चिट्ठा अनुसरणकर्ता

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

गधा घोड़ा नहीं हो सकता कभी तो क्या गधा होने का ही फायदा उठा

लिखने
लिखाने
के राज

किसी
को कभी
मत बता

जब
कुछ भी
समझ में
ना आये

लिखना
शुरु हो जा

घोड़ों के
अस्तबल में
रहने में कोई
बुराई नहीं होती

जरा भी मत शरमा

कोई
खुद ही
समझ ले
तो समझ ले

गधे होने
की बात को
जितना भी

छिपा सकता है छिपा

कभी
कान को
ऊपर की
ओर उठा

कभी
पूँछ को
आगे पीछे घुमा

चाबुकों
की फटकारों को

वहाँ सुनने से
परहेज ना कर

यहाँ आकर
आवाज की
नकल की
जितनी भी

फोटो कापी चाहे बना

घोड़े
जिन रास्तों से
कभी नहीं जाते

उन
रास्तों पर
अपने ठिकाने बना

घोड़ो की
बात पूरी नहीं
तो आधी ही बता

जितना
कुछ भी
लिख सकता है
लिखता चला जा

उन्हें
कौन सा
पढ़ना है
कुछ भी
यहाँ आकर

इस बात का फायदा उठा

सब कुछ
लिख भी गया

तब भी
कहीं कुछ
नहीं है कहीं होना

घोड़ों को

लेखनी की लंगड़ी लगा

बौद्धिक
अत्याचार
के बदले का
इसी को
हथियार बना

घोड़ों की
दौड़ को
बस किनारे से
देखता चला जा

बस
समझने की
थोड़ा कोशिश कर

फिर
सारा हाल
लिख लिख कर

यहाँ आ कर सुना

वहाँ भी
कुछ नहीं
होना है तेरा
यहाँ भी कुछ

नहीं है होना

गधा
होने का

सुकून मना

घोड़ों
के अस्तबल
का हाल
लिख लिख कर

दुनियाँ को सुना

गधा
होने की बात

अपने
मन ही
मन में

चाहे गुनगुना।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद खूबसूरत व्यंग्य रचना भाईसाहब

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  2. है जन्नत उन्हीं की,ज़माना उन्हीं का ...

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज गुरुवारीय चर्चा मंच पर ।। आइये जरूर-

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 14/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  5. बहुत शानदार हाश्य रचना मज़ा आ गया,
    गहरी बात भी कह गए हसा कर सर ,,

    गधा होने की बात
    अपने मन ही मन
    में चाहे गुनगुना।।।

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