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शनिवार, 9 सितंबर 2017

किस बात की शर्म जमावड़े में शरीफों के शरीफों के नजर आने में

किस लिये
चौंकना
मक्खियों के
मधुमक्खी
हो जाने में

सीखना 
जरूरी
है 
बहुत
कलाकारी
कलाकारों से
उन्हीं के
पैमानों में

किताबें ही
किसलिये
दिखें हाथ में
पढ़ने वालों के

जरूरी नहीं
है नशा
बिकना
बस केवल
मयखाने में

शहर में हो
रही गुफ्तगू
पर कान
देने से क्या
फायदा

बैठ कर
देखा
किया कर
 घर पर ही
हो रहे मुजरे
जमाने में

दुश्मनों की
दुआयें साथ
लेना जरूरी
है बहुत

दोस्त मशगूल
हों जिस समय
हवा बदलवाने
की निविदा
खुलवाने में

‘उलूक’
सिरफिरों
को बात
बुरी लगती है

शरीफों की
भीड़ लगी
होती है
जिस बात को
शरीफों को
शराफत से
समझाने में ।

चित्र साभार: Prayer A to Z

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