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मंगलवार, 8 मई 2018

टिप्पणियों पर बिफरते नये शेर को देख कर पुराने हो चुके भेड़ को कुछ तो कह देना हो रहा है

सब कुछ
एक साथ
नहीं दौड़ता है

टाँगें
कलम हो जायें
बहुत कम होता है

वजूका
खेत के बीच में
भी हो सकता है
कहीं किनारे पर
बस यूँ ही खड़ा
भी किया होता है

कहने लिखने को
रोज हर समय
कुछ ना कुछ
कहीं किसी
कोने में
जरूर होता है

लिखे हुऐ
सारे में से
जान बूझ कर
नहीं लिखा गया
कहीं ना कहीं
किसी पंक्ति
के बीच से
झाँक रहा होता है

समुन्दर
लिख लेने
के बाद
नदी लिखने
का मन
किसी का
होता होगा
पता कहाँ
चलता है

कलम की
पुरानी
स्याही को
नाले के पास
लोटे में धोना
और फिर
चटक धूप में
सुखा कर
नयी स्याही
भर लेना

एक पुराना
मुहावरा
हो चुका
होता है

नये मुल्ले
और
प्याज पर
लिखने से
दंगा भड़कने
का अंदेशा
हो रहा
होता है

रोज के
रोजनामचे
को लिखने
वाले ‘उलूक’
का दिल

साप्ताहिक
हो लेने
पर भी
बाग बाग
हो रहा
होता है

लिखना
लिखाना
और
उस पर
टिप्पणी
पाने की
लालसा पर

हमेशा
की तरह
नये सिपाही
का बंदूक
तानने पर

अपनी
पुरानी
जंक लगी
बन्दूक से
खुद का
फिर से
सामना
हो रहा
होता है

अपना लिखना
अपने लिखे को
अपना पढ़ लेना
समझ में आ जाना
सालों साल में

पुराने प्रश्न से
जैसे नया
सामना हो
रहा होता है ।

सोमवार, 11 मई 2015

बकरी और शेर भेड़िया और भेड़

भेड़िये ने खोल ली है
आढ़त बीमे कराने की
भेड़ें बहुत खुश हैं अब
मरेंगी भी तो मेमने
सड़क पर नहीं आयेंगे
खा पी सकेंगे
बढ़ा सकेंगे खून
तब तक जब तक
शरीर के बाल उनके
बड़े नहीं हो जायेंगे
वैसे भी भेड़िये
को कुछ नहीं
करना होता है
समझदार भेड़िये का
एक इशारा ही
बहुत होता है
भेड़े पढ़ लिख
कर भी
अनपढ़ बनी रहें
इसका पूरा इंतजाम
उनके पाठ्यक्रम में
ही दिया होता है
बेवकूफी भेड़ों की
नस नस में
बसी होती है
भेड़िये का आम
मुख्तार होने की
हौड़ में भेड़ें ही
भेड़ों से भिड़
रही होती हैं
इन सब में ‘उलूक’
बस इतना ही
सोच रहा होता है
काटने के बाद
गर्दन भेड़ की
किस जगह
दुनियाँ में
दूसरा कौन
ऐसा और है
जो पैसे बीमे के
गिन रहा होता है ।
चित्र साभार: www.canstockphoto.com

गुरुवार, 22 मई 2014

पहचान के कटखन्ने कुत्तों से डर नहीं लगता है

पालतू भेड़ों
की भीड़ को
अनुशाशित
करने के लिये ही
पाले जाते हैं कुत्ते
भेड़ोँ को घेर कर
बाड़े तक पहुँचाने में
माहिर हो जाने से
निश्चिंत हो जाते हैं
भेड़ों के मालिक
कुत्तों के हाव भाव
और चाल से ही
रास्ता बदलना
सीख लेती हैं भेड़े
मालिक बहुत सारी
भेड़ों को इशारा करने
से अच्छा समझते हैं
कुत्तों को समझा लेना
भेड़ों को भी कुत्तों से
डर नहीं लगता है
जानती हैं डर के आगे
ही जीत होती है
भेड़ों को घेर कर
बाड़े तक पहुँचाने का
इनाम कुछ माँस
के टुकड़े कुत्ते भेड़ों
के सामने से ही नोचते हैं
भेड़े ना तो खाती हैं
ना ही माँस पसँद करती हैं
पर उनको कुत्तों को
माँस नोचता देखने
की आदत जरूर हो जाती है
रोज होने वाले दर्द
की आदत हो जाने
के बाद दवा की जरूरत
महसूस नहीं होती है ।

मंगलवार, 6 मई 2014

जिसको काम आता है उसको ही दिया जाता है

अपनी प्रकृति
के हिसाब से
हर किसी को
अपने लिये
काम ढूँढ लेना
बहुत अच्छी
तरह आता है
एक कबूतर
होने से
क्या होता है
चालाक हो अगर
कौओं को सिखाने
के लिये भी
भेजा जाता है
भीड़ के लिये
हो जाता है
एक बहुत
बड़ा जलसा
थोड़े से गिद्धों को
पता होता है
मरा हुआ घोड़ा
किस जगह
पाया जाता है
बहुत अच्छी
बात है अगर
कोई काली स्याही
अंगुली में
अपनी लगाता है
गर्व करता है
इतराता हुआ
फोटो भी कई
खिंचाता है
चीटिंयों की
कतार चल
रही होती है
एक तरफ को
भेड़ो का रेहड़
अपने हिसाब से
पहाड़ पर
चढ़ना चाहता है
एक खूबसूरत
ख्वाब कुछ दिनों
के लिये ही सही
फिल्म की तरह
दिखाया जाता है
देवता लोग
नहीं बैठते हैं
मंदिर मस्जिद
गुरुद्वारे में
हर कोई भक्तों से
मिलने बाहर को
आ जाता है
भक्तों की हो रही
होती है पूजा
न्यूनतम साझा
कार्यक्रम के बारे में
किसी को भी कुछ
नहीं बताया जाता है
चार दिन शादी ब्याह
के बजते ढोल नगाड़ों
के साथ कितना
भी थिरक लो
उसके बाद दूल्हा
अकेले दुल्हन के
साथ जाता है
तुझे क्या करना है
इन सब बातों से
बेवकूफ ‘उलूक’
तेरे पास कोई
काम धाम
तो है नहीं
मुँह उठाये
कुछ भी
लिखने को
चला आता है ।

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

आदत से मजबूर कथावाचक खाली मैदान में कुछ बड़बड़ायेंगे

भेड़ियों के झुंड में
भेड़ हो चुके कुछ
भेड़ियों के
मिमयाने की
मजबूरी को

कोई व्यँग कह ले
या उड़ा ले मजाक

अट्टहासों के
बीच में तबले
की संगत जैसा
ही कुछ महसूस
फिर भी
जरूर करवायेंगे

सुने ना सुने कोई पर
रेहड़ में एक दूसरे को
धक्का देते हुऐ
आगे बढ़ते हुऐ
भेड़ियों को भी पता है
शेरों के शिकार में से
बचे खुचे माँस और
हड्डियों में हिस्से बांट
होते समय सभी
भेड़ों को उनके अपने
अंदर के डर अपने
साथ ले जायेंगे

पूँछे खड़ी कर
के साथ साथ
एक दूसरे के
बदन से बदन
रगड़ते हुऐ एक दूसरे
का हौसला बढ़ायेंगे
काफिले की
रखवाली करते
साथ चल रहे कुत्ते
अपनी वफादारी
अपनी जिम्मेदारी
हमेशा की तरह
ही निभायेंगे

बाहर की ठंडी हवा
को बाहर की
ओर ही दौड़ायेंगे
अंदर हो रही
मिलावटों में
कभी पहले भी
टाँग नहीं अढ़ाई
इस बार भी
क्यों अढ़ायेंगे

दरवाजे हड्डियों के
खजाने के खुलते ही
टूट पड़ेंगे भेड़िये
एक दूसरे पर
नोचने के लिये
एक दूसरे की ताकत
को तौलते हुऐ
शेर को लम्बी दौड़
के बाद की थकावट
को दूर करने की
सलाह देखर
आराम करने का
मशविरा जरूर
दे कर आयेंगे

भेड़ हो चुके भेड़िये
वापस अपने अपने
ठिकानो पर लौट कर
शाँति पाठ जैसा
कुछ करवाने
में जुट जायेंगे

पंचतंत्र नहीं है
प्रजातंत्र है
इस अंतर को
अभी समझने में
कई स्वतंत्रता संग्राम
होते हुऐ नजर आयेंगे ।

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