उलूक टाइम्स: अगस्त 2014

रविवार, 31 अगस्त 2014

बन रही हैं दुकाने अभी जल्दी ही बाजार सजेगा

सपने देखने
में भी सुना है
जल्दी ही एक
कर लगेगा

सपने बेचने
खरीदने का
उद्योग

इसका मतलब
कुछ ऐसा लगता है
खूब ही फलेगा
और फूलेगा

लम्बी दूरी की
मिसाइल की
तरह बहुत दूर
तक मार करेगा

आज का देखा
एक ही सपना
कई सालों तक
जिंदा भी रहेगा

कुछ ही
समय पहले
किसने सोचा था
ऐसा भी
इतनी जल्दी ही
ये होने लगेगा

कितनी
बेवकूफी
कर रहे थे
इससे पहले
के सपने
दिखाने वाले लोग

अब पछता
रहे होंगे
सोच सोच के

टिकाऊ सपने
बना के दिखाने
वाले का धंधा

इतनी जोर शोर से
थोड़े से समय में ही
चल निकलेगा

सपने आते ही
आँख बंद
करने लगा था
‘उलूक’ भी
कुछ दिनो से

लगता है
ये सब
सुन कर अब
सोने के बाद
अपनी आँखे
आधी या पूरी
खुली रखेगा ।

चित्र: गूगल से साभार ।

शनिवार, 30 अगस्त 2014

कभी ‘कुछ’ कभी ‘कुछ नहीं’ ही तो कहना है

अच्छी तरह पता है
स्वीकार करने में
कोई हिचक नहीं है
लिखने को पास में
बस दो शब्द ही होते हैं
जिनमें से एक पर
लिखने के लिये
कलम उठाता हूँ
कलम कहने पर
मुस्कुराइयेगा नहीं
होती ही नहीं है
कहीं आज
आस पास
किसी के भी
दूर कहीं रखी
भी होती होगी
ढूँढने उसे
जाता नहीं हूँ
प्रतीकात्मक
मान लीजिये
चूहा इधर उधर
कहीं घुमाता ही हूँ
चूहा भी प्रतीक है
गणेश जी के
वाहन का जिसको
कहीं बुलाता नहीं हूँ
माउस कह लीजिये
आप ठीक समझें
अगर हिलाता
इधर से उधर हूँ
खाली दिमाग के
साथ चलाता भी हूँ
दो शब्द में एक
‘कुछ’ होता है
और दूसरा होता है
‘कुछ नहीं’
सिक्का उछालता हूँ
यही बात बस एक
किसी को बताता
कभी भी नहीं हूँ
नजर पड़ती है
जैसे ही कुछ पर
उसको लिखने
के लिये बस कलम
ही एक कभी
उठाता नहीं हूँ
लिखना दवा
होता नहीं है हमेशा
बीमार होना मगर
कभी चाहता नहीं हूँ
मछलियाँ मेरे देश
की मैंने कभी
देखी भी नहीं
मछलियों की
सोचने की सोच
बनाता भी नहीं हूँ
चिड़िया को चावल
खिलाना कहा था
किसी ने कभी
मछलियों को खिलाने
जापान भी कभी
जाता नहीं हूँ
समझ लेते है
‘कुछ’ को भी मेरे
और ‘कुछ नहीं’ को
भी कुछ लोग बस
यही एक बात कभी
समझ लेता हूँ
कभी बिल्कुल भी
समझ पाता नहीं हूँ ।


चित्र: गूगल से साभार ।

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

होते होते नहीं मजा तो है होने के बाद कुछ देर में कुछ कुछ कहने का


दिन भर की बौखलाहटें 
उथल पुथल हुई सोच 

बारिश के बाद के
छोटे छोटे नाले 
मटमैला पानी उथली नदी 
कंकड़ पत्थर धूल धक्कड़ का साम्राज्य 

पारदर्शी जल के
ज्ञान के दर्शन का हरण 
थोड़ी खलबली कठिन एक परीक्षा 
जल की खुद की हलचल की समीक्षा 

बस इंतजार और इंतजार 
ठहराव तक सवरने का 
मिलावट के कुछ कर गुजरने का 
मिट्टी के दूर तक कहीं बहने का 

पत्थर का गहराई में जा ठहरने का
आहिस्ता आहिस्ता 
तमाशा जल के भरे पूरे यौवन के खिलने का 

एक दिन की बात नहीं
रोज का काम 
एक कफन में एक जेब सिलने का 

पता चलना
उसी तरह उथले पानी के निथरने का 
दिखना शुरु होना आर पार 

खबर छपना
ढके हुऐ सब कुछ के पारदर्शी होने का 
अंदाज वही हर बार की तरह 
वैसा हमेशा सही

कभी ऐसा भी 
कभी कभी कहीं कहीं 
कह लेने का । 

चित्र: गूगल से साभार ।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

आज ही के दिन क्रोध दिवस मनाया जाता है

अपनी कायरता
के सारे सच
हर किसी को
पता होते हैं

जरूरत नहीं
पड़ती है जिसकी
कभी किसी
सामने वाले को
समझाने की

सामने वाला भी
कहाँ चाहता है
खोलना अपनी
राज की पर्तों को

कौन हमेशा शांति
में डूबा रह पाता है

अच्छा रहता है
ढका रहे जब तक
चल सके सब कुछ
अपना अपना
अपने अपने
अंदर ही अंदर

पर हर कोई जरूर
एक सिकंदर
होना चाहता है

डर से मरने
से अच्छा
क्रोध बना या
दिखा कर
उसकी ढाल से
अपने को
बचाना चाहता है

सच में कहा गया है
और सच ही
कहा गया है
क्रोध वाकई में
कपटवेश में
एक डर है

अपने ही अंदर
का एक डर
जो डर के ही
वश में होकर
बाहर आकर
लड़ नहीं पाता है

वैसे भी कमजोर
कहाँ लड़ते हैं
वो तो रोज मरते हैं
रोज एक नई मौत

मरना कोई भी
नहीं चाहता है

केवल मौत के
नाम पर
डर डर कर
डर को भगाना
चाहता है

इसी कशमकश में
किसी ना किसी
तरह का एक क्रोध
बना कर उसे
अपना नेता
बना ले जाता है

वो और उसके
अंदर का देश
देश की तरह
आजाद हो जाता है

अंदर होता है
बहुत कुछ
जो बस उसके
डर को पता होता है

और बाहर बस
क्रोध ही आ पाता है
जो अपने झूठ को
छिपाने का एक
बहुत सस्ता सा
हथियार हो जाता है

बहुत सी जगह
बहुत साफ
नजर आता है

बहुत सी काली
चीजों को बहुत बार
झक सफेद चीजों से
ढक दिया जाता है ।

चित्र गूगल से साभार ।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

नजर टिक जाती है बहुत देर तक अंजाने में किसी की डायरी के एक पन्ने में बस यूँ ही कभी

 
ढूँढना
शुरु करना कभी कुछ 
थोड़ी देर देखने भर के लिये 
खुद को अपने ही आस पास से हटा कर 
दूर ले जाने की मँशा के साथ भटकते भटकते 

रुकते हुऐ
कदम किसी के पन्ने पर 
बस इतना सोच कर कि ठीक नहीं
रोज अपनी ही बात को लेकर खड़े हो जाना 

दर्द बहुत हैं बिखरे हुऐ
गुलाबों की सुर्ख पत्तियों से जैसे ढके हुऐ 
बहुत कुछ है यहाँ
पता लगता भी है 

कहीं किसी मोड़ पर आकर
मुड़ा हुआ पन्ना किसी किताब का
रोक लेता है कदमों को 
और नजर
गुजरती किसी लाईन के बीच 
पता चलता है खोया हुआ किसी का समय

और 
रुकी हुई घड़ी
जैसे इंतजार में हो
किसी के लौटने के आने की खबर के लिये 

जानते बूझते
किसी के चले जाने की 
एक सच्ची बहुत दूर से आई और गयी
खबर के झूठ हो जाने की आस में 

अपने गम
बहुत हल्के होते हुऐ
तैरते नजर आना शुरु होते हैं
और नम कर देते हैं आँखो को एक आह के साथ

जो निकलती है
एक दुआ के साथ दिल से 
खोये हुऐ के सभी अपनों के लिये । 

चित्र साभार:  http://apiemistika.lt/ 

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

बिल्ली जब जाती है दिल्ली चूहा बना दिया जाता सरदार है

नदी है नावें है
बारिश है बाढ़ है
नावें पुरानी हैं
छेद है पानी है

पतवार हैं
हजार हैं
पार जाने को
हर कोई भी
तैयार है

बैठने को
पूछना नहीं है
कुर्सियों की
भरमार है

गंजे की कंघी है
सपने के बालों
को रहा संवार है

लाईन है दिखानी है
पीछे के रास्ते
पूजा करवानी है
बारी का करना
नहीं इंतजार है

नियम हैं कोर्ट है
कचहरी है वकील हैं
दावे हैं वादे हैं
वाद हैं परिवाद हैं
फैसला करने को
न्यायाधीश तैयार है

भगवान है पूजा है
मंत्र हैं पंडित है
दक्षिणा माँगने का
भी एक अधिकार है

पढ़ना है पढ़ाना है
स्कूल जरुरी जाना है
सीखने सिखाने का
बाजार गुलजार है

धोती है कुर्ता है
झोला है लाठी है
बापू की फोटो है
मास्साब तबादले
के लिये पीने
पिलाने को खुशी
खुशी तैयार है

‘उलूक’ के पास
काम नहीं कुछ
अड़ोस पड़ोस
की चुगली का
बना लिया
व्यापार है ।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

गलतफहमी में ही सही लेकिन कभी कोई ऐसे ही कुछ समझ चुका है जैसा नजर आने लगता है थोड़ी देर के लिये ही सही

कुछ तो
अच्छा ही
लगता होगा

एक
गूँगे बहरे को

जब

उसे
कुछ देर
के लिये
ही सही

महसूस
होता होगा

जैसे
उसके
इशारों को
थोड़ा थोड़ा

उसके
आस पास के

सामान्य
हाथ पैर
आँख नाक कान
दिमाग वाले

समझ
रहे हों
के जैसे
भाव देना
शुरु करते होंगे

समझ में
आता ही होगा

किसी
ना किसी को

कि एक
छोटी सी
बात को
बताने के लिये

उसके पास
शब्द कभी भी
नहीं होते होंगे

कहना
सुनना बताना
सब कुछ
करना होता होगा उसे

हाथ की
अँगुलियों से ही

या कुछ कुछ
मुँह बनाते हुऐ ही

बहुत
खुशी
झलकती होगी
उसके चेहरे पर

बहुत सारे
लोग नहीं भी

बस
केवल एक ही
समझ लेता होगा
उसकी बात को
उसके भावों को

या
दर्द और खुशी
के बीच की

उसकी
कुछ यात्राओं को

सोच भी
कभी कभी
एक ऐसा
बहुत छोटा
सा बच्चा
हो जाती है

जो एक
टेढ़ी मेढ़ी
लकड़ी को

एक
खिलौना
समझ कर
ताली बजाना
शुरु कर देता हो

कुछ भी
कैसे भी कहा जाये

सीधे सीधे
ना सही
कुछ इशारों
में ही सही

जरूरी नहीं है

अपनी
बात को
कहने के लिये
एक कवि या
लेखक हो जाना
हमेशा ही

लेकिन
बिना पूँछ के
बंदर के नाच पर भी

कभी
किसी दिन
देखने वाले
जरूर ध्यान देते हैं

अगर
वो रोज
नाचता है

‘उलूक’

किसी
दिन तुझे

इस तरह
का लगने
लगता है
कुछ कुछ
अगर

खुश
हो
लिया कर
तू भी
थोड़ी देर
के लिये
ही सही ।

रविवार, 24 अगस्त 2014

आईने के पीछे भी होता है बहुत कुछ सामने वाले जिसे नहीं देख पाते हैं

कहा जाता
रहा है

आज
से नहीं
कई सदियों से

सोच
उतर आती है
शक्ल में

दिल की बातें
तैरने लगती हैं
आँखों के पानी में

हाव भाव
चलने बोलने से
पता चल जाता है

किसी
के भी ठिकाने
का अता पता

बशर्ते
जो बोला या
कहा जा रहा हो
वो स्वत: स्फूर्त हो

बस
यहीं पर
वहम होना
शुरु हो जाता है

दिखने
लगता है
पटेल गाँधी सुभाष
भगत राजगुरु
और
कोई ऐसी ही
शख्सियत

उसी तरह
जैसे बैठा हो कोई
किसी सनीमा हॉल में

और
चल रही हो
पर्दे पर कोई फिल्म

हो रही हो
विजय सच की
झूठ के ऊपर

वहम
वहम बने रहे
तब तक सब कुछ
ठीक चलता है

जैसे
रेल चल रही
होती है पटरी पर

लेकिन
वहम टूटना
शुरु होते ही हैं

आईने
की पालिश
हमेशा काँच से
चिपकी नहीं
रह पाती है

और
जिस दिन से
काँच के आर पार
दिखना शुरु
होने लगता है

काँच
का टुकड़ा
आईना ही
नहीं रहता है

काँच
का टुकड़ा
एक सच होता है

जो
आईना कभी भी
नहीं हो सकता है

उसे
एक सच
बनाया जाता है

एक
काँच पर
पालिश चढ़ा कर

बहुत
कम होते हैं
लेकिन होते हैं
कुछ बेवकूफ लोग

जो
कभी भी
कुछ नहीं
सीख पाते हैं

जहाँ
समय के साथ
लगभग सभी लोग
थोड़ा या ज्यादा
आईना हो ही जाते हैं

उनके
पार देखने की
कितनी भी कोशिश
कर ली जाये

वो
वही दिखाते हैं
जो वो होते ही नहीं है

और
ऐसे सारे आईने
एक दूसरे को
समझते बूझते हैं

कभी
एक दूसरे के
आमने सामने
नहीं आते हैं

जहाँ
भी देखिये
एक साथ

एक
दूसरे के लिये
कंधे से कंधा
मिलाये
पाये जाते हैं ।

शनिवार, 23 अगस्त 2014

खुद को भी पता कहाँ कुछ भी होता है कहाँ किस समय कौन क्या किस के लिये इस तरह भी कह देता है

यूँ ही कुछ भी
कहीं भी
कहने वाला
नहीं कह देता है
हर किसी की
आदत सब कुछ
हर किसी से
कह देने की भी
नहीं होती है
कुछ कहने के
बारे में किसी से
कुछ पूछ लेना
कहने से पहले भी
बहुत जरूरी
नहीं होता है
फिर भी मन
करता है कह
लेना सब कुछ
सब से चिल्ला
चिल्ला कर
पर कौन कितना
बहरा होता है
देखने से कुछ भी
पता नहीं होता है
सब सामान्य
सा दिखता है
सामने वाला भी
अपने जैसा ही
आम लगता है
किसी का भी
होता होगा आदमी
लेबल लगा कर
कोई भी बेवकूफ
जनता के बीच
खड़ा नहीं होता है
इतना तो पक्का
ही होता है
घाव छोटा हो
या कुछ बड़ा भी
किसी ना किसी
के पास कहीं ना कहीं
जरूर बना होता है
बात उसी की
लेकर कहने के लिये
ही खड़ा होता है
माईक के सामने
शुरु करते ही
सब कुछ भूल कर
अपनी नहीं किसी
बड़ी तूफानी
शैतानी आत्मा
को जामा अच्छाई
का औढ़ा कर
अपनी सोच में
ओहदा भगवान
का दे देता है
अपनी बात किसी
और दिन कहने
के लिये रख कर
सबको पागल
बनाने वाले पागल
को भगवान तक
कह ही देता है
आज सोच बैठा
था ‘उलूक’ भी
कहने की सब कुछ
सब से यहाँ आकर
नहीं कह सका
रोज की तरह
सब को पता है
कुछ नहीं कहता है
बस कुछ कुछ
यूँ ही हमेशा
इसी तरह से
आ आ कर
कहने की सूचना
जरूर दे देता है
कुछ भी कहीं भी
यूँ ही कभी भी
किसी से भी
तो नहीं कह
देना होता है ।
 
   

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

आभासी असली से पार पा ही जाता है

असली दुनियाँ अपने
आस पास की
निपटा के आता है
लबादे एक नहीं
बहुत सारे
प्याज के छिलकों
की तरह के कई कई
रास्ते भर उतारता
चला जाता है
घर से चला होता है
सुबह सुबह
नौ बजे का
सरकारी सायरन
जब भगाता है
कोशिश ओढ़ने की
एक नई
मुस्कुराहट
रोज आईने
के सामने
कर के आता है
शाम होते धूल
की कई परतों
से आसमान
अपने सिर
के ऊपर का
पटा पाता है
होता सब वही है
साथ उसके
जिसके बारे में
सारी रात
और सुबह
हिसाब किताब
रोज का रोज
बिना किसी
कापी किताब
और पैन के
लगाता है
चैन की बैचेनी से
दोस्ती तोड़ने की
तरकीबें खरीदने
के बाजार अपनी
सोच में सजाता है
रोज होता है शुरु
एक कल्पना से
दिन हमेशा
संकल्प एक नया
एक नई उम्मीद
भी जगाता है
लौटते लौटते
थक चुकी होती है
असली दुनियाँ
हर तरफ आभासी
दुनियाँ का नशा
जैसे काँच के
गिलास ले कर
सामने आ जाता है
लबादे खुल चुके
होते हैं सब
कुछ गिर चुके होते हैं
कब कहाँ अंदाज
भी नहीं सा कुछ
आ पाता है
जो होता है
वो हो रहा होता है
और होता रहेगा
उसी तरह असली
के हिसाब से
नकली होने का
मजा आना शुरु
होते ही आभासी
का सुरुर चारों
तरफ छा जाता है ।

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

फिर किसी की किसी को याद आती है और हम भी कुछ गीले गीले हो लेते हैं

कदम
रोक लेते हैं
आँसू भी
पोछ लेते हैं

तेरे पीछे नहीं
आ सकते हैं
पता होता है

आना चाहते हैं
मगर कहते कहते
कुछ अपने ही
रोक लेते हैं

जाना तो हमें भी है
किसी एक दिन के
किसी एक क्षण में

बस इसी सच को
झूठ समझ समझ कर
कुछ कुछ जी लेते हैं

यादें होती हैं कहीं
किसी कोने में
मन और दिल के

जानते बूझते
बिना कुछ ढकाये
पूरा का पूरा
ढका हुआ जैसा ही
सब समझ लेते हैं

कुछ दर्द होते है
बहुत बेरहम
बिछुड़ने के
अपनों से
हमेशा हमेशा
के लिये

बस इन्हीं
दर्दों के लिये
कभी भी कोई
दवा नहीं लेते हैं

सहने में
ही होते हैं
आभास उनके

बहुत पास होने के
दर्द होने की बात
कहते कहते भी
नहीं कहते हैं

कुछ आँसू इस
तरह के ठहरे हुऐ
हमेशा के लिये
कहीं रख लेते हैं

डबडबाते से
महसूस कर कर के
किसी भी कीमत पर
आँख से बाहर
बहने नहीं देते हैं

क्या करें
ऐ गमे दिल
कुछ गम
ना जीने
और
ना कहीं
मरने ही देते हैं

बहुत से परदे
कई नाटकों के
जिंदगी भर
के लिये ही
बस गिरे रहते हैं

जिनको उठाने
वाले ही हमारे
बीच से
पता नहीं कब
नाटक पूरा होने से
बस कुछ पहले ही
रुखसती ले लेते हैं ।

"750वाँ उलूक चिंतन:  आज के 'ब्लाग बुलेटिन' पर"

बुधवार, 20 अगस्त 2014

होते होते कुछ हो गये का अहसास ही काफी हो जाता है

उम्र के साथ ही
हो जरूरी नहीं
समय के साथ
भी हो सकती है
इश्को मुहब्बत
की बात तुक में हो
या अतुकाँत हो
अंदर कही उबल
रही हो या फिर
कहीं चुपचाप
बैठी शांत हो
खड़ी पहाड़ी के
ऊपर उँचाई पर
बैठ कर नीचे से
आती हुई
सरसराती हवा जब
बात करना शुरु
कर देती है
उसके बाद कहाँ
पता चल पाता है
आभास भी
नहीं होता है
कुछ देर के लिये
समय जैसे पानी में
घुलती हुई सफेद
दूध की एक
धार हो जाता है
सारा जहर धीरे धीरे
निकलता हुआ
आत्मा का जैसे
आत्मा के नीले
पड़े हुऐ शरीर से
निकल कर
सामने से होता हुआ
दूर घाटी में बहती हुई
नदी में समा जाता है
शिव नहीं हो सकता
आदमी कभी भी
नहीं सह सकता है
आस पास फैले हुऐ
जहर की जरा सा
आँच को भी जरा सी
जानते बूझते तैरता है
डूबता उतराता है
जहर और जहरीला
हो जाता है
नीलकंठ की कथा
दोहराने कलियुग में
वैसे भी कोई
बहरूपिया ही
नाटक के एक पात्र के
रूप में ही आ पाता है
कुछ भी हो शहर से दूर
पहाड़ी के नीचे से ऊपर
की ओर बहती हवा में
कुछ देर के लिये ही सही
थोड़ा बहुत ही सही
बैठा या खड़ा हुआ
पत्थर पर एक भीड़ से
निकला हुआ पत्थर
पिघल नहीं भी पाता है
पर कहीं कुछ मुलायम
सा हो जाने का अहसास
ही बस अनमोल हो जाता है ।

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

जो होता नहीं कहीं उसी को ही दिखाने के लिये कुछ नहीं दिखाना पड़ता है

बैठे ठाले का
दर्शन है बस
चिंतन के किसी
काम में कभी भी
नहीं लाना होता है
खाली दिमाग
को कहते हैं
दिमाग वाले
शैतान का एक
घर होता है
ऐसे घरों की
बातों को
ध्यान में नहीं
लाना होता है
सब कर रहे
होते हैं लागू
अपने अपने
धंधों पर
धंधे पर ही बस
नहीं जाना होता है
बहुत देर में आती है
बहुत सी बातें
गलती से समझ में
सबको आसानी से
समझ में आ जाये
ऐसा कभी भी कुछ
नहीं समझाना होता है
एक ही जैसी बात है
कई कई बातों में
घुमा फिरा के फिर
उसी जगह पर
चले जाना होता है
सबके सब कर
रहे होते हैं
गांंधी दर्शन के
उल्टे पर शोध अगर
मान्यता पाने के लिये
शामिल हो ही
जाना पड़ता है
घर में सोते रहिये
जनाब चादर ओढ़ कर
दिन हो या रात हो
अखबार में कसरत
करता हुआ आदमी
एक दिखाना पड़ता है
कभी तो चावल के
दाने गिन भी लिया
कर ‘उलूक’ दिखाने
के लिये ही सही
रोज रोज कीड़े
दिखाने वाले को
बाबा जी का भोंपू
बजा कर शहर से
भगाना पड़ता है ।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

नहीं लिख पाउंगा उसके लिये कुछ भी जिसके जलवे में आदमी बन कर के कोई शामिल होता है



दिमाग से लिखना मन की बात लिखना
किताब से लिखना बेबात की बात लिखना 
सुबह सवेरे बैठ कर एक रात लिखना 
अखबार में छपने छपाने के लिये लिखना 
अलग अलग होता है भाई क्यों परेशान होता है

डाक्टर ने नहीं कहा होता है 
पढ़ने के लिये वो सब कुछ 
जो इस दुनिया में 
हर जगह किसी भी दीवार पर
ऐरे गैरे नत्थू खैरे ने 
लिखा या लिखवा दिया होता है

पैजामे और टोपी देख कर 
लिखने वाले की बात पर क्यों चला जाता है

यहाँ हर कोई 
बिना कपड़े का ही आता है 
जैसा होता है उसी तरह आता है

अपने हिसाब किताब को देख कर
दुनियाँ को पागल बनाता है

कपड़े 
के बिना जो होता है 
उसे गूगल का 
शब्दकोश क्या कहता है 
उससे क्या करना होता है

सीधे सीधे 
नंगा कह देना 
अच्छा नहीं होता है 

दुनियाँ 
ऐसे लोगों से ही चल रही है

एक 
तू है ‘उलूक’
अपनी बेवकूफियों को
हरे पत्तों से ढकने में लगा रहता है 

अखबार में छपे 
कबूतरों के मनन चिंतन से
परेशान मत हुआ कर
कबूतर अपने घोंसले में 
अपनी ही बीट पर सोता है

जनता 
उस की तरह की ही
उस की 
वाह वाही में लगी रहती है

जिनको 
पता सब होता है
वो उनकी तरह का ही होता है

अल्पसंख्यक 
बस एक संख्या है
उसी ने बिल्ली की तरह 
खंभा ही तो बस एक नोचना होता है ।

रविवार, 17 अगस्त 2014

हे कृष्ण जन्मदिन की शुभकामनाऐं तुम्हें सब मना रहे हैं और जिसे देने तुम्हें सारे कंस मामा भी हमारे साथ ही आ रहे हैं

दो ही दिन हुऐ हैं 
जश्ने आजादी का मनाये हुऐ 
हे कृष्ण 

आज तेरा जन्म दिन 
मनाने का अवसर हम पा रहे हैं 
दिन भर का व्रत करने के बाद 
शाम होते होते दावत फलाहार की
तुझे भोग 
लगा कर खुद खा 
और बाकी को साथ में भी खिला पिला रहे हैं 

दादा दादी माँ पिताजी 
से बचपन में सुनी कहानियाँ
याद 
साथ साथ करते भी जा रहे हैं 

कितने मारे 
कितने तारे गिनती करने में 
आज भी याद नहीं आ पा रहे हैं 
सभी का हो चुका था संहार सुना था 
कुछ बचे थे शायद भले लोग 
कुछ गायें कुछ ग्वाले कुछ बाँसुरी की धुन और तानें 
आज भी सुन और सुना रहे हैं 

आज ही की 
बात नहीं है कृष्ण 
तेरे बारे में सुनते सुनते 
अब खुद अपने जाने के दिनों के 
बारे में भी कुछ सोचते जा रहे हैं 

नहीं हुई भेंट तुझसे 
कहीं घर में मंदिर में 
रास्ते में आदमी ही आदमी आते जाते भीड़ दर भीड़ 
हम खुद ही खोते जा रहे हैं 

कंस से लेकर 
शकुनि ही शकुनि 
घर से लेकर मंदिर तक में नजर आ रहे हैं 

गीता देकर गये थे 
तुम अपनी याद दिलाने के लिये 
पाप करने के बाद शपथ उसी पर आज 
हम हाथ रख कर खा रहे हैं खिला रहे हैं 

हैप्पी बर्थ डे कृष्ण जी 
कहने हमेशा हर साल 
याद कर लेना तुम भी सभी संहार किये गये 
उस समय के और इस समय के
हो चुके 
तुम्हारे भक्त गण 
मेरे साथ मेरे आस पास मिलकर
हरे कृष्ण हरे कृष्ण 
गाते गाते तालियाँ भी साथ में बजा रहे हैं ।   

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

सरकारी त्योहार के लिये भी अब घर से लाना जरूरी एक हार हो गया

रोज उलझना
झूठ से फरेब से
बे‌ईमानी से
भ्रष्टाचार की
किसी ना किसी
कहानी से
सपना देखना
खुशी पाने का
ज्यादा से ज्यादा
नहीं तो कम से कम
एक को सही
अपना गुलाम
बना कर जंजीर
डाल कर नचाने से
इच्छा करना
पूरी करने की
अपनी अपूर्त
अतृप्त आकाँक्षाओं की
बिना बताये
समझाये आस
पास की जनता
को समझ कर बेवकूफ
गर्व महसूस करना
मुँह पर आती कुटिल
मुस्कुराहट को
छुपाने से
किसने देखी
कब गुलामी
कौन कब और कहाँ
आजाद हो गया
किसने लिखी
ये सब कहानी
सपना किसका
साकार हो गया
समझते समझते
बचपन से लेकर
पचपन तक का
समय कब
पार हो गया
तीन सौ चौंसठ
दर्द भरे नगमों को
सुनने का पुरुस्कार
एक दिन झंडा
उठा कर सब कुछ
भूल जाने के लिये
सरकार का एक
सरकारी त्योहार हो गया
कुछ कहेगा तो
वो कहेगा तुझसे
‘उलूक’ देशभक्त
होने और दिखाने का
एक दिन तो मिलता
है पूरे सालभर में
भाषण मूल्यों के
झंडा लहरा कर
देने के बाद का
उन सब का कभी
का तैयार हो गया
तुझे क्या हो जाता
है हमेशा ही ऐसा
अच्छे आने वाले
समय में भी बेकार
बोल बोल कर
लगता है आजाद
होने से पहले ही
तू बहुत और बहुत
बीमार हो गया ।

बुधवार, 13 अगस्त 2014

आज ही छपा है अखबार में कहने को कल परसों भी कह दिया है

पूरे पके
और
सूखे हुऐ
कददू
को हाथ में
लेकर
संकल्प
ले लिया है

ना
खुद खाउँगा
ना
खाने दूँगा

बहुत
जोर से
बहुत बड़ा
एक लाउडस्पीकर
हाथ में लेकर
कह दिया है

सावधान
बड़ा
खाने वालो

खाना पीना
दिखना
कहीं किसी
को भी नजर

भूल से
भी नहीं
आना चाहिये

बहुत पुराना
खा चुके
मोटे लोगों को भी
अपना भार
अब घटाना चाहिये

सब कुछ
बदल डालूँगा
एक नहीं कई कई
बार कह दिया है

खाने पीने को
छोड़ कर
बाकी सब कुछ
कर लेने का
लाइसेंस
बस अपने ही
ईमानदारों
को ही दिया है

अभी तो
बस बड़े बड़े
खाने वालों
के लिये
सी सी कैमरे
लगाये जा रहे हैं

कद्दू
के अंदर
पनप रहे कीड़े
कौन सा
किसी को
बाहर से कहीं
नजर आ रहे हैं

छोटे मोटे
बिल पर्चे
टी ऐ डी ऐ
कमीशन
सब हजार
दस हजार
तक के

अभी
पाँच साल
तक नोटिस में
नहीं लिये जायेंगे

अगले
पाँच साल में
छोटे खाने
वाले भी
ट्रेनिंग
रिफ्रेशर कोर्सेस
के लिये
बुला लिये जायेंगे

अभी चोगे
धो धुला के
स्त्री कर करा कर
शरीर पे डालना ही
सिखाया जा रहा है

मैले मन
को धोने
धुलाने का
पाउडर भी

जल्दी ही
चीन या
अमेरिका का ही
आने जा रहा है

देश भक्तो
बेकार की
फालतू बातों में
ध्यान क्यों
लगा रहे हो

पंद्रह अगस्त
दो ही दिन के
बाद आ रहा है

इतनी
बड़ी बात
भूल क्यों
जा रहे हो

खाना पीना
पीना खाना
होता रहता है

कम बाकी कल
परसों भी हो
ही जायेगा

अभी
झंडे बेचने हैं
उनको बेचने
और
खरीदने को

कौन
कहाँ से आयेगा
कहाँ को जायेगा

चीन से
बन कर भी
आता है तो
क्या होता है

झंडा ऊँचा
रहे हमारा

अपने
देश में ही
गाया जायेगा ।

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

गधा घोड़ा नहीं हो सकता कभी तो क्या गधा होने का ही फायदा उठा

 

लिखने लिखाने के राज 
किसी को कभी मत बता 
जब कुछ भी समझ में ना आये 
लिखना शुरु हो जा 

घोड़ों के अस्तबल में 
रहने में कोई बुराई नहीं होती 
जरा भी मत शरमा 

कोई खुद ही समझ ले तो समझ ले 
गधे होने की बात को
जितना भी छिपा सकता है छिपा 

कभी कान को ऊपर की ओर उठा 
कभी पूँछ को आगे पीछे घुमा 
चाबुकों की फटकारों को 
वहाँ सुनने से परहेज ना कर 
यहाँ आकर आवाज की नकल की 
जितनी भी फोटो कापी चाहे बना 

घोड़े जिन रास्तों से कभी नहीं जाते 
उन रास्तों पर अपने ठिकाने बना 
घोड़ो की बात पूरी नहीं तो आधी ही बता 

जितना कुछ भी लिख सकता है लिखता चला जा 
उन्हें कौन सा पढ़ना है कुछ भी यहाँ आकर 
इस बात का फायदा उठा 

सब कुछ लिख भी गया
तब भी कहीं कुछ नहीं है कहीं होना 
घोड़ों को लेखनी की लंगड़ी लगा 
बौद्धिक अत्याचार के बदले का इसी को हथियार बना 

घोड़ों की दौड़ को बस किनारे से देखता चला जा 

बस समझने की थोड़ा कोशिश कर 
फिर सारा हाल लिख लिख कर यहाँ आ कर सुना 

वहाँ भी
कुछ नहीं होना है तेरा 
यहाँ भी
कुछ नहीं है होना 
गधा होने का सुकून मना 

घोड़ों के अस्तबल का
हाल लिख लिख कर दुनियाँ को सुना

गधा होने की बात
अपने मन ही मन में चाहे गुनगुना।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

किसलिये कोई लिखने लिखाने की दवा का बाजार चुनता है

कौन है जो
नहीं लिखता है
बस उसका लिखा
कुछ अलग सा
इसका लिखा कुछ
अलग सा ही
तो दिखता है
वैसे लिखने लिखाने
की बातें पढ़ा लिखा
ही करता है
वो गुलाब देख
कर लिखता है
जो रोज नहीं
खिलता है
बस कभी कभी
ही दिखता है
किसी का लिखा
पिटने पिटाने के
बाद खिलता है
एक दिन की
बात नहीं होती है
रोज का रोज पिटता है
सेना का सिपाही
नहीं बनता है
कायरों को वैसे भी
कोई नहीं चुनता है
लिखने लिखाने
का मौजू यहीं
और यहीं बनता है
हर फ्रंट पर उसका
सिपाही अपनी
बंदूक बुनता है
गोलियाँ भी
उसकी होती है
लिखने वाला बस
आवाज सुनता है
मार खाने से
पेट नहीं भरता है
मार खा खा कर
शब्द चुनता है
लिखने लिखाने
की बातों का कनिस्तर
बस मार खाने
से भरता है
उनके साये और
आसरे पर
 लिखने वाला
पुरुस्कार चुनता है
सब से हट कर
लिखने का खामियाजा
तिरस्कार चुनता है
एक ही नहीं
सारे के सारे फ्रंट पर
पिट पिटा कर
‘उलूक’ कुछ
तार बुनता है
वहाँ भी नहीं
सुनता है कोई
यहाँ भी नहीं सुनता है
लिखना लिखाना
बहुत आसान होता है
बहुत आसानी से
लिखता है कोई
कुछ भी कभी भी
जो डरते डरते
हुऐ हर जगह
की हार चुनता है
बिना बेतों की
मार चुनता है
लेखक डरता है
डरपोक होता है
लड़ता तो है पर
कलम चुनता है
बस तलवार देख
कर आँखें ही
तो बंद करता है ।

रविवार, 10 अगस्त 2014

कभी उनकी तरह उनकी आवाज में कुछ क्यों नहीं गाते हो



गनीमत है 
कवि लेखक कथाकार गीतकार 
या 
इसी तरह का कुछ हो जाने की सोच 
भूल से भी पैदा नहीं हुई कभी 

मजबूत लोग होते हैं 
लिखते हैं लिखते हैं लिखते चले जाते हैं 
कविता हो कहानी हो नाटक हो या कुछ और 
ऐसे वैसे लिखना शुरु नहीं हो जाते हैं 

एक नहीं कई कोण से शुरु करते हैं 
कान के पीछे से कई बार 
लेखनी निकाल कर सामने ले आते हैं 

कई बार फिर से कान में वापस रख कर 
उसी जगह से सोचना शुरु हो जाते हैं 
जहाँ से कुछ दिन पहले हो कर 
दो चार बार कम से कम पक्का कर आते हैं 

लिखने लिखाने के लिये
आँगन होना है दरवाजा होना है खिड़की होनी है 
या बस खाली पीली किसी एक सूखे पेड़ पर यूँ ही पूरी 
नजर गड़ा कर वापस आ जाते हैं 

एक नये मकान बनाने के तरीके होते हैं कई सारे 
बिना प्लोट के ऐसे ही तो नहीं बनाये जाते हैं 

बड़े बड़े बहुत बड़े वाले जो होते हैं 
पोस्टर पहले से छपवाते हैं 
शीर्षक आ जाता है बाजार में 
कई साल पहले से बिकने को 

कोई नहीं पूछता बाद में 
मुख्य अंश लिखना क्यों भूल जाते हैं

सब तेरी तरह के नहीं होते ‘उलूक’ 
तुम तो हमेशा ही बिना सोचे समझे 
कुछ भी लिखना शुरु हो जाते हो 

पके पकाये किसी और रसोईये की रसोई का भात 
ला ला कर फैलाते हो 

विज्ञापन के बिना छपने वाले 
एक श्रेष्ठ लेखकों के लेखों से भरा हुआ अखबार बन कर 

रोज छपने के बाद 
कूड़े दान में बिना पढ़े पढ़ाये पहुँचा दिये जाते हो 

बहुत चिकने घड़े हो यार 
इतना सब होने के बाद भी 
गुरु फिर से शुरु हो जाते हो ।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

बचपन से चलकर यहाँ तक गिनती करते या नहीं भी करते पर पहुँच ही जाते

दिन के आसमान
में उड़ते हुऐ चील
कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में
आकाश गंगा के
चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की
गिनती करते करते
एक दो तीन से
अस्सी नब्बे होते जाते
कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते
ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते
उसी समय लौट आते
उतनी ही उर्जा और
जोश से फिर से
किसी एक जगह से
गिनती करना
शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन
की बात हो
ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा
खेल हो जाते
कोई थकान नहीं
कोई शिकन नहीं
कोई गिला नहीं
किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते
होते के बीच
झुंड बदल जाते
कब गिनतियाँ
आदमी और
भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं
तारे और चाँद
ना ही चील के
विशाल डैने
ही नजर आते
थकान ही थकान
मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर
तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा
किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर
भी नहीं समझ पाते
समझ में आना शुरु
होने लगता यात्रा का
बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं
के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर
भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन
और अपने अगर
इन सब में कहीं
नहीं खो जाते ।
  

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

समझौते होते हैं सब समझते हैं करने वाले बेवकूफ नहीं होते हैं

अपनी अच्छाइयों को
अपनी चोर जेबों
में छुपाये हुऐ
बस उसी तरह
जैसे छुपाना आसान
होता है अंधेरे में
अपनी परछाइयों को
समझौतों के तराजू
लिये फिर रहे हैं
गली गली
मजाल है कि
कोई पलड़ा
ऊँचा और कोई
नीचा हो जाये
तराजू भी हर
एक के पास
एक से समझौता ब्राँड
कहीं कोई चूक नहीं
हर एक के चेहरे पर
एक मुखौटा उसी तरह से
बचाव की मुद्रा में जैसे
लगा लेता है वैल्डिंग
करते समय आँखें
बचाने के लिये कोई
अच्छाई की शरम
गीली करती हुई जेबें
और समझौतों की
बेशर्मी से गरम होकर
खौलती फड़कती नसें
मेरी भी आदत में
आदतन शामिल
हो चुकी है उसी तरह
जिस तरह बंद
हो चुकी हों गीता कुरान
बाईबिल और रामायण
पढ़ने की कोशिश
करते करते किसी की
भारी बोझिल होते होते
आँखे और हर तरफ
फैल चुका हो चारों ओर
काला होता हुआ
सफेद कोहरे
में लिपटा हुआ
एक समझौता
एक ताबूत में
एक और कोशिश
हर किसी की
ताबूत के ढक्कन को
चाँदी से मढ़ कर
चमकदार बना देने की
ताकि गीली होती
चोर जेब से गिरती
शरम की गीली
ओस की बूँदे
साफ करती रहें
झूठ की चमक को
और सलामत रहे
हर किसी की
कुछ अच्छाई उसकी
चोर जेब में
बची रहे सड़ने से
समझौतों की सड़न से
बचते बचाते हुऐ
और समझौते होते रहें
यूँ ही मुखौटों की आड़ में
एक दूसरे के मुखौटों
की कतार के बीच
अच्छाइयाँ बची रहें
मिलें नहीं कभी
किसी की किसी से
समझौता करने
कराने के लिये
या खुद एक समझौता
हो जाने के लिये
अच्छाइयाँ
हर किसी की
होने के लिये ही
होती है बस
ताकी सनद रहे ।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

बारिशों का पानी भी कोई पानी है नालियों में बह कर खो जाता है

खुली खिड़कियों
को बरसात
के मौसम में
यूँ ही खुला
छोड़ कर
चले जाने
के बाद
जब कोई
लौट कर
वापस
आता है
कई दिनों
के बाद
गली में
पाँवों के
निशान तक
बरसते पानी
के साथ
बह चुके
होते हैं
पता भी
नहीं चलता है
किसी के आने
और
झाँकने का भी
दरवाजे भी
कुछ कुछ
अकड़ चुके
होते है
बहुत सारे
लोग
बहुत सारे
लोगों के
साथ साथ
आगे पीछे
होते होते
कहीं से
कहीं की
ओर निकल
चुके होते हैं
वहम होने
या
ना होने का
हमेशा वहम
ही रह
जाता है
जब कोई
गया हुआ
वापस लौट
कर आता है
जहाँ से
गया था
वहाँ पहुँच
कर बस
इतना ही
पता चल
पाता है
पता नहीं
किसी ने
पता लिख
दिया था
उस का
उस जगह का
जहाँ उसे
लगता था
वो है
उस जगह पर
लौट कर
खुद अपने
को ही बस
नहीं ढूँढ
पाता है
हर कोई
अपने अपने
पते को
लेकर
अपनी अपनी
चिट्ठी

खुद के
लिये ही

लिखता हुआ
नजर आता है
ना पोस्ट आफिस
होता है जहाँ
ना ही कोई
डाकिया
कहीं दूर
दूर तक
नजर आता है
‘उलूक’
बहुत ही
जालिम है ये
सफेद पन्ना
काला नहीं
हो पाता है
अगर कभी
तो कोई
भी झाँकने
तक नहीं
आता है
काँटा
चुभा रहना
जरूरी है
पाँव के
नीचे से
खून दिखना
भी जरूरी
हो जाता है
तेरा पता तुझे
पता होता है
खुद ही खोना
खुद ही ढूँढना
खुद को यहाँ
हर किसी को
इतना मगर
जरूर
आता है ।