उलूक टाइम्स: जनवरी 2014

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

सच कहा जाये तो दिल की बात कहने में दिल घबराता है

कितना
कुछ भी

लिख
दिया जाये

वो

लिखा ही
नहीं जाता है

जो

बस
अपने से
ही साझा
किया जाता है

इस पर
लिखना
उस पर
लिखना

लिखते
लिखते
कुछ भी
लिखना

बहुत
कुछ
ऐसे ही
लिखा
जाता है

लिखते
लिखते भी
महसूस होना

कि
कुछ भी
नहीं लिखा
जाता है

हर
लिखने वाला
इसी मोड़ पर

बहुत ही
कंजूस
हो जाता है

पढ़ने
वाले भी
बहुत होते हैं

कोई
पूरा का पूरा
शब्द दर शब्द
पढ़ ले जाता है

बेवकूफ
भी नहीं होता है

फिर भी
कुछ भी नहीं
समझ पाता है

शराफत होती है

बहुत
अच्छा
लिखा है
की टिप्पणी

एक
जरूर दे जाता है

बहुत अच्छा
लिखने वाले को
पाठक ही नहीं
मिल पाता है

एक
अच्छी तस्वीर के

यहाँ बाजार
लगा नजर आता है

 कुछ अच्छा
लिख लेने की सोच

जब तक
पैदा करे कोई
एक कभाड़ी 
बाजार भाव
गिरा जाता है

बहुत से
पहलवान हैं

यहाँ भी
और वहाँ भी

दादागिरी
करने में

लेखक
और
पाठक से
कमतर
कोई नजर
नहीं आता है

दाऊद
यहाँ भी हैं
बहुत से

पता नहीं

मेरा
ख्वाब है
या
किसी और
को भी
नजर आता है ।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

आज के दिन अगर तू नहीं मारा जाता तो शहर का साईरन कैसे टेस्ट हो पाता

सुबह सुबह आज भी
सुनाई दिया जो
रोज सुनाई देता था
आप सोच रहे होंगे
अलार्म जी नहीं
उसकी जरूरत
उनको पड़ती है
जिनको साउंड स्लीप
रोज आती है
किसी भी बात की
चिंता जिन्हे कभी
नहीं सताती है
अपने यहाँ नींंद
उस समय ही
खुल पाती है
जब एक आवाज
कुछ देर हल्की
फिर होते होते
तेज हो जाती है
दूध नहीं लाना है आज
तब महसूस होता है
क्यों दूध भी नल
में नहीं आता है
पानी मिला हुआ
ही तो होता है
पानी के नल में ही
क्यों नहीं दे
दिया जाता है
बाकी सब वही
होना था रोज रोज
का जैसा रोना था
बस ग्यारा बजे
सायरन मेरे शहर में
आज कुछ नया
सा जब बज उठा था
पहले लगा कहीं
आग लग गई होगी
फिर पुराना दिमाग
सोता हुआ सा
कुछ कुछ जगा था
आज की तारीख
पर ही तो कभी
गांंधी मारा गया था
देश के द्वारा
हर साल इसी दिन
मौन रख रख कर
उसका एहसान
उतारा गया था
कितनी किश्ते
बचीं हैं अभी तक
बताया नहीं गया था
क्या पता कुछ
ब्याज जोड़ कर
कुछ और वर्षों के
लिये सरकाया गया था
दो मिनट बाद
फिर बजा साईरन
मेरा शहर उठा उठा
एक साल के लिये
फिर से सो गया था
और मैं भी उठा
दूध की बाल्टी
पकड़ कर घर की
सीढ़ियांं उतरना
शुरु हो गया था । 

बुधवार, 29 जनवरी 2014

पुरानी किताब में भी बहुत कुछ दबा होता है खोलने वाले को पता नहीं होता है

एक
बहुत पुरानी 
सी किताब पर 
पड़ी धूल को झाड़ते ही

कुछ 
ऐसा लगा
जैसे 

कहीं किसी पेज 
पर
कोई चीज 
है अटकी हुई 

जिससे लग रही है 
किताब कुछ पटकी पटकी हुई 

चिपके हुऐ पन्नों के 
खुलने में बहुत ध्यान रखना पड़ा 

सोचना ये पड़ा 

फट ना जाये कहीं 
थोड़ा सा भी रखा हुआ कुछ विशेष 
और
हाथ से निकल 
ना जाये कोई खजाना बरसों पुराना 
या
उसके 
कोई भी अवशेष 

या
शायद
कोई 
सूखा हुआ
गुलाब 
ही दिख जाये 
किसी जमाने की किसी की
प्रेम 
कहानी ही समझ में आ जाये 

ऐसा भी मुमकिन है 
कुछ लोग रुपिये पैसे भी कभी किताबों में 
सँभाला करते थे 

हो सकता है 
ऐतिहासिक बाबा आदम के जमाने का कोई पैसा 
ऐसा निकल जाये 
अपनी खबर ना सही 
फटे नोट की किस्मत ही कुछ सुधर जाये 

किसी शोध पत्र में 
कोई उसपर कुछ लिख लिखा ले जाये 
धन्यवाद मिले नोट पाने वाले को 
नाम पत्र के अंतिम पेज में ही सही 
छप छपा जाये 

शेखचिल्ली के सपने 
इसी तरह के मौकों में समझ में आते होंगे 
किताबों के अंदर बहुत से लोग 
बहुत कुछ रख रखा कर भूल जाते होंगे 

परेशानी की बात
तो 
उसके लिये हो जाती होगी
जिसके 
हाथ
इस तरह की 
पुरानी किताब कहीं से पड़ जाती होगी 

बड़ी मेहनत और 
जतन से
चाकू 
स्केल की मदद से 
बहुत देर में जब सफलता हाथ में आ ही जाती है 

जो होता है अंदर से 
उसे देख कर खुद झेंप आ जाती है 
अपने ही लेख में लिखी
एक इबारत 
पर जब
नजर 
पड़ जाती है 

लिखा होता है 

"इसे इसी तरह से 
चिपका कर उसी तरह रख दिया जाये 
'उलूक' अपनी बेवकूफी किसी को बताई नहीं जाती है" ।

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

क्या किया जाये अगर कोई कुछ भी नहीं बताता है


चलिये

आज
आप 
से ही
पूछ लेते हैं 

कुछ
लिखा जाये 
या
रहने दिया जाये 

रोज लिख लेते हैं 
अपने मन से
कुछ भी 

पूछते भी नहीं 

फिर
आज कुछ 
अलग सा
क्यों 
ना
कर लिया जाये 

अपना लिखना 
अपना पढ़ना 
अपना समझना 
सभी करते हैं 

कौन
किसी से 
पूछ कर लिखता है 

चलिये
कुछ 
नया कर लेते हैं 

आप बताइये 
किस पर लिखा जाये 
क्या
लिखा जाये 
कैसे
लिखा जाये 

जैसे
खाना पकाना 
सब का
अलग 
अलग
होता है 

एक
जैसा भी 
होने से कुछ 
नहीं होता है 

बैगन की
सब्जी 
ही होती है 

एक
बनाता है 
तो
कद्दू
का 
स्वाद होता है 

दूसरे
के बनाने पर 
पूछना
पड़ जाता है 
बैगन
जैसा कुछ 
लग रहा है 

हमारे
शहर के 
पाँच सितारा होटल 
का
एक बहुत
प्रसिद्ध 
खानसामा
इसी तरह 
का
बनाता है 

अरे
परेशान होने 
को
यहाँ कोई भी 
नहीं आता है 

सबको पता होता है 
सब कुछ हमेशा 

कोई
अनपढ़ 
सुना है

क्या 
कहीं कमप्यूटर 
भी चलाता है 


ये तो बस कुछ 
देर का शगल है 

नये जमाने के 
नये लोगों का 

क्या
यहाँ कोई 
किसी बंदर के 
हाथ में अदरख 
है या नहीं 
देखने आता है 

एक जमाने में 
डायरी हुआ करती थी 

कोई
नहीं परेशान 
होता था
इस बात से 
शाम होते ही 
लिखने वाला

अपनी 
दिन भर की कमाई 
सब से छुपा कर 
किस किताब के 
किस पन्ने में 
जमा कर जाता है 

आज
बस रूप 
बदल गया पन्ने का 
आदमी
उसकी पतंग 
बना कर भी 
अगर
उड़ाता है 

कोई
उस पतंग की 
उड़ान को देखने के 
लिये नहीं आता है 

कटी
पतंगें होती है 
कुछ कुछ 
पतंग बाजों की 
उनका आना एक 
मजबूरी उनकी 
हो जाता है 

ये
शक की बीमारी भी 
बहुत बर्बादी ले 
कर आती है 

वो
बस ये देखने 
के लिये आता है 

कहीं
कोई उसकी 
पतंग उड़ाने तो 
नहीं आता जाता है 

बहुत देर से 
पूछ रहा था “उलूक” 
क्या करना है 

नहीं मिला
कोई जवाब 
बाद में मत कहना 
जो मन में आये 
यहाँ लिख लिखा कर 
चला जाता है ।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

क्यों तू लिखे हुऐ पर एक्सपायरी डाल कर नहीं जाता है

ऐसा कुछ भी नहीं है
जो लिखा जाता है
आदत पड़ जाये
किसी को तो क्या
किया जाता है
बहुत दिन तक
नहीं चलता है
लिखे हुऐ को
किसी ने नहीं
देखा कहीं
रेफ्रीजिरेटर में
रखा जाता है
दुबारा पलट कर
देखने वैसे भी तो
कोई नहीं आता है
एक बार भी आ गया
तब भी तो बहुत
गजब हो जाता है
बिकने वाला सामान
भी नहीं होता है
फिर भी पहले से ही
मन बना लिया जाता है
एक्स्पायरी एक दिन
की ही है बताना भी
जरूरी नहीं हो जाता है
दाल चावल बीन कर
हर कोई खाना चाहता है
कुछ होते है जिन्हें
बस कीड़ोँ को ही
गिनने में मजा आता है
रास्ते में ही लिखता
हुआ चलने वाला
मिट जाने के डर से भी
लौट नहीं पाता है
शब्द फिर भी
कुचला करते हैं
आसमान पढ़ते हुऐ
चलने वाला भी
उसी रास्ते से
आता जाता है
बड़ी बड़ी बातें
समझने वाले
और होते हैं
जिनके लिखने
लिखाने का हल्ला
कुछ लिखने से
बहुत पहले ही
हो जाता है
"कदर उल्लू
की उल्लू ही
जानता है 

चुगत हुमा को
क्या खाक
पहचानता है"
उलूक की
महफिल में
ऐसा ही एक शेर
किसी उल्लू के मुँह
से ही यूँ ही नहीं
फिसल जाता है ।

रविवार, 26 जनवरी 2014

कोई गुलाम नहीं रह गया था तो हल्ला किस आजादी के लिये हो रहा था

गुलामी थी सुना था
लिखा है किताबों में

बहुत बार पढ़ा भी था
आजादी मिली थी

देश आजाद हो गया था
कोई भी किसी का भी
गुलाम नहीं रह गया था

ये भी बहुत बार
बता दिया गया था

समझ में कुछ
आया या नहीं
बस ये ही पता
नहीं चला था

पर रट गया था
पंद्रह अगस्त
दो अक्टूबर
और
छब्बीस जनवरी
की तारीखों को
हर साल के नये
कलैण्डर में हमेशा
के लिये लाल कर
दिया गया था

बचपन में
दादा दादी ने
लड़कपन में
माँ पिताजी ने
स्कूल में
मास्टर जी ने
समझा और
पढ़ा दिया था

कभी
कपड़े में
बंधा हुआ
एक स्कूल या
दफ्तर के डंडे
के ऊपर
खुलते खुलते
फूल झड़ाता
हुआ देखा था

समय के साथ
शहर शहर
गली गली
हाथों हाथ में
होने का फैशन
बन चला था

झंडा ऊंचा
रहे हमारा
गीत की
लहरों पर
झूम झूम कर
बचपन
पता नहीं
कब से कब तक
कूदते फाँदते
पतंग उड़ाते
बीता था

जोश इतना था
किस चीज का था
आज तक भी
पता ही नहीं
किया गया था

पहले समझ थी
या अब जाकर
समझना
शुरु हो गया था

ना दादा दादी
ना माँ पिताजी
ना उस जमाने के
मास्टर मास्टरनी
में से ही कोई एक
जिंदा बचा था

अपने साथ था
अपना दिमाग
शायद
समय के साथ
उस में ही कुछ
गोबर गोबर सा
हो गया था

आजादी
पाने वाला
हर एक गुलाम
समय के साथ
कहीं खो गया था

जिसने
नहीं देखी सुनी थी
गुलामी कहीं भी
वो तो पैदा होने से
ही आजाद हो गया था

बस
झंडा लहराना
उसके लिये साल के
एक दिन जरूरी
या
शायद मजबूरी
एक हो गया था

कुछ भी कर ले
कोई कहीं भी कैसे भी
कहना सुनना कुछ
किसी से भी
नहीं रह गया था

देश भी आजाद
देशवासी भी आजाद
आजाद होने का
ऐसे में क्या
मतलब रह गया था

किसी
को तो
पता होता
ही होगा

जब एक
'उलूक' तक
अपने कोटर में

तिरंगा लपेटे
“जय हिंद”
बड़बड़ाते हुऐ

गणतंत्र
दिवस के
स्वागत में
सोता सोता
सा रह गया था ।

शनिवार, 25 जनवरी 2014

किसी की दुखती रग पर क्या इसी तरह हाथ रखा जाता है

सुबह सुबह उठते
ही कोई पूछ बैठे
कल के बारे में
तो वही बता पाता है
जिसको आज के
बारे में बहुत कुछ
विस्तार से समझ
में आता जाता है
उस के लिये कोई
कुछ नहीं कर सकता है
जिसकी सोच में
मोच आने से बहुत
लोच आ जाता है
अब ये भी कोई
प्रश्न हुआ पूछना
क्या आपके वहाँ भी
गणतंत्र दिवस
मनाया जाता है
प्रश्न कठिन भी
नहीं होता है
पर घूमा हुआ
दिमाग ऐसे में
कलाबाजी खा
ही जाता है
एक एक अर्जुन
अपने हाथ में
अपनी मछली की
आँख को लिया हुआ
तीर से कुरेदता हुआ
सामने सामने ही
दिखने लग जाता है
ऐसे में जवाब
दिया ही जाता है
जी हाँ बिल्कुल
मनाया जाता है
गणों के द्वारा
हमारे तंत्र में भी
गणतंत्र दिवस
हमेशा हर वर्ष
जैसा हर जगह
मनाया जाता है
झंडा भी होता है
तिरंगा भी होता है
जय हिंद का नारा
भी जोर शोर से
लगाया जाता है
सारे देश भक्त
जरूर दिखते हैं
उस दिन दिन में
अखबार में समाचार
भी फोटो शोटो
के साथ आता है
सारे अर्जुनोँ की
मछलियों की आँख
और तीर में ही
मगर हमेशा की तरह
हर गणतंत्र दिवस में
'उलूक' का ध्यान
भटक जाता है
देश भक्ति का
सबूत देने का मौका
आते आते हमेशा ही
उसके हाथ से
इसी तरह फिर
एक बार छूट जाता है ।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

तेरे से ये उम्मीद नहीं थी जो तू कर रहा है

क्यों रे

बहुत
उछल रहा है

सुना है

आजकल
कुछ कुछ

कहीं
लिख विख रहा है

क्या लिख रहा है

बुरी बात ये है  

कुछ भी हमें
कहीं से भी

तेरे बारे में
पता नहीं
चल रहा है

भाई
क्यों इतना
परेशान कर रहा है

बता
क्यों नहीं 
देता
साफ साफ
क्या कर रहा है

लिखता भी है
तो कुछ ऐसा

सुना गया है
जिसे कोई भी
नहीं पढ़ रहा है

जो पढ़ भी रहा है
हमे बताने के लिये
कि तू क्या कर रहा है

उसके पल्ले भी

कुछ भी नहीं
पड़ रहा है

समझ में
नहीं आ रहा है

पहले तो
कभी नहीं
किया तूने
पिछले पचास
सालों में जो

इस
उम्र में
पहुँच कर
आज तू
कर रहा है

किसने
कहा तुझसे
ऐसा करने को

ये भी
जानने का
बहुत मन
कर रहा है

कोई
नहीं बताता
कौंन है तेरे पीछे

जो तुझे
उकसा कर
ये सब
कर लेने को
मजबूर
कर रहा है

जब
कोई कहीं
कुछ नहीं
कर रहा है

किसी ने
किसी बात पर

कहीं
कुछ कहा हो
की बात पर

कहाँ
किसी को
कोई फर्क
पढ़ रहा है

गोलियाँ
चल रही हैं

लाइसेंस
होने ना होने
की बात
कौन कर रहा है

कई
मर रहे हैं

किसी ने
नहीं कहा
कि कोई बुरा
कर रहा है

फिर
तू कैसे
इतने दिनों से
मौज कर रहा है

लाइसेंस
लिखने का
किसने दे दिया तुझको

जो
मन में आये
किसी के लिये

कुछ भी
लिख मर रहा है

कितने
दिनों तक
पायेगा चैन
ओ बैचेन उलूक

जल्दी ही
लिखने लिखाने
वालों पर भी
कर लग रहा है ।

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

पता होता है फूटता है फिर भी जानबूझ कर हवा भरता है


पानी में
बनते 
रहते हैं बुलबुले
कब बनते हैं कब उठते हैं 
और कब फूट जाते हैं

कोशिश करना 
भी
चाहता है 
कोई
छाँटना 
एक बुलबुला अपने लिये
मुश्किल में जैसे फँस जाता है

जब तक
नजर 
में आता है एक
बहुत सारों को 
अगल बगल से बन कर फूटता हुआ
देखता 
रह जाता है

कुछ ही देर में 
ही
बुलबुलों से 
ही जैसे सम्मोहित हो जाता है

कब बुलबुलों के 
बीच का ही
एक 
बुलबुला खुद हो जाता है
समझ ही नहीं पाता है

बुलबुलों को 
कोमल अस्थाई और अस्तित्वहीन
समझने की कोशिश में
ये 
भूल जाता है
बुलबुला एक क्षण में ही 
फूटते फूटते अपनी पहचान बना जाता है

एक फूटा नहीं 
जैसे हजार पैदा कर जाता है

ये और वो भी 
इसी तरह रोज ही फूटते हैं

रोज भरी 
जाती है हवा
रोज उड़ने की कोशिश करते हैं

अपने उड़ने की छोड़ 
दूसरे की उड़ान से उलझ जाते हैं
इस जद्दोजहद में 
कितने बुलबुले फोड़ते जाते हैं

बुलबुले पूरी जिंदगी 
में
लाखों बनते हैं 
लाखों फूटते हैं
फिर भी बुलबुले ही कहलाते हैं

ये और वो भी 
एक बार नहीं
कई बार फूटते हैं 
या फोड़ दिये जाते हैं

इच्छा आकाँक्षाओं की 
हवा को
जमा भी 
नहीं कर पाते हैं
ना वो हो पाते हैं ना ये हो पाते हैं

हवा भी यहीं 
रह जाती है
बुलबुले बनते हैं 
उड़ते भी हैं फिर फूट जाते हैं

सब कुछ
बहुत कुछ 
साफ कह रहा होता है
सब
सब कुछ 
समझते हुऐ भी 
नासमझ हो जाते हैं
फूटते ही
हवा 
भरने भराने के
जुगाड़ में
लीन और 
तल्लीन हो जाते हैं ।

चित्र साभार: https://pngtree.com/

बुधवार, 22 जनवरी 2014

"बहुत खूब ... बहते हुए शब्द कहीं दूर निकल गए पर अंत में फिर मुकाम पे ले आए आप उन्हें" दिगम्बर नसवा जी ने कहा "उलूक उवाच पर" क्या खूब कहा

'उलूक' की 20/01/2014 की पोस्ट

पर दिगम्बर नसवा जी की
टिप्पणी
"बहुत खूब ...
बहते हुए शब्द कहीं दूर निकल गए पर अंत में फिर मुकाम पे ले आए आप उन्हें ..."
पर निकले उदगार

भोगना और भोगे हुऐ को
शब्दों में  जैसे का तैसा उतार देना
हो ही नहीं पाता है

लाख कोशिश करने के बाद भी
कहीं ना कहीं
थोड़ा सा ही सही भटका ही जाता है

मनस्थिति
समय के साथ समय के अनुसार
रूप बदलने में बहुत माहिर होती है
सच कहें तो बहुत ही शातिर होती है

अपनी ही होने से भी कुछ नहीं होता है

पता होता है हर एक को अपने बारे में
बहुत कुछ साफ साफ
अपना देखा अपना लिखा
अपना जैसा ही होता है

बात तो तब होती है
जब किसी और की समझ में
थोड़ा थोड़ा सा उसमें से
निथर कर आ जाता है

लिखने और पढ़ने की आदत
हर कोई तो डाल नहीं पाता है
 
बहुत सुखी होता है
जो ना लिखता है ना पढ़ता है
बस कुछ का कुछ करता चला जाता है

एक ही शब्द घूमता हुआ एक आईना हो जाता है
एक ही के लिये हर चक्कर के बाद
एक नया अर्थ ले आता है

बिरले होते हैं जिनके लिये 
हर रास्ता एक पहचान हो जाता है

चलते चलते
कौन खो रहा है कहाँ
और कहाँ पहुँच कर
फिर से अपने को पा जाता है

सागर की गहराई को नाप लेना किसी चीज से

एक बड़ी बात हो जाने में नहीं आता है

बात तो तब होती है
जब पानी के रंग को देख कर कोई
पानी की कहानी घर बैठे बैठे सुना जाता है

पढ़ना फिर समझना किसी और के मन को
उसके लिखे शब्दों से
हर ऐसे वैसे को कहाँ आ पाता है

पर जो सीख लेता है करते करते लिखते पढ़ते
बिना काटे और चखे
कितना मीठा है एक फल
वही और वही बता पाता है

भटकना भी सँभलने का एक तरीका हो जाता है
अगर कोई प्यार से समझा ले जाता है ।

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

होने होने तक ऐसा हुआ जैसा होता नहीं मौसम आम आदमी जैसा हो गया

मौसम का मिजाज था
कोई आदमी का नहीं
मनाये जाने तक
ये गया और वो गया
कहने कहने तक
थोड़ा कुछ नहीं
बहुत कुछ हो गया
उजाला हुआ फिर
अंधेरा अंधेरा
सा हो गया
कोहरा उठा
अपने पीछे छिपा
ले गया सारे दृश्य
खुद को ही खोज लेना
जैसे बहुत दूभर हो गया
कुछ देर के लिये
थम सा गया समय
जैसे घड़ी को एक
घड़ी में कोई चाभी देने
से हो रह गया
बूँदा बाँदी होना
शुरु होना था
पानी जैसे इतने में
ही बहुत हल्का होकर
रूई जैसा हो गया
धुँधला धुँधला हुआ
कुछ कुछ होते होते
सब जैसे सुर्ख सफेद
चादर जैसा हो गया
शांत हुआ इतना हुआ
जैसे बिना साज के
सँगीतमय वातावरण
सारा हो गया
कहीं गीत लिखा गया
मन ही मन में
किसी के मन से एक
काल जैसे कालजयी
किसी और के
लिये कहीं हो गया
कहीं उकेरा गया
किसी की नर्म
अंगुलियों से एक चित्र
सफेद बर्फ की चादर पर
जिसे देख देख कर
चित्रकार ही दीवाना
दीवाना सा हो गया
एक शाम से लेकर
बस एक ही रात में
जैसे एक छोटा सा
सफर बहुत ही
लम्बा हो गया
समाधिस्त होता हुआ
भी लगा कहीं
कोई पेड़ या पहाड़
सब कुछ कुछ पल
के लिये जैसे
साधू साधू हो गया
एक लम्बी रात के
गुजर जाने के बाद
का सूरज भी होते होते
जैसे कुछ पागल
पागल सा हो गया
नहाया हुआ सा दिखा
हर कण आस पास का
जैसा कुछ कुछ गुलाबी
गुलाबी हो गया
प्रकृति के एक खेल को
खेलता हुआ जैसे
एक मुसाफिर
देर से चल रही एक
गाड़ी पर फिर से
सवार होकर
रोज के आदी सफर पर
कुछ मीठी खुश्बुओं को
मन में बसाकर
रवाना हो गया
मौसम का मिजाज
जैसे फिर से
आम आदमी के
रोज के मिजाज
का जैसा हो गया ।

सोमवार, 20 जनवरी 2014

अच्छा होता है कभी कभी बिजली का लम्बा गुल हो जाना

अपनी इच्छा से
नहीं कर लेना चाहता है
बिजली गुल
कोई कभी बहुत देर के लिये

पर बिजली आदमी तो नहीं होती है
फिर भी हो जाती है बंद भी कभी कभी

दूर बहुत दूर तक अंधेरा ही अंधेरा
जैसे थम सी जाती हो जिंदगी
फिर जलते हैं दिये और मोमबत्ती
जिनकी रोशनी में कर्कश शोर नहीं होता है

जो देता है बस एक सुकून सा

बारिश के बाद का आसमान धुला धुला सा
रात को भी काला नहीं
आसमानी हो उठता है
बहुत साफ नजर आते हैं तारे

जैसे पहचान के कुछ लोग
मिल उठे हों
एक बहुत लम्बी सी जुदाई के बाद

टिमटिमाते हुऐ जैसे पूछते भी हों
हाल दिल का

इच्छा भी उठती है कहीं से बहुत तीव्र
देख लेने की और सोच लेने की

कुछ देर के लिये ही सही
तारों की बस्ती में
ढूँढ रहा हो कोई अपना ही अक्स

कुछ ही क्षण में
हो जाता है जैसे आत्मावलोकन

साफ पानी में जैसे दिखा रहा हो
सब शीशे की तरह
तेज भागती हुई  जिंदगी का सच

कुछ देर का विराम
बता देता है असलियत
खोल देता है कुछ बंद खिड़कियाँ

जिनकी तरफ देखने की भी फुरसत
नहीं होती है दौड़ते हुऐ दिनों में

और बहना महसूस होता है
कुछ ठंडी सोच का

कुछ रुक रुक कर ही सही
बहुत आगे बढ़ जाने के बाद

ऐसे ही समय महसूस होता है
अच्छा होता है कभी कभी यूँ ही लौट लेना
बहुत और बहुत पीछे की ओर भी
जहाँ से चलना शुरु हुऐ थे हम कभी

पर ऐसा होता नहीं है
बिजली रोज आती है जाती बहुत कम है
बहुत कम कभी कभी बहुत दिनो के लिये ।

शनिवार, 18 जनवरी 2014

बहुत भला होता है भले के लिये ही भला कर रहा होता है

ऐसा नहीं है कि भला 
करने वाले नहीं है
बहुत हैं बहुतों का
भला करते हैं
अब इसमें क्या बुराई है
कि ऐसा करने से
उनका भी कुछ कुछ
थोड़ा थोड़ा सा
भला हो जाता हो
सपने बेचना भी
ऐसे ही लोगों को
ही आता है
कभी सपनों के लिये
कहीं कुछ लिया
दिया गया हो
किसी कागज के
पन्ने में लिखा हुआ
नहीं पाया जाता है
 

बहुत भले लोग होते हैं
किसी के लिये
खुद बा खुद
सोच तक देते हैं
समझा भी देते हैं
जब ऐक सोच ही
रहा हो किसी एक
चीज को बनाने में
तो दूसरे को क्या
जरूरत है अपने
दिमाग को उसी
के लिये भिड़ाने में
आकाश होता है
उनका बहुत ही बड़ा
कोई रोक नहीं होती है
किसी के लिये भी
उनके आकाश में
उड़ान भरने की
बस एक ही बात का
रखना पड़ता है ध्यान
गुस्ताखी नहीं
होनी चाहिये कभी भी
उनके आकाश की
सीमा पार कर जाने की
सिखा भी दिया जाता है
एक आकाश होते हुऐ
एक दूसरा आकाश
नहीं बनाया जाता है
जब एक पहले से
काम में लाया
जा रहा होता है
उड़ान भरने के लिये
अपना अपना बना के
कोई अकेले अकेले जो
क्या उड़ा जाता है
भले लोगों का
आकाश भी होता है
उड़ानेंं भी होती हैं
सोच भी होती है
सपने भी होते हैं
भले लोग ही होते हैं
जो सब कुछ खुद
कर रहे होते हैं
और जिसके लिये
ये सब कुछ
हो रहा होता है
वो कुछ भी नहीं
कर रहा होता है
उसका तो बस
और बस भला
और भला ही
हो रहा होता है ।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

समय के साथ मर जाने वाले लिखे पढ़े को छापने से क्या होगा

पेड़ की शाख पर ही
बैठ कर देखा था
जटायू ने भी
बहुत कुछ उस समय
बहुत कुछ बताया भी था
मरते मरते तक भी
राम को सीताहरण
का आँखों देखा हाल
तुलसीदास जी तो
लिख भी गये थे
रामचरित मानस में
जंगल के बीच हुआ
सारा का सारा बबाल
दूरियाँ बहुत थी
बात जाती ही थी
बहुत दूर तलक जब
निकल ही लेती थी
गजल तब भी बनती थी
संगीत भी दिया जाता था
अपसरायें भी उतर लेती थी
कभी कभी ऊपर
आसमान से नीचे
इस धरती पर
धरती पर ही जैसे
एक स्वर्ग उतर आता था
लिखा गया होगा
जरूर कहीं ना कहीं
सच भी होगा
एक कहाँनी नहीं होगी
जरूर इतिहास के किसी
मोड़ का वर्णन होगा
और इसी लिये तो
उस जमाने का राम
आज तक जिंदा होगा
औरत का अपहरण
और उसके घर से
उसके निष्काशन का बिल
उस समय की संसद में
ही पास हो गया होगा
इसी लिये बेधड़क
हिम्मती लोगों के द्वारा
आज तक प्रयोग
हो रहा होगा
बस राम राज्य की
कल्पना को कहीं
ऊपर से संशोधन
के लिये लौटा
दिया गया होगा
जटायू को दूर तक
नहीं देखने की
चेतावनी भी तभी
दे दी गई होगी
एक उल्लू भी तभी से
हर शाख पर बैठा
दिया गया होगा
और इन्ही उल्लुओं
की खबर छापने के लिये
उल्लुओं में सबसे उल्लू
को एक अखबार निकालने
के लिए कह
दिया गया होगा
इतिहास भी होगा
सीता और राम
भी चलता चलेगा
तुलसीदास की
रामचरित मानस की
रायल्टी के लिये
सुप्रीम कोर्ट का
फैसला भी होगा
उल्लूक की समझ में
नहीं आई तो बस
यही बात कि उसने
उल्लूक के अखबार
की किताब छाप लेने
को क्यों कहा होगा
शायद उसे मालूम
हो गया होगा
आने वाले समय में
कूड़े के व्यापार में ही
नुकसान कम और
नफा ज्यादा होगा !

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

क्या हुआ अगर खुद लिख कर खुद ही कोई समझ रहा है

रात रात भर
भौंक रहा है
आजकल घर का
पालतू कुत्ता
भौंक रहा है तो
भौंक रहा है
रोकने की कोशिश
भी जारी है
पर फिर भी कुछ
कहीं नहीं हो रहा है
अब जब आदमी को
मौका मिल रहा है
स्कूल जाने का
तो पढ़ लिख
ले रहा है
कोई कहीं भी उसे
रोक नहीं रहा है
जो नहीं जा पा
रहा है स्कूल
वो पढ़े लिखों की
संगत में रहकर
पढ़ने लिखने की
सोच ले रहा है
क्या बुरा कर रहा है
जहाँ तक कुछ
लिख लेने की
बात आती है
लिखना बस
चाहने तक की
बात होती है
हर कोई कुछ ना कुछ
लिख ही ले रहा है
अब कौन लिख रहा है
क्या लिख रहा है
क्यों लिख रहा है
किस पर लिख रहा है
किसी को इस सब से
कहाँ कोई मतलब
जैसा ही हो रहा है
खाना खाता है हर कोई
एक समय मिल गया
तो भी ठीक
नहीं तो कोई दो दो समय
भी अपना पेट भर रहा है
सुबह से लेकर शाम तक
कभी ना कभी फारिग
भी हो ले रहा है
चल रहा है होना ही है
इसलिये हो रहा है
किसी के फारिग
हो लेने से किसी को
क्या कोई फर्क पड़ रहा है
क्या किया जाये अगर
दिमाग किसी का
चल रहा है
चल रहा है तो
चल रहा है
कमप्यूटर के प्रिंटर का
रिफिल जो क्या है
कह दिया जाये
आज खाली हो रहा है
बाजार में नया
नहीं मिल रहा है
फर्क बस इतना है
कि पालतू कुत्ता
अकेला भौं भौं
नहीं कर रहा है
पूरी रात भौकता है
जब एक बार
शुरु कर रहा है
शहर के हर कोने से
कोई ना कोई जानवर
पालतू या आवारा
उसका साथ देने में
कोई कसर भी
नहीं कर रहा है
बात अलग है
कि उलूक के पल्ले
कुछ नहीं पड़ रहा है
इतना सोच कर बस
खुश हो ले रहा है
कि पढ़े लिखे होने का
असर कहीं तो
किसी पर पड़ रहा है !

बुधवार, 15 जनवरी 2014

मकर संक्रांति दूसरी किस्त में देखिये क्या क्या हुआ

जिस बात के होने
का अंदेशा था वही
और बस वही
होता हुआ दिखा
सुबह सुबह की छोड़िये
शाम तक भी कौऐ ने
मैं आ गया हूँ नहीं कहा
वैसे तो पता था
यही होना है
कौआ पिछले कई सालों से
कहाँ मिल पा रहा है
और जरूरी नहीं है
जो एक बार हुआ हो
वही कई कई बार
होना ही होना होता हो
पर्दा उठा हो
नाटक एक हुआ हो
जली हुई मोमबत्तियाँ
अपने हाथों में लेकर
एक लड़की के लिये
जैसे कभी शहर
पागल हो गया हो
सफेद टोपियाँ ही टोपियाँ
गली गली में हल्ला गुल्ला
चोर चोर की जगह
मोर मोर हो गया हो
पर्दा जब गिर गया हो
उसके बाद किसे
को पता नहीं चला हो
क्या क्या नहीं हो गया हो
जिंदा मीट के एक
सफेद पोश व्यापारी का
रंगे हाथों पकड़ा जाना
उसी छोटे से शहर के लिये
इस बार एक छोटी
सी खबर हो गया हो
शोर शराबा टोपी मोमबत्ती
का टाईम ठंडे बस्ते
में जा कर सो गया हो
इतना काफी नहीं है क्या
समझने के लिये
क्या पता कौआ भी अब
कौआ ही ना रह गया हो
एक मुर्गा या कबूतर
जैसा कुछ हो गया हो
ऐसा होना गिना जाता होगा
किसी जमाने में
अचम्भे जैसा होने में
अब कुछ भी कैसा भी
कहीं भी हो जाना
एक नार्मल बात हो गया हो
कौआ बहुत ज्यादा
समझदार हो गया हो
लोकल मुद्दों पर प्रतिक्रिया
नहीं देकर राष्ट्रीय धारा में
गोते लगाना सीख ही गया हो
इसलिये मकर संक्रांति को
आना उसने छोड़ ही दिया हो !


मंगलवार, 14 जनवरी 2014

साल भर नहीं नहाने वाला भी आज के दिन कम से कम नहाता है

अंग्रेजी
में स्नेल
हिंदी का
होता है
घोंघा
या शँबुक

हमारे
यहाँ कह
दिया
जाता है
उसे एक
गनेल

मकर
संक्राति
के दिन
सुबह सुबह
मुनादि
घर वाली
की ओर
से कर
दी जाती है

जो बस यह
बताती है
आज के
दिन को
कहीं कहीं
नरहर भी
कह दिया
जाता है
आज के दिन
नहाना बहुत
ही जरूरी
माना जाता है

जो आज नहीं
नहा पाता है
अगले जन्म में
मनुष्य ही नहीं
बन पाता है
एक गनेल
हो जाता है

जो बहुत
ही धीरे धीरे
चलता है
कहीं भी नहीं
पहुँच पाता है

बुढ़ापा
आना
शुरु हो
चुका है
जब ये
महसूस
होने लग
जाता है
दो घंटे पहले
श्रीमती जी का
दिया आदेश
जब याद
ही नहीं
रह पाता है

किस्मत
का मारा
एक शौहर
खाने की
मेज में
बैठे हुऐ
परिवार को
खाना खाते
हुऐ देखकर
बिना नहाये ही
आज के दिन
खाना खाने
के लिये
बैठ जाता है

एक तो
काले कौओं
का त्योहार
उसपर एक
भी कौआ
कहीं भी
दूर दूर तक
नजर नहीं
आता है

होता भी
होगा कहीं
पर घर पर
बने हुऐ
पकवानों
को अब
खाने को
नहीं
आता है

जंगल
रहे नहीं
कव्वों
को सीमेंट
का जंगल
शायद
जगह जगह
उगा हुआ
पसंद भी
नहीं आता है

मेहनत से
पकाने
पड़ते हैं
बहुत सारे
पकवान
जिनको
माला में
एक पिरोया
जाता है

दूसरे दिन
मुँह अँधेरे
कौओ को
पुकारा
जाता है

कहना
होता है
“काले काले
घुघुती
माला खाले”
जो बचपन
की याद
बहुत
दिलाता है

आ जाते थे
उस समय
ढेरों कौए
कहाँ कहाँ से
इस जमाने
का कौआ
पता नहीं
कहाँ रह
जाता है

श्रीमती जी
करती हैं
बहुत सारी
मेहनत
त्योहार
मनाना बहुत
जरूरी हो
जाता है

ऐसे में
किसे नहीं
आयेगा क्रोध
अगर कोई
सौ बार
कह देने के
बाद भी
एक
शुद्ध दिन
नहा कर
ही नहीं
आ पाता है !

सोमवार, 13 जनवरी 2014

आज की बड़ बड़ “नैनीताल समाचार” वालों के लिये

बड़े बड़े अखबार
रोज सुबह घर के
दरवाजे पर हॉकर
आकर फेंक जाता है
मजबूरी होती है
उठाना ही होता है
आदमी या उसका
कोई आदमी जाकर
उठा ही लाता है
अखबार के हिसाब से
बाजार के हिसाब से
छोटी छोटी ज्यादा
बड़ी खबर कुछ कम
या खबर की कबर
की खबरें ढूँढने में
बहुत ज्यादा कुछ
मजा सा नहीं आता है
गड्ढे में घुसी हुई
कुछ गाड़ियाँ कुछ लाशें
कुछ घायल कुछ मुआवजा
कुछ अस्पताल में
मौत की सजा
सुनाये गये जच्चा बच्चा
अपने देश अपने प्रदेश
की जवानी के राज
खोल के जाता है
इंतजार रहता है
मगर कुछ छोटे
अखबारों का
जो रोज रोज नहीं
आ पाता है
कभी कभार अब
दिखने वाला डाकिये
के पास अब यही काम
ज्यादा पाया जाता है
खबरें ऐसी की पढ़कर
मजा आ जाता है
अब आप कहोगे
ऐसी कौन कौन सी
खबर होती हैं जिसे
पढ़ने में मजा
भी आता जाता है
मुख्य पृष्ठ पर एक कविता
“उदास बखत के रमोलिया”
एक जिंदा कवि
कुछ कोशिश करके
जैसे लाशों को जगाता है
चौथे पन्ने पर
थपलियाल जी का लेख
"चरित्रहीन शिक्षक कैसे
गढ़ सकेगा अच्छा समाज"
जैसे मुँह चिढ़ाता है
प्रवीण तोमर के
लेख का शीर्षक
“अध्यापक राजनीतिबाज
शिक्षा तवायफ और
समाज तमाशाबीन

पढ़कर ही दिल
गद्गद हो जाता है
जगमोहन रौतेला का लेख
“केंद्र के अधीन करने से
 कैसे सुधरेंगे विश्वविद्यालय”
सबका ध्यान कूड़े दान
हो रहे प्रदेश के
विश्वविध्यालयों की तरफ
आकर्षित कर ले जाता है
अब ये बात अलग है
एक छोटा सा अखबार
अपनी बड़ी बड़ी
खबरों के साथ
जिन पाठकों के
हाथ में जाता है
उन लोगोँ के पास
सड़ी मानसिकता
वाली बातों की खबरों को
निडरता से कह देने
वालो के लिये बस "वाह"
कह देने से ही
मामला यहीं पर
खत्म हो जाता है
जो कुछ नहीं
कर सकता कहीं
अखबार और
अखबार वालों को
“जी रया” का आशीर्वाद
खुश हो कर देते हुऐ
अपनी भड़ास
थोड़ी सी ही सही
मिटा ले जाता है ! 

रविवार, 12 जनवरी 2014

मिर्ची क्यों लग रही है अगर तेरी दुकान के बगल में कोई नयी दुकान लगा रहा है

माना कि
नयी
दुकान एक

पुरानी
दुकानों के 
बाजार में
घुस कर

कोई
खोल बैठा है

पुराना ग्राहक
इतने से में ही
पता नहीं
क्यों आपा
खो बैठा है

खरीदता है
सामान भी
अपनी ही
दुकान से
धेले भर का

नयी
दुकान के
नये ग्राहकों को

खाली पीली

धौंस
पता नहीं

क्यों
इतना देता है


अपने
मतलब
के समय

एक दुकानदार
दूसरे
दुकानदार को

माल
भी
जो चाहे दे देता है


ग्राहक
एक का

बेवकूफ जैसा

दूसरे के
ग्राहक से

खाली पीली
में
ही
उलझ लेता है


पचास साठ
सालों से

एक्स्पायरी
का सामान

ग्राहकों को
भिड़ा रहे हैं


ऐसे
दुकानदारों के

कैलेण्डर

ग्राहक

अपने अपने
घर पर

जरूर लगा रहे हैं

माल सारा
दुकानदारों

के खातों में ही
फिसल के जा रहा है

बाजार
चढ़ते चढ़ते

बैठा दिया
जा रहा है


नफा ही नफा
हो रहा है


पुरानी
दुकानों को

थोड़ा बहुत
कमीशन


ग्राहकों में
अपने अपने

पहुंचा दिया
जा रहा है


ग्राहक
लगे हैं
अपनी
अपनी
दुकानो के

विज्ञापन
सजाने में


कोई
अपने घर का

कोई
बाजार का
माल
यूं ही
लुटा रहा है


क्या फर्क
पड़ता है

ऐसे में

अगर कोई

एक नई दुकान
कुछ दिन के
लिये
ही सही
यहाँ लगा रहा है


खरीदो
आप अपनी
ही
दुकान का
कैसा भी सामान


क्यों
चिढ़ रहे हो

अगर कोई
नयी दुकान

की तरफ
जा रहा है


बाजार
लुट रही है

कब से
पता है तुम्हें भी


फिर
आज ही
सबको

रोना सा
क्यों आ रहा है


बहुत जरूरी
हो गया है

अब इस बाजार में

एक
अकेला कैसे

सारी बाजार
को लूट कर


अपनो में ही
कमीशन

बटवा रहा हैं

तुम करते रहो धंधा 

अपने इलाके में
अपने हिसाब से

एक नये
दुकानदार की

दुकानदारी

कुछ दिन

देख लेने में
किसी का क्या
जा रहा है ?

शनिवार, 11 जनवरी 2014

राय देने में कहाँ कहता है कोई खर्चा बहुत ज्यादा ही होता है

कुछ ऐसा क्यों 
नहीं लिखता कभी 
जिसे एक गीत की 
तरह गाया जा सके 
तेरे ही किसी
अंदाज को
 
एक हीरो की तरह 
उस पर फिल्माया 
भी कभी जा सके 
रहने भी दीजिये 
इतना भाव भी
खाली मत बढ़ाइये 
लिखने के लिये 
लिखने वाले बहुत 
पाये जाते हैं यहा 
हजूर
हमें बख्श दीजिये
 
खजूर के पेड़ पर 
इस तरह तो ना 
मजबूर कर चढ़ाइये 
अब जब पहुँच ही 
गये हैं आप हमारी 
हिसाब लिखने 
की दुकान तक 
हमें लिखने से 
कोई मतलब नहीं 
रहता है कभी भी 
इस बात को थोड़ा 
समझते हुऐ
अब जाइये
 
श्रीमती जी भी परेशान 
किया करती थी बहुत

दिनों तक हमारे लिखने 
लिखाने को लेकर
उनसे भी बोलना 
पड़ा एक दिन इसी 
तरह से दुखी होकर 
समझा करो कभी 
हमारी भी मजबूरी 
भाग्यवान
थोड़ा सा
 
हमारी तरह होकर 
तुम तो सारा कूड़ा 
रसोई का कूड़ेदान में 
डालकर फारिग 
हो जाती हो 
कुछ ना कुछ 
कर धर कर 
हमसे कुछ तो 
होता नहीं कहीं भी 
फिलम भी अब 
बनती है हर कोई 
किसी ना किसी 
विलेन को ही लेकर 
वही निकलता है 
गली से अंत में 
देखने सुनने वालों 
का भगवान होकर 
गीत भी उसका 
लिखता वही है 
संगीत भी उसी का 
सुनाई देता है 
सब नाचते गाते हैं 
उसी को कंधों पर
अपने रख कर 
हीरो कहीं पिटता है 
कहीं बरतन उठाता 
हुआ दिखाई देता है 
गीत हीरो पर 
फिल्माया
गया हुआ
 
क्या आपको
अब भी
 
कहीं दिखाई
देता है
 
या समझ
लूँ मैं
 
इस बात
को इस तरह
 
की मुझ में
ही आपको
 
आज का कोई 
विलेन एक 
दिखाई देता है |