उलूक टाइम्स: बीज
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शनिवार, 6 दिसंबर 2014

कुछ भी यूँ ही


शब्द बीजों से उपजी
शब्दों की लहलहाती फसल हो

या सूखे शब्दों से
सूख चुके खेत में
पढ़े हुऐ कुछ सूखे शब्द

बस देखते रहिये
काटने की जरूरत ना होती है
ना ही कोशिश करनी चाहिये काटने की

दोनों ही स्थितियों में
हाथ में कुछ नहीं आता है
खुशी हो या दुख:
शब्द बोना बहुत आसान होता है
खाद पानी हवा
के बारे में नहीं सोचना होता है

अंकुर फूटने का भी
किसी को इंतजार नहीं होता है
ना ही जरूरत होती है

सोच लेने में कोई हर्ज नहीं है

रात के देखे सुबह होने तक
याद से उतर जाते हैं सपनों की तरह


पौंधे उगते ही हैं
सभी नहीं तो
कुछ कुछ उगने भी चाहिये

अगर बीज बीज होते हैं
अंकुरित होते जैसे
तो हमेशा ही महसूस किये जाते हैं

पर अंकुरण होने से लेकर
पनपने तक के सफर में

खोते भी हैं और
सही एक रास्ते पर होते होते
मंजिल तक पहुँच भी जाते हैं

कुछ भी हो
खेत बंजर होने से अच्छा है
बीज हों भी और पड़े भी रहें
जमीन की ऊपरी सतह पर ही सही

दिखते भी रहें उगें नहीं भी
चाहे किसी को भूख ना भी लगे
और भरे पेट कोई देखना भी ना चाहे
ना खेतों की ओर
या बीजों को कहीं भी खेत में

या कहीं किसी
बीज की दुकान पर
धूल पड़े कुछ थैलों के अंदर

शब्दों के बीच दबे हुऐ शब्द
कुचलते हुऐ कुछ शब्दों को यूँ ही ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 15 पृ43

मंगलवार, 24 जून 2014

रोज एक नई बात दिखती है पुराने रोज हो रहे कुछ कुछ में

ये पता होते
हुऐ भी कि
बीज हरे भरे
पेड़ पौँधे के
नहीं है जो
बो रहे हैं
उनसे बस
उगनी हैं
मिट्टी से
रेत हो चुकी
सोच में कुछ
कंटीली झाड़ियाँ
जिनको काटने
के लिये कभी
पीछे मुड़ के
भी किसी ने
नहीं देखना है
उलझते रहे
पीछे से आ रही
भीड़ की सोच
के झीने दुपट्टे
और होते रहे
बहुत कुछ
तार तार
समय के
आर पार
देखना शुरु
कर लेना
सीख लेने
से भी कुछ
नहीं होता
अपने से शुरु
कर अपने में
ही समाहित
कर लेने में
माहिर हो कर
कृष्ण हो चुके
लोगों को अब
द्रोपदी के चीर
के इन्ही सोच
की झड़ियों में
फंस कर उधड़ना
देख कर शंखनाद
करना कोई नई
बात नहीं है
तुझी को आदत
डालनी पड़ेगी
बहरे होने की
नहीं हो सकता
तो चीखना सीख
एक तेज आवाज
के साथ जो
आज के कृष्ण
के शंख का
मुकाबला कर सके
तू नहीं तो
कृष्ण ही सही
थोड़ा सा
खुश रह सके ।

शनिवार, 3 मई 2014

सब पी रहे हों जिसको उसी के लिये तुझको जहर के ख्वाब आते हैं

रेगिस्तान की रेत के
बीच का कैक्टस
फूलोंं के बीज बेच रहा है

कैक्टस 
बहुत कम लोग पसंद करते हैं

कम से कम
वास्तु शास्त्री की बातों को
मानने वाले तो कतई नहीं

कुछ रखते हैं गमलों में
क्योंकि फैशन है रखने का

पर किंवदंतियों के भूत से भी
पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं
गमले 
घर के पिछवाड़े रख कर आते हैं

कैक्टस के कांटे निकलने
का मौसम अभी नहीं है
आजकल उनमें फूल आते हैं

फूल के बीज बिक रहे हैं बेतहाशा भीड़ है

और भीड़ की
बस दो ही आँखें होती हैं
उनको कैक्टस से कोई मतलब नहीं होता है
उनके सपने में फूल ही फूल तो आते हैं

काँटो से लहूलुहान ऐसे लोग
भूखी बिल्ली की तरह होते हैं

जो बस दूध की फोटो देख कर ही तृप्त हो जाते हैं

इसी भूख को बेचना सिखाने वाले कैक्टस
उस मौसम में 
जब उनके काँटे गिर चुके होते हैं

और कुछ फूल
जो उनके बस फोड़े होते हैं 
सामने वाले को फूल जैसे ही नजर आते हैं

सारे फूलों को फूलों के बीज बेचना सिखाते हैं

फूल कैक्टस को महसूस नहीं करते हैं
उसके फूलों पर फिदा हो जाते हैं

और बेचना शुरु कर देते हैं कैक्टस के बीज

‘उलूक’
बहुत दूर तक देखना अच्छा नहीं है
कांटे तेरे दिमाग में भी हैं
जिनपर फूल कभी भी नहीं आते हैं

कैक्टस
इसी बात को बहुत सफाई के साथ
भुना ले जाते हैं

और यूँ ही खेल ही खेल में
सारे के सारे बीज बिक जाते हैं

देखना भर रह गया है
कितने बीजों से 
रक्तबीज फिर से उग कर आते हैं ।