उलूक टाइम्स: लिखा कुछ भी नहीं जाता है बस एक दो कौए उड़ते हुऐ से नजर आते हैं

चिट्ठा अनुसरणकर्ता

सोमवार, 13 जुलाई 2020

लिखा कुछ भी नहीं जाता है बस एक दो कौए उड़ते हुऐ से नजर आते हैं


शब्द सारे
मछलियाँ हो जाते हैं
सोचने से पहले
फिसल 
जाते हैं

कुछ
पुराने ख्वाब हो कर
कहीं गहरे में खो जाते हैं

लिखने
रोज ही आते हैं
लिखा कुछ  जाता नहीं है
बस तारीख बदल 
जाते हैंं

मछलियाँ
तैरती दिखाई देती हैं
हवा के बुलबुले बनते हैं
फूटते चले जाते हैं

मन
नहीं होता है
तबीयत नासाज है
के बहाने
निकल आते हैं

पन्ने पलट लेते हैं
खुद ही डायरी के खुद को
वो भी आजकल
कुछ लिखवाना
कहाँ चाहते हैं 

बकवास
करने के बहाने
सब खत्म हो जाते हैं

पता ही नहीं चल पाता है
बकवास करते करते
बकवास
करने वाले

कब खुद
एक बकवास हो जाते हैं 

कलाकारी
कलाकारों की
दिखाई नहीं देती है

सब
दिखाना भी नहीं चाहते हैं

नींव
खोदते चूहे घर के नीचे के

घर के
गिरने के बाद
जीत का झंडा उठाये
हर तरफ
नजर आना शुरु हो जाते हैं 

‘उलूक’
छोड़ भी नहीं देता 
है लिखना 

कबूतर लिखने की सोच
आते आते
तोते में अटक जाती है

लिखा
कुछ भी नहीं जाता 
है
एक दो कौए
उड़ते हुऐ से नजर आते हैं ।

चित्र साभार:
https://timesofindia.indiatimes.com/

19 टिप्‍पणियां:

  1. सरपट भागते समय से क़दम मिलाते दृश्य
    सोच के शब्द होने के पूर्व बदलते परिदृश्य
    कबूतर का तोता होना अनूठा नहीं लगता
    अजीब लगता है जब कुत्ते हो जाते अदृश्य।
    ----
    हमेशा की तरह सारगर्भित रचना सर।
    सादर प्रणाम सर।

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  2. कलाकारी
    कलाकारों की
    दिखाई नहीं देती है...
    सादर नमन..

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 14 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. आपकी रचना बहुत सुंदर है
    हाल ही मैने ब्लॉगर ज्वाइन किया है आपसे निवेदन है आप मेरे ब्लॉग पर आए मुझे पढ़े मुझे दिशा निर्देश करें
    https://srikrishna444.blogspot.com/2020/07/blog-post.html

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-07-2020) को     "बदलेगा परिवेश"   (चर्चा अंक-3763)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  6. जोशी जी हर बार की तरह बहुत खूब

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  7. समझने के प्रयास में समझ ही उलझ जाती है.मछली की कहानी कबूतर लिखता.कौए को तोता के चिन्हों पर चलना....
    लाजवाब अंदाज़ 👌
    कलाकारी
    कलाकारों की
    दिखाई नहीं देती है

    सब
    दिखाना भी नहीं चाहते हैं

    नींव
    खोदते चूहे घर के नीचे के

    घर के
    गिरने के बाद
    जीत का झंडा उठाये
    हर तरफ
    नजर आना शुरु हो जाते हैं ...वाह !

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  8. हमेशा की तरह अपनी अलग ही अंदाज में बेहतरीन सृजन, सादर नमन आपको

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  9. कबूतर लिखने की सोच
    आते आते
    तोते में अटक जाती है
    वाह बेहतरीन रचना आदरणीय 👌

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  10. गज़ब!
    हमेशा की तरह तीखा चरपरा 'जीत का झंडा।'
    वाह!

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  11. नमन है आपको और आपकी कलम को।

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  12. जब शब्द फिसलते हों ... ख्वाब कहीं गहरे खो जाते हों ... तो लिखना भी कुछ का कुछ हो जाता है ...

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  13. कौओं ने भी इतना तो लिखवा ही लिया...

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  14. शब्द मछली बने और जाकर कौए पर अटक गए ! वाह !!!! यही है उलूक दर्शन जो अलग है शानदार है ! सादर --

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