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बुधवार, 18 अप्रैल 2018

उसी समय लिख देना जरूरी होता है जिस समय दूर बहुत कहीं अंतरिक्ष में चलते नाटक को सामने से होता हुआ देखा जाये

लिखना
पड़ जाता है
कभी मजबूरी में

इस डर से
कि कल शायद
देर हो जाये
भूला जाये

बात निकल कर
किसी किनारे
से सोच के
फिसल जाये

जरूरी
हो जाता है
लिखना नौटंकी को

इससे पहले
कि परदा गिर जाये

ताली पीटती हुई
जमा की गयी भीड़
जेब में हाथ डाले
अपने अपने घर
को निकल जाये

कितना
शातिर होता है
एक शातिर
शातिराना
अन्दाज ही
जिसका सारे
जमाने के लिये
शराफत का
एक पैमाना हो जाये

चल ‘उलूक’
छोड़ दे लिखना
देख कर अपने
आस पास की
नौटंकियों को
अपने घर की

सबसे
अच्छा होता है
सब कुछ पर
आँख कान
नाक बंद कर

ऊपर कहीं दूर
अंतरिक्ष में बैठ कर

वहीं से धरती के
गोल और नीले
होने के सपने को
धरती वालों को
जोर जोर से
आवाज लगा लगा
कर बेचा जाये।

चित्र साभार: www.kisspng.com

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

जन्म दिन अभी तक तो तेरा ही हो रहा है आज के दिन कौन जाने कब तक

कुछ देर के लिये
याद आया तिरंगा

उससे अलग कहीं
दिखी तस्वीर
संत की
माने बदल गये

यहाँ तक आते आते
उसके भी इसके भी

एक
डिजिटल हो गया
दूसरे की याद भी
नहीं बची कहीं

दिखा थोड़ा सा बाकी
अमावस्या के चाँद सा

समय के साथ साथ
कुछ खो गया

सोच सोच में पड़ी
कुछ डरी डरी सी

कहीं किसी को
अंदाज
आ गया हो
सोचने का
श्राद्ध पर्व
पर जन्मदिन
के दिन का

दिन भी सूखा
दिन हो गया
याद आया कुछ
सुना सुनाया

कुछ कहानियाँ
तब की सच्ची
अब की झूठी

बापू
कुछ नहीं कहना
जरूरतें बदल गई
हमारी वहाँ से
यहाँ तक आते आते

तेरे जमाने
का सच
अब झूठ

और झूठ
उस समय का
इस समय का
सबसे बड़ा सच भी
निर्धारित हो गया

जन्मदिन
मुबारक हो
फिर भी बहुत बहुत

बापू
दो अक्टूबर
का दिन अभी तो
तेरा ही चल रहा है

भरोसा नहीं है
कब कह जाये कोई
अब और आज
से ही इस जमाने के
किसी नौटंकी बाज की
नौटंकी का दिन हो गया ।

चित्र साभार: caricaturez.blogspot.com

रविवार, 21 जून 2015

नाटक कर पर्दे में उछाल खुद ही बजा अपने ही गाल

कुछ भी
संभव
हो सकता  है

ऐसा
कभी कभी
महसूस होता है

जब दिखता है

नाटक
करने वालों
और दर्शकों
के बीच में

कोई भी

पर्दा
ना उठाने
के लिये होता है
ना ही गिराने
के लिये होता है

नाटक
करने वाले
के पास बहुत सी
शर्म होती है

दर्शक
सामने वाला
पूरा बेशर्म होता है

नाटक
करने भी
नहीं जाता है

बस दूर से
खड़ा खड़ा
देख रहा होता है

वैसे तो
पूरी दुनियाँ ही
एक नौटंकी होती है

नाटक
करने कराने
के लिये ही
बनी होती है

लिखने लिखाने
करने कराने वाला
ऊपर कहीं
बैठा होता है

नाटक
कम्पनी का
लेकिन अपना ही
ठेका होता है

ठेकेदार
के नीचे
किटकिनदार होते हैं

किटकिनदार
करने कराने
के लिये पूरा ही
जिम्मेदार होते हैं

‘उलूक’
कानी आँखों से
रात के अंधेरे
से पहले के
धुंधलके में
रोशनी समेट
रहा होता है

दर्शकों
में से कुछ
बेवकूफों को
नाटक के
बीच में कूदते हुऐ
देख रहा होता है

कम्पनी के
नाटककार
खिलखिला
रहे होते हैं

अपने लिये
खुद ही तालियाँ
बजा रहे होते हैं

बाकी फालतू
के दर्शकों
के बीच से
पहुँच गये
नाटक में
भाग लेने
गये हुऐ
नाटक कर
रहे होते हैं

साथ में
मुफ्त में
गालियाँ खा
रहे होते हैं
गाल
बजाने वाले
अपने गाल
खुद ही
बजा रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.india-forums.com

शुक्रवार, 27 जून 2014

बेकार की नौटंकी छोड़ कर कभी प्यार की बात भी कर

बात करना इतना
भी जरूरी नहीं
कभी काम की
बात भी कर
बहुत कर चुका
बेकार की बातें
कभी सरकार की
बात भी कर
जीना मरना
सोना उठना
खाना पीना
सबको पता है
इसकी उसकी
छोड़ कर कभी
अपनी और
अपने घर की
बात भी कर
कान पक गये
बक बक तेरी
सुनते सुनते
किसी एक दिन
चुप चाप रहने
की बात भी कर
सब जगह होता है
सब करते हैं
पुराने तरीकों को
छोड़ कुछ नये
तरीके से करने
वालों की
बात भी कर
खाली बैठे
बात ही बात में
कितने दिन
और निकालेगा
कुछ अच्छी बात
करने की भी सोच
कुछ नई बात करने
की बात भी
कभी ईजाद कर
‘उलूक’ तंग आ
चुका है शमशान
का अघोरी तक
लाशों की बात
छोड़ कर कभी
जिंदा लोगों
की बात भी कर ।

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