करने में लगे हुऐ
पक्षियों को
बदनाम
करने में लगे हुओं को
किस ने
क्या कहना है
और
कौन सा
उन के कहे लिखे से
सुबह होनी है
लिखने लिखाने की

बहुत जरूरी है
जिंदा रहना बकवास का
ताकि असल जिंदा रहे
कहीं
और किसी पन्ने में

पता तो चले लिखना इतना आसान नहीं है

कुछ भी कभी भी कहीं भी
लिख लिखा कर
दो चार दिन की छुट्टी कर लेने वाले को भी
सब पता होता है
रोज स्कूल खोलने
और कभी कभी खोल देने में
बहुत ज्यादा अन्तर नहीं होता है
कौन सा कर्ता पढ़ा करता है कुछ
कहीं अपने किये कराये के ऊपर लिखे को
और
कौन सा लिखे लिखाये से होता है
कहीं उजाला

लिखने वाला सोच ले
वो दिया है
उसी दिन से
हितैशी शुरु कर देंगे
दिखाना उसके नीचे की जमीन
अंधेरे वाली
समाज को बता कर
उसे चीनी माओ का रिश्तेदार
माओवादी मिआउँ मिआउँ

रहने दीजिये
धन्यवाद आपको आपने पूरा पढ़ा

फिर से धन्यवाद
उनको
जिनको समझ में आ पाया

बाकी
कुछ लिखना जरूरी है
जिंदा रहने के लिये
और
जिंदा रखने के लिये एक पन्ना

नहीं तो कई आये हैं
कई आ कर चले गये
ज्ञान देकर
चिट्ठाकारी के ऊपर

टिप्पणी
मत दीजिये
टिप्पणी गुनाह है
टिप्पणी का प्रचार नहीं।

 चित्र साभार: https://www.thebookdesigner.com/2013/08/3-blogging-mistakes/

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

चिट्ठे में चिपकाई जाने वाली पन्द्रह सौ पैंतीसवीं वर्ष दो हजार बीस की सैंतालिसवीं गद्य टाईप पद्य बकवास

 



लिखना
और
लिखे हुऐ पर
कभी किसी मनहूस घड़ी पर
किसी और दिन
दूसरी बार चिंतन करना
अदभुत होता है

लिखने वाले के लिये भी
और
लिखे हुऐ को दुबारा
पाठक के रूप में
पढ़े जाने के लिये भी

लिखते समय का
बेवकूफ
परिपक्व हो चुका होता है
जब पाठक हो कर
सामने आता है

अपना लिखा अपना पढ़ना
टिप्पणी भी
किसी की
मजबूरी में दी हुई

लेखक
टिप्पणी दे आया  
टिप्पणीकार की तरह
एक अनमोल रचना पर
बहुत सुन्दर की

सुन्दर से
बहुत सुन्दर होते हुऐ
लाजवाब से
गजब वाह से लेकर अदभुद

लिखना सफल

फिर
उसके बाद 
किसे कौन बताये कौन समझाये

लिखना पढ़ना छोड़
बातें करना इधर उधर की
लिखने को छोड़ कर बाकी सब

चिट्ठाकारी चिट्ठे ब्लागिंग में भी
चल रहा है
चलता रहा है
अंडरवर्ड
 
बहुत सारी कहानियाँ हैं

लेखन में भी हैं
दबँग
एक नहीं कई हैं ‘उलूक’

रात का प्राणी
दिन में भी देख लेता है

जय ब्लॉगिंग ।

चित्र साभार: https://in.pinterest.com/

रविवार, 22 नवंबर 2020

धुआँ धुआँ हो कहीं हो फिर भी

 



धुआँ धुआँ सा 
जरा सा सोच में 
चला आया आज 
पता नहीं क्यों 

कोई खबर 
कहीं आग लगने की 
सुबह के अखबार में नहीं दिखी 
फिर भी 

बहुत कुछ जलता है 
ना धुआँ होता है ना आग दिखती है कहीं 
राख भी हो जाती है राख तक 
नामों निशा नहीं मिलता है कहीं 
फिर भी 

सुलगना जरूरी है 
बस कोयले का ही नहीं 
हर एक सोच का भी 
कहीं भी थोड़ा सा ही सही 
आग भी हो और राख भी हो
दूर बहुत हो 
फिर भी 

अपनी सम्भलती नहीं गाय 
दूसरे की उजाड़ जाने की चिंता में 
गलता एक आदमी दिखता है 
होता हुआ धुआँ धुआँ 
नजर नहीं आता है कहीं 
फिर भी 

बहुत सारी आग 
बहुत सारा धुआँ 
सम्भालते लोग 
आग और धुऐं की बात 
आते ही कहीं 
बातों को 
पानी और दूध की ओर 
टालते लोग 
फिर भी 

पागल ‘उलूक’ अंधा ‘उलूक’
 बेशरम ‘उलूक’ 
दिन में रात 
और रात में दिन की 
बातें करता ‘उलूक’ 
धुआँ और आग 
या आग और धुऐं की 
बातों को सम्भालता ‘उलूक’ 
फिर भी 

 फायर ब्रिगेड जरूरी है पता है 
आग हो या धुआँ हो फिर भी 
बेफिकर होकर 
चुटकुलों के साथ 
आग और धुआँ 
मुँह से निकालता ‘उलूक’ 
सिगरेट का धुआँ हो या 
धुआं यूं ही धुआं धुआं 
फिर भी 

चित्र साभार: http://clipart-library.com/s

रविवार, 15 नवंबर 2020

शुभ हो दीप पर्व उमंगों के सपने बने रहें भ्रम में ही सही

 


हर्षोल्लास
चकाचौँध रोशनी
पठाकों के शोर
और बहुत सारे
आभासी सत्यों की भीड़

 बीच से
गुजरते हुऐ
कोशिश करना
पंक्तियों से नजरें चुराते हुऐ
लग जाना
बीच के निर्वात को
परिभाषित करने में

कई सारे भ्रमों से झूझते हुऐ
 व्यँग खोजना
उलझन भरी सोच में

और लिख देना कुछ नहीं

इस कुछ नहीं लिखने
और कहीं
अन्दर के किसी कोने में बैठे
थोड़े से अंधेरे को
चकाचौँध से घेर कर
कत्ल कर देने की
सोच की रस्सियाँ बुनना

इंगित करता हुआ
महसूस कराता लगता है
समुद्र मंथन इसी तरह हुआ होगा 
 निकल कर आई होंगी
लक्ष्मी भी शायद

आँखें बंद कर लेने के बाद
दिख रहे प्रकाश को
दीपावली कहा गया होगा

लिख देना
और फिर लिखे के अर्थ को
खुद ही खुद में खोजना
बहुत आसान नहीं

फिर भी
इशारों इशारों में
हर किसी का लिखा
इतना तो बता देता है
लिखा हुआ
सीधे सीधे
सब कुछ बता जायेगा
सोचना ठीक नहीं

अंधेरा है तो प्रकाश है
फिर किसलिये
छोटे से अँधेरे को घेर कर
लाखों दियों से मुठभेड़

यही दीपावली है
यही पर्व है दीपों का

कुछ देर के लिये
अंधेरे से मुँह मोड़ कर बैठ लेने
और खुश हो लेना
कौन सा बुरा है ‘उलूक’

कुछ समझना
कुछ समझाना
बाकी सब
बेमतलब का गाना

फिर भी
बनी रहे लय
कुछ नहीं
और कुछ के
बीच की
जद्दोजहद के साथ

शुभ हो दीप पर्व
उमंगों के सपने बने रहें
भ्रम में ही सही।


चित्र साभार:
https://medium.com/the-mission/a-practical-hack-to-combat-negative-thoughts-in-2-minutes-or-less-cc3d1bddb3af

शनिवार, 14 नवंबर 2020

बकवासी ‘उलूक’ फिर से निकली है धूप अँधेरे से निकल दीवाली दिन में सही कुछ नया कर ही डाल

 


चल
कुछ तो निकाल

बहुत दिन हो गये
अब
कुछ भी सही
आज
फिर से लिख डाल 

आदत
रोज बकने की ना दबा

कब्र खोद
हड्डियाँ शब्दों की सही
मरी ही निकाल 

फटी
जेब ले खंगाल

बड़े नोटों को दे
श्रद्धाँजलि
चिल्लर ही सही
तबीयत से उछाल 

सम्भाल दे
ना अनकही
कूड़ा कूड़ा हो कमाल

सड़े को
फिर ना सड़ा
मसाला कुछ मिला

अचार ही सही
कुछ तो बना डाल 

जन्मदिन
बापू चाचा ताऊ

बहुत हो गये
नया शगूफा निकाल

दिवाली मना
पठाके ही नहीं 
सब कुछ जला डाल

कहाँ है कॉरोना
किस बात का है रोना

मुँह खोल हाथ मिला
गले मिल प्यार जता

किस बात की
नाराजगी
भीड़ जुलूस ही सही
पहन सर ही पर रुमाल

उल्लुओं की कथायें
उल्लू की जुबानी

पंडाल
एक लगा
बातें बना कर उड़ा
कुछ दावतें ही दे डाल 

बहुत
हो चुकी सच्चाई 
झूठ के पैर दिखा डाल

डट ले
गद्दी सम्भाल
बहुत दिन रह लिया चुप
चल
बड़ी जीभ निकाल
 
रोज का रोज ना कही
हफ्ते पंद्रह दिन
ही सही
कुछ तो कर बबाल

चल
कुछ तो निकाल
बहुत दिन हो गये
अब

कुछ भी सही
‘उलूक’
आज फिर से
कुछ तो लिख डाल ।

चित्र साभार: https://pooh.fandom.com/

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

लिखना फिर शुरु कर ‘उलूक’ लिखे पर लम्बाई के हिसाब से भुगतान किये जाने की खबर आ रही है

 

लिखना
और
सुबह सवेरे
समय पर उठना
एक जैसा हो लिया है 

कुछ
समय से
आदतें सारी
यूँ ही
खराब होती जा रही है 

सारा
बेतरतीब
वहीं का वहीं रह गया है 

सपना
आसमान का एक
जमीं पर खुद सो लिया है 

कूड़े के डिब्बे को
रोज खाली करने की
याद
नहीं आ रही है 

सफेद में काला
और
काले में
कुछ सफेद बो लिया है 

सफेद पन्नों की देखिये
कैसी
मौज होती जा रही है

स्याही ने खुद को
कुछ सफेद सा रंग लिया है 
सारी सफेदी
सफेदों के सामने से
सफेद सफेद चिल्ला रही है 

लिखना लिखाना
अँधेरे में खुद ही खो लिया है 
स्याही काली
अपने काले शब्दों को पी जा रही है 

शब्दों को पता नहीं
क्यों इतना नशा हो लिया है 
स्याही
कलम के पेट में
अलग से लड़खड़ा रही है 

लिखना भूल जाना
बहुत अच्छा है
कोई भूल ही गया है 

भरे कूड़े के
डब्बे के अंदर से
घमासान
होने की आवाजें आ रही हैं 

फीते से
कलम के साथ पन्ने
कई सारे
नाप लिया है ‘उलूक’ 

लिखे लिखाई की
प्रति मीटर लम्बाई
के हिसाब से
भुगतान किये जाने की
खबर आ रही है। 

चित्र साभार: https://www.smashingmagazine.com/

रविवार, 11 अक्तूबर 2020

बाढ़ थमने की आहट हुई नहीं बकवास करने का मौसम आ जाता है

 

वैसे तो
सालों हो गये अब

कुछ नहीं लिखते लिखते

और ये कुछ नहीं अब

शामिल हो लिया है
आदतों में सुबह की
एक प्याली जरूरी चाय की तरह

फिर भी इधर कुछ दिनों
कागजों में बह रही
इधर उधर फैली हुई
बहुत कुछ की आई हुई बाढ़ से
बचने बचाने के चक्कर में

कुछ नहीं भी
पता नहीं चला कहाँ खो गया 
है

होते हुऐ पर कुछ लिखना
कहाँ आसान होता है

हमेशा
नहीं हुआ कहीं भी
ही आगे कहीं दिख रहा होता है

अब
दौड़ में शुरु होते समय पानी की

हौले हौले से कुछ बूँदें
नजर आ ही जाती हैँ 

देख लिया जाता है
इंद्रधनुष भी बनता हुआ कहीं
किसी कोने में छा सा जाता है 

कुछ के होते होते बहुत कुछ

शुरु होता है ताँडव
बूंदों का जैसे ही

पानी ही
पता नहीं चलता है
कि है कहीं
सारा बहुत कुछ खो सा जाता है

जैसे नियाग्रा 
जल प्रपात से गिरता हुआ जल
धुआँ धुआँ
होना शुरु हो जाता है

‘उलूक’ भी
गहरी साँस खींचता सा कहीं से

अपनी
देखी दिखाई सुनी सुनाई पर
बक बकाई ले कर
फिर से हाजिर होना
शुरु हो जाता है। 

चित्र साभार: https://www.gettyimages.co.uk/

बुधवार, 30 सितंबर 2020

लिखने की बीमारी है इलाज नहीं है चल रही महामारी है है तो मुमकिन है है कहीं किसी लौज में है

 


किस बात का है रोना कहाँ है कोरोना 
सब हैं तो सही और भी मौज में हैं
डर है बस कहीं है खबर में है
खबर अखबार में है
वीर हैं बहुत सारे हैं सब फौज में हैं

दिख नहीं रहा है गिनती कर रहा है
छुपा है घर में और सब की खोज में है
गुलाब उसकी सोच में है
कांटे खुद की सोज में हैं
बात है जो है बस रोज (गुलाब) में है

समझ सब की अपनी है
बात बस खाली हवा में रखनी है
सच है कहीं है किसी हौज में है 

नाटक जरूरी है
तन्खवाह लेकिन
हर पहली तारीख को
खाते में आना बहुत जरूरी है 

हस्पताल है
पर्ची है
चिकित्सक है
बिना बिमारी मरी महामारी है
मुर्दे हैं सारे भोज में हैं

सब को पता है
हर आदमी
कहां है पूछता फिर रहा है
उसकी मजबूरी है
सोच है नोज (नाक) में है

लिखना
‘उलूक’ का
उसकी बीमारी है
इलाज है नहीं
चिकित्सक की कमजोरी है
सारे हैं
सैल्फी की पोज में हैं ।


चित्र साभार: https://www.aegonlif

शनिवार, 26 सितंबर 2020

चिट्ठों के बीच बारह साल/ नवें महीने की चालीसवीं बकवास/ जरा बच के/ नजूल है/

 


याद करने की कोशिश है 
 फजूल है 

क्या लिखा कितना लिखा
लिखा लिखाया सारा सब है
बस है
ऊल जलूल है 

कवियों कथाकारों के बीच
घुस घुसा कर
करतब दिखाता रहा
एक जमूरा बिन मदारी 
ये सच है
कबूल है

कविता कहानियों की दौड़
होती रही है 
होती रहेगी हमेशा 
शामिल होने का निमंत्रण है
डर है इतना है
बबूल है

लिखने को गिनना गिनकर फ़िर लिखना 
एक आदत हो चली है
लिखना लिखाना अलग बात है
गिनना गिनाना जरूरी है
मकबूल है

लेखक लेखिका
यूँ ही नहीं लिखा करते 
कुछ भी कहीं भी कभी भी
हर कलम अलग है स्याही अलग है
पन्ना अलग है बिखरा हुआ है
कुछ उसूल है

लिखना उसी का लिखाना उसी का
गलफहमी कहें
कहें सब से बड़ी है
भूल है

‘उलूक’
पागल भी लिखे किसे रोकना है
बकवास करने के पीछे
कहीं छुपा है
रसूल है।

चित्र साभार: https://www.clipartkey.com/

रविवार, 20 सितंबर 2020

खाली लिखने लिखाने से कुछ नहीं होना है गिरोह खुद ही होना होगा या किसी गिरोह में शामिल होना ही पड़ेगा

 


आसान
नहीं होता है
एक गिरोह हो जाना

बहुत
मुश्किल है
बिना गिरोह में शामिल हुऐ
कुछ
अपने मन से
सही कुछ
कहीं कर ले जाना

जमाना
आज गिरोहों का है

सरदार कौन है
कौन सदस्य है
किसे पूछना है

अपनी इच्छा से हो सके
कोई
अपने फायदे का काम बस यही सोचना है

गिरोह
हो जाने के
कोई नियम कायदे नहीं होते हैं

क्रमंचय या संचय का
प्रयोग करना होता है
काम कैसे हो जायेगा
बस यही सोचना और यही देखना होता है

बाहर से चेहरे में लिखा
बहुत कुछ नजर आये तब भी
आँख बंद कर
उससे कहीं पीछे की ओर देखना होता है

दल
दल बदल
झंडा डँडा सब दिखाने के होते हैं
काम कराने के तरीके के रास्तों के
अलग कुछ फसाने होते हैं

अकेला आदमी
कुछ अच्छी सोच लिये
अच्छे काम कर पाने के सपने खोदता है

उसी आदमी की
अच्छाई की तस्वीर को
कहीं एक गिरोहबाज
तेल पोत लेने के फसाने ढूंढता है

अच्छे अच्छा और अच्छाई
अभिशाप हो लेते हैं
तेल पोतने वाला
किसी और गिरोह का सहारा ले कर
अच्छाई की कबर खोदता है

जमाना गिरोह
और
गिरोहबाजों का चल रहा है

समझदार
कोई भी
अपने हिसाब के किसी गिरोह के
पैर धोने के लिये
उसके
आने जाने के ठिकाने ढूंढता है

‘उलूक’ कुछ करना कराना है तो
गिरोह होना ही 
पड़ेगा

खुद ना कर सको कुछ
कोई गल नहीं
किसी गिरोहबाज को
करने कराने के लिये
कहना कहाना ही 
पड़ेगा

हो क्यों नहीं लेता है
कुछ दिन के लिये बेशरम
सोच कर अच्छाई 

हमाम में
सबके साथ नहाना है  
खुले आम कपड़े खोल के
सामने से तो आना ही पड़ेगा।


चित्र साभार: https://clipart-library.com/
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बुधवार, 16 सितंबर 2020

लाशें जिंदा रहना बहुत जरूरी हैं मरे हुऐ लोगों के जिन्दा समाचारों लिये हमेशा

 

एक पुड़िया सफेद पाउडर मिला है

उस जगह पर जहाँ चॉक ही चॉक
पायी जाती रही है हमेशा से डिब्बा बन्द

अलग बात है
कहीं जरा सा भी नहीं घिसी रखी है इतिहास बनाने के लिये भी

हम सब
उसी को घिसने की रोटियां तोड़ते रहें हैं सालो साल

और कुछ
इसी की सफेदी को बिना छुवे हो लिये हैं बेमिसाल
खरीदे हैं जिन्होंने कई सम्मान अपने नाम से
अखबार साक्षी रहे हैं

अपनी नाकामियां लिखना आसान नहीं है

अखबार वाले के किये गये प्रश्न के उत्तर दिये गये हैं
किस तरह तराशे हुऐ निकलें
कल सुबह तक कुछ कहना ठीक नहीं है

और वैसे भी जो छपा आ जाता है
उसके बाद कहाँ कुछ किया जाता है

बहुत कुछ होता है आसपास कुछ अजीब सा हमेशा ही

अब हर बात कहाँ किसी अखबार तक पहुँचती है
और जो पहुँचाई जाती है कुछ दस्तखतों के साथ
उसकी तसदीक करने कभी कोई आता भी नहीं है

हमाम के अन्दर के कपड़े के बारे में पूछे गये प्रश्न
नाजायज हैं कह कर
खुद अपनी तस्वीर अपने ही आइने की
किसी को भी दिखा लेने की
आदत कभी बनी भी नहीं है

उलूक
चिड़िया कपड़े ना पहना करती है
ना उसे आदत होती है बात करने की नंगई की
उसकी जरूरत भी नहीं होती है

हम सब कर लेते हैं खास कर बातें कपड़ों की

और ढकी हुई उन सारी लाशों की
जिनकी खुश्बू पर कोई प्रश्न नहीं उठता है

आज के समाज में
लाशें जिंदा रहना बहुत जरूरी हैं
मरे हुऐ लोगों के जिन्दा समाचारों के लिये हमेशा ।

चित्र साभार:
https://twitter.com/aajtak

शनिवार, 12 सितंबर 2020

कूड़े पर तेरा लिखना हमेशा कूड़ा कूड़ा जैसा ही तो होना है





कितना भी लिखें कुछ भी लिखें
कल परसों भी यही सब तो होना है 

नये होने की आस बस जिंदा रखनी है
 पुराना हुआ रहेगा भी
उस की खबर को अब कब्र में ही तो किसी सोना है 

वो करेगा कुछ नहीं
करे कराये पर कुछ ना कुछ उल्टा सीधा ही तो उसे कहना है 

देखने के लिये
तैयार तो किये जा रहे हैं मैदाने जंग शहर शहर
वहां जंग छोड़ कर
और कुछ अजीब सा ही तो होना है 

आदत डालनी ही पड़ेगी
डर के साथ जीने की
पढ़ाना तो किसी पुराने वीर की कहानी ही है
अभी के समय का तो बस रोना है

समझ में तब आये किसी के
जब कोई समझना चाहे
खुद ही मौज में दिखते है सारे जवान आज
कंधे अपने दे कर किसी कोढ़ी को तारने की बन के सीढ़ी
चढ़ कर ऊपर
मारनी है लात सबसे पहले सीढ़ी को गिराने के लिये उसने भी
एक बार नहीं
बेवकूफों के साथ हर बार तो यही होना है

दिखता है सामने से
होता हुआ भ्रष्टाचार बड़े पैमाने का
सुनना कौन चाहता है
मुखौटा ओढ़ा हुआ देशभक्त देशप्रेमी के करे धरे का

किसी के पास कहाँ समय है
कहाँ किसे इस सब के लिये सोचना है
रोने के लिये रखा है सामने से कोरोना है

‘उलूक’
तेरी बुद्धि तेरा सोचना तेरा नजरिया
बदलना तो नहीं है
तेरे लिये कूड़े पर तेरा लिखना
हमेशा
कूड़ा कूड़ा जैसा ही तो होना है।

चित्र साभार: http://www.clker.com/
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Alexa Traffic Rank World: 120598 इंडिया: 11696 12/09/2020 08:15 पी एम 
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रविवार, 6 सितंबर 2020

कभी यूँ ही कुछ भी लिख दिया भी जरूरी है सामने रखना अपने ही आइने के : मुआफ़ी के साथ कि कूड़ेदान का ढक्कन बंद रखना चाहिये लेखकों ने अपने घर का

 

सारे मोहरे शतरंज के
चौसठ खानों से बाहर निकल कर
सड़क पर आ गये हैं 

और
एक हम हैं

खुद ही कभी एक घर चल रहे हैं
और कभी
ढाई घर फादने के लिये
उँट के लिबास
शतरंज खेलने वाले के लिये ही
उसके घर तक
सड़क सड़क बिना जूते बिना चप्पल
यूँ ही कोने कोने कील ठोक कर बिछा गये हैं

शतरंज की बिसात की सीढ़ी
बनाने की सोच लिया एक प्यादा साथ का
एक पायदान ऊपर कूद कर

कब वजीर हो गये पूछने पर
कह लिये

सुबह के अखबार के समाचार देखते क्यों नहीं
ब्यूरो चीफ को सलाम कर लिया करो
कई बार कहा सुना नहीं तुमने

पता चलना जरूरी है
देख लो
अपनी औकात में आये की नहीं
बस सुनाने आ गये

लिखने वाले लिखते रहे हैं
लिखेंगे भी औने पौने कहीं किसी कोने में
किसे देखना है किसे पढ़ना है

दीवारों पर लिखी बातों के जमाने गये
बहुत खूबसूरत से स्क्रीन बिस्तरों के पास
बहुत नजदीकियाँ लिये छा गये

 ‘उलूक’
लिख लिया करना चाहिये रोज का रोज
कम से कम एक दिन छोड़ कर

पता नहीं चल रहा हो जब
घर के लोग ही
कब पाकिस्तानी हुऐ

और
कब किस घड़ी
पब जी का चेहरा ओढ़े हुऐ

तिरंगे झंडे पर बैठे हुऐ
महाभारत के हनुमान बन कर जैसे
हवा पानी मिट्टी में जमीन के तक छा गये।

चित्र साभार: https://www.presentermedia.com/
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शनिवार, 5 सितंबर 2020

उजाले पीटने के दिन थोड़ा अंधेरा भी लिखना जरूरी था बस लिखने चला आया था

 


कल दूरभाष पर
बात हुई थी
उसने बताया था वो बहुत रोया था
क्या करूँ
समझ नहीं बस पाया था
घर के लोगों से साझा करने का साहस नहीं कर पाया था

दिया मानता रहा था हमेशा
बस लौ की रोशनी ही समझ पाया था

सकारात्मक रहने फैलाने बाँटने दिखाने के दिन के पहले दिन
वो अपनी सारी यँत्रणाये सुनाने के लिये कुछ सोच कर यूँ ही चला आया था

बहुत सारा अँधेरा दिये के नीचे का
दिया भी कहाँ किसी से कभी बाँट पाया था
वो जो कह रहा था सारा सब तो बहुत ही साफ और खुला था
पहले से पता था
जमाना और जमाने के आज का शिक्षक
बहुत कुछ नया सीख चुका था
धोती झोले की सोच बहुत पीछे कहीं छोड़ आया था

शोध करने की प्रबल इच्छा और मेहनत से प्राप्त कर चुका उपाधियाँ निर्धारित
एक छोटे से गाँव से निकल कर बहुत दूर चकाचौँध भरे शहर तक पहुँच पाया था
उसे कहाँ पता था पहला मील का पत्थर
शिक्षक की महत्वाकाँक्षाओं ने ही
किसी एक दल की सदस्यता की पर्ची को उसके हाथ में थमाया था

बहुत कुछ जरूरत से ज्यादा मिलने के बावजूद भी
पैसे की भूख की बीमारी से ग्रसित हो जाना भी
वो नहीं देख और समझ पाया था

दिया लेकिन देखना शुरु कर चुका था
रोशनी अपने सामने के दिये की
और उसके नीचे के अंधेरे में
एक एक करके जाते कई दिये भविष्य के
यंत्रणायें झेलने के लिये बस सालों साल

उलझते निपटते लगते निखर कर निकलते
कोई भी कहाँ समझ पाया था

तेरे ही एक दिन के पहले दिन ‘उलूक’
तेरा ही प्रिय तेरी ही एक दास्ताँ लेकर तेरे पास आया था

पुरुस्कारों की बारिशों के मेले के बीच उसके रोने को सुनकर
तू भी कहाँ जरा सा भी रो पाया था

उजाले पीटने के दिन थोड़ा अंधेरा भी लिखना जरूरी था
बस लिखने चला आया था।

चित्र साभार: https://www.thestatesman.com/

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Alexa Traffic Rank 129939 Traffic Rank in इंडिया 12332 05/09/2020 के दिन 09:55 एएम 
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मंगलवार, 1 सितंबर 2020

लिख ही लें थोड़ा सुकून इधर से लेकर उधर तक फैल चुके हों जहाँ जर्रा जर्रा बेजुबान

 

डा० कफ़ील खान

भगवान जी और अल्ला मियाँ
का तो पता नहीं 
पर सुबह अच्छी खबर मिली और अच्छा लगा

पता नहीं किसे सुनाई दी
किसे कुछ भी
अब भी पता नहीं चला 

आदमी के आदमी ने आदमी पर
लगा कर इल्जाम बता कर गुनाहगार 

बोल कर कुछ
दिखा कर कर गया जैसे कोई
शब्दों से कत्लेआम 

कर दिया गया अन्दर
बिना पूछे बिना देखे हथियार और कत्ल का सामान 

लगा दी गयी धारायें
एक आदमी पर सारी सभी भीड़ की 
मानकर उसे एक नहीं कई कई आदमी एक साथ
जैसे हो एक जगह उगाये खुद की ही हजारों जुबान 

फ़िर आदमी ने ही कर दिया इन्कार
देने से सजा झूठ की
कुछ बचा हुआ होगा वहाँ शायद इंसान 

‘उलूक’ काट लिये दिन सैकड़ों
काल कोठरी में बेगुनाह ने

सजा कौन देगा यंत्रणा देने वाले गुनहगार को
कौन सा अल्ला या कौन सा भगवान ?


चित्र साभार: https://www.gograph.com/
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Alexa Traffic Rank 130398 Traffic Rank in इंडिया 12663 01/09/2020 के दिन 9:25 पीएम 
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रविवार, 30 अगस्त 2020

यूं ही लिख कभी बिना सोचे बिना देखे कुछ भी आसपास अपने लाजवाब लिखा जाता है

 


डस्टबिन
मतलब कूड़ेदान

अब
कूड़ा कौन दान करता है
और
कौन ग्रहण
ये तो पता नहीं

पर बजबजा जाता है

ढक्कन
ऊपर उठना शुरु हो जाता है

कितनी भी
कोशिश करो
ना जिक्र किया जाये
कुछ अलग से अच्छा सा कहा जाये

पर कैसे

देखना सुनना महसूस करना
बन्द ही नहीं किया जाता है

कुछ अच्छा
खुद ही कूड़े से परेशान
किसी किनारे से निकल कर

शुद्ध हवा पानी खोजने के लिये
रेगिस्तान में आज के निकल जाता है

उस अच्छे के हाथ कुछ लगता है पता नहीं

पर
सामने से बचे हुऐ कूड़े पर बहुत प्यार आता है

और
लाजवाब कहलाये जाने लायक
लाजवाब सुन्दर बहुत खूब लिख लिया जाता है

लेखक
छंद बंद छोटी कहानी लम्बी कविता
समीक्षा टिप्पणी

साहित्य की
लगी हुई कतार को कूँद फाँद कर
हवा हवाई गुब्बारे बैखौफ उड़ाता है

उसे ना शर्म आती है
ना किसी का लिहाज रह जाता है

कौन समझाये
मूल्यों को समझना परखना लागू करना
स्वयं के ऊपर
इतना आसान नहीं हो पाता है

जितना काले श्यामपट के ऊपर
सफेद चॉक से लकीरें खींच कर लिख लिखा कर
गीले कपड़े से तुरत फुरत पोंछ भी दिया जाता है

लिखने लिखाने पढ़ने पढा‌ने का भी संविधान है ‘उलूक’

पता नहीं किसलिये
तुझे सीमायें तोड़ने में मजा आता है

कोशिश तो कर किसी दिन
दिमाग आँख नाक मुँह बंद करना
और फिर
बिना सोचे समझे कुछ लिखने का

 देख
फिर अपने लिखे लिखाये को

बस
देख कर ही
कितना नशा होता है

और
कितना मजा आता है। 

चित्र साभार: https://www.rediff.com/getahead/slide-show/
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बुधवार, 26 अगस्त 2020

सोच तो थी बहुत कुछ लिखने की लेकिन लगता नहीं है उसमें से थोड़ा सा कुछ भी लिख पाउँगा कहीं

 


सारी जिन्दगी निकल गयी
लेकिन लगने लगा है
थोड़ी सी भी आँख तो अभी खुली ही नहीं 

अन्धा नहीं था लेकिन अब लग रहा है
थोड़ा सा भी पूरे का
अभी तो कहीं से भी दिखा ही नहीं 

नंगा और नंगई सोचने में
शर्म दिखाने के बाद भी बहुत आसान सा लगता रहा
बस कपड़े ही तो उतारने हैं कुछ शब्द के
सोच लिया

अरे क्या कम है
बस ये किया और कुछ किया ही नहीं 

परदे बहुत से
बहुत जगह लगे दिखे लहराते हुऐ हवा में
कई कई वर्षॉं से टिके
खिड़कियाँ भी नहीं थी ना ही दरवाजे थे
कहीं दिखा ही नहीं 

क्या क्या कर रहे हैं
सारे शरीफ़
अखबार की सुबह की खबर और पेज में दिखाई देने वाले

जब बताने पै आ जाता है एक गरीब
तब शर्म आती है आनी भी चाहिये
बहुत लिख लिये गुलाब भी और शराब भी

लिख देने वाला सच
बेशर्मी से जरा सा भी तो
‘उलूक’
कहीं भी
आज तक लिखा ही नहीं।

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

ulooktimes.blogspot.com २६/०८/२०२० के दिन 

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शनिवार, 22 अगस्त 2020

हम लोगों की छवि बनाते हैं लोगों के बारे में लोगों को घर घर जा जा कर समझाते हैं

 
हजूर आप करते क्या हैं

हम करते तो हैं कुछ
लेकिन उस करने का बस वेतन खाते हैं 

बाकि काम बहुत हैं
धन्धों के अंदर के कुछ धन्धों की बात बताते हैं

पता नहीं समझेंगे भी या नहीं
हम लोगों की छवि बनाते हैं
फिर उसे सारे समाज में फैलाते हैं 

वो बात अलग है
अपने घर के सारे आईने
कपड़े में लपेट कर नदी में बहा आते हैं 

हमें अपना चेहरा याद नहीं रहता है
हम सामने वाले का चेहरा चेहरों को याद दिलाते हैं 

समाज नहीं देखता है हमें
हराम की खाते हुऐ सालों साल तक 
हम काम में लगे हुऐ किसी भी आदमी को
हराम का खा रहा है की कहानी का नायक बनवाते हैं 

जमाना हम से चल रहा है
हम जमाने को चलाते हैं 
हम से नहीं चल पाता है जो भी
उसका चलना फिरना बन्द करवाते हैं 

हमारी फोटो अखबार वाले
हमारे घर से ले जाते हैं
सुबह की खबर हम ही छपवाते हैं 
शाम होते ही साथ बैठते हैं हम और वो
काँच के कुछ गिलास टकराते हैं 

बदनाम हम नहीं हो सकते हैं कभी भी
हम बदनाम करवाते हैं 
धन्धे कहाँ बन्द हो रहें हैं हजूर
हम धन्धों के अन्दर भी धन्धे पनपाते हैं 

‘उलूक’ तू लिख और लिख कर इधर उधर चिपका 
हम तेरे जैसे एक नहीं
कई की अपने हिसाब से छवि बना कर
दीवार दीवार चिपकाते हैं 

हम छवि बनाते हैं
हम छवि बना बना कर फैलाते हैं
खुली आँखों पर परदे डलवा कर उजाला बेच खाते हैं । 

चित्र साभार: https://www.canstockphoto.com/

ulooktimes.blogspot.com २३-०८-२०२०

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मंगलवार, 18 अगस्त 2020

तो बेशरम उलूक कब छोड़ेगा तू लिखना बकवास छोड़ ही दे ये नादानी है

 

अरे 
सब तो
लिख रहे हैं 
कुछ ना कुछ 
मेरे लिखे से क्या परेशानी है 

मैं तो
कब से
लिख रहा हूँ 
मुझे खुद पता नहीं है 
मेरे लिखे लिखाये में कितना पानी है 

मेरे
लिखने से
किसलिये परेशान हैं 

आपके लिये
उठाने वाले  कलम
गिन लीजियेगा हजूर

हर
डेढ़ शख्स
फिदा है आप पर 
बाकी आधा
है या नहीं भी किसलिये सोचना 
है

लिख दीजियेगा
आँकड़े की कोई बे‌ईमानी है 

मेरा लिखना
मेरा देखना
मेरी अपनी बीमारी है 

अल्लाह करे
किसी को ना फैले
ये कोरोना नहीं रूमानी है

सब
देख कर लिखते हैं
फूल खिले अपने आसपास के 
झाड़ पर
लिखने की
मेरे जैसे खड़ूस ने खुद ही ठानी है 

सब अमन चैन तो है
सुबह के अखबार क्यों नहीं देखता है 

कहाँ भुखमरी है
कहाँ गरीबी है कहाँ कोई बैचेन है 

तेरे शहर की
हर हो रही गलत बात पर
नजर डालने वाला

जरूर
 कोई चीनी है
या पाकिस्तानी  है

पता नहीं
क्या सोचता है
क्या लिखता है
पागलों के शहर का एक पागल
काँग्रेस और भाजपा तो
आनीजानी है 


शहर
पागल नहीं है
हवा पानी में
कुछ मिला कर रखा है किसी ने
ना कहना
कितनी बेईमानी 
है 

कत्ल से लेकर
आबरू लूटने की भी 
नहीं छपी
इस शहर की कई कहानी है 


कोई
कुछ नहीं
कहता है यहाँ ‘उलूक’
यही तो
एक अच्छे शहर की निशानी है 


चित्र साभार: https://nohawox.initiativeblog.com/

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

अथ श्री बरगद कथा

 पता
नहीं चलता है 

मगर
कुछ लोग
समय के साथ
बरगद हो जाते हैं

ऐसा नहीं है
कि लोग
 बरगद होना नहीं चाहते हैं 

लोग
जन्म से 
बरगद ही होते हैं

बस
उगना
फिर बड़ा हो कर
विशाल आकार लेकर
आसमान और जमीन के बीच
फैल जाना

सब नहीं कर पाते हैं

कुछ
बरगद होकर
शुरु कर देते हैं

दूसरों को बरगद बनाना

इसे
 कार्यक्रम कहें या क्रियाकर्म
फर्क
ज्यादा नहीं होता है

पूरा ढिंढोरा
पीटा जाता है
समाज के हर बरगद हो चुकों को
न्यौता भेजा जाता है

नींव रखी जाती है
एक करोड़
बरगद के जंगल बनाने
और
सामाजिक पर्यावरण को बचाने

फिर
मजबूत किये जाने के
सपने दिखा कर
दूरगामी उद्देश्य का
एक बहुत बड़ा खाका
पेश किया जाता है

सांयकालीन सत्र में
अखबारी बरगदों के साथ
संगीतमय समां बंधवा कर
सुबह की खबरों का
ठेका दिया जाता है

ये सारा
खुलेआम किया जाता है
जोर शोर से पर्दे उखाड़ कर
प्रचारित प्रसारित किया जाता है

सभा समाप्त होती है
पर्दा गिरा दिया जाता है 

अब शुरु होता है
आकृष्ट करना
लोगों को
बरगद हो लेने के सुनहरे मौके का

एक
बरगदी सपना
फैलाया जाता है 
बरगद बनाने शुरु किये जाते हैं

सबसे पहले
जमीन की मिट्टी से
उसे अलग किया जाता है

चारों ओर से घेर कर
थोड़ी मिट्टी थोड़ा पानी थोड़ी हवा
की जगह में

एक
गमले में
बरगद होने के लिये
छोड़ दिया जाता है

समय काटने
के इन्तजामात
किये जाते हैं

बीच बीच में
पूरा जवान हो चुके
बरगद का चित्र दिखाया जाता है

ध्यान
बंटते ही
बढ़ते पनपते
जवान बरगद की
बढ़ती शाखाओं और जड़ों को
कलम कर दिया जाता है

बरगद बनता है
समय निकलता है 

बरगद
कब बोनसाई हो गया
‘उलूक’ 
बस ये
कोई नहीं जान पाता है

बस
ऐसे ही किसी दिन
एक नया
कोई
बरगद होने के सपने के जालों में
फंस कर चला आता है

बोनसाई
उखाड़ कर
कहीं फेंक दिया जाता है

एक
नया सपना
उगने फैलने
फिर
छंटने कटने के लिये
प्रस्तुत हो जाता है

अखबार सुबह का
 बरगद बनाने
और
जंगल उगाने के लिये
किसी को
सरकारी सम्मान मिलने के
समाचार से
पटा नजर आता है ।

चित्र साभार: https://www.patrika.com/

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१४/०८/२०२० को
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बुधवार, 12 अगस्त 2020

बन्द दिमाग एक जगह गुटरगूँ करते हुऐ नजर आयेंगे अपनी सोच ले तू कहाँ जायेगा

 

ऐ कबूतर 
कौओं के बीच घिरा रहता है 
काँव काँव 
फिर भी नहीं सीखता है 
बस अपनी 
गुटुर गूँ करने में लगे रहता है 

बहुत दिन 
नहीं चलने वाली है 
तेरी ये मनमानी 
कौओं के राजा ने 
पता होना चाहिये तुझे भी 
है कुछ अपने मन में करने की ठानी 

सारे कौए 
सफेद रंग में रंग दिये जायेंगे 
मोटी चौंच के कबूतर हर तरफ हर जगह 
नजर गढ़ाये नजर आयेंगे 

कबूतर के लिये 
खाली सारी जगहों पर 
कौऐ कबूतर बना कर भर दिये जायेंगे 

कबूतर कबूतर से 
चौंच लड़ाते 
गुटरगूँ गुटरगूँ करते बैठे ठाले 
अपने घौंसलों में 
पंजे लड़ाते नजर आयेंगे 

सीख 
क्यों नहीं लेता है 
थोड़ा सा कौआ हो जाना 
जमाने के साथ चलना 
एक नयी भाषा सीखना 
द्विभाषी हो विद्वानों में गिना जाना 

कबूतर हो कर भी 
कौओं के साथ नजर आयेगा 
बड़ा नहीं भी मिलेगा 
थोड़ा छोटा ही सही 
टुकड़ा कटे मुर्गे की टाँग का 
हाथ में आ पायेगा 

इज्जत बढ़ेगी अलग से 
कौओं के समाज में 
अखबार वाला भी 
तेरे लिये एक बड़ी 
फर्जी खबर छापने में 
देरी नहीं लगायेगा 

क्या फायदा वैसे भी
कबूतर बने रहने में 
उस जगह 
जहाँ किसी पीर के 
बकरी चरखा तकली का 
नाम तक 
जान बूझ कर मिटा दिया जाता हो 
हजारों करोड़ खर्च कर 
बीट करने के लिये 
एक मूरत खड़ी करके 
सरेआम खुले आसमान के नीचे 
कबूतरों को रिझाने के लिये 
रख दिया जाता हो 

समय खराब है 
नहीं कह देना 
कहीं कभी भूल कर भी 

सारे 
अच्छे समय के नशे में मदहोश 
अच्छी सोच के कबूतर हो चुके 
कौओं के द्वारा 
उसी समय नोच खाया जायेगा 

बन्द कर के दिमाग अपना 
सोचना शुरू कर दे अभी से 
खोदना किसी सूखे पेड़ का कोटर 
कहीं भी किसी वीराने में 

‘उलूक’ जल्दी ही 
कबूतरों और 
कौओं के बीच 
तकरार करवाने का 
इल्जाम मढ़ कर 
तुझे भी दो गज जमीन 
मरने के बाद की से 
मरहूम कर दिया जायेगा। 



गुरुवार, 6 अगस्त 2020

‘उलूक’ अच्छा किया कल के ही दिन कुछ नहीं लिखा था



रोज 
वैसे भी 
कौन लिखता है 
आज कल 

कल भी 
कुछ नहीं लिखा था 

कल ही 
बहुत कुछ लिखना था 

फिर भी नहीं लिखा था 

आसमान 
लिखने की इच्छा थी 

नीला साफ धुला हुआ ना भी सही 
कुछ धुँधलाया हुआ सा कहीं 

बस नहीं लिखा था 
तो नहीं ही लिखा था 

कतार में लगा था आसमान भी 
आँख थोड़ी सी उठाई तो थी 
थोड़ा सा किनारा कहीं दूर 
किसी के पीछे खड़ा सा दिखा था 

अजीब बात नहीं थी 
बातें अजीब होती भी नहीं है 
आदमी अजीब हो जाता है 

कतार में होने से क्या हो जाता है 
कतार जा कर कतार में मिल जाती है 
कैदी सौ गुनाह माँफ कर दिया जाता है 
कतारें जमीन में लोटना शुरु हो जाती हैं 
जमीन जमीन फैला हुआ आसमान हो जाता है 

अब आसमान का क्या कसूर फिर 

गलती देखने वाले की हो जाती है 
सीधे आसमान की ओर 
जब मन करे देखना शुरु हो जाता है 

आखिर 
औकात भी कोई चीज होती है 
जमीन से आसमान 
ऐसे ही थोड़ा सबको नजर आता है 

बेशरम 
जमीन से देखना शुरु करना क्यों नहीं सीखा था

बात कुछ लिखने की थी 
वो भी गुजरे कल के दिन की थी 

कल
सबने कुछ ना कुछ
कहीं ना कहीं 
थोड़ा सा या बहुत ज्यादा सा
कतार कतार लिखा था 

कतार में किसी के पीछे 
सिमट लिया था हर कोई 
किसी के नाम पर 
कुछ बनाने के जुनून का 
एक सिरा पकड़े हुऐ एक नाम 
आसमान होता दिखा था 

बहुत साफ साफ जर्रे जर्रे के जर्रे ने 
खुद ही लिखा था 

आसमान
इसलिये तो कतार में लगा था 

‘उलूक’
अच्छा किया 
कल के ही दिन 
कुछ नहीं लिखा था। 

चित्र साभार: https://www.123rf.com/