भेड़िये ने खोल ली है आढ़त
बीमे कराने की
भेड़ें बहुत खुश हैं अब
मरेंगी भी तो
मेमने सड़क पर नहीं आयेंगे
खा पी सकेंगे बढ़ा सकेंगे खून
तब तक जब तक
शरीर के बाल उनके बड़े नहीं हो जायेंगे
वैसे भी भेड़िये को कुछ नहीं करना होता है
समझदार भेड़िये का
एक इशारा ही बहुत होता है
भेड़ेंं पढ़ लिख कर भी अनपढ़ बनी रहें
इसका पूरा इंतजाम
उनके पाठ्यक्रम में ही दिया होता है
बेवकूफी भेड़ों की नस नस में बसी होती है
भेड़िये का आम मुख्तार होने की हौड़ में
भेड़ें ही भेड़ों से भिड़ रही होती हैं
इन सब में ‘उलूक’
बस इतना ही सोच रहा होता है
काटने के बाद गर्दन भेड़ की
किस जगह दुनियाँ में
दूसरा कौन ऐसा और है
जो पैसे बीमे के गिन रहा होता है ।
चित्र साभार: www.canstockphoto.com

oh...kis khubsurti se symble ke madhyam se chot ki hai...
जवाब देंहटाएंआभार अपर्णा जी ।
हटाएंसर आपकी अभिव्यक्ति सीधे दिल को छूती है।
जवाब देंहटाएंआभार अभिषेक ।
हटाएंबहुत सुंदर.
जवाब देंहटाएंआभार राजीव ।
हटाएंयह हमारी आज की सामाजिक खादय श्रंखला है।
जवाब देंहटाएंआभार कहकशाँ जी ।
हटाएंबहुत सुन्दर तरीके से हमारे आस-पास होने वाली बातों को कविता में पिरोया है ।
जवाब देंहटाएंआभार मधूलिका जी ।
हटाएंब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मैं रश्मि प्रभा ठान लेती हूँ कि प्राणप्रतिष्ठा होगी तो होगी , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
जवाब देंहटाएंआभार रश्मि प्रभा जी ।
हटाएंबहुत सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंआभार नीरज ।
हटाएंमैं साफ देख पाता हूँ कि ताकतवर कैसे नियम बनाता है और कमजोर खुशी-खुशी उसी जाल में फँस जाता है। पढ़ाई, बीमा और समझदारी सब दिखावा लगने लगते हैं।
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