दिन के आसमान में उड़ते हुऐ
चील कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में
आकाश गंगा के चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की गिनती करते करते
एक दो तीन से अस्सी नब्बे होते जाते
कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते उसी समय लौट आते
उतनी ही उर्जा और जोश से फिर से
किसी एक जगह से गिनती करना शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन की बात हो ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा खेल हो जाते
कोई थकान नहीं कोई शिकन नहीं
कोई गिला नहीं किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते होते के बीच झुंड बदल जाते
कब गिनतियाँ आदमी और भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं तारे और चाँद
ना ही चील के विशाल डैने ही नजर आते
थकान ही थकान मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर भी नहीं समझ पाते
समझ में आना शुरु होने लगता
यात्रा का बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन और अपने
अगर इन सब में कहीं नहीं खो जाते ।
