उलूक टाइम्स: दिसंबर 2018

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

जरूरी नहीं है लिखा जाये हमेशा काँव काँव


तीन अक्षर
शब्द शिशिर

दिशाहीन की कोशिश 
लिखने की दिशायें
धवल उज्जवल

प्रयास लिखे में दिखाने की
कड़ाके की ठण्ड
सिकुड़ती सोच

शब्द वाक्यों पर बनाता हुआ एक बोझ
कम होता शब्दों का तापमान
दिखती कण कण में सोच

ओढ़े सुनहली ओस
वसुन्धरा अम्बर होते एकाकार
आदमी के मौसम होने की
जैसे हो उन्हें दरकार

लिये हुऐ सूर्य की तरह
अमृत बरसाने की चाहत
सभी पूर्वाग्रह छोड़ कर
लिखने लिखाने को कुछ दे कर राहत

प्रकृति के नियम से बंधे मौसम के गुनगुने भाव
बर्फीले शब्द के साथ देते शब्द ही
अहसास जलते हुऐ कुछ मीठे अलाव

‘उलूक’ 
कोई नहीं
होता है
कभी धारा के साथ कभी धारा के विपरीत
चलाता चल अपनी
बिना चप्पुओं की खचड़ा सी नाव ।

चित्र साभार: https://www.gograph.com

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 22 पृ61

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

गुलाम के इशारे पर चलता है स्वतंत्रता पढ़ाने को चला आता है


स्वतंत्र एक शब्द है स्वतंत्रता एक ख्वाब है 
गुलाम और गुलामी आम है और खास है

नकारते रहिये
हो गये  तो सीढ़ी आपके पास है
नहीं हो पाये अगर
का मतलब
साँप कहीं ना कहीं है 
और बहुत नजदीक है
और आसपास है

साँप और सीढ़ी के बीच एक रिश्ता है
इसीलिये खेला भी जाता है

हर गुलाम अपने नीचे 
बस गुलाम देखना चाहता है
गुलाम सोचना चाहता है

हर गुलाम 
एक बड़े गुलाम का खास होना चाहता है
गुलाम
गुलाम होकर भी
गुलाम हूँ सोचना भी नहीं चाहता है

गुलामी खून में होती है खून लाल होता है
सभी का एक जैसा
आदमी से लेकर जानवर का तक

सारे गुलाम स्वतंत्रता जीते हैं ख्वाब पीते हैं
इसके गुलाम
उसको स्वतंत्रता पढ़ाते हैं
उसके गुलाम
स्वतंत्रता सिखाने वाले शिक्षकों की पाँत में
सबसे आगे खड़े नजर आते हैं

नियम स्वतंत्र होते है
पालन करने वाले गुलाम होते हैं
गुलामी कुछ ना कुछ दे जाती है
स्वतंत्रता पागलों के काम आती है

स्वतंत्रता सपने जगाती है
सोना बहुत जरूरी है
गुलामों को नींद जरूरत से ज्यादा आती है

गुलाम बहुत आतुरता के साथ
स्वतंत्रता लिखना चाहता है
लिखना शुरु करता है
मालिक सपने में आना शुरु हो जाता है

‘राम’ ईश्वर है 
‘उलूक’ गुलाम उसके नाम पर
तुझे धमका कर 
तेरा क्रिया करम श्राद्ध सब
अभी और अभी यहीं कर देना चाहता है

देश स्वतंत्र हुआ था गुलामों से
कुछ सुना था 
फिर क्यों हर तरफ अपने आसपास अपने ऊपर 
किसी एक गुलाम का साया नजर आता है

घर में ही घर के भेड़िये नोच रहे होते हैं
अपनी भेड़ें अपने हिसाब से
शेर का गुलाम
शेर की एक तस्वीर का झंडा ला ला कर
क्यों लहराता है ?

चित्र साभार: https://apptopia.com/

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 26   पृ69 

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

काला फिर से सफेद और सफेद फिर से काला हो जाने की घड़ी का समय खोज रहा है गणना करने वाले हाँफ रहे हैं

कुछ चूहे
सुना जा
रहा है

नाच रहे हैं

कुछ
पता चल
रहा है

भाग रहे हैं

किसी
जलजले
का डर है
या
किसी साँप
की हलचल
कहीं
आसपास
रेंगने की
भाँप रहे हैं

सफेद चूहों
को देखा है
खोदते हुऐ
एक मकान
की जड़ों को
कल तक

आज काले
उधर की तरफ
झाँक रहे हैं

बहुत
हड़बड़ी
के साथ
एक दूसरे
के ऊपर
चढ़ कूद
उछल कर
शोर मचाते

अपने
पंजे और दाँतों
को माँज रहे हैं

ठेका
बदल रहा है
कुछ देर में ही

निविदाओं
के पुराने
हो चुके
कागजों से

पुराने
ठेकेदार
सर्दी भगाने
के लिये
आग जला
कर ताप रहे हैं

खबर
गरम है
गरम पड़े
हुऐ नरम हैं

आकाश
की तरह
मुँह किये हुऐ
कई सारे

दिन में
तारे गिनने की
कोशिश करते

जैसे
आँखों ही
आँखों में

एक दूसरे की
पीड़ा नाप रहे हैं

‘उलूक’
तू भी देख

मुँह
ऊपर कर
आकाश की
तरफ कहीं

सबसे
खुशहाल
वही सब हैं

जो नहीं
सोच रहे हैं चूहे

और
मुँह उठा कर

कहीं
ऊपर
की तरफ
ताक रहे हैं।

चित्र साभार: https://clipartxtras.com

रविवार, 9 दिसंबर 2018

पूरे साल का खाता बही फिर से याद आ रहा है देश तो सागर है ‘उलूक’ के कोटर एक नाली की बातें हैं रहने दीजिये काहे परेशान होना है मत झाँकिये

नियमावली
जरूर छापिये

 मोती जैसे
अक्षरों में
छपे हुऐ पन्ने

घर घर में
हर एक को
जा जा
कर बाँटिये

करा क्या है
किस ने आकर
किससे और
क्यों पूछना है

कुछ
अपने जैसों के
साथ मिल कर

 नियमों की
धज्जियाँ टाँकिये

मूँछों हों तो
ताव दीजिये

नहीं हों तो
खाँचे में मूँछ के

अँगुलिया
फेर घुमा
चिढ़ा चिढ़ा
कर मौज काटिये

बहुत ज्यादा
गधा गधा
मत बाँचिये

गधों
की अब
तरक्की
कर ही डालिये

घोड़े
पुकार कर
उनकी खुशी में

 उनके
साथ साथ
खुद भी नाँचिये

अपने
हिसाब के
आस पास के
किसी अस्तबल के

चक्रानुक्रमानुसार

तख़्त-ए-ताऊस छाँटिये

तीन साल तक
लगातार
घोड़े बना चुके
अपने अपने
गधों को
लम्बी दौड़ के
घोड़े बाँटिये

किसी से
चिढ़ हो
उसको
तीन टाँग टूटे
गधे की नकेल
थमा कर

घोड़ों की दौड़ में
शामिल होने का
आदेश थमा कर

 उसके गिरने की
खबर दौड़ से
पहले छापिये

लिखने लिखाने से
किसलिये भागना
मत भागिये
कुछ भी लिखिये
गिनतियों से
लिखे लिखाये को
जरूर नापिये

गिनना
बहुत जरूरी है
कितना लिख गये
गिनती नहीं आती
कोई बात नहीं
बगले मत झाँकिये

पैमाना
कोई होना
जरूरी है
मयखाने में
आने जाने
वालों के
जूते चप्पलों
की लम्बाई
ले कर ही सही
 मगर
 कुछ तो नापिये

रंग देखिये
रंग समझिये
रंग से झुड़े
करतबों के
ढंग समझिये

सरदार की
कठपुतलियाँ
बिना डोर के
पगलायी हुयी

अपने
आसपास
की समझिये

 सरदार
को ही
बस खाली
एक अखबार
की खबर
पढ़ कर
मत डाँठिये

समझिये
बड़े घपले
के पर्दे होते हैं
छोटे छोटे
भ्रष्टाचार के
सुर्खियों से भरे
समाचार
थोड़ा सा रुकिये
इतनी जल्दी मत हाँफिये

पूरे के पूरे सड़े
हुऐ कद्दू के
एक बीज के
सड़े होने की
खबर को लेकर
पुतला फूँकने
के लिये मत भागिये

‘उलूक’
की बड़बड़
पूरे साल की
कोई नयी बात नहीं है

दो हजार उन्नीस में
मिलने वाला है
यहाँ कोई ईनाम
किसी एक को

उधर की ओर ताकिये

ईवीएम नहीं होगी
इस के लिये यहाँ

 कुछ और जुगाड़
करना पड़ेगा

नेटवर्किंग
का जमाना है
नेटवर्किंग
के पर्फेक्ट
वर्किंग के लिये
अपने अपने वोट
कहाँ है जरा भाँपिये

अंत में सुझाव-ए-उलूक

पढ़े लिखे
बुद्धिजीवी से
उम्मीद मत रखिये
उसका दिमाग भी
एक बड़ा सा
पेट होता है

कुछ
बुद्धिजीवी
चने हो
आपके पास
तो बाँटिये ।

चित्र साभार: http://personligutvecklingcentrum.se

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

दिसम्बर ने दौड़ना शुरु कर दिया तेजी से बस जल्दी ही साल की बरसी मनायी जायेगी



फिर 
एक साल निकल लिया 

संकेत 
होनी के होने के 
नजर आना शुरु हुए 

अपनी ही सोच में 
खुद की सोच का ही 
कुछ गीला हिस्सा 
शायद फिर से 
आग पकड़ लिया 

धुआँ नहीं दिखा 
बस जलने की खुश्बू आती हुयी 
जैसा कुछ महसूस हुआ 

निकल लिया उसी ओर को 
सोचता हुआ देखने के लिये 
अगर हुआ है कुछ तो क्या हुआ 

लेकिन इस सब के बीच 
बस इतना सा संतोष हुआ 

कि खुश्बू सोच लिया 
अच्छा किया 
सकारात्मकता की रेखा को छूता रहा 
सोच को अपना पैर 
बाहर को नहीं रखने दिया 

इससे पहले बदबू की सोचती 
सोच 
टाँग पकड़ कर 
अन्दर का 
अन्दर को ही खींंच लिया 
समझाकर दिमाग को खुद के 

अपनी ही मुट्ठी बनाकर 
अपने ही हाथ की 
जोर से ठोक लिया 

हौले से हो रहे जोर के शोर से 
कुछ हिलने का 
जैसा अनुभव किया 

फिर झिझक कर याद किया 
जमाने पहले 
गुरुजी का पढ़ाया शिष्टाचार का पाठ 

और वही अपने आप 
बड़बड़ाते हुऐ 
खुद ही खुद के लिये बोल लिया

अभी सोच में आया ही था 
कि 
सभी तो लिख दिया 

और अभी अभी फिर से 
लिखने लिखाने को 
कोने से 
कलम दबा कर खिसक लिया 

एक पुरानी किताब को 
फिर बेमन से खोल लिया

***********

रहने दे 
मत खाया कर कसम ‘उलूक’ 
नहीं लिखने की 
लिख भी देगा तब भी 
साल इसी तरह गुजरते चले जायेंगे 

करने वालों की ताकत और सक्रियता में 
वृद्धि चक्रवृद्धि होती रही है 

लिखने लिखाने की कलमें घिसेंगी 
घिसती चली जायेंगी 

अखबार रोज का रोज 
सबेरे दरवाजे पर टंका मिलेगा 
खबरें छपवाने वालों की ही छपेंगी 

साल भर की समीक्षा की किताब के हर पन्ने पर 
वही चिपकी हुई नजर आयेंगी

हर साल इसी तरह 
दिसम्बर की विदाई की जायेगी ।। 

चित्र साभार: http://clipart-library.com/

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

रोज ही पढ़ने आता है साहिब नापागल लिखा पागल ‘उलूक’ का समझ में नहीं आता है कहता फिरता है किसी से कुछ पूछ क्यों नहीं लेता होगा

कपड़े सोच के उतार देने के बाद 
दौड़ने वाले की सोच में 
केवल और केवल यही होता होगा

अब इसके बाद कौन क्या कर लेगा 
इससे ज्यादा सोच में उसके 
होना भी नहीं होता होगा

कपड़े सोच के उतरे होते हैं कौन देखता है 
ना सोच पाता है ऐसा भी जलवा 
पहने हुऐ कपड़ों का होता होगा

कोशिश जारी रखता है उतारने की 
किसी का भी कुछ भी 
नहीं सोचता है 
खुदा भी ऊपर से कुछ तो देखता होगा

लगा रह खींचने में कपड़े रूह के 
अपने अपनों के भी 
कोई शक नहीं करता होगा कि खींचता होगा

आदत पड़ गयी हो शराब पीने की जिसे 
दिये के तेल की बोतल को देख कर 
उसी पर रीझता होगा 

आईना हो जाता है किसी के घर के हमाम का 
किसी का लिखा लिखाया 
क्या लिख दिया 
शर्मा कर थोड़ा सा तो कभी सोचता होगा

कहने को कहता फिर रहा होता है इस सब के बाद
 इक पढ़ा लिखा 
ये आदमी है या जानवर पता नहीं 

फालतू में क्या ऊल जलूल 
क्यों हर समय
कुछ ना कुछ लिखता दीखता होगा 

पागलों की भीड़ में किसी 
एक पागल के इशारे पर 
कपड़े उतार देने का खेल जमाने से चल रहा होगा 

कपड़े समझ में आना उतारना समझ में आना 
खेल समझ मे आने का खेल समझाने से चल रहा होगा

किसी भी शरीफ को शराफत के अलावा 
किसलिये क्यों देखना सुनना 

अपनी अपनी आँखें सबकी 
अपना अपना सब को अपने हिसाब का दीखता होगा

नंगे ‘उलूक’ के देखने को लिखा देख कर 
कुछ भी कहो 

टाई सूट पहन कर निकलते समय 
आईने के सामने साहिब जरा सा तो चीखता होगा।


चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

रविवार, 2 दिसंबर 2018

गिरोहबाज गिरोहबाजी सब बहुत अच्छे हैं हाँ कहीं भी नहीं होना कुछ अलग बात है

गिरोह बनाना
अलग बात है
गिरोह बनाते बनाते
एक गिरोह हो जाना

अलग बात है

पिट्सबर्ग़
के कुत्तों का
कुछ दिनों तक
खबरों में रहना

अलग बात है

पैंसेल्विनिया
के सियारों का
सब कुछ हो जाना
समय बदलने के साथ

अलग बात है

गिरोह में
शामिल होकर भी
कुछ अलग नजर आना

अलग बात है

गिरोहबाज
के साथ रहकर भी
गिरोहबाज का
नजर नहीं आना

अलग बात है

अलग बात है

किसी भी गिरोह में
शामिल ना होकर
जिंदा रह लेना

गिरोहों का जलवा होना
जलवों से कुछ अलग रह लेना

अलग बात है

अलग अलग दिखना
अलग अलग गिरोहों को
कितनी अलग बात है

इस गिरोह से
उस गिरोह तक
बिना दिखे
कहीं भी
नहीं दिखायी देना

सबसे अलग बात है

मलाई की
एक मोटी परत
दूध के ऊपर से दिखना

अलग बात है

दूध का
नीचे नीचे से
यूँ ही कहीं और
को खिसक लेना

अलग बात है

गिरोहबाजों
के आसपास ही
भीड़ का हर समय
नजर आना

अलग बात है

इस गिरोह से
उस गिरोह
किसी के
आने जाने को
नजर अन्दाज
कर ले जाना

अलग बात है

‘उलूक’
किसी ने
नहीं रोका है
किसी को

किसी भी
गिरोह के साथ
आने जाने के लिये

तेरी
मजबूरी
तू जाने

गिरोहबाजों
के बीच
रहकर भी
गिरोहबाजी
लिख ले जाना

अलग बात है

www.fotosearch.com

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

पुर्नस्थापितं भव


समर्पित समाज के लिये समर्पित
करता रहता है समय बे समय
अपना सब कुछ अर्पित

छोटे से गाँव से शुरु किया सफर 
शहर का हो गया कब
रहा हमेशा इस सब से बेखबर

नाम बदलता चलता चला गया

स्कूल से कालेज कालेज से विद्यालय
विद्यालय से विश्वविद्यालय हो गया

अचानक सफर के बीच का एक मुसाफिर
आईडिया अपना एक दे गया काफिर

स्थापना दिवस स्थापित का मनाना शुरु हो गया
एक तारा दो तारा से पाँच सितारा की तरफ
उसे खिसकाया जाना शुरु हो गया

देश के विकास की तरफ दौड़ने की कहानी
उसी बीच कोई आ कर सुनाना शुरु हो गया

नाक की खातिर किसी की नाक को
कुछ खुश्बू सी महसूस हुई
ना जाने किस मोड़ पर

नाक के ए बी सी डी से
ए को उठा ले आने का
जोड़ तोड़ करवाना शुरु हो गया

ए आया जरा सा भी नहीं शर्माया

बेशरम का रोज का ही
जगह जगह छप कर आना शुरु हो गया

निमंत्रण समर्पित जनता को
कब किसने दिया ना जाने

गायों को अपनी सुबह सुबह
छोड़ने आना शुरु हो गया

कारें स्कूटर घर की
जगह जगह खड़ी होने लगी

गैराज मुफ्त का
सब के काम आना शुरु हो गया

कुत्ते बकरियाँ बन्दर
सब दिखायी देने लगे घूमते
शौक से बिना जंगल का
चिड़ियाघर नजर आना शुरु हो गया

खेल कूद के मैदान में खुशियाँ बटने लगी
समय समय पर 
शादी विवाह कथा भागवत का पंडाल
बीच बीच में कोई बंधवाना शुरु हो गया

तरक्की के रास्ते खुलते चले गये

हर तीन साल में ऊँचाइयों की ओर ले जाने के लिये
एक कुछ और ऊँचा आ कर
ऊँचाईयाँ समझाना शुरु हो गया

क्या कहे क्या छोड़ दे कुछ कहता ‘उलूक’ भी

भीड़ में शामिल हो कर भीड़ के गीत में 
भीड़ का सिर नजर आने से

पुनर्मूषको भव: कथा को याद करते हुऐ
सब कुछ कहने से कतराना शुरु हो गया

जो भी हुआ जैसा हुआ
निकल गया दिन स्थापना का

फिर से स्थापित हो कर एक मील का पत्थर
अगले साल के स्थापना दिवस की आस लेकर

फिर से उल्टे पाँव भागना शुभ होता है
समझाना शुरु हो गया ।