चिट्ठा अनुसरणकर्ता

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

आ जाओ अलीबाबा फिर एक बार खेलने के लिये चोर चोर

रोज
जब चोरों से
सामना होता है

अलीबाबा
तुम बहुत
याद आते हो

सारे चोर
खुश
नजर आते हैं

जब भी
चोर चोर
खेल रहे होते हैं

और
जोर जोर से
चोर चोर चिल्लाते हैं

चोर अब
चालीस ही
नहीं होते हैं

मरजीना
अब नाचती
भी नहीं है

अशर्फियाँ
तोलने के
तराजू

और
अशर्फियाँ भी
अब नहीं होते हैं

खुल जा
सिमसिम
अभी भी
कह रहे हैं लोग

खड़े हैं
चट्टानों
के सामने से

इंतजार में
खुलने के
किसी दरवाजे के

अलीबाबा
बस एक तुम हो

कि
दिखाई ही
नहीं देते हो

आ भी जाओ
इससे पहले

हर कोई
निशान
लगाने लगे
दरवाजे दरवाजे
इस देश में

और पैदा होना

शुरु हों
गलतफहमियाँ

लुटने शुरु हों
घर घर में ही
घर घर के लोग

डर
अंदर के
फैलने लगें
बाहर की तरफ

मिट्टी
घास और पेड़
पानी बादल
और
काले सफेद
धुऐं में भी

रहम करो
ले आओ
कुछ ऐसा
जो ले पाये जगह

खुल जा
सिमसिम की

और
पिघलना शुरु
हो जायें चट्टाने

बहने लगे
वो सब
जो मिटा दे
सारे निशान
और पहचान

सारी
कायनात
एक हो जाये

और
समा जाये
सब कुछ
कुछ कुछ ही में

आ भी जाओ
अलीबाबा

इस से पहले
की देर हो जाये

और
‘उलूक’ को
नींद आ जाये

एक
नये सूरज
उगने के समय ।

चित्र साभार: www.bpiindia.com

12 टिप्‍पणियां:

  1. आ भी जाओ अलीबाबा--- गजब का प्रतीक
    बहुत सुंदर
    सादर

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2144 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. आ भी जाओ
    इससे पहले हर कोई
    निशान लगाने लगे
    दरवाजे दरवाजे ........Behtareen!!

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार जून 23, 2019 को साझा की गई है पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. व्यथा को भी इतने रोचक तरीके से लिखा जा सकता है!!!
    अलीबाबा भी कहीं रास्ता भूलकर भटक रहा है शायद....

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  6. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 10 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  7. अब कोई अलीबाबा नहीं आएगा और आएगा भी तो वह 41वां चोर ठहराया जाएगा।
    यह आधुनिक सभ्य समाज , यह परिवेश , ये काले कोट वाले जेंटलमैन , यह बौधिक वर्ग सभी मिल कर उसे ऐसे न्याय के कठघरे में खड़ा करेंगे , जहाँ से उसे सीधे यमपाश नजर आएगा।
    और वह मरजीना जिसके स्नेह निष्ठा पर उसे अत्यधिक विश्वास है , वह नृत्य करेगी अवश्य , परंतु इन चालीस चोर के मृत्यु गान के लिए नहीं, वरन् अलीबाबा जैसे निश्छल , निर्मल और कर्म के प्रति निष्ठावान व्यक्ति को भ्रमित करने के लिए, उसके पतन के लिए और अपनत्व भरे शब्दों से ऐसे उसे अंधकूप में दफन के लिए , जिसमें तेजाब की बारिश हो।
    फिर भी इन षड़यंत्रकारियों के हाथों अशर्फी हाथ नहीं लगेगी, क्योंकि सोना खोटा नहीं होता है.. ?

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