उलूक टाइम्स: 2010

सोमवार, 18 जनवरी 2010

मन प्रदूषण

मेरे मन
के
ग्लेशियर
से

निकलने
वाली गंगा

तेरे प्रदूषण
को
घटते बढ़ते

हर पल
हर क्षण
महसूस किया
है मैंने

भोगा है
तेरे गंगाजल
के
काले भूरे
होते हुवे 
रंग को

विकराल 
होते हुवे 

तेरी शांत 
लहरों को

बदलते हुवे
सड़ांध में

तेरी
भीनी भीनी
खुश्बू को

और ऎसे
में अब

मेरी 
सांस्कृ्तिक
धरोहर

मैं खुद
ही चाहूंगा

ये
ग्लेशियर
खुद बा खुद
सूख जाये

ताकि मेरे
मन से 
बहने वाली
पवित्र गंगे

तू मैली
ना कहलाये ।

रविवार, 17 जनवरी 2010

भ्रम

आदमी 
क्यों चाहता है
अपनी ही शर्तों पर जीना

सिर्फ अमन चैन
सुख की  हरियाली में सोना

ढूंढता है 
कड़वे स्वाद में मिठास
और दुर्गंध में सुगंध

हाँ 
ये आदमी
की ही तो है चाहत 
उसे भूलने से मिलती है राहत

फिर भी 
पीड़ा 
 दुख 
का अहसास
एक स्वप्न नहीं
सुख की ही है छाया

और
छाया कभी
पीछा नहीं छोड़ती
सिर्फ अँधेरे से है मुंह मोड़ती

आदमी अंधेरा भी नहीं चाहता
करता है सुबह का इंतजार

अंधेरा मिटाने को
रात का इंतजार
छाया भगाने को

और ऎसे ही
निकलते हैं दिन बरस

फिर भी न जाने 
आदमी क्यों चाहता है
अपनी ही शर्तों पर जीना ।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

आदमी और सौर मण्डल

आदमी
घूमता है तारा बन
अपने ही बनाये सौर मण्डल में

घूमते घूमते भूल जाता है
घूमना है उसे
अपने ही सूरज के चारों ओर

जिंदगी के हर हिस्से के सूरज
नज़र आते हैंं उसे अलग अलग

घूमते घूमते
भूल जाता है चक्कर लगाना
और
लगने लगता है उसे

वो नहीं
खुद सूरज घूम रहा है
उसके ही चारों ओर ।

चित्र साभार: https://www.123rf.com/

                                        'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 5  पृ 22