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सोमवार, 17 जुलाई 2017

फेस बुक मित्र के मित्रों के मित्रों के गिरोहों की खबरें

गिरोह गिरोह
की बात करें
देखें समझें
एक दूसरे को
आदाब करें

किसने रोका है

खामखा
अकेले चने को
भीड़ की खबरें
दिखा कर
उसकी शामें तो
ना बरबाद करें

माना कि
जमीन से कुछ
उठाने के लिये
झुकना बहुत
जरूरी है

मिल कर झुकें
हाथ में हाथ
डाल कर झुकें
उठा लें सारा
सब कुछ
मिल बाँट
कर मिट्टियाँ
अपने अपने
खेतों के नाम करें

सर उठा
कर जीने दें
एक दो पैर पर
खड़े इन्सान को

काट लें
बहुत जरूरी हो
सर कलम का
अगर मजबूरी हो

अपनी खुद की
आँखों में किसी
के शर्मसार
होने का ना
इन्तजाम करें

आपका पन्ना है
आपके दोस्त हैं
जो करना है करें
कल्तेआम करें

जो नहीं चाहता है
शामिल होना
गिरोहों के जलसों
की खबरों में

उसके पन्नों में
ले जा जाकर
खबरें अपनी
विज्ञापन अपने
अपने धन्धों के
ना सरे आम करें

‘उलूक’
की आदत है
दिन के अंधेरे में
नहीं देखने के
बहाने लिखना

लिखने दें
भाड़ नहीं
फोड़ सकने
की खिसियाहट
उसे भी थोड़ी

मिल जुल कर
करें चीर हरण

खबर अर्जुन ने
किया बलात्कार
या
फिर कन्हैया
के ही नाम करें।

चित्र साभार: Chatelaine

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

पीटना हो किसी बड़ी सोच को आसानी से एक छोटी सोच वालों का एक बड़ा गिरोह बनाया जाता है

बड़ी सोच का
बड़ा कबीर
खुद को दिखा
दिखा कर ही
बड़ा फकीर
हुआ जाता है


छोटी सोच
बता कर
प्रतिद्वन्दी की
अपने जैसों
के गिरोह के
गिरोहबाजों
को समझाकर
आज किसी
की भी एक बड़ी
लकीर को
बेरहमी के साथ
खुले आम
पीटा जाता है

लकीर का
फकीर होना
खुद का
फकीर को
भी बहुत
अच्छी तरह
से समझ
में आता है

फकीर को
लकीर अगर
कोई समझा
पाता है तो
बस कबीर
ही समझा
पाता है

जरूरी नहीं
होता है तीखा
होना अँगुलियों
के नाखूँनो का
किसी की सोच
को खुरचने के लिये

खून भी आता है
लाल भी होता है
सोच समझ कर
योजना बना कर
अगर हाँका
लगाया जाता है

अकेले ज्यादा
सोचना ही
किसी का
कभी उसी
की सोच
को खा जाता है


बोलने के लिये
अकेले आता है
लेकिन
रोज का रोज
समझाया जाता है

इशारों में भी
बताया जाता है
किताबों खोल कर
पढ़ाया जाता है


एक आदमी
का बोलना
लिखने के लिये
एक दर्जन
दिमागों को
काम में
लगाया
जाता है

छोटी सोच
बताने को
इसी लिये
कोई ना कोई
फकीर कबीर
हो जाता है

बड़ी सोच में
लोच लिये ऐसे
ही फकीर को
बैचेनियाँ
खरीदना
खोदना और
बेचना आता है

आसान होता है
किसी की सोच
के ऊपर चढ़ जाना
उसे नेस्तनाबूत
करने के लिये

एक गिरोह
की सोच
का सहारा
लेकर
किसी भी
सोच का
दिवाला
निकाला
जाता है

जरूरी होता है
दबंगों की सोच
का दबंग होना
दबंगई
समझाने के लिये

अकेले
चने की
भाड़ नहीं
फोड़ सकने
की कहानी
का सार
समझ में
देर से
ही सही
मगर कभी
आता है

‘उलूक’
ठहर जाता है
आजकल
पढ़ते समझते
गोडसे सोचों
की गाँधीगिरी

लिखा लिखाया
खुद के लिये
उसका खुद
के पास ही
छूट जाता है

समझ जाता है
पीटना हो किसी
बड़ी सोच को
आसानी से

एक छोटी
सोच वालों
का एक
बड़ा गिरोह
बनाया जाता है ।

चित्र साभार: Clipart Panda

बुधवार, 23 नवंबर 2016

सब नहीं लिखते हैं ना ही सब ही पढ़ते हैं सब कुछ जरूरी भी नहीं है लिखना सब कुछ और पढ़ना कुछ भी

मन तो
बहुत
होता है
खुदा झूठ
ना बुलाये

अब खुदा
बोल गये
भगवान
नहीं बोले
समझ लें

मतलब
वही है
उसी से है
जो कहीं है
कहीं नहीं है

सुबह
हाँ तो
बात
मन के
बहुत
होने से
शुरु
हुई थी

और
सुबह
सबके साथ
होता है
रोज होता है
वही होता है

जब दिन
शुरु होता है
प्रतिज्ञा
लेने जैसा
कुछ ऐसा
कि
राजा दशरथ
का प्राण जाये
पर बचन
ना जाये जैसा

जो कि

कहा जाये
तो सीधे सीधे
नहीं सोचना
है आज से
बन्दर क्या
उसके पूँछ
के बाल के
बारे में भी
जरा सा

नहीं बहुत
हो गया
भीड़ से
दूर खड़े
कब तक
खुरचता
रहे कोई
पैर के
अँगूठे से
बंजर
जमीन को
सोच कर
उगाने की
गन्ने की
फसल
बिना खाद
बिना जल

बोलना
बोलते
रहना
अपने
को ही
महसूस
कराने
लगे अपने
पूर्वाग्रह

जब

अपने
आसपास
अपने जैसा
हर कोई
अपने
साथ बैठा
कूड़े के
ढेर के ऊपर
नाचना
शुरु करे
गाते हुऐ
भजन
अपने
भगवान का
भगवान
मतलब खुदा
से भी है
ईसा से
भी है
परेशान
ना होवें

नाचना
कूड़े की
दुर्गंध
और
सड़ाँध
के साथ
निर्विकार
होकर

पूजते हुऐ 

जोड़े हाथ
समझते हुऐ 

गिरोहों से 
अलग होकर 
अकेले जीने 
के खामियाजे 

‘उलूक’ 
मंगलयान 
पहुँच चुका 
होगा
मंगल पर 
उधर
देखा कर 
अच्छा रहेगा 
तेरे लिये 

कूड़े पर 
बैठे बैठे 
कब तक 
सूँघता
रहेगा 
दुर्गंध 

वो बात 
अलग है 
अगर नशा 
होना शुरु 
हो चुका हो 

और 

आदत हो 
गई हो 

सबसे
अच्छा है 
सुबह सुबह 
फारिग
होते 
समय
देशभक्ति 
कर लेना
सोच कर
तिरंगा झंडा
जिसकी
किसी
को याद
नहीं आ
रही है
इस समय
क्योंकि
देश
व्यस्त है
कहना
चाहिये
कहना
जरूरी है ।

चित्र साभार: All-free-download.com

बुधवार, 24 जुलाई 2013

आज गिरोह बनायेगा कल पक्का छा जायेगा



सावन के अंधे की
तरह हो जायेगा
समय के साथ अगर
बदल नहीं पायेगा
कोई कुछ नहीं
देखेगा जहां
वहाँ तुझको
सब हरा हरा
ही नजर आयेगा
पिताजी ने बताया
होगा कोई रास्ता
उस जमाने में कभी
भटकने से तुझे वो
भी नहीं बचा पायेगा
अपने लिये आखिर
कब तक खुद ही
सोचता रह जायेगा
गिरोह में शामिल
अगर नहीं हो पायेगा
बेवकूफी के साथ
दो करोड़ घर
में रख जायेगा
आबकारी आयुक्त की
तरह लोकपाल
के पंजे मे जा
कर फंस जायेगा
समझदारी के साथ
एक झंडा उठायेगा
उंगली भी कोई नहीं
कभी उठा पायेगा
अपना और अपने
लोगों का तो करेगा
ही बहुत कुछ भला
गिरोह के लिये भी
कुछ कर पायेगा
करोडो़ की योजना
परियोजना बनायेगा
सबका हिस्सा टाईम
पर दे के आयेगा
झुक कर करता चलेगा
रोज बस नमस्कार
बस एक बार
काम का बस भोंपू
बना कर बजायेगा
आज गिरोह के लिये
झंडा एक उठायेगा
कल खुद गिरोह के
झंडे में नजर आयेगा
एक बेवकूफ दो
करोड़ के साथ
घर में
पकड़ा जायेगा
जेल पहुँच जायेगा
तू दस करोड़
भी ले जायेगा
लाल बत्ती की कार
के साथ कहीं बैठा
भी दिया जायेगा
निर्वात पैदा होने की
चिंता कोई भी
नहीं कर पायेगा
निकलते ही तेरे ऊपर
नीचे से एक
नया गिरोहबाज
तैयार खड़ा
तुझे मिल जायेगा ।

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