क्या जवाब दूँ मैं तुझे लक्ष्मण
मैं राम होना भी नहीं चाहता हूँ
आज मेरे अंदर का रावण बहुत विकराल भी हो गया है
और मुझे राम से डर लगने लगा है
राम आज मुझे पल पल हर पल नोच रहा है
किस से कहूँ नहीं कह सकता
राम राम है जय श्री राम है मेरा ही राम है
लक्ष्मण तुम को शक्ति लगी थी
और तुम्हारे पास प्रश्न तब नहीं थे
अब हैं बहुत हैं
लक्ष्मण तुम और तुम्हारे जैसे और
कई अनगिनत अभिमन्यू हैं
जो तीर नहीं हैं
पर चढ़ाया गया है जिन्हे कई बार
गाँडीव पर अर्जुन ने तुम्हें समझा बुझा कर
तुम बने भी हो तीर चले भी हो तीर की तरह कई बार
इतना बहुत है कि आज के जमाने में
कोई ना मरता है ना घायल होता है तुम्हारे जैसे तीरों से
कायरों के टायरों पर सड़क के निशान नहीं पड़ते हैं लक्ष्मण
रोज बहुत लोगों के अंदर कई राम मरते हैं
कोई नहीं बताता है
किसी से कुछ नहीं कह पाता है
बहुत बैचेनी होती है
और तुम भी पूछ बैठे ऐसे में ऐसा ही कुछ
और पता चला आजकल राम
तुम्हारे साथ भी वही करता है
जो सभी के साथ उसने हमेशा से किया है
सभी को राम से प्रेम है
सभी को जय श्री राम कहना अच्छा लगता है
कोई खेद नहीं होता है
राम राम होता है लक्ष्मण
प्रश्न करना हमेशा दर्दमय होता है
उत्तर देना उस से भी ज्यादा दर्द देता है
जब प्रश्न अलग होता है
राम अलग होता है और पूछने वाला
लक्ष्मण होता है ।
चित्र साभार: forefugees.com
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 56 पृ132

