कारवाँ कुछ ऐसे जिनके शुरु होने के बारे में
पता नही होता है
ना ही पता होता है उनकी मंजिल का
बस यूँ ही होते होते महसूस होता है
शामिल हुआ होना किसी एक ऐसी यात्रा में
जहाँ कहीं कुछ नहीं होता है
आसपास क्या
कहीं दूर दूर बहुत दूर तक
घने जंगल के बीच
पेड़ों के बीच से आती रोशनी की
किरणों से बनते कोन या फिर
सरसराती हवाओं का शोर
गिरते पानी की छलछलाहट
या फिर झिंगुरों की आवाज
सबका अलग अलग अपना अस्तित्व
समझने की जरूरत कुछ भी नहीं होती है
फिर भी अच्छा सा महसूस होता है
कभी कभी गुजर लेना कुछ दूर तक
बहुत सारे चलते कारवाओं के बीच से चुपचाप बिना कुछ कहे सुने
लिखते लिखते बन चुके शब्दों के कारवाओं के बीच
निशब्द कुछ शब्द भी यही करते हैं
मौन रहकर कुछ कहते भी हैं और नहीं भी कहते हैं
समझने की कोशिश करना हमेशा जरूरी भी नहीं होता है
कभी कभी किसी का लिखा
कुछ नहीं भी कह रहा होता है
पढ़ने वाला बस
एक नजर कुछ देर बिना पढ़े
लिखे लिखाये को बस देख रहा होता है
समझ में कुछ नहीं भी आये
फिर भी एक सुकून जैसा कहीं
अंदर की ओर कहीं से कहीं को बह रहा होता है
महसूस भी कुछ हो रहा होता है ।
चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 47 पृ112
