उलूक टाइम्स: जुलाई 2026

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

चिट्ठाकार हैं कुछ स्वाभिमानी हैं कुछ थोड़ा सा बस पानी पानी हैं

 
थोड़ी सी हैं कुछ बातें हैं
खुद की हैं जो
खुद को बस थोड़ी सी समझानी हैं

किसी और से क्या कहना है कुछ
जब समझ में उसको
उसकी अपनी ही बातें नहीं आनी हैं

दिखता जो कुछ है
उसपर कुछ लिखना है
कहानी तो बस कुछ और ही
दिखे से इतर दो एक बनानी हैं

गांधी रखकर खोज  में अपनी
बंदर तीन उठा गोद में अपनी
नाख  कान आंख अपनी ही
खुद की ही तो बंद करवानी हैं

सच ही सोचेंगे सच ही खोदेंगे
सच की ही लड़ाई 
लड़ने को  ही
बस कुछ लिखने में ही ठानी है

अपने अपने लिखे लिखाए में
अपनी बातें इसकी बातें उसकी बातें
बातें तो बस आनी जानी हैं

कुछ पढ़ते हैं इसका ही लिखा
कुछ को लिखा उसका बस पढ़ना है
कुछ को बस लिखना ही है
पढ़ना ही बस बेमानी है

कुछ लिखते पढ़ते हैं
कुछ पढ़ते हैं फिर लिखते हैं
सब की अपनी आदत हैं
समझ में कुछ कुछ ही तो आनी हैं

चिट्ठाकारी से जन्मे हैं
कुछ चिट्ठे हैं
चिट्ठाकार हैं कुछ
स्वाभिमानी हैं
कुछ थोड़ा सा बस
पानी पानी हैं
|

                                                         
                                            चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है

 


घर के राम कृष्ण हनुमान को साथ ले
सड़क कोई एक नापने निकल जाता है
अल्बर्ट पिन्टो गुस्सा भूल जाता है
लीला देख कर कल्कियों की भुनभुनाता है

समझने में गलतियाँ करता है अनेकों एक साथ
सीधे रास्ते में ही उलझ जाता है
दिखाने को बनाए चित्र अपने रंगों से भरे
अंधे साथ रखता है उन्हें मनाता है

सुनाने को कहानियां देखी हुई खुद की
बहरों को सुबहो शाम आवाजें लगाता है
लूले गाते हैं गीत लिखे भक्ति भाव से उसके
यही आगास नई रागों की धुन बनाता है

भरम होते हैं टूट कर गिरते भी हैं पता नहीं
बेखयाली उन्हें फिर से चुन उठाता है
‘उलूक’ खुद समझता है समझ गया है खुद का लिखा
फिर से समझाने को चला आता है |

चित्र साभार : https://www.wallpaperflare.com/

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कुछ अलग से हो निर्भया के साथ हुए को भी समझाओगे

 


अब कौन सा छछूंदर और ढूंढ के तुम ले आओगे
कितना गिरोगे हजूरे आला तुम अब लुढ़क जाओगे

रहने दो नापना एक फुट को तीस सेंटीमीटर से अब
अपनी उलझनों को जनता को खुद आ दिखाओगे

अपना चेहरा खुद तो देख लिया करो किसी का नोचने से पहले
हमाम की दीवार ढह गई है अब कहो किसका क्या छुपाओगे

लिखे में दिखता है लिखने वाले का सबकुछ बहुत साफ साफ
अपने लिखे में खुद को लिखा हुआ कभी तो कुछ दिखाओगे

बेटियां किस की थी किसने सोचना था तुम क्यों पछताओगे
कुछ अलग से  हो निर्भया के साथ हुए को भी समझाओगे

‘उलूक’ चिकने घड़े से भी पूछेगा मजबूरी में हमेशा आदतन
जतन कर लो फिसल गए किसी और के हाथों से टूट जाओगे |

चित्र साभार https://www.shutterstock.com/

रविवार, 19 जुलाई 2026

कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए

 

इंतहा है बेशरमी की होनी भी चाहिए
शरम निगोड़ी कभी धोनी भी चाहिए

मुहं खोलते ही फैलता है रायता जिसका
ककड़ी हरी हो पीली हो धोनी ही चाहिए

पढ़े लिखे होने का घमंड लिखे में भी दिखे
एक अनपढ़ की जी हजूरी होनी ही चाहिए

गिरना जरूरी है गिरे हुए को और कहीं नीचे
ऊंचाइया देखने में सिर से टोपी गिरनी ही चाहिए

इतिहास में दर्ज होगी फेंकी गई स्याही सरेआम
अनपढ़ सरदार की कलम कबाड़ में बिकनी ही चाहिए

कितना कुछ लिखे कोई क्या लिखे किसपर लिखे 
सब उतार के बैठे की खाल भी  उतरनी ही चाहिए

‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 

चित्र साभार: https://www.reddit.com/

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार



चोरी डकैती हत्या बलात्कार भ्रष्टाचार व्यभिचार
कौन सा आज का है एक नया समाचार
इतिहास में भी होता आया हो जो कई कई बार
उसका किसलिए जिक्र करना बार बार

चोर घर का हो अपना हो
किसलिए उसपर बात करना
किसलिए बैठाया है हर थाने में एक थानेदार
चोर चोर चिल्लाए जो चोर के सामने सामने
उसका श्राद्ध बहुत जरूरी हो गया है करना इस बार

खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार
सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार
क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की
सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार

किसी को कुछ नहीं आता है समझ में
दिमाग रखता है बस एक हजूर का ठेकेदार
सारी निविदाएं होती हैं उसकी
उसी को लिखनी होती है खबर उसी का होता है अखबार

‘उलूक’ समझ को ठोक लिया कर अपनी हथौड़े से
कुछ भी पढ़ने से पहले हर बार
भगवान जब लिख रहा हो कुछ
बिना पढे ही लिख क्यों नहीं देता
दंडवत प्रणाम और नमस्कार ?

चित्र साभार: https://www.dreamstime.com/

बुधवार, 15 जुलाई 2026

फिर हुई खुजली अंगुलियों में मगर कलम की स्याही आजकल जाम है

 

वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है

सौ झूठ बोलते
दिव्य दर्शन सच के हो जाना
सुना आज बहुत आम है
कहीं कितने भी हों विलाप भक्तो
मूल्यों का आलाप जरूरी सुबहो शाम है

सही की परिभाषा गढ़ रहा है नई कोई
समझा करो बहुत ही विद्वान है
गिरोह से प्रेम रखता है तो क्या
गिरोह के कत्लेआम में ही तो सम्मान है

बतला रहा है
टांग पर खड़ा है एक बरसों से
क्या हुआ अगर हम्माम है
कपड़े खुद के उतरे हुए हैं सारे सभी
आईने में तो दिख रहा सब गुलफाम है

किसलिए करें बात शर्म करने की
लाशों के ढेर हैं ठहाके भी हैं
बस रोना हराम है
लिखे में दिख रहा है चेहरा किसी का
और लिखा माथे पर भी गुलाम है

‘उलूक’ गिनना मोतियाबिंद सोच पर पड़े
और बिखरे हुए कागजों पर
एक बड़ा काम है
किसको देखनी है अब रोशनी सुबह की भगत
अंधेरे का ही बस करना जब गुणगान है?

चित्र साभार: https://pixabay.com/