उलूक टाइम्स: माचिस की तीली कुछ सीली कुछ गीली रगड़ उलूक रगड़ कभी लगेगी वो आग कहीं जिसकी किसी को जरूरत होती है

मंगलवार, 9 नवंबर 2021

माचिस की तीली कुछ सीली कुछ गीली रगड़ उलूक रगड़ कभी लगेगी वो आग कहीं जिसकी किसी को जरूरत होती है



बहुत जोर शोर से ही हमेशा
बकवास शुरु होती है

किसे बताया जाये क्या समझाया जाये
गीली मिट्टी में
सोच लिया जाता है दिखती नहीं है
लेकिन आग लगी होती है

दियासलाई भी कोई नई नहीं होती है
रोज के वही पिचके टूटे डब्बे होते हैं
रोज की गीली सीली तीलियाँ होती हैं

घिसना जरूरी होता है
चिनगारियाँ मीलों तक कहीं दिखाई नहीं देती हैं

मान लेना होता है गँधक है
मान लेना होता है ज्वलनशील होता है
मान लेना होता है घर्षण से आग पैदा होती है
मान लेना होता है आग सब कुछ भस्म कर देती है
और बची हुई बस कुछ होती है तो वो राख होती है

इसी तरह से रोज का रोज खिसक लेता है समय
सुबह भी होती है और फिर रात उसी तरह से होती है

कुछ हो नहीं पाता है चिढ़ का
उसे उसी तरह लगना होता है
जिस तरह से रोज ही
किसी की शक्ल सोच सोच कर लग रही होती है

खिसियानी बिल्ली के लिये
हर शख्स खम्बा होना कब शुरु हो लेता है
खुद की सोच ही को नोच लेने की सोच
रोज का रोज पैदा हो रही होती है

रोज का रोज मर रही होती है
तेरे जैसे पाले हुऐ कबूतर बस एक तू ही नहीं
पालने वाले को
हर किसी में तेरे जैसे एक कबूतर की जरूरत हो रही होती है

‘उलूक’ खुजलाना मत छोड़ा कर कविता को
इस तरह रोज का रोज
फिर रोयेगा
नहीं तो किसी एक दिन कभी आकर
कह कर
खुजली किसी और की खुजलाना किसी और का
बिल्ली किसी और की खम्बा किसी और का
तेरी और तेरे लिखने लिखाने की
किसे जरूरत हो रही होती है ।

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

17 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(११-११-२०२१) को
    'अंतर्ध्वनि'(चर्चा अंक-४२४५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. खुद की सोच ही को नोच लेने की सोच रोज का रोज पैदा हो रही होती है

    -अनेक दिलों की आवाज आपके शब्दों
    सुकूँ मिलता है
    अद्धभुत रचना

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  3. हर बकवास में एक सत्य,एक दर्पण ।
    गहन दृष्टि।
    सुंदर सृजन।

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  4. उलूक की सोच !
    अगर खिसिया कर हर खम्बा हमने नोच लिया तो क्या सड़क पर लगी लाइटें गैस के गुब्बारों पर टांगी जाएंगी?

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  5. मान लेना होता है गँधक है
    मान लेना होता है ज्वलनशील होता है
    मान लेना होता है घर्षण से आग पैदा होती है
    मान लेना होता है आग सब कुछ भस्म कर देती है
    और बची हुई बस कुछ होती है तो वो राख होती है सही कहा बस मान लेना होता है...सीली तीली भी घिस घिस कर जल ही जायेगी....
    वाह!!!
    अद्भुत...लाजवाब।

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  6. बहुत कुछ संदेश देती लाजवाब रचना । गजब लिखा है आपने ।
    नमन और वंदन ।

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  7. हमेशा की तरह बहुत बढ़िया. बहुत सही-सही, सच-सच. बधाई.

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  9. हाहाहाहाहा माने पर ही दुनिया चल रही है।

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  10. हमेशा की तरह ...
    आपका अंदाज़ जुदा है ... अभिव्यक्ति जुदा है ... गीली तीली भी जुदा है जो जला देती है बहुत कुह ...

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