उलूक टाइम्स: जुलाई 2013

बुधवार, 31 जुलाई 2013

बाहर के लिये अलग बनाते है अंदर की बात खा जाते हैं !

मुड़ा तुड़ा कागज का एक टुकड़ा 
मेज के नीचे कोने में पड़ा मुस्कुराता है

लिखी होती है कोई कहानी अधूरी उसमें
जिसको कह लेना 
वाकई आसान नहीं हो पाता है 

ऎसे ही पता नहीं कितने कागज के पन्ने 
हथेली के बीच में निचुड़ते ही चले जाते हैं 

कागज की एक बौल होकर 
मेज के नीचे लुढ़कते ही चले जाते हैं

ऎसी ही कई बौलों की ढेरी के बीच में बैठे हुऎ लोग
कहानियाँ बनाने में माहिर हो जाते हैं 

एक कहानी शुरु जरूर करते हैं
राम राज्य का सपना भी दिखाते हैं 
राजा बनाने के लिये  किसी को भी 
कहीं से ले भी आते हैं 

कब खिसक लेते हैं बीच में ही और कहाँ को 
ये लेकिन किसी को नहीं बताते हैं

अंदर की बात को कहना 
इतना आसान कहाँ होता है 
कागजों को निचोड़ना नहीं छोड़ पाते हैं 

कुछ दिन बनाते हैं कुछ और कागज की बौलें
लोग राम और राज्य दोनो को भूल जाते हैं 

ऎसे ही में कहानीकार और कलाकार 
नई कहानी का एक प्लॉट ले 
हाजिर हो जाते हैं ।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

सीधे सीधे बता पागल मत बना

कबीर जैसा
कैसे बनूँ
कैसे कुछ
ऎसा कहूँ

समझ में
खुद के
भी कुछ
आ जाये

 समझाना
भी सरल
सरल सा
हो जाये

पहेलियाँ
कहाँ किसी
की सहेलियाँ
हुआ करती हैं

समझने के
लिये दिमाग
तो लगाना
ही पड़ता है

जिसके पास
जितना होता है
उतना ही बस
खपाना पड़ता है

जिसके समझ
में आ गई
जिंदगी को
सुलझाता
चला जाता है

उससे पहेली
पूछने फिर
किसी को
कहीं नहीं
आना पड़ता है

उसका एक
इशारा अपने
आप में पूरा
संदेश हो जाता है

उसे किसी
को कुछ
ज्यादा में
बताना भी
नहीं पड़ता है

दूसरी तरफ
ऎसा भी कहीं
पाया जाता है

जिसको आस पास
का बहुमत ही
पागल बनाता है

जहाँ हर कोई
एक कबूतर को
बस यूं ही देखता
चला जाता है

पूछने पर
एक नहीं हर एक
उसे कौवा एक
बताना चाहता है

एक अच्छी भली
आँखो वाले को
डाक्टर के पास
जाना जरूरी
हो जाता है

बस इन्ही बातों
से कोई दीवाना
सा हो जाता है

सीधे सीधे किसी
बात को कहने
में शरमाता है

कभी आदमी
को गधा
कभी गधे
को आदमी
बनाना सीख
जाता है

समझने वाला
समझ भी
अगर जाता है
समझ में आ
गया है करके
किसी को भी
बताना नहीं
चाहता है

अब आप ही
बताइये

बहुमत छोड़ कर
कौन ऎसे पागल
के साथ में आना
जाना चाहता है ।

सोमवार, 29 जुलाई 2013

सभी देखते हैं, मोर नाचते हैं. कितने बाँचते हैं !

सभी को दिखाई
दे जाते हैं रोज
कहीं ना कहीं
कुछ मोर उनके
अपने जंगलों
में नाचते हुऎ
सब लेकिन
कहाँ बताते है
किसी और को
जंगल में मोर
नाचा था और
उन्होने उसे
नाचते हुए
देखा था
बस एक तेरे
ही पेट में
बातें जरा सा
रुक नहीं
पाती हैं
मोर के नाच
खत्म होते ही
बाहर तुरंत
निकल के
आती हैं
पता है तू
सुबह सुबह
जंगल को
निकल के
चला जाता है
शाम को लौट
के आते ही
मोर के नाच
की बात रोज
का रोज यहाँ
पर बताता है
बहुत सारे
मोर बहुत से
जंगलो में रोज
नाचते हैं
बहुत सारे
लोग मोर
के नाच को
देखते हैं फिर
मोर बाँचते हैं
कुछ मोर
बहुत ही
शातिर माने
जाते हैं
अपने नाचने
की खबर
खुद ही
आकर के
बता जाते हैं
क्यों बताते हैं
ये बात
सब की
समझ में
कहाँ आ
पाती है
कभी दूसरे
किसी जंगल
से भी एक
मोर नाचने
की खबर
आती है
यहाँ का
एक मोर
वहां बहुत
दिनो से
नाच रहा है
कोई भी
उसके नाच
को पता
नहीं क्यों
नहीं बाँच
रहा है
तब जाके
हरी बत्ती
अचानक ही
लाल हो
जाती है
बहुत दिनों
से जो बात
समझ में
नहीं आ
रही थी
झटके में
आ जाती है
मोर जब
भी कहीं
और किसी
दूसरे जंगल
में जाना
चाहता है
अपना नाच
कहीं और
जाकर दिखाना
चाहता है
जिम्मेदारी
किसी दूसरे को
सौंपना नहीं
चाहता है
बिना बताये
ही चला
जाता है
बस दूसरे
मोर को
जंगल में
नाचते रहना
का आदेश
फोन से
बस दे
जाता है
इधर उसका
मोर नाच
दिखाता है
उधर उसका
भी काम
हो जाता है
सब मोर
का नाच
देखते हैं
किसी को
पता नहीं
चल पाता है ।

रविवार, 28 जुलाई 2013

किस को करना है हिट किसको जाना है पिट मिलकर बतायें

स्कोर क्या हुआ
कहीं दो कहीं तीन
कहीं तो कुछ
भी नहीं हुआ
आया जरूर था
कह कर नहीं गया
बस जीरो एक दिखा
कितने हिट मिले
रोज का रोज
कौन गिनता फिरे
कहीं उम्दा दिखे
कहीं सुंदर दिखे
कहीं वाह वाह
हर कोई लिखे
कुछ समझ में
थोड़ा सा आये
कुछ पूरा ऊपर
ऊपर ही निकल
कर उड़ जाये
अब किससे
क्या कहा जाये
सब्जी की दुकान में
मछली भी मिल जाये
गूगल से बुलाये
ट्वीटर से हकाये
खुद आये ना आये
पता चिपका कर
ही चला जाये
ब्लागिंग की दुनिया
गोल है चपटी नहीं
इधर से जाने वाला
उधर भी मिल जाये
मैं तेरे घर में आऊँ
तू मेरे घर में आये
मैं तेरे पै दे जाऊँ
तू मेरे पै दे जाये
ना बैट नजर आये
ना बौल नजर आये
आँख बंद कर के
चौके छक्के उड़ाये
टिप्पणी के खेल
का तेंदुलकर हो जाये
अपना अपना
बैट अपने साथ
लेकर आयें
अपनी बौल
दूसरे के हाथ
ना थमायें
टीम भावना
सर्वोपरि बनायें
फुटबाल खेलने
वालों को काहे
मैच देखने के
लिये बुलायें
अच्छा हो
अगर इस सब
को नियम बना
संविधान में
भी ले आयें
देश एक है
नेता एक हैं
हम भी साथ
कुछ निभायें ।

शनिवार, 27 जुलाई 2013

लिखने से कोई विद्वान नहीं होता है


सम्पादक जी को
देखते ही 
साथ में किसी जगह कहीं 
मित्र से
रहा नहीं गया 
कह बैठे यूँ ही

भाई जी
ये भी लिख रहे हैं 
कुछ कुछ आजकल 

कुछ कीजिये इन पर भी कृपा 

कहीं
पीछे पीछे के पृष्ठ पर ही सही
थोड़ा सा
इनका कुछ छापकर 

क्या पता किसी के
कुछ
समझ में भी आ जाये

ऎसे ही कभी
बड़ी ना सही 
कोई छोटी सी दुकान 
लिखने पढ़ने की
इनकी भी कहीं
किसी कोने में एक खुल जाये 

मित्रवर की
इस बात पर 
उमड़ आया बहुत प्यार
मन ही मन किया उनका आभार 

फिर मित्र को
समझाने के लिये बताया 

पत्रिका में
जो छपता है 
वो तो कविता या लेख होता है 

विद्वानो के द्वारा
विद्वानो के लिये
लिखा हुआ
एक संकेत होता है 

आप मेरे को
वहाँ कहाँ अढ़ा रहे हो
शनील के कपडे़ में
टाट का टल्ला 
क्यों लगा रहे हो 

मेरा लिखना
कभी भी
कविता या लेख नहीं होता है 

वो तो बस
मेरे द्वारा
अपने ही 
आस पास
देखी समझी गयी
कहानी का
एक पेज होता है 

और आस पास
इतना कुछ होता है
जैसे
खाद बनाने के लिये 
कूडे़ का
एक ढेर होता है 

रोज
अपने पास इसलिये 
लिखने के लिये 
कुछ ना कुछ
जरूर होता है 

यहाँ आ कर
लिख लेता हूँ 

क्योंकि 
यहाँ लिखने के लिये ही
बस एक विद्वान होना
जरूरी नहीं होता है 

खुद की
समझ में भी
नहीं 
आती हैंं
कई बार कई बात 

उसको भी
कह देने से 
किसी को कोई भी 
कहाँ यहाँ
परहेज होता है 

विद्वान लोग
कुछ भी
नहीं लिख देते हैं

'उलूक'
कुछ भी
लिख देता है

और 
उसका
कुछ मतलब
निकल ही आये 
ये जरूरी भी
नहीं होता है ।

चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com/

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

भले हैं नारद जी अच्छा ही चाहते हैं

नारद जी को
ये जरा भी 

समझ में
नहीं आता है

देवताओं और
असुरों से
साथ साथ
आखिर क्यों
नहीं रहा जाता है

कितने साल
देखिये हो गये
कितने असुर
असुर नहीं रहे
देवता जैसे
ही हो गये

देवताओं का
असुरों में
असुरों का
देवताओं में
आना जाना
भी अब
देखा ही जाता है

नारद जी को
वैसे तो
देवता ही
माना जाता है

असुरों के यहाँ
आना जाना
लेकिन उनका
बहुत बार देखा
सुना जाता है

बहुत
समय से
इसीलिये
जुगाड़
लगा रहे हैं

असुरों को
देवताओं में
मिलाने का मिशन

अपना ध्येय
बना रहे हैं

देवता तो
हमेशा बहुमत
में होते हैं

क्योंकी वो तो
देवता लोग होते हैं

ये बात
कोई
नहीं देखता
कुछ देवता
देवताओं के
कहने पर
नहीं जाते हैं

पर देवता तो
देवता होते हैं
गिनती में
देवताओं के
साथ ही हमेशा
गिने जाते हैं

असुर तो
हमेशा से ही
अल्पसंख्या
में पाये जाते हैं

मौका
मिलता है कभी
अपने काम के लिये
देवता हो जाने में
नहीं हिचकिचाते हैं

बेवकूफ
लेकिन हमेशा
ही नहीं बनाये जाते हैं

समझते हैं
सारे असुर
अगर देवताओं के
साथ चले जायेंगे

अभी
छुप कर करते हैं
जो मनमानी

उसे करने के लिये
खुले आम मैदान में
निकल के आ जायेंगे

यही सब सोच कर
असुर रुक जाते हैं

ज्यादा
नुकसान
कुछ उनको
नहीं होता 
है

देवताओं
के राज्य में
वैसे भी
उनके काम
कौन सा
हो पाते हैं ।

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

यहाँ होता है जैसा वहाँ होता है

होने को 
माना
बहुत कुछ 
होता है

कौन सा 
कोई 
सब कुछ 
कह देता है

अपनी 
फितरत से 
चुना जाता है 
मौजू

कोई 
कहता है 
और
कहते कहते 
सब कुछ 
कह लेता है 

जो 
नहीं चाहता 
कहना
देखा सुना 
फिर से 

वो 
चाँद की 
कह लेता है 

तारों की 
कह लेता है

आत्मा की 
कह लेता है

परमात्मा की 
कह लेता है 

सुनने वाला 
भी 
कोई ना कोई 

चाहिये 
ही होता है 

कहने वाले को 
ये भी
अच्छी तरह 
पता होता है 

लिखने वाले 
का भी 
एक भाव होता है

सुनने वाला 
लिखने वाले से 
शायद 
ज्यादा 
महंगा होता है 

सुन्दर लेखनी 
के साथ
सुन्दर चित्र हो

ज्यादा नहीं 
थोड़ी सी भी 
अक्ल हो 
सोने में 
सुहागा होता है 

हर कोई 
उस भीड़ में
कहीं ना कहीं 
सुनने के लिये 
दिख रहा होता है 

बाकी बचे 
बेअक्ल
उनका अपना 
खुद का 
सलीका होता है

जहाँ 
कोई नहीं जाता
वहां जरूर 
कहीं ना कहीं उनका 
डेरा होता है

कभी किसी जमाने में
चला आया था 
मैं यहाँ
ये सोच के 

शायद 
यहां कुछ 
और ही
होता है

आ गया समझ में 
कुछ देर ही से सही
कि 
आदमी
जो 
मेरे वहाँ का होता है 

वैसा ही 
कुछ कुछ 
यहाँ का होता है 

अंतर होता है 
इतना 
कि 
यहाँ तक आते आते

वो
ऎ-आदमी
से 
ई-आदमी 
हो लेता है ।

बुधवार, 24 जुलाई 2013

आज गिरोह बनायेगा कल पक्का छा जायेगा



सावन के
अंधे की
तरह हो
जायेगा

समय के
साथ अगर
बदल
नहीं पायेगा

कोई
कुछ नहीं
देखेगा जहां

वहाँ तुझको
सब हरा हरा ही
नजर आयेगा

पिताजी ने
बताया होगा
कोई रास्ता
उस जमाने में कभी

भटकने से
तुझे वो भी
नहीं बचा पायेगा

अपने लिये
आखिर
कब तक
खुद ही
सोचता
रह जायेगा

गिरोह में
शामिल अगर
नहीं हो पायेगा

बेवकूफी
के साथ
दो करोड़
घर में
रख जायेगा

आबकारी
आयुक्त
की तरह
लोकपाल
के पंजे मे
जा कर
फंस जायेगा

समझदारी
के साथ
एक झंडा
उठायेगा

उंगली भी
कोई नहीं
कभी
उठा पायेगा

अपना
और अपने
लोगों का तो
करेगा ही
बहुत कुछ भला

गिरोह के
लिये भी
कुछ कर पायेगा

करोड़ों
की योजना
परियोजना
बनायेगा

सबका हिस्सा
टाईम पर
दे के आयेगा

झुक कर
करता चलेगा
रोज बस नमस्कार

बस एक बार
काम का बस भोंपू
बना कर बजायेगा

आज
गिरोह के लिये
झंडा एक उठायेगा

कल
खुद गिरोह के
झंडे में
नजर आयेगा

एक बेवकूफ
दो करोड़ के साथ
घर में
पकड़ा जायेगा
जेल पहुँच जायेगा

तू दस करोड़
भी ले जायेगा
लाल बत्ती की
कार के साथ
कहीं बैठा भी
दिया जायेगा

निर्वात
पैदा होने
की चिंता
कोई भी
नहीं कर पायेगा

निकलते ही
तेरे ऊपर

नीचे से एक
नया गिरोहबाज
तैयार खड़ा
तुझे मिल जायेगा ।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

चेहरे पर भी लिखा होता है

चेहरे
पर भी तो
कुछ कुछ
लिखा होता है

ना कहे
कुछ भी
अगर कोई
तब भी
थोड़ा थोड़ा सा
तो पता होता है

अपना चेहरा
सुबह सुबह ही
धुला होता है

साफ होता है
कुछ भी कहीं
नहीं कहता है

चेहरा चेहरे
के लिये एक
आईना होता है

अपना चेहरा
देखकर कुछ
कहाँ होता है

बहुत कम
जगहों पर ही 
एक आईना
लगा होता है

अंदर बहुत
कुछ चल
रहा होता है

चेहरा कुछ
और ही तब
उगल रहा
होता है

दूसरे चेहरे
के आते ही
चेहरा रंग
अपना बदल
रहा होता है

चेहरे पर
कुछ लिखा
होता है
ऎसा बस
ऎसे समय
में ही तो
पता चल
रहा होता है ।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

तुलसीदास जी की दुविधा


सरस्वती प्रतिमा को
हाथ जोडे़ खडे़ 
तुलसीदास जी को
देख कर 
थोड़ी देर को अचंभा सा हुआ

पर
पूछने से 
अपने आप को
बिल्कुल भी ना रोक सका

पूछ ही बैठा 

आप और यहाँ
कैसे
आज दिखाई 
दे जा रहे हैं

क्या
किसी को 
कुछ
पढ़ाने के 
लिये तो नहीं
आप आ रहे हैं 

राम पर लिखा 
किसी जमाने में
उसे ही कहाँ अब कोई पढ़ पा रहा है 

बस
उसके नाम 
का झंडा
बहुतों 
के काम बनाने के काम में
जरूर 
आज आ रहा है 

हाँ
यहाँ तो बहुत 
कुछ है
नया नया
बहुत कुछ ऎसा जैसे हो अनछुआ

अभी अभी देखा
नये जमाने का नायक एक
मेरे 
सामने से ही जा रहा है 

उसके बारे में 
पता चला
कि 
हनुमान उसे यहाँ
कहा 
जा रहा है

हनुमान
मेरी 
किताब का 
नासमझ निकला

फाल्तू में
रावण से 
राम के लिये 
पंगा ले बैठा 

यहाँ तो 
सुना
रावण 
की संस्तुति पर
हनुमान 
के आवेदन को

राम
खुद ही 
पहुँचा रहा है 

समझदारी से देखो
कैसे
दोनों का ही 
आशीर्वाद
बिना पंगे 
के वो पा रहा है 

राम और रावण 
बिना किसी चिंता
2014 की फिल्म की भूमिका
बनाने 
निकल जा रहे हैं

हनुमान जी
जबसे 
अपनी गदा
यहाँ 
लहरा रहे हैं 

लंकादहन
के 
समाचार भी अब
अखबार 
में नहीं पाये जा रहे हैं

मैं भी
कुछ 
सोच कर
यहाँ 
आ रहा हूँ

पुरानी कहानी के 
कुछ पन्ने
हटाना 
अब चाह रहा हूँ

क्या जोडूँ 
क्या घटाऊँ
बस ये ही नहीं कुछ
समझ 
पा रहा हूँ 

विद्वानों की 
छत्र छाया 
शायद मिटा दे मेरी 
इस दुविधा को कभी

इसीलिये
आजकल 
यहाँ के चक्कर लगा रहा हूँ ।

चित्र साभार: 
https://www.devshoppe.com/blogs/articles/goswami-tulsidas

शनिवार, 20 जुलाई 2013

कब्र की बात पता करके आ मुर्दा एक हो जा

बहुत बार इस
बात का उदाहरण
अपनी बात को
एक ताकत देने
के लिये दे
दिया जाता है
जिसे सुनते ही
सामने वाला
भी भावुक हो
ही जाता है
जब उससे
कहा जाता है
अपनी कब्र का
हाल तो बस
मुर्दा ही
बता पाता है
कब्र में तो जाना
ही होता है
एक ना एक दिन
वहाँ से कौन
फिर जाकर के
वापस आता है
फिर कैसे कह
दिया जाता है
एक नहीं
कई कई बार
कब्र का हाल तो
बस मुर्दा ही
बता पाता है
ये सच होता है
या कई बार
बोला गया झूठ
जिसे बोलते बोलते
एक सच बना
दिया जाता है
वैसे भी एक मुर्दा
कभी दूसरे मुर्दे से
विचारों का आदान
प्रदान कहाँ
कर पाता है
मुर्दो की गोष्ठी या
मुर्दों की कार्यशाला
कभी कहीं हुई हो
ऎसा कहीं इतिहास
के पन्नों में भी तो
नहीं पाया जाता है
इस बात को बस
तभी कुछ थोड़ा
बहुत समझा जाता है
जब सामने सामने
बहुत कुछ होता
हुआ साफ साफ
सबको नजर आता है
हर कोई आँख
अपनी लेकिन बंद
कर ले जाता है
जैसे मुर्दा एक
वो हो जाता है
बोलता कुछ नहीं
मौत का सन्नाटा
चारों तरफ जैसे
छा जाता है
जब हो ही जाता है
अपने चारों और
कब्र का माहौल
खुद ही बनाता है
मुर्दा होकर जब
कब्र भी पा जाता है
उसके बाद फिर
बाहर कुछ भी
कहाँ आ पाता है
बस यूँ ही कह
दिया जाता है
अपनी कब्र का
हाल मुर्दा ही
बस बता पाता है । 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सुबह एक सपना दिखा उठा तो अखबार में मिला

कठपुतली वाला
कभी आता था
मेरे आँगन में
धोती तान दी
जाती थी एक
मोहल्ले के बच्चे
इक्ट्ठा हो जाते थे
ताली बजाने के
लिये भी तो कुछ
हाथ जरूरी हो
जाते थे
होते होते सब
गायब हो गया
कब पता ही
कहाँ ये चला
कठपुतलियाँ
नचाने वाले
नियम से
चलते हुऎ
हमेशा ही देखे
जाते थे
धोती लांघ कर
सामने भी नहीं
कभी आते थे
कठपुतलियाँ
कभी भी पर्दे
के पीछे नहीं
जाती थी
काठ की जरूर
होती थी सब
पर हिम्मत की
उनकी दाद
सभी के द्वारा
दी जाती थी
धागे भी दिखते
थे साफ साफ
बंधे हुऎ कठपुतलियों
के बदन के साथ
समय के साथ
जब समझ कुछ
परिपक्व हो जाती है
चीजें धुँधली भी हों
तो समझ में आनी
शुरु हो जाती है
कठपुतली वाला
अब मेरे आँगन
में कभी नहीं आता है
कठपुतलियाँ के काठ
हाड़ माँस हो गये हैं
वाई फाई के आने से
धागे भी खो गये हैं
धोती कौन पहनता
है इस जमाने में
जब बदन के कपडे़
ही खो गये हैं
बहुत ही छोटे
छोटे हो गये हैं
कठपुतली का नाच
बदस्तूर अभी भी
चलता जा रहा है
सब कुछ इतना
साफ नजर सामने
से आ रहा है
कठपुतलियाँ ही
कठपुतलियों को
अब नचाना सीख
कर आ रही है
पर्दे के इधर भी हैं
और पर्दे के उधर
भी जा रही हैं
बहुत आराम से
है कठपुतलियाँ
नचाने वाला
अब कहीं और
चला जाता है
उसको इन सब
नाचों में उपस्थिती
देने की जरूरत
कहाँ रह जा रही है
खबर का क्या है
वो तो कुछ होने
से पहले ही
बन जा रही है
क्या होगा ये
भी होता है पता
कठपुतलियाँ सब
सीख चुकी हैं
ऎ आदमी तू
अभी तक है कहाँ
बस एक तुझे ही
क्यों नींद आ रही है
जो सुबह सुबह
सपने दिखा रही है ।

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

देश बड़ा है घर की बनाते हैं

देश की सरकार
तक फिर कभी
पहुँच ही लेगें
चल आज अपने
घर की सरकार
बना ले जाते हैं
अंदर की बात
अंदर ही रहने
देते हैं किसी को
भी क्यों बताते हैं
ना अन्ना की टोपी
की जरूरत होती है
ना ही मोदी का कोई
पोस्टर कहीं लगाते हैं
मनमोहन को चाहने
वाले को भी अपने
साथ में मिलाते हैं
चल घर में घर की ही
एक सरकार बनाते हैं
मिड डे मील से हो
रही मौतों से कुछ तो
सबक सीख ले जाते हैं
जहर को जहर ही
काटता है चल
मीठा जहर ही
कुछ कहीं फैलाते हैं
घर के अंदर लाल
हरे भगवे में तिरंगे
रंगो को मिलाते हैं
कुछ पाने के लिये
कुछ खोने का
एहसास घर के
सदस्यों को दिलाते हैं
चाचा को समझा
कुछ देते हैं और
भतीजे को इस
बार कुछ बनाते हैं
घर की ही तो है
अपनी ही है
सरकार हर बार
की तरह इस
बार भी बनाते हैं
किसी को भी इस
से फरक नहीं
पड़ने वाला है कहीं
कल को घर से
बाहर शहर की
गलियों में अगर
हम अपने अपने
झंडों को लेकर
अलग अलग
रास्तों से निकल
देश के लिये एक
सरकार बनाने
के लिये जाते हैं ।

बुधवार, 17 जुलाई 2013

बैल एक दिखा इसलिये कहा

कल्पना की उड़ान
कब कहाँ को कर
जाये प्रस्थान
रोकना भी उसे
आसान नहीं
हो पाता है

अब कुछ अजीब
सा आ ही जाये
दिमाग के पर्दे में
बनी फिल्म को देखना
लाजमी हो जाता है

 क्या किया जाये
उस समय जब
एक बैल सामने
से आता हुआ
नजर आता है

 बैल का बैल होना
उसके हल को
अपने कंधों पर ढोना
खेत का किसी के
पास भी ना होना
सबके समझ में
ये सब आ जाता है

हर बैल लेकिन
अपने बैल के लिये
एक खेत की सीमा
जरूर बनाता है

 उसे भी होना ही
पड़ता है किसी
का एक बैल कभी
अपने बैल को देखते
ही लेकिन यही
वो भूल जाता है

ऊपर से नीचे तक
बैल के बैल का बैल
पर बैल हूँ एक मैं
कोई भी स्वीकार
नहीं ये कर पाता है

हरेक की इच्छा
होती है बहुत तीव्र
हर कोई एक ऎसा
बैल अपने लिये
हमेशा चाहता है

जिसके कटे हुऎ
हो सींग दोनो
हौ हौ करते ही
इशारा जिसके
समझ में आता है

बैल इस तरह
एक साम्राज्य
बैलों का बना
भी ले जाता है

लेकिन बैल तो
बैल होते हैं
गलती से कभी
उतर गया हल
कंधे से थोड़ी
देर के लिये

 हर बैल उजाड़
लेकिन चला ही
जाना चाहता है ।

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

पूछ रहा है पता जो खुद है लापता

बहुत दिनों से
कई कई बार
सुन रहा था
नया आया है
एक हथियार
कह रहे थे लोग
बहुत ही काम
की चीज है
कहा जा रहा था
उसको सूचना
का अधिकार
एक आदमी
अपना दिमाग
लगाता है और
एक हथियार
अच्छा बना
ले जाता है
दूसरा आदमी
उसी हथियार
को सही जगह
पर फिट करना
सीख जाता है
कमाल दिखाता है
धमाल दिखाता है
ऎल्फ्रेड नोबल का
डायनामाईट कब
का ये हो जाता है
जिसने बनाया
होता है उसे
भी ये पता
नहीं चल
पाता है
उसके घर का
एक लापता
दस रुपिये
के पोस्टल
आर्डर से
उसको ढूँढने
के लिये उसको
ही आवेदन
थमा जाता है
उस बेचारे को
समझ में ही
नहीं आ पाता है
किस से पूछे
कैसे जवाब
इसका बनाया
जाता है कि वो
रहता है आता है
और कहीं भी
नहीं जाता है
तीस दिन तक
बस ये ही काम
बस हो पाता है
जवाब देने की
सीमा समाप्त
भी हो जाती है
जवाब भी तैयार
किसी तरह
कर लिया जाता है
किसी को भी
ये खबर नहीं
होती है कि
लापता इस
बीच फिर
लापता हो
जाता है
सूचना उसकी
कोई भी नहीं
दे पाता है ।

सोमवार, 15 जुलाई 2013

अब तुम भी पूछोगी क्या?

क्यों पूछती हो
एक ही बात बार बार

ये किस पर 
लिखा है
क्या कुछ लिखा है

मैने कभी 
क्या तुमसे कहा है
मैं लिख रहा हूँ 
तुमको पढ़ भी लेना है समझना है

इतने लोग हैं 
यहाँ
कुछ ना 
कुछ लिखते हुऎ
शायद 
तुमको भी 
मेरी तरह ही नजर आ रहे हैं

किसी को 
कुछ लगता है अच्छा
किसी को लगता है कुछ बुरा

सब ही तो 
अपनी अपनी बात यहाँ समझा रहे हैं

अब जैसे 
कभी
चोर 
पर लिखा दिखता है कहीं अगर
तो कौन सा सिपाही लोग
उसको पकड़ने को जा रहे हैं

बस
लिख 
ले जा रहे हैं हम भी
कुछ कहीं 
करने को नहीं जा रहे हैं

करने वाले 
सब लगे हुऎ हैं करने में
वो कौन सा तुम्हारी तरह
पढ़ने 
को यहाँ आ रहे हैं

या तो
सीख 
लो उन से कुछ करना
नहीं तो 
बस पढ़ लिया करना

अगली बार 
से हम भी 
तुमको बताने ये नहीं जा रहे हैं

हम से 
होता तो है कुछ भी नहीं
सरे आम देख कर आते हैं वहाँ कुछ

अपनी
अंधेरी 
गली में
खम्बा नोचना तक अपना
किसी को भी नहीं दिखा पा रहे हैं ।

चित्र साभार: http://clipart-library.com/

शनिवार, 13 जुलाई 2013

विभीषण या हनुमान बता किसको है चाहता

सारा का सारा  जैसे का तैसा
नहीं सब कह दिया
है जाता

बहकते और भड़कते हुऎ में से
कहने लायक ही उगल दिया
है जाता

कहानिया
तो बनती ही हैं 
मेरे यहाँ भी तेरे यहाँ भी 

बारिशों का मौसम भी होता है माना 
सैलाब लेकिन हर रोज ही नहीं
है आता 

हर आँख
देखती है एक ही चीज को 
अपने अलग अंदाज से 

मुझे दिखता है कुछ
जो 
उसको कुछ और ही
 है नजर आता

राम की कहानी है एक पुरानी 
विभीषण
सुना रावण को छोड़ राम के पास 
है चला जाता 

क्या सच था ये वाकया
तुलसी से कहाँ अब ये किसी से
है पूछा जाता

आज भी तो दिखता है विभीषण 
उधर जाता इधर आता

राम के काम में
है आता
रावण के भी काम भी
है लेकिन आता 

हनुमान जी
क्या कर रहे होते होंगे आज
जिसकी समझ में 
आ गयी होगी मेरी ये बात 

वो भी कुछ यहाँ 
कहाँ कह कर चला
है जाता 

क्योंकि
सारा का सारा 
जैसे का तैसा नहीं सब कह दिया
है जाता ।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

बिल्ला कोई भी लगायेगा आदमी तो हो जायेगा

कितनी
भी बड़ी

तोप

तू
होता होगा


तेरा गोला
चलकर 
भी

फुस्स
हो जायेगा


किसी
भी गलत
मुद्दे को 


 तू
सही
ठहराने
की
मुहिम में
हार जायेगा


कोई भी
तेरे साथ

में नहीं
आ पायेगा


एक ना
एक दिन

लटका
दिया जायेगा


बिना
किसी बात के


मुश्किल
में भी फंसा

कहीं
दिया जायेगा


अपने पत्ते
अगर

नहीं उनको
दिखायेगा


तेरे होने
ना होने से

यहाँ
कुछ नहीं होता


जो भी होता है

माथे पे लिखे हुऎ
बिल्ले से होता है

तेरा होना यहाँ

भाजपा
या काँग्रेस

वाला ही
बता पायेगा


दो में
नहीं होना भी

थोड़ा बहुत
चल जायेगा


तीसरे
फ्रंट से कहीं

तेरा तार
अगर जुड़ा

उन्हें कहीं
दिख जायेगा


मुश्किल
में होने पर

होना कहीं ही
तेरे को
बचा ले जायेगा


एक दिन
तू बचेगा

कभी तू भी
किसी को

बचा कर
निकाल
के
ले आयेगा


कहीं
नहीं होने वाला


अपनी
आवाज से


 बस
कुछ कौऎ


 और
कबूतर ही

उड़ा पायेगा

दल में
नहीं घुस सके


संगठन
से उसके

जा कर भी
अगर
कहीं
जुड़ जायेगा


मुश्किलें
पैदा करना

किसी के लिये भी

तेरे लिये
आसान

बहुत
हो जायेगा


हर कोई

तेरे से

राय फिर
जरूर 
लेने
के लिये आयेगा


चुनाव
के दिनों

को छोड़कर

बाकी
दिनों की

समस्या में

तू

कहाँ है
ये नहीं

देखा जायेगा

तेरे
दर्द के लिये


उधर
वाला भी

अपने झंडे
दिखा 
कर
जलूस बनायेगा


सबके
दिल में

होगा तू
इधर भी

और
उधर भी


तेरा नाम
किसी 
की
जबान पर

कहीं भी
नहीं आयेगा


मेरी
एक पते

की बात
अगर


 तू
मान जायेगा


सोनिया, मोदी,

वृंदा या माया दीदी

में से
किसी की

छाया भी

अगर

कहीं
पा जायेगा


तेरा
अस्तित्व


 उस दिन
उभर 
कर
निखर जायेगा


कौड़ी
का भाव

जो आज है तेरा

करोड़ों
के मोल 
का
हो जायेगा


कुछ
लोगों के

लिये कुछ
करने वालों मे
गिन लिया जायेगा

ये सब
तभी
संभव
हो पायेगा


जब
बिल्ला
कोई एक

माथे पर
आज भी

अपने
लिखवायेगा


ऎसे ही
चलता
रहा

बिना छत्र

छाया के अगर

कौन
तेरा भला

कुछ कर पायेगा

लावारिस
में गिना 

जाता है आज भी

लावारिस
हमेशा

के लिये
हो जायेगा ।

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

किसने बोला कलियुग में रामराज्य नहीं है आता

बाघ बकरी
कभी खेला
जाता था
अब नहीं
खेला जाता

बहुत सी जगह
ये देखा है जाता

बाघ
बकरी की
मदद कर
उसे बाघ
बनाने
में मदद
करने है आता

जहाँ बाघ
बकरी की
मदद कतिपय
कारणों से नहीं
है कर पाता

वहाँ
खुद ही
शहर की
मुर्गियों से
बकरियों के लिये
अपील करवाने
की गुहार
भी है लगाता

बाघ
जिन बकरियों
के साथ है रहता
उनको खाने की
इच्छा नहीं दिखाता

वो बाघ होता है
इतना गया गुजरा
भी नहीं होता

उसके पास इधर
उधर से भी खाने
के लिये बहुत
है आ जाता

बाघ की टीम
का हर सदस्य
बकरियों को
हमेशा ही है
ये समझाता

बाघ
बस बकरियों
को बाघ बनाने के
लिये अपनी
जान है लगाता

जिस बकरी की
समझ में नहीं
आ पाती है बात

उसके हाथ से
बाघ बनने का
स्वर्णिम अवसर
है निकल जाता

बाघ बकरियों को
बाघ बनाने के
लिये ही तो
उनकी लाईन
है लगवाता

अपनी कुछ खास
बकरियों को ही
इसके लिये
मानीटर है बनाता

अब इतना कुछ
कर रहा होता है

अपने लिये भी
कुछ माहौल इससे
बनवा ले जाता

बकरियों का इसमें
कौन सा कुछ
है चला जाता

बकरियों
की मैं मैं
का शोर जब
अखबार में उसकी
फोटो के साथ
छप है जाता

उसका कद थोड़ा
सा लम्बा इससे
अगर हो भी जाता

ये सब भी तो
बाघ बकरी के
खेल में आघे को
काम है आता

बाघ का ऎसा
आत्मविश्वास
कहानियों में भी
नजर नहीं आता

कौन कहता है
राम राज्य अब
कहीं यहा नहीं
पाया है जाता

बाघ बकरियों को
अपने साथ है
पानी तक पिलाता

बस कभी जब
महसूस करता है
बकरियों के लिये
कुछ नहीं कर पाता

शहर की
मुर्गियों से
उनके लिये
झंडे है उठवाता

बकरियों
के लिये
बन जाती है
ये एक बडी़ खबर

अखबार
तो कायल
होता है बाघ का
उसे छींक भी आये
उसकी फोटो अपने
फ्रंट पेज में
है छपवाता

बकरियों पर आई
आफत का होने
जा रहा है समाधान
बाघ का बस
होना ही
बकरियों के साथ
काम के होने का
संकेत है हो जाता

बाघ बकरी
कभी
खेला जाता था
अब
नहीं है
खेला जाता ।

सोमवार, 8 जुलाई 2013

मुझ से पूछने आता तो तेरे को कोई कैसे फंसाता

एक डी एन ए
टेस्ट करवाता है
दो नौकर के साथ
बनी सी डी मामले
में फंस जाता है
तीन का फोन
टेप करके चूजे
क्या होते हैं
टी वी पर
सरे आम सबको
बताया जाता है
हे भगवान !
इतनी पकी उम्र
होने पर भी
तेरा सब कुछ
कैसे इतनी
आसानी से
पब्लिक हो
जाता है
वो भी इतना
जिम्मेदार नेता
जो राज्य से
लेकर देश
को चला
ले जाता है
मेरी समझ
में ये नहीं
आता है
तेरे जैसे
लोगों को
उस जगह
पढ़ने कुछ
दिन के लिये
क्यों नहीं
भेज दिया
जाता है
जहाँ ऎसा
वैसा किताबों
में तो कहीं
नहीं दिखाया
जाता है
लेकिन सब कुछ
बहुत आसानी
से किया जाता है
कोई भी
किसी को
कहीं नहीं
फंसाता है
ना टी वी
में आता है
ना ही अखबार
वाला ही वो
सब बताता है
और ये सब करने
वाले को ही बस
इनाम में कुछ
साथ में दिया
भी जाता है
बाकी बचे हुओं
को अभी भी
बता दिया
जाता है
अगर वो भी
एक दो तीन
की तरह ही
कुछ करना
चाहता है
ऎसे स्कूलों
में क्यों नहीं
कुछ दिन
पढ़ने के
लिये आ
जाता है ।

रविवार, 7 जुलाई 2013

क्यों अपने बेताल की किस्मत का बाजा बजा रहा है


विक्रमादित्य
के 
समय से 

बेताल
फिर फिर पेड़ पर
लौट कर जाता रहा है 

तुझे
हमेशा खुशफहमी
होती रही है 

तेरा बेताल
तुझे छोड़ 
कर
कहीं भी नहीं 
जा पा रहा है 

पेड़ पर
लटकता है 
जाकर जैसे ही वो

तू अपनी आदत से 
बाज नहीं आ रहा है

समय के साथ
जब 
बदलते रहे हैं मिजाज 
विक्रमादित्य के भी
और बेताल के भी 

तू खुद तो
उलझता ही है
बेताल को भी
प्रश्नों में
उलझाता जा रहा है 

बदल ले
अपनी सोच को
और अपने बेताल को भी

नहीं तो
 हमेशा ही कहता
चले जायेगा उसी तरह 

बेताल
फिर फिर लौट 
के पेड़ पर जा कर 
लटक जा रहा है 

देखता नहीं
कितना 
तरक्की पसंद हो चुके हैं
लोग तेरे आस पास के 

हर कोई
अपने बेताल से 
किसी और के बेताल 
के लिये
थैलियाँ 
पहुँचा रहा है

तू इधर
प्रश्न बना रहा है 
उसी सड़क से ही
रोज आता है
जहाँ से बरसों से 
जाता रहा है 

दुख इस बात का 
ज्यादा हो जा रहा है 

ना तो तू अपना 
भला कर पा रहा है

तेरा बेताल भी 
बेचारा आने जाने में 
बूढ़ा तक भी 
नहीं हो पा रहा है 

आदमी लगा है 

अपने
काम निकालता
चला जा रहा है 

उसका बेताल 
यहाँ जो भी करे 
वहाँ तो मेरा भारत 
महान बना रहा है 

तेरे बेताल की
किस्मत
ही फूटी हुई है 

तेरे प्रश्नों
की रस्सी 
से
फाँसी भी नहीं 
लगा पा रहा है 

तू बना
संकलन 
‘ज्यादातर पूछे गये प्रश्न “

कोई
उत्तर लेने देने 
को नहीं आ रहा है 

आज
फिर उसी तरह 
दिख रहा है दूर से 
तेरा बेताल

अपने 
सिर के बाल 
नोचता हुआ

उसी
पेड़ पर 
लटकने को 
चला जा रहा है

जहाँ

तू
उसे जमाने 
से

यूँ ही
लटका रहा है ।

चित्र साभार: 
https://www.storyologer.com/