उलूक टाइम्स: जनवरी 2015

शनिवार, 31 जनवरी 2015

एक को चूहा बता कर हजार बिल्लियों ने उसे मारने से पहले बहुत जोर का हल्ला करना है


बाअदब
बामुलाहिजा
होशियार

बाकी
सब कुछ
तो ठीक है
अपनी अपनी
जगह पर

तुम एक
छोटी
सी बात
हमको भी
बताओ यार

शेर के खोल
पहन कर
कब तक करोगे
असली शेरों
का शिकार

सबसे
मनवा
लिया है
सब ने मान
भी लिया है
कबूल कर
लिया है

सारे के सारे
इधर के भी
उधर के भी
हमारे और
तुम्हारे
तुम जैसे

जहाँ कहीं
पर जो भी
जैसे भी हो
शेर ही हो

उसको
भी पता है
जिसको
घिर घिरा
कर तुम
लोगों के
हाथों
बातों के
युद्ध में
मरना है

मुस्कुराते हुऐ
तुम्हारे सामने
से खड़ा है

गिरा भी लोगे
तुम सब मिल
कर उसको

क्योंकि एक के
साथ एक के युद्ध
करने की सोचना
ही बेवकूफी
से भरा है

अब बस एक
छोटा सा काम
ही रह गया है

एक चूहे को
खलास करने
के लिये ही

सैकड़ों
तुम जैसी
बिल्लियों को
कोने कोने से
उमड़ना है

लगे रहो
लगा लो जोर

कहावत भी है
वही होता है जो
राम जी को
पता होता है

जो करना
होता है
वो सब
राम जी ने ही
करना होता है

राम जी भी
तस्वीरों में तक
इन दिनों कहाँ
पाये जाते हैं

तुम्हारे
ही किसी
हनुमान जी
की जेबों
में से ही
उन्होने भी
जगह जगह
अपना झंडा
ऊँचा करना है

वो भी बस
चुनाव तक

उसके बाद
राम जी कहाँ
हनुमान जी कहाँ

दोनो को ही
मिलकर
एक दूसरे
के लिये
एक दूसरे के
हाथों में
हाथ लिये

विदेश
का दौरा
साल
दर साल
हर साल
करना है ।

चित्र साभार: www.bikesarena.com

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

बापू इस पुण्यतिथी पर आप ही कुछ नया कर लीजिये

बापू अब तो
कुछ नया
कर लीजिये
बहुत पुरानी
हो गई
धोती आपकी
नई डिजायन
कर करवा कर
डिजायनर
कर लीजिये
इतना गरीब
भी नहीं रहा
अब देश कि
आप धोती से
ही बदन
छुपाते रहें
आठ दस लाख
की सिल्क धोती
कम से  कम
पहन कर
जनता के
सामने आने
की अपनी
आदत कर लीजिये
जन्मदिन के तोहफे
जन्मदिन पर फिर
सुझा देंगे आपको
अभी बहुत दिन हैं
पुण्यतिथी पर
पहनियेगा नहीं भी
कोई बात नहीं
खरीद कर
बिकवाने की बात
ही कर लीजिये
गुजरात की या
हिंदुस्तान की सफेद
धोती हो ये भी
जरूरी नहीं
कौन पूछ रहा है
ग्लोबलाइजेशन
का फंडा सिखा
कर लंदन से ही
आयात कर लीजिये
हमने तो ना
आप को देखा बापू
ना ही आपकी
धोती को कभी
कहीं नजर तो
आइये कभी
धोती हाथ में
लेकर ही सही
आमना सामना
तो कर लीजिये
आदत हो गई है
‘उलूक’ को अब
झूठ के साथ
सफल प्रयोग
कर लेने की
कुछ हमें कर
लेने दीजिये नया
नये जमाने की
नयी चोरियाँ
आप बस फोटो में
बने रहने की
अपनी आदत अब
पक्की कर लीजिये ।

चित्र साभार: shreyansjain100.blogspot.com

बुधवार, 28 जनवरी 2015

उसके आने और उसके जाने का फर्क नजर आ रहा है

सात समुंदर पार
से आकर
वो आईना
दिखा रहा है
धर्म के नाम पर
बंट रहे हो
बता रहा है
पता किसी
को भी नहीं था
वो बस इतना
और इतना ही
बताने के लिये
तो आ रहा है
धूम धड़ाम से
फट रहे हों
पठाके खुशी के
कोई खुशफहमी
की फूलझड़ी
जला रहा है
दिल खोल के
खड़े हैं राम भक्त
पढ़ रहे हैं साथ में
हनुमान चालिसा भी
हनुमान अपने को
बता कर कोई
मोमबत्तियाँ
बाँट कर
जा रहा है
एक अरब
से ज्यादा
के ऊपर थोपा
गया मेहमान
मुँह चिढ़ा कर
सामने सामने
धन्यवाद
हिंदी में
बोल कर
जा रहा है
अपनी अपनी
सोच और
अपनी अपनी
समझ है यारो
तुम लोगों का
अमेरिका होगा
’उलूक’ को
दूसरा पाकिस्तान
नजर आ रहा है
कुछ नहीं हो
सकता आजाद
होने के बाद
आजादी का
नाजायज फायदा
एक गुलाम और
उसका बाप
उठा रहा है
विवेकानंद भी
हंस रहा है
ऊपर कहीं
सुना है
मेरे भाई बंधुओ
जनता से
कहने का
नुकसान उसे
आज समझ मे
आ रहा है ।
चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

गुलामी से आजादी तक का सवाल आजादी से आजादी तक हर तरफ उत्तर प्रश्नो का अकाल

कुछ अलग
ही अहसास
आज का
विशेष दिन

कुछ आजाद
आजाद से
हो रहे हों जैसे
सुबह सुबह से ही कुछ खयाल

उत्पाती बंदरों
का पता नहीं
कहीं दूर दूर तक

रोज की तरह
आज नहीं पहुँचे
घर पर करने

हमेशा की
तरह के
आम आदमी
की आदत में
शामिल हो चुके धमाल

शहर के स्कूल
के बच्चों की
जनहित याचिका
बँदरो के खिलाफ

असर दो दिन में
न्यायाधीश भी
बिना सोचे
बिना समझे
कर गया हो जैसे ये एक कमाल

दिन आजाद
गणों के तंत्र की
आजादी के
जश्न का

जानवर भी
हो गया
समझदार

दे गया
उदाहरण
इस बात का
करके गाँधीगिरी
और नहीं करके
एक दिन के लिये कोई बबाल

साँप सपेरों
जादूगरों
तंत्र मंत्र के
देश के गुलाम

आजादी के
दीवानों को ही
होगा सच में पता

बंद रेखा के
उस पार से
खुली हवा में
आना इस पार

जानवर से
हो जाना ग़ण
और मंत्र का
बदलना तंत्र में
और आजाद देश
मे आजाद ‘उलूक’ एक बेखयाल

उसके लिये
आजादी का
मतलब

बेगानी शादी और
दीवाना अब्दुल्ला हर एक नये साल

एक ही दाल
धनिये के
पीले पत्तों
को सूँघ कर
देख लेना होते हुऐ
हर तरफ माल और हर कोई मालामाल

बंदों का वंदे मातरम
तब से अब और
बंदरों का सवाल
तब के और अब के

समझदार को
इशारा काफी
बेवकूफों के लिये
कुर्सियाँ सँभाल

वंदे मातरम से
शुरु कर
घर की माँ को
धक्के मार कर घर से बाहर निकाल ।

चित्र साभार: nwabihan.blogspot.com

रविवार, 25 जनवरी 2015

सोनी और मोनी की है जोड़ी अजीब सजनी अमीर साजन गरीब

मित्रता समपन्न
और विपन्न
के बीच में

चर्चा
जोर शोर की
खबरें आने की
अमीर की
महीने भर की

खबरें जाने की
अमीर की
फिर महीने भर तक

गरीब की झोपड़ी में
गरीबी का उजाला
स्वाभिमानी
कुछ नहीं माँगता
अपने लिये
सम्मानित कर
तो दिया
उसने आकर
कदम से कदम
मिला कर
मातृभाषा से बात
शुरु कर दिल
दिमाग और मन
तक खरीद डाला

जमाना भी
सिखा रहा है
रिश्तों की नई
परिभाषा गढ़ना
अपने घर के
तोड़ कर पड़ोसी
के घर के लिये
बुन लेना सुंदर
फूलों की माला

बातें होना
बातों में
मिठास होना
चेहरे होना
चेहरों पर
मुस्कान होना

बातें सुन सुन कर
बातें समझने
की आदत
बातों बातों में
ही हो लेना

कई जमाने से
कुछ नहीं होते रहने
की आदत को फिर से
कुछ होने की आहटों
में ही डुबो डाला

करामाती अमीरजादों
के राजकुमार के
आने की खुशी में
गरीबजादों के
गरीबखाने की गरीबी
को कितनी आसानी से
चुटकी में चाशनी चाशनी
में डुबो डुबो कर
मिठास से धो डाला

लेते रहिये स्वाद
जीभ में आज कल
परसों और
बरसों के लिये

इंतजार के साथ
चाकलेटी ख्वाबों का
आने वाला है जल्दी ही
हर हाथ में पंद्रह लाख
के बाद का करोड़पति
स्वादिष्ट निवाला ।

चित्र साभार:
www.dailymail.co.uk

शनिवार, 24 जनवरी 2015

आदमी होने से अच्छा आदमी दिखने के जमाने हो गये हैं

आदमी होने
का वहम हुऐ
एक या दो
दिन हुऐ हों
ऐसा भी नहीं है
ये बात हुऐ तो
एक दो नहीं
कई कई
जमाने
हो गये हैं
पता मुझको
ही है ऐसा
भी नहीं है
पता उसको
भी है वो बस
कहता नहीं है
आदमी होने के
अब फायदे
कुछ भी नहीं
रह गये हैं
आदमी दिखने
के बहुत ज्यादा
नंबर हो गये हैं
दिखने से आदमी
दिखने में ही
अब भलाई है
आदमी दिखने
वाले आदमी
अब ज्यादा ही
हो गये है
आम कौन है
और खास
कौन है आदमी
हर किसी के
सारे खास
आदमी आम
आदमी हो गये हैं
हर कोई आदमी
की बात करने
में डूबा हुआ है
आज बहुत
गहराई से
आदमी था
ही नहीं कहीं
बस वहम था
एक जमाने से
इस वहम को
पालते पालते
हुऐ ही कई
जमाने हो गये हैं ।

चित्र साभार: www.picthepix.com

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

खुले खेतों में शौच विज्ञापनों की सोच दूरदर्शन रेडियो और समाचार दोनो जगह दोनो की भरमार अपनी अपनी समझ अपने अपने व्यापार

रेल की
पटरी पर
दौड़ती हुई
एक रेलगाड़ी
एक दिशा में

और
दूर जाते
उल्टी 

दिशा में
भागते हुऐ
पेड़ पौँधें
मैदान खेत
पहाड़
सब कुछ
और
बहुत कुछ

अपना देश
अपने दृष्य
अपनी सोच भी
दौड़ती हुई
साथ में
रुकती हुई कुछ
अटकते हुऐ
मजबूर करते हुऐ

सोचने के लिये
कुछ शौच पर भी

सामने दिखते हुऐ
खुले आकाश के नीचे
शौच पर बैठे हुऐ
एक के बाद एक
थोड़े से नहीं
बहुत से लोगों को

सूरज
और उसकी
रोशनी का भी
कोहरे से छुपने
का एक
असफल प्रयास
हो रहा हो जैसे

थरथराती
निकलती
दौड़ती
रेलगाड़ी
बेखबर
जैसे
दिखते हुऐ पर
कुछ कहने की
उसे जरूरत नहीं

और
शौच पर
क्या कुछ
कहा जाये

हर चीज पर
कुछ लिख
लिया जाये
इसकी भी
मजबूरी नहीं

फिर गर्व
होता हुआ
सा कुछ कुछ
घर पर बने
शौचालयों पर

और कुछ
कुछ इतना
पढ़े लिखे
भी होने पर

सोच सके जो
शौच की सोच
शौच और
शौचालय पर
दिखाये जा रहे
विज्ञापनों को

अंतर उनमें
और मुझ में
बस इतना
वो विज्ञापन
देखते हैं
और
चले आते हैं
खुले आकाश
के नीचे

और मैं
अपनी
बंद सोच
के साथ
शौच के बाद
दूरदर्शन
पर बैठा
देख रहा
होता हूँ
एक विज्ञापन
शौच की
सोच का

अब शौच
भी कोई
विषय है
सोच कर
कुछ लिख
लेने के लिये
कौन समझाये
किस को ?

चित्र साभार: www.michellehenry.fr

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

खुली बहस होने से अच्छा बंद आँखों से देखना होता है किताबों से बाहर की एक बात जब किसी दिन बताई जाती है

एक लम्बे अर्से से
कूऐं की तलहटी
से मुँडेर तक की
छोटी सी उछाल में
सिमटी हुई जिंदगी
रंगीन हो जाती है
जब एक कूऐं से
होते होते सोच
एक दूसरे कूऐं में
दूर जाकर कहीं
डूब कर तैर कर
नहा धो कर आती है
कई नई बातें सीखने
को मिलती हैं और
कई पुरानी बातों की
असली बात निकल
कर सामने आती है
जरूरी होता है पक्ष
में जाकर बैठ जाना
उस समय जब विपक्ष
में बैठने से खुजली
शुरु हो जाती है
बहस करने की
बात कहना ही एक
गुनाह के बराबर होता है
उस समय जब
अनुशाशन के साथ
शाशन के मुखोटे
बैचने वालों के
चनों में भूनते भूनते
आग लग जाती है
आ गया हो फिर
समय एक बार
दिखाने का अक्ल से
घास किस तरह
खाई जाती है
लोकतंत्र का मंत्र
फिर से जपना
शुरु कर चलना
शुरु कर चुकी होती हैं
कुछ काली और
कुछ सफेद चींंटियाँ
अखबार के सामने
के पन्ने रेडियो
दूर दर्शन में
हाथी दिखाई जाती है
बहुत छोटी होती है
यादाश्त की थैलियाँ
चींंटियों के आकार के
सामने कहाँ कुछ
याद रहता है
कहाँ कुछ याद करने
की जरूरत ही रह जाती है
कृष्ण हुऐ थे
किस जमाने में
और इस जमाने में
गीता सुनाई जाती है
कतारें चींंटियों की
फिर लगेंगी युद्ध
होने ना होने की
बातें हो ना हों
दुँदुभी हर किसी
के हाथ में
बिना आवाज
की बजती
दिखाई जाती है
मेंढकी खयाल ही
सबसे अच्छा
खयाल होता है
अपने कुऐं में
वापस लौट कर
आने पर बात पूरी
समझ में आती है ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

गांंधी सुना है आज अफ्रीका से लौट के घर आ रहा है

घर वापसी
किस किस की
कहाँ कहाँ से और
कब कब होनी है
कोई भी हो
लौट ही तो रहा है
तेरी सूरत किसलिये
रोनी रोनी है
नया क्या कोई
कुछ करने जा रहा है
तेरे चेहरे पर पसीना
क्यों आ रहा है
गांंधी जी
ना मैंने देखे
ना तूने देखे
बस सुनी सुनाई
बात ही तो है
क्या कर गये
क्या कह गये
किस ने समझा
किस ने बूझा
चश्मा लाठी
चप्पल बचा के
रखा हुआ है और
हमारे पास ही तो है
कौन सा उनका भूत
उन सब का प्रयोग
फिर से करने
आ रहा है
कर भी लेगा तो
क्या कर लेगा
गांंधी जी भी
एक मुद्दा हो चुका है
झाड़ू की तरह
उसे भी प्रयोग
किया जा रहा है
बहुत कुछ छिपा है
इस पावन धरती पर
धरती पकड़ भी हैं
बहुत सारे
हर कोई एक नया
मुद्दा खोद के
ले आ रहा है
सूचना क्रांंति का
कमाल ही है ये भी
मुद्दे के सुलझने
से पहले दूसरा मुद्दा
पहले मुद्दे का
घोड़ा बना रहा है
घोड़े से नजर
हटा कर सवार
को देखने देखने तक
एक नया मुद्दा
तलवार का
सवार मुद्दे के हाथ में
थमाया जा रहा है
चिंता हो रही है तो
बस इस बात की
आज के दिन गांंधी के
लौटने की खबर का
मुद्दा गरमा रहा है
कहीं सच में ही
आ गये लौट
के गांंधी जी उस
पवित्र जमीन पर
जहाँ आज हर कोई
अपने आप को
गाँधी बता रहा है
क्या फर्क पड़ना है
उन गांंधियों को
जिनका धंधा आज
ऊँचाईयों पर छा रहा है
दूर आसमान से
देखने से वैसे भी
दिखता है जमीन पर
गांंधी हो या हाथी हो
कोई चींटी जैसा कुछ
इधर से उधर को
और उधर से इधर को
आ जा रहा है
नौ जनवरी को
पिछले साल तक
‘उलूक’ तक भी
नहीं जानता था
इस साल वो भी
गांंधी जी के
इंतजार में
बैठ कर
वैष्णव जन
तो तैने कहिये
गा रहा है ।

चित्र साभार: printablecolouringpages.co.uk

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

खबरची और खबर कर ना कुछ गठजोड़



जरूरत है एक खबरची की 
जो बना सके एक खबर मेरे लिये और बंटवा दे 
हर उस पन्ने पर लिख कर 
जो देश के ज्यादातर समझदार लोगों तक पहुँचता हो 

खबर ऐसी होनी चाहिये 
जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं हो 
और जिसके होने की संभावना कम से कम हो 

शर्त है मैं खबर का राकेट छोड़ूंगा हवा में
और वो उड़ कर गायब हो जायेगा 

खबर खबरची फैलायेगा 
फायदा जितना भी होगा राकेट के धुऐं का 
पचास पचास फीसदी पी लिया जायेगा 

कोई नहीं पूछता है खबर के बारे में 

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा 
बहस का एक मुद्दा हो जायेगा 

वैसे भी ऐसी चीज जिसके बारे में 
किसी को कुछ मालूम नहीं होता है 
वो ऐसी खबर के बारे में पूछ कर
अज्ञानी होने का बिल्ला अपने माथे पर क्यों लगायेगा 

इसमें कौन सी गलत बात है अगर एक बुद्धिजीवी 
दूध देने वाले कुत्तों का कारखाना बनाने की बात कहीं कह जायेगा 

कुछ भी होना संभव होता है 
वकत्वय अखबार से होते हुऐ पाठक तक तो 
कम से कम चला जायेगा 

कारखाना बनेगा या नहीं बनेगा किसको सोचना है 
कबाड़ी अखबार की रद्दी ले जायेगा 
हो सकता है आ जाये सामने से फिर खबरची की खबर
भविष्य में कहीं सब्जी की दुकान में सामने से 
जब सब्जी वाला खबर के अखबार से बने लिफाफे में 
आलू या टमाटर डाल कर हाथ में थमायेगा 

जरूरत है एक खबरची की 
जो मेरे झंडे को लेकर एवरेस्ट पर जा कर चढ़ जायेगा 
ज्यादा कुछ नहीं करेगा बस झंडे को 
एक एक घंटे के अंतर पर हिलायेगा । 

चित्र साभार: funny-pictures.picphotos.net

बुधवार, 7 जनवरी 2015

इंद्रियों को ठोक पीट कर ठीक क्यों नहीं करवाता है

कान
आँख नाक
जिह्वा त्वचा
को इंद्रियां
कहा जाता है

इन
पाँचों के अलावा

ज्ञानी
एक और की
बात बताता है

छटी इंद्री

जिसे
कह दिया जाता है

गाँधी जी ने
तीन बंदर चुने

कान आँख
और जिह्वा
बंद किये हुऐ

जिनको
बरसों से

यहाँ वहाँ
ना जाने
कहाँ कहाँ

दिखाया जाता है

सालों
गुजर गये
थका नहीं
एक भी बंदर
उन तीनों में से

भोजन पानी
का समय
तक आता है
और
चला जाता है

नाक बंद
किया हुआ बंदर
क्यों नहीं था
साथ में इन तीनो के

इस बात
को पचाना
मुश्किल हो जाता है

गाँधी जी
बहुत
समझदार थे
ऐसा कुछ
किताबों में
लिखा पाया जाता है

झाड़ू भी
नहीं दे गये
किसी एक बंदर
के हाथ में

ये भी
अपने आप में
एक पहेली
जैसा हो जाता है

जो भी है
अपने लिये तो
आँखो से देखना ही
बबाल हो जाता है

आँखे बंद
भी कर ली जायें

तो कानो में
कोई फुसफुसा जाता है

कान
बंद करने की
कोशिश भी की
कई बार

पर
अंदर का बंदर
चिल्लाना शुरु
हो जाता है

एक नहीं
अनेकों बार

महसूस
किया जाता है

‘उलूक’
तुझ ही में
या तेरी
इंद्रियों में ही
है कोई खराबी कहीं

आशाराम
और
रामपाल की
शरण में
क्यों नहीं
चला जाता है

ज्यादा लोग

देखते
सूँघते सुनते
महसूस करते हैं
जिन जिन बातों को

तेरे
किसी भी
कार्यकलाप में
उसका जरा सा भी
अंश नहीं आता है

सब की इंद्रियाँ
सक्रिय होती हैं

हर कोई
कुछ ना कुछ
कर ही ले जाता है

तुझे
गलतफहमी
हो गई है
लगता है

छटी इंद्री
कहीं होने की
तेरे पास

इसीलिये
जो कहीं
नहीं होता है

उसके
होने ना होने
का वहम
तुझे
जाता है ।

चित्र साभार: bibliblogue.wordpress.com

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

नदी में लगी आग और मछलियों की मटरगश्ती

नदी में आग
लगी हुई है
और मछलियाँ
पेड़ पर चढ़ कर
सोई हुई हैं

अब आप कहेंगे
नदी में किसने
आग लगाई
मछलियाँ पेड़ पर 

किसने चढ़ाई

अरे इतना भी नहीं
अगर जानते हो
तो इधर उधर
लिखे लिखाये को
छलनी हाथ में
लेकर क्यों छानते हो

होना वही होता है
जो राम ने रचा
हुआ होता है

राम कौन है
पूछने से पहले
सोच लेना होता है
रहना होता है या
नहीं रहना होता है

राम को तो
माननीय
कुरैशी जी
तक जानते हैं
और जो राम को
नहीं जानते हैं
उनको वो बहुत ही
बदनसीब मानते हैं

अब ये नहीं कहना
मुझको नहीं पता है
अखबार में मुख्य पृष्ठ
पर उनका ऐसा ही
कुछ वक्तव्य छपा है

उनका हर हितैशी
उस अखबार के
पन्ने को फ्रेम करवा
कर मंदिर की दीवार
में मढ़ रहा है
जिनको पता है
देवों की धरती पर
राम का जहाज
उतरवाने का कोई
जुगाड़ कर रहा है

राम तो ऊपर से
नीचे को आना
भी शुरु हो गये है
पर तबादले की
खबर सुनकर
भद्रजन ठीक समय
पर सड़कों को छोड़
पैदल सड़कों पर
चलना शुरु कर गये हैं

ऐन मौके पर राम के
जहाज के पैट्रोल का
पैसा देने वाले
मुकर गये हैं
राम भी सुना है
देवभूमी की ओर
आने के बजाये
पूरब की ओर
जाना शुरु हो गये हैं

कुछ भी हो
जब से आये हैं
पालने राज्य को
राम राम करते करते
राममय हो गये हैं

आते आते तो
किये ही कई काम
कई काम जाते जाते
भी जाने से पहले
की तारीखें लिख
कर कर गये हैं

कुछ छप्पर वालों
को छप्पर फाड़
कर दे गये हैं
कुछ पक्की
छत के मकान
छ्प्पर लगवाने
लायक भी नहीं
रह गये हैं

उन्ही की कृपा है
दो चार गधे घोड़े
की बिरादरी में
शामिल हो गये हैं
और दो चार घोड़े
गधों में मिलाने
के काबिल हो गये हैं

उनके आने पर
कौन कितना
खुश हुआ है और
उनके जाने पर
किस को कितना
दुख: हुआ है
जो है सो है
होनी को तो होना है
आप को लेकिन
परेशान नहीं होना है
पानी में लगी आग से
पानी का कुछ
नहीं होना है

और मछलियाँ
तो मछलियाँ है
कहीं भी चली जायेंगी

आज पेड़ पर
चढ़ी दिख रही है
कल को आसमान
में उड़ जायेंगी
तेरे को तेरे घर में
और मेरे को
मेरे घर में ही
बस रोना है ।

चित्र साभार: www.bigstockphoto.co

सोमवार, 5 जनवरी 2015

चूहे मारने वाली बिल्लियों को कुत्तों की देखभाल करने के काम दिये जाते हैं

एक नहीं कई जगहों पर
कोयले मोहर लगाते हैं
सब कुछ काला काला
हो जाता है फिर भी
कव्वे शोर नहीं मचाते हैं
हीरे बहुत से होते हैं
कोयलों के बीच से ही
कोयलों में से ही कुछ
दब दबा कर
बन बना जाते हैं
यहाँ कोयले कहने से
मतलब उड़ती काली
चीज से मत
निकाल बैठियेगा
वो बात अलग है
कोयला जला के
काला हुआ पदार्थ
कोयल से भी
बनाया जा सकता है
जब कोयल को हम
आग में जलाते हैं
बात कोयले के मोहर
लगाने से शुरु हुई थी
भटक गई उड़ती
चिड़िया के पंखों की
फड़फड़ाहट में
घबराने की बात नहीं है
घबराने वाले ही
असली जगह पर
हीरों को कोयलों से
कम आँके जाने का
हिसाब किताब बना
कर सिखाते हैं
कोई भी दो आँखों वाला
आँखों को कष्ट नहीं देता है
हर सजावट की जगह पर
हीरे नहीं आने दिये जाते हैं
राज काज राजा को
ही चलाना होता है
समझदार लोग भी
राजकाज में मदद
करने के लिये आते हैं
काम दिया जाने से पहले
जरूरी होता है बताना
अपने काम करने
की अच्छाईयों को
दूध देने वाली गायों को
बकरी कटने वाले
कारखाने के रास्ते
पर दौड़ाते हैं
सीख लेते हैं
इस कलाकारी
को जो भी कलाकार
दीवार पर लगी सीढ़ी में
बहुत ऊपर तक
चढ़े नजर आते हैं
जिसको आता है
दीवार पर चूना लगाना
सीढ़ी पकड़े उसे गिरने से
रोकते हुऐ नजर आते हैं ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

रविवार, 4 जनवरी 2015

है तो अच्छा है नहीं है तो बहुत अच्छा है


नया कहने के लिये उठ लिया जाये 
अच्छा है 
रहने दें नींद ही में रह लिया जाये 
तो भी अच्छा है 

खयाल के
खाली चावलों को बीनते बीनते नींद आ जाती है 
थोड़ा खयाली पुलाव पका लिया जाये 
अच्छा है 

उनको आता है खयाल के घोड़े दौड़ाना 
अपना गधा भी कम नहीं है 
गधा है फिर भी अच्छा है 

पाँच के दस के और बीस के नोट 
बहुत पुराने हैं मगर अच्छे हैं 
पंद्रह पच्चीस के भी आ जायें छप कर
और अच्छा है 

उसकी बारूद की टोकरी की खबर उसने दी 
अच्छा है 
इसने फोड़ कर उसके सिर में 
पीठ थपथपा ली अपनी 
बहुत अच्छा है 

इसका दिल है धड़कता है 
ये भी अच्छा है 
उसका दिल है धड़कता है 
वो भी अच्छा है 

अच्छी बात करना सबसे अच्छा है 
अच्छा दिन है अच्छी रात है 
बहुत अच्छा है 

अच्छी खबरें है अच्छी बात हैं 
जो है सो है बहुत अच्छा है 

और फिर से नया कहने के लिये 
उठ लिया जाये अच्छा है 
रहने दें नींद ही में रह लिया जाये 
और अच्छा है । 

चित्र साभार: www.christart.com

शनिवार, 3 जनवरी 2015

नया साल नई दुल्हन चाँद और सूरज अपनी जगह पर वही पुराने

जुम्मा जुम्मा
ले दे के
खीँच खाँच के
हो गये
तीन दिन
नई दुल्हन के
नये नये
नखरे
जैसे मेंहदी
लगे पाँव
दूध से
धुले हुऐ
अब तेज भी
कैसे चलें
पीछे से
पुराने दिन
खींचते हुऐ
अपनी तरफ
जैसे कर रहे हों
चाल को
और भी धीमा
कोई क्या करे
जहाँ रास्ते को
चलना होता है
चलने वाले को
तो बस खड़े
होना होता है
वहम खुद के
चलने का
पालते हुऐ
तीन के तीस
होते होते
मेंहदी उतर
जाती है
कोई पीछे
खींचने वाला
नहीं होता है
चाल
अपने आप
ढीली
हो जाती है
तीन सौ पैंसठ
होते होते
आ गया
नया साल
जैसे नई दुल्हन
एक आने
को तैयार
हो जाती है
चलने वाले को
लगने लगता है
पहुँच गया
मंजिल पर
और
आँखे कुछ
खोजते हुऐ
आगे कहीं
दूर जा कर
ठहर जाती हैं
कम नहीं
लगता अपना
ही देखना
किसी चील
या
गिद्ध के
देखने से
वो बात
अलग है
धागा सूईं
में डालने
के लिये
पहनना
पड़ता हो
माँग कर
पड़ोसी से
आँख का चश्मा
कुछ भी हो
दुनियाँ चलती
रहनी है
पूर्वाग्रहों
से ग्रसित
‘उलूक’
तेरा कुछ
नहीं हो सकता
तेरे को शायद
सपने में भी
नहीं दिखे
कभी
कुछ अच्छा
दिनों की
बात रहने दे
सोचना छोड़
क्यों नहीं देता
अच्छा होता है
कभी चलते
रास्तों से
अलग होकर
ठहर
कर देखना
चलता हुआ
सब कुछ
साल गुजरते
चले जाते हैं
नये सालों
के बाद
एक नये
साल से
गुजरते
गुजरते ।

चित्र साभार: galleryhip.com

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

मजबूत बंधन के लिये गठबंधन की दरकार होती है


कठिन नहीं बहुत आसान होता है
बंधन बहुत छोटा 
और गठबंधन आसमान होता है 

गठबंधन नहीं होता है जहाँ 
अंदर अंदर ही घमासान होता है

बंधन होने से कहीं भी 
बंधने वाला बहुत परेशान होता है 
मोटी रस्सी में बंधी छटपटाती 
एक छोटी सी जान होता है

गठबंधन होने से 
सभी का जीना आसान होता है
कई जिस्म होते हैं कई जाने होती हैं 
पता कहाँ चलता है कहाँ दीन कहाँ ईमान होता है 

भूल जाता है हमेशा 
घर में भी तो होता है और यही होता है 
आज से नहीं कई जन्मों से होता है

माँ का बाप से बच्चों का माँ बाप से 
पति का पत्नी से होता है 

बंधन से शुरु होता है 
चलता है बहुत धीमे धीमे 
गठबंधन होते ही वही सब कुछ 
दौड़ने के लिये तैयार होता है 

क्या होता है अगर धर्म का धर्म से नहीं होता है 
दिखाये भी कोई दिखावे के लिये 
तब भी बहुत कमजोर होता है 

क्या होता है अगर अधर्म का अधर्म से होता है 
और बहुत मजबूत होता है 

कैसा होगा 
पहले से कहाँ महसूस होता है 

शादी होने के बाद देखा जाये अगर 
ज्यादातर शुरु होता है 

बंधन होने से ही कुछ नहीं होता है 
जब तक गठबंधन नहीं होता है 

फिर गठबंधन से एक सरकार बनती 
देख कर ‘उलूक’ क्यों तुझे कंफ्यूजन होता है 

गठबंधन के लिये दिया गया जनादेश 
नीचे से नहीं कहीं उपर से 
दिये आदेश का प्रकार होता है 

ईश्वर और अल्लाह की 
एक नहीं कई बैठकों के बाद निकला 
सरकार बनाने का आदेश 
सबसे जानदार होता है

ऊपर की बड़ी बातों को 
छोटी नजर से देखने वाले का 
मुहँ काला और नजरिया बेकार होता है 

बंधन हमेशा कमजोर और गठबंधन
हमेशा 
जोरदार होता है ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

नया साल कुछ नये सवाल पुराने साल रखे अपने पास पुराने सवाल

शायद कोई
चमत्कार होगा
और जरूर होगा
पहले कभी
नहीं हुआ तो
क्या होता है
इस बार होगा
पक्का होगा
असरदार होगा
हो सकता है
दो या तीन
बार होगा
हमेशा होते
रहने की आशा
या सोच नहीं
पक रही है कहीं
खाली दिमाग
के किसी
बिना ईधन
के चूल्हे में
दो या तीन
नहीं भी सही
एक ही बार सही
क्या पता
वो इस बार होगा
हर साल आता है
नया साल
पुराने साल
के जाते ही
इस बार भी
आ गया है
आज ही आया है
पुराना हिसाब
वहीं पीछे
छोड़ के आया है
या बैंक के खाते
के हिसाब की तरह
कुछ कुछ काम
का आगे को भी
सरकाया है
पहला पहला
दिन है साल का
अभी हाथ में
ही दिख रही है धूनी
जमाने का मौका
ही नहीं मिल पाया है
पिछले साल भी
आया था एक साल
इसी जोशो और
खरोश के साथ
जानते थे जानने वाले
चलेगा तो चलेगा
आँखिर कितना
बस एक ही तो साल
जमे जमाये
इस से पहले
क्यों नहीं कर
दिये जायें खड़े कुछ
अनसुलझे सवाल
उलझा इतना
कि साफ साफ
महसूस हुआ साल भर
कि सँभलते संभलते
भी नहीं संभल पाया है
नये साल की हो चुकी है
आज से शुरुआत
बस यही पता नहीं
कुछ चल पाया है
कि समझदार है बहुत
और सवाल अनसुलझे
पिछले साल के
अपने साथ में
ले कर आया है
या बेवकूफ है
‘उलूक’ तेरी
तरह का ही एक
खुद उलझने के
लिये सवालों से
नये सवालों
का न्योता
सवाल खड़े
करने वालों को
पिछले साल से ही
दे कर आया है ।

चित्र साभार: www.happynewyear2015clipart.in