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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

नकारात्मकता फैला कर सकारात्मकता बेचने वालों के लिये सजदे में सर झुका जा रहा था

बिल्लियों के
अखबार में
बिल्लियों ने
फिर छ्पवाया

सुबह का
अखबार
रोज की तरह

आज भी
सुबह सुबह
उसी तरह से
शर्माता हुआ
जबर्दस्ती
घर के दरवाजे से
कूदता फाँदता
हुआ ही आया

खबर
शहर के कुछ
हिसाब की थी
कुछ किताब की थी
शरम लिहाज की थी
शहर के पन्ने में ही
बस दिखायी गयी थी

चूहों की पढ़ाई
को लेकर आ रही
परेशानियों की बात
बिल्लियों के
अखबार नबीस के द्वारा
बहुत शराफत के साथ
रात भर पका कर
मसाले मिर्च डाले बिना
कम नमक के साथ
बिना काँटे छुरी के
सजाई गयी थी

मुद्दा
दूध के बंटवारे
को लेकर हो रहे
फसाद का नहीं है

खबर में
समझाया गया था

बिल्लियाँ
घास खाना
शुरु कर जी रही हैं
बिल्लियों का
वक्तव्य भी
लिखवाया गया था

सफेद
चूहों को अलग
और
काले चूहों को
कुछ और अलग
बताया गया था

खबर जब
कई दिनों से
सकारात्मक सोच
बेचने वालों की
छपायी जा रही थी

पता नहीं बीच में
नकारात्मक उर्जा
को किसलिये
ला कर
फैलाया जा रहा था

बात
चूहों के
शिकार की
जब थी ही नहीं

बेकार में
दूध के बटवारे
को लेकर पता नहीं
किस बात का
हल्ला
मचवाया जा रहा था

चूहे चूहों को गिन कर
पूरी गिनती के साथ
बिल से निकल कर
रोज की तरह वापस
अपने ही बिल में
घुस जा रहे थे

दूध और
मलाई के निशान
बिल्लियों की मूँछों
में जब आने ही
नहीं दिये जा रहे थे

बिल्लियों के
साफ सुथरे धंधों को
किसलिये
इतना बदनाम
करवाया जा रहा था

ईमानदारी की
गलतफहमियाँ
पाला ‘उलूक’

बे‌ईमानी के
लफड़े में
अपने हिस्से का
गणित लगाता हुआ

रोज की तरह
चूहे बिल्ली के
खेल की खबर
खबरची
अखबार की गंगा
और डुबकी
सोच कर

हर हर गंगे
मंत्र के जाप के
एक हजार आठ
पूरे करने का
हिसाब लगा रहा था।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

सकारात्मक और नकारात्मक हवा को देखने के नजरिये से पता चल जाता है

कभी लगता है
आता है
कभी लगता है
नहीं आता है
जब बहुत ज्यादा
भ्रम होना शुरु
हो जाता है
सोचा ही जाता है
पूछ ही लेना चाहिये
पूछने में किसी
का क्या जाता है
ऐसा सोच कर जब
जमूरा उस्ताद के
धौरे पहुँच जाता है
तो उस्ताद भी
मुस्कुराते हुऐ
बताता है
बहुत आसान
सा प्रश्न है जमूरे
देख अपने ही
सामने से एक
खाली जगह को
देखते देखते
सारी जिंदगी
एक आदमी
सोच सोच कर
कुछ बन रहा है
कुछ बन रहा है
देखते सोचते
गुजर भी जाता है
उसके मरने के बाद
उसका जैसा ही
दूसरा इसी बनने
की बात को
आगे बढ़ाता है
बन रहा है की जगह
पक्का बन रहा है
फैलाना शुरु
हो जाता है
सकारात्मक
कहा जाता है
ऐसे ही
सकारात्मक
लोगों में से ही
सबसे
सकारात्मक को
बन रहा है
कहने को
आगे बढ़ाने का
ठेका भी
दिया जाता है
नकारात्मक
खाली खाली
रोज खाली
जगह को
देखने खाली
चला आता है
देखता है
सोचता है
खाली है
खाली है
कहते कहते
खाली बेकार
में आता है और
खाली चला
जाता है
ऐसे खाली
लोगों को
खाली ही रहने
दिया जाता है
‘उलूक’
उसी खाली
जमीन को
देखते देखते
ऊँघता हुआ
पेड़ की किसी
डाल पर पंजे से
अपने कान
खुजलाता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

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