चिट्ठा अनुसरणकर्ता

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

बस समय चलता है अब इशारों में एक माहिर के सूईंया छुपाने से

किसलिये
डरता है
उसके
आईना
दिखाने से 

चेहरा
छुपा के
रखता है
वो
अपना
जमाने से 

कुछ
पूछते ही
पूछ लेना
उस से
उसी समय 

तहजीब
कहाँ गयी
तेरी

पूछने
चला है
हुकमरानो से 

ना देखना
घर में लगी
आग को

बुझाना भी नहीं 

दिखाना
आशियाँ
उसका जलता हुआ 

चूकना नहीं
तालियाँ
भी
बजाने से 

हिलती रहें
हवा में
आधी कटी
डालें
पेड़ पर ही 

सीखना
कत्ल करना

मगर बचना

लाशें
ठिकाने लगाने से 

नकाब
सबके
उतार देने का
दावा है
नकाबपोष का

शहर में
बाँटता है
चेहरे

खरीदे हुऐ
नकाबों के
कारखाने से

घड़ी
दीवार पर टंगी है

उसी
तरह से
टिकटिकाती हुयी

बस
समय चलता है
अब
इशारों में ‘उलूक’ 

एक
माहिर के
सूईंया
छुपाने से। 

चित्र साभार: https://www.fotolia.com

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (19-09-2019) को      "दूषित हुआ समीर"   (चर्चा अंक- 3463)     पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 18 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. समय कभी नहीं रुकता , किसी के लिए नहीं रुकता है

    जवाब देंहटाएं
  4. हर जगह विभ्रम उत्पन्न करना -एक शगल बन गया है जैसै.

    जवाब देंहटाएं
  5. किसलिये
    डरता है
    उसके
    आईना
    दिखाने से

    चेहरा
    छुपा के
    रखता है
    वो
    अपना
    जमाने से
    बहुत खूब... हमेशा की तरह लाजवाब ।

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह बहुत खूब कहा आपने आदरणीय सर
    सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  7. मुसाहिबी में रात-दिन,तू ज़िंदगी गुज़ार दे,
    उन्हें जलाना घर कोई, तो माचिसें उधार दे.
    न सर उठा, न खोल मुंह, बना रहे तू पालतू,
    तू उन पे वर्तमान क्या, भविष्य भी निसार दे.

    जवाब देंहटाएं
  8. शहर में
    बाँटता है
    चेहरे

    खरीदे हुऐ
    नकाबों के
    कारखाने से.... वाह! लाज़बाब@@!

    जवाब देंहटाएं

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