उलूक टाइम्स: लिखा सबका नहीं फैलता है कागज पर कुछ का बहता चला जाता है सलीके से: यूँ ही एक खोज

चिट्ठा अनुसरणकर्ता

बुधवार, 11 मार्च 2020

लिखा सबका नहीं फैलता है कागज पर कुछ का बहता चला जाता है सलीके से: यूँ ही एक खोज



खुलता रोज है
एक पन्ना
हमेशा

खुलता है
उसी तरह

जैसे
खोला जाता है
सुबह

किसी
दुकान का शटर

और
बन्द
कर दिया जाता है
शाम को
आदतन

पिछले
कई दिनों से

तारीख
बदल रही है
रोज की रोज

मगर
कलम है
लेट जाती है
थकी हुयी सी
बगल में ही
सफेद पन्ने के

सो जाती है
आँखे
खुली रख कर

देखने के लिये
कुछ
रंगीन सपने
गलतफहमी के

लिख सके
कुछ
सकारात्मक सा

फजूल
बक बक करते करते
सालों हो गये हों जब

लिख दिये होंगे
अब तक तो
सारी अंधेरी रात के
सारे कालेपन

सोच कर
कुछ नयापन
कुछ पुराना
बदलना चाह कर

अपनी
जीभ का स्वाद
ढूँढने
निकल पड़ती है
नींद में

कुछ नया
खुली आँखों से
देखते देखते
ओढ़े हुऐ
सकारात्मकता

फैली हुयी
भीड़ के
चेहरे दर चेहरे

भीड़ दर भीड़
पढ़ाती
एक भीड़
अकेले

अकेले को
अलग

अलग
बनाने के लिये
एक भीड़

भीड़
जो
बहुत जरूरी
हो गयी है आज

सारे चेहरे
लहाराते हुऐ
ओढ़ी
सकारात्मकता

जो ढक लेती है
पूरी भीड़ को
बदल जाती है
सारी परिभाषाऐं
बहती हुई
भीड़ के अंदर अंदर

दूर
किसी
ठूँठ पर बैठे
अन्धेरे में

आँखे
चौंधियाता
उलूक
प्रकाशमान
होता हुआ

कलम की
नोक से
कुरेदते हुऐ
अपने दाँतो के बीच
ताजी नोची लाश के
चिथड़े को

खुश
हो कर
काम आ गयी
कलम की नोक पर

अपनी
पीठ ठोक कर
अपने को खुद
दाद देता

नकारात्मकता
को
लीप देने के लिये

समय के गोबर
और
मिट्टी के साथ
अपने
चारों तरफ

और
मदहोश होता
खुश्बू से
फैलती हुई

मानकर
कुछ भी लिखा
इसी तरह
फैलता
चला  जाता है

बहता
नहीं है
निर्धारित
रास्ते पर ।

चित्र साभार:
 https://www.graphicsfactory.com/

7 टिप्‍पणियां:

  1. सोच कर
    कुछ नयापन
    कुछ पुराना
    बदलना चाह कर
    सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 12 मार्च 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (13-03-2020) को भाईचारा (चर्चा अंक - 3639) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    आँचल पाण्डेय

    जवाब देंहटाएं
  4. उलूक से विचार काफ़ी मिलते है
    न जाने क्यों।
    जोरदार रचना हमेशा की भांति।
    नई पोस्ट - कविता २

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर सृजन सर हमेशा की तरह , सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  6. कलम है
    लेट जाती है
    थकी हुयी सी
    बगल में ही
    सफेद पन्ने के
    सो जाती है
    आँखे
    खुली रख कर
    देखने के लिये
    कुछ
    रंगीन सपने
    गलतफहमी के
    लिख सके
    कुछ
    सकारात्मक सा
    वाह!!!
    इससे भी बेहतर इससे भी सकारात्मक...।
    जहाँ चाह है वहीं राह है
    और यही है आपकी सफलता की कुंजी भी
    बहुत शानदार ...लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  7. सो जाती है
    आँखे
    खुली रख कर

    देखने के लिये
    कुछ
    रंगीन सपने
    गलतफहमी के ...
    ये गलतफहमियाँ ना हों जो जिएँगे कैसे ... बहुत ज़रूरी हैं ये साँसों के लिए ... उत्पात मचाने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं