उलूक टाइम्स: बाढ़ थमने की आहट हुई नहीं बकवास करने का मौसम आ जाता है

चिट्ठा अनुसरणकर्ता

रविवार, 11 अक्तूबर 2020

बाढ़ थमने की आहट हुई नहीं बकवास करने का मौसम आ जाता है

 

वैसे तो
सालों हो गये अब

कुछ नहीं
लिखते लिखते

और ये
कुछ नहीं
अब

शामिल
हो लिया है
आदतों में सुबह की
एक प्याली
जरूरी चाय की तरह

फिर भी
इधर कुछ दिनों
कागजों में बह रही
इधर उधर फैली हुई
बहुत कुछ
की
आई हुई बाढ़ से
बचने बचाने के चक्कर में

कुछ नहीं
भी
पता नहीं चला कहाँ खो गया

होते हुऐ पर
कुछ लिखना
कहाँ आसान होता है

हमेशा
नहीं हुआ कहीं भी
ही
आगे
कहीं दिख रहा होता है

अब
दौड़ में
शुरु होते समय
पानी की

हौले हौले से
कुछ बूँदें
नजर आ ही जाती हैँ 

देख लिया जाता है
इंद्रधनुष भी
बनता हुआ कहीं
किसी कोने में छा सा जाता है 

कुछ
के
होते होते
बहुत कुछ

शुरु होता है
ताँडव
बूंदों का जैसे ही

पानी
ही
पता नहीं चलता है
कि है कहीं
सारा बहुत
कुछ खो सा जाता है

जैसे 
नियाग्रा 
जल प्रपात से गिरता हुआ जल
धुआँ धुआँ
होना शुरु हो जाता है

‘उलूक’ भी
गहरी साँस खींचता सा
कहीं से

अपनी
देखी दिखाई सुनी सुनाई पर
बक बकाई ले कर
फिर से
हाजिर होना
शुरु हो जाता है। 

चित्र साभार: https://www.gettyimages.co.uk/

22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! सुंदर हाज़िरी, उलूक की बकबकाई की!

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  2. आपकी पारखी दृष्टि से कुछ बच नहीं सकता। आपके कलम की कुछ बूँदें सब कह जाती है, बिना कुछ ज्यादा कहे।
    शुभ प्रभात व साधुवाद।

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 12 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-10-2020 ) को "अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर एक मां की हुंकार..."(चर्चा अंक 3853) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  5. पानी
    ही
    पता नहीं चलता है
    कि है कहीं
    सारा बहुत
    कुछ खो सा जाता है - - अंदाज़ ए बयान क्या कहिए - - कुछ शब्द ही काफी हैं ज़िन्दगी की तस्वीर के लिए, नमन सह।

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  6. पानी
    ही
    पता नहीं चलता है
    कि है कहीं
    सारा बहुत
    कुछ खो सा जाता है

    जैसे
    नियाग्रा
    जल प्रपात से गिरता हुआ जल
    धुआँ धुआँ
    होना शुरु हो जाता है..वाह !बहुत ही सुंदर सर।
    सादर

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  7. जैसे
    नियाग्रा
    जल प्रपात से गिरता हुआ जल
    धुआँ धुआँ
    होना शुरु हो जाता है

    ‘उलूक’ भी
    गहरी साँस खींचता सा
    कहीं से

    अपनी
    देखी दिखाई सुनी सुनाई पर
    बक बकाई ले कर
    फिर से
    हाजिर होना
    शुरु हो जाता है।


    सुन्दर रचना।

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  8. अपनी
    देखी दिखाई सुनी सुनाई पर
    बक बकाई ले कर
    फिर से
    हाजिर होना
    शुरु हो जाता है। ,,,,,,, बहुत लाजवाब है

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  9. होते हुए पर लिखना मुश्किल तो है ही ,खतरों से भरा भी है.

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  10. कोरोना से हुई रंग विहीन फिजा पर ये रंग कौन सा छा गया,
    बाढ़ थमने की आहट हुई नहीं बकवास करने का मौसम आ गया।

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  11. यह जो दुनिया का मौसम है, बिना बक-बकाई के काम ही नहीं चलता. बहुत सही लिखा.

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