उलूक टाइम्स: जो होता नहीं कहीं उसी को ही दिखाने के लिये कुछ नहीं दिखाना पड़ता है

चिट्ठा अनुसरणकर्ता

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

जो होता नहीं कहीं उसी को ही दिखाने के लिये कुछ नहीं दिखाना पड़ता है

बैठे ठाले का
दर्शन है बस
चिंतन के किसी
काम में कभी भी
नहीं लाना होता है
खाली दिमाग
को कहते हैं
दिमाग वाले
शैतान का एक
घर होता है
ऐसे घरों की
बातों को
ध्यान में नहीं
लाना होता है
सब कर रहे
होते हैं लागू
अपने अपने
धंधों पर
धंधे पर ही बस
नहीं जाना होता है
बहुत देर में आती है
बहुत सी बातें
गलती से समझ में
सबको आसानी से
समझ में आ जाये
ऐसा कभी भी कुछ
नहीं समझाना होता है
एक ही जैसी बात है
कई कई बातों में
घुमा फिरा के फिर
उसी जगह पर
चले जाना होता है
सबके सब कर
रहे होते हैं
गांंधी दर्शन के
उल्टे पर शोध अगर
मान्यता पाने के लिये
शामिल हो ही
जाना पड़ता है
घर में सोते रहिये
जनाब चादर ओढ़ कर
दिन हो या रात हो
अखबार में कसरत
करता हुआ आदमी
एक दिखाना पड़ता है
कभी तो चावल के
दाने गिन भी लिया
कर ‘उलूक’ दिखाने
के लिये ही सही
रोज रोज कीड़े
दिखाने वाले को
बाबा जी का भोंपू
बजा कर शहर से
भगाना पड़ता है ।

18 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर पोस्ट।

    शुक्रिया दोस्त आपकी टिप्पणियों का।

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज बुधवारीय चर्चा मंच पर ।। आइये जरूर-

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  3. बैठे ठाले का दर्शन वास्‍तव में ही बहुत वि‍कट होता है

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  4. सुंदर व सटीक , सर धन्यवाद !
    जय श्री कृष्ण

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