उलूक टाइम्स: अगस्त 2017

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

कभी तो छोड़ दिया कर ‘उलूक’ हवा हवा में हवा बना कर हवा दे जाना




किसी की मजबूरी होती है
अन्दर की बात लाकर
बाहर के अंधों को दिखाना
बहरों को सुनाना

और
बेजुबानों को
बात को बार बार कई बार
बोलने बतियाने के लिये
उकसाना

सबके बस में भी
नहीं होती है

झोले में कौए रख कर
रोज की कबूतर बाजी

हर कोई नहीं कर सकता है

भागते हुऐ शब्दों को
लंगोट पहना पहना कर
मैदान में दौड़ा ले जाना

कुछ कलाकार होते हैं
माहिर होते हैं

जानते हैं शब्दों को बाँध कर
उल्लू की भाँति
अंधेरे आकाश में
बिना लालटेन बांधे
उड़ा ले जाना

सुना है
कहीं किसी हकीम लुकमान ने
अपने बिना लिखे नुस्खे
में कहा है

अच्छा नहीं होता है
पत्थरों पर 
कुछ भी लिख लिखा कर
 सबूत दे जाना

देख सुन कर तो
कभी किसी दिन
समझ लिया कर
‘उलूक’

अन्दर की बात का
बाहर निकलते निकलते
हवा हवा में हवा होकर
हवा हो जाना।

चित्र साभार: www.clker.com

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

राम और रहीम को एक साथ श्रद्धाँजलि देने का इस से अच्छा मौका कब और कहाँ मिल पाता है

जब भी
शुरु किया
जाता है
सोचना
कुछ
लिखने
के लिये
सोच बन्द
हो जाती है
कुछ लिखा
ही नहीं जाता है


आँख कान नाक
बन्द किये हुऐ
गाँधी के
बन्दरों का चेहरा
सामने से चिढ़ाता
हुआ नजर आता है

दुकान खोलने
के बाद कुछ
बिके ना बिके
बेचने की
कोशिश करना
दुकानदार की
मजबूरी हो जाता है

ग्राहक
इस बाजार में
वैसे भी बहुत
कम होते हैं

सोच खरीदने
बेचने वाले कुछ
दुकानदारों को
तरस आ जाता है

बहुत कुछ
हुआ होता है
बड़ा और
बहुत बड़ा

लिखने की
सोचते उसी
बड़े पर
किस्मत खराब
के सामने से
ही घर के
बड़े उस हुऐ का
छोटा भाई
दिखाई खड़ा
दे जाता है

बाद में
लिखना चाहिये
सोच कर
लिखने वाला
लिखना छोड़ कर
सड़क पर
निकल चला
जाता है

हर तीसरा
दिखता है
बड़े की सोच
के समर्थन
का झंडा
उठाये हुऐ

पर पता नहीं
क्यों इस बार
चुपचाप
मूँगफली छीलते
छिक्कल खाते हुऐ

दाने सड़क पर
फेंकता हुआ
पाया जाता है

साँप सूँघना
साँपों का
किसी ने सुना
हो या ना सुना हो

अपने पाले
साँप को
सजाये जिंदगी
हो जाने से
पिता ही नहीं
पूरे कुनबे का
गला सूख
जाता है
उनसे कुछ
नहीं कहा
जाता है

साँप को हो
जाती है सजा

‘उलूक’
नोचता है
बाल अपने
ही सर के
पिता साँप का
जब तुरन्त ही
साँप के सँपोले
को पालने की
जुगत लगाना
शुरु हो जाता है ।

चित्र साभार: Republic World

बुधवार, 23 अगस्त 2017

पढ़ने वाला हर कोई लिखे पर ही टिप्पणी करे जरूरी नहीं होता है



जो लिखता है उसे पता होता है 
वो क्या लिखता है किस लिये लिखता है 
किस पर लिखता है क्यों लिखता है

जो पढ़ता है उसे पता होता है 
वो क्या पढ़ता है किसका पढ़ता है क्यों पढ़ता है 

लिखे को पढ़ कर उस पर कुछ कहने वाले को पता होता है 
उसे क्या कहना होता है 

दुनियाँ में बहुत कुछ होता है 
जिसका सबको सब पता नहीं होता है 

चमचा होना बुरा नहीं होता है 
कटोरा अपना अपना अलग अलग होता है 

पूजा करना बहुत अच्छा होता है 
मन्दिर दूसरे का भी कहीं होता है 

भगवान तैंतीस करोड़ बताये गये हैं 
कोई हनुमान होता है कोई राम होता है 
बन्दर होना भी बुरा नहीं होता है 

सामने से आकर धो देना 
होली का एक मौका होता है 

पीठ पीछे बहुत करते हैं तलवार बाजी 

‘उलूक’ कहीं भी नजर नहीं आने वाले 
रायशुमारी करने वालों का 
सारे देश में एक जैसा एक ही ठेका होता है । 

चित्र साभार: Cupped hands clip art

रविवार, 20 अगस्त 2017

आसपास कुछ ईश्वरीय होने का अहसास

सूक्ष्म मध्यम
महत दिव्य
अलौकिक

या और भी
कई प्रकार के
आभास कराते

अपने ही
आसपास के
कार्यकलाप


आसानी से जैसे
खेल खेल में
समझाते
सर्वशक्तिमान
सर्वज्ञ
सर्वव्यापी
सर्वभूत

दिलाते
अहसास
सभी
ज्यादातर
या कुछ
मनुष्यों
के ही
ईश्वर होने का

यहीं इति कर देना
या इसके बाद
लिख देना क्रमश:
शेष अगले अंक में

फर्क है
बहीखाते में
रोज का रोज
हिसाब
जोड़ लेने 
में 
हफ्ते में
सात दिन का
एक साथ
लिखने 
में 

या महीने भर 

के हिसाब को
किसी एक दिन
निचोड़ 
लेने में 

वैसे भी
आधी उम्र पार
करते करते
समझ में आना
शुरु हो ही जाता है

आधी उम्र तक
पहुँचने तक के
सब कुछ सीखे
हुऐ का सार

पाप पुण्य
की सीमा में
लड़खड़ाते
खुद के अच्छे
कर्मों से
पुण्यों को
जमा कर
लेने के भ्रम

अनदेखी
करते हुऐ
सामूहिक
अपराधों में
अपनी
भागीदारी को

अच्छा है
महसूस
कर लेना
‘उलूक’

स्वयं का भी
ईश्वर होना
डकारते हुऐ
अन्दर की ओर
अह्म ब्रह्मास्मि।

चित्र साभार: Clipart - schliferaward

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

ऊँची उड़ान पर हैं सारे कबूतर सीख कर करना बन्द पंख उड़ते समय


किसी से
उधार 
ली गई बैसाखियों पर
करतब 
दिखाना सीख लेना 

एक दो का नहीं 
पूरी एक सम्मोहित भीड़ का 

काबिले तारीफ ही होता है 

सोच के हाथ पैरों को
आराम देकर 
खेल खेल ही में सही 
बहुत दूर के आसमान 
को छू लेने का प्रयास 

अकेले नहीं
मिलजुल कर एक साथ 

एक मुद्दे 
चाँद तारे उखाड़ कर 
जमीन पर बिछा देने को लेकर 

सोच का बैसाखी लिये
सड़क पर चलना दौड़ना 

नहीं जनाब
उड़ लेने का जुनून 
साफ नजर आता है आज 

बहुत बड़ी बात है 
त्याग देना अपना सब कुछ 
अपनी खुद की सोच को तक 

तरक्की के उन्माँद
की 
खुशी व्यक्त करना 
बहुत जरूरी होता है
 ‘उलूक’ 

त्यौहारों के
उत्सवों को मनाते हुऐ 

अपने पंखों को
बन्द कर 
उड़ते पंछियों को
एक ऊँची उड़ान पर
अग्रसर होते देख कर। 

चित्र साभार: NASA Space Place

शनिवार, 12 अगस्त 2017

बस एक कमेटी बना मौत के खेल को कोढ़ के खेल पर ले आ

कहा था
कोढ़ फैला

कोढ़
समझ में
नहीं आया तेरे
मौत फैला आया

आक्सीजन से
कोढ़ भी हो
सकता था
तुझे पता
नहीं था

मौत देने की
क्या जरूरत थी

आक्सीजन
से कोढ़
समझ में
नहीं आ
रहा होगा

होता है

कुछ भी
सम्भव है
किसी चीज
से कुछ भी
हो सकता है

कैसे हो
सकता है


अखबार
वालों से
रेडियो
वालों से
टी वी
वालों से
समबन्ध कुछ
अच्छे बना

समबन्ध
मतलब
वही जो
घर में घर
के लोगों से
घर के जैसे
होते हैं

चिन्ता करने
की जरूरत
नहीं है

अब कर दिया
तो कर दिया
हो गया
तो हो गया

ऐसा कर
अब कमेटी
एक बना

कमेटी में
उन सब को
सदस्य बना
जिनको मौत
समझ में
नहीं आती है
बस कोढ़
समझ में
आता है

कोढ़ का
मतलब
उस बीमारी
से नहीं है
जिसमें शरीर
गलता है थोड़ी सी
आत्मा को गला

कई जगह
कई आत्माएं
सामने सामने
गलती बहती
हुई दिखती हैं
बहुत मौज
में होती हैं

जब कोढ़
हो जाना
या कोढ़ी
कहलाया जाना
किसी जमाने से
सम्मान की बात
हो चुकी होती है

‘उलूक’ को
खुजली होती
ही रहती है
उसकी खुजली
पर मत जा

कोढ़ और कोढ़ी
उन्मूलन के
खिलाफ
कुछ मत बता

बस कुछ
रायता फैला
कुछ दही
कुछ खीरा
अलग कर
और
कुछ नमक
कुछ मसाला
फालतू का मिला

खुद भी खा
कमेटी को
भी कुछ खिला।


चित्र साभार: Weymouth Drama Club

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

बेहयाई से लिखे बेहयाई लिखे माफ होता है

लहर कब उठेगी
पता नहीं होता है
जरूरी नहीं
उसके उठने के
 समय हाथ में
किसी के
कैमरा होता है

शेर शायरी
लिखने की बातें
हैं शायरों की
ऐसा सभी सुनते हैं
बहुतों को पता होता है

बहकती है सोच
जैसे पी कर शराब
सोचने वाला
पीने पिलाने की
बस बातें
सोचता रहता है

कुछ आ रहा
था मौज में
लिख
देना चाहिये
सोच कर
लिखना
शुरु होता है

सोच कब
मौज में आयी
सोचा हुआ कब
बह गया होता है
किसे पता होता है

रहने दे चल
कुछ फिर और
डाल साकी
सोच के गिलास में

शराब और गिलास
का रिश्ता अभी
भी बचा है
कोई गिला कोई
शिकवा नहीं
बताता है
अखबार वाला भी
कभी पढ़ने में
सुनने में ऐसा
आया भी
नहीं होता है

‘ऊलूक’ की
आदत है
इधर की
उधर करने की

जैसा कहावतों
में किसी की
आदत के लिये
कहा होता है

रोज लिखना
शरीफों
की खबर
ठीक भी
नहीं होता है

किसी दिन
शरीफों के
मोहल्ले में
शराफत से
कुछ नहीं
बोल देना भी
ठीक होता है।

चित्र साभार: Shutterstock