उलूक टाइम्स: अखबार

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बुधवार, 16 सितंबर 2020

लाशें जिंदा रहना बहुत जरूरी हैं मरे हुऐ लोगों के जिन्दा समाचारों लिये हमेशा

 

एक पुड़िया सफेद पाउडर मिला है

उस जगह पर जहाँ चॉक ही चॉक
पायी जाती रही है हमेशा से डिब्बा बन्द

अलग बात है
कहीं जरा सा भी नहीं घिसी रखी है इतिहास बनाने के लिये भी

हम सब
उसी को घिसने की रोटियां तोड़ते रहें हैं सालो साल

और कुछ
इसी की सफेदी को बिना छुवे हो लिये हैं बेमिसाल
खरीदे हैं जिन्होंने कई सम्मान अपने नाम से
अखबार साक्षी रहे हैं

अपनी नाकामियां लिखना आसान नहीं है

अखबार वाले के किये गये प्रश्न के उत्तर दिये गये हैं
किस तरह तराशे हुऐ निकलें
कल सुबह तक कुछ कहना ठीक नहीं है

और वैसे भी जो छपा आ जाता है
उसके बाद कहाँ कुछ किया जाता है

बहुत कुछ होता है आसपास कुछ अजीब सा हमेशा ही

अब हर बात कहाँ किसी अखबार तक पहुँचती है
और जो पहुँचाई जाती है कुछ दस्तखतों के साथ
उसकी तसदीक करने कभी कोई आता भी नहीं है

हमाम के अन्दर के कपड़े के बारे में पूछे गये प्रश्न
नाजायज हैं कह कर
खुद अपनी तस्वीर अपने ही आइने की
किसी को भी दिखा लेने की
आदत कभी बनी भी नहीं है

उलूक
चिड़िया कपड़े ना पहना करती है
ना उसे आदत होती है बात करने की नंगई की
उसकी जरूरत भी नहीं होती है

हम सब कर लेते हैं खास कर बातें कपड़ों की

और ढकी हुई उन सारी लाशों की
जिनकी खुश्बू पर कोई प्रश्न नहीं उठता है

आज के समाज में
लाशें जिंदा रहना बहुत जरूरी हैं
मरे हुऐ लोगों के जिन्दा समाचारों के लिये हमेशा ।

चित्र साभार:
https://twitter.com/aajtak

शनिवार, 22 अगस्त 2020

हम लोगों की छवि बनाते हैं लोगों के बारे में लोगों को घर घर जा जा कर समझाते हैं

 
हजूर आप करते क्या हैं

हम करते तो हैं कुछ
लेकिन उस करने का बस वेतन खाते हैं 

बाकि काम बहुत हैं
धन्धों के अंदर के कुछ धन्धों की बात बताते हैं

पता नहीं समझेंगे भी या नहीं
हम लोगों की छवि बनाते हैं
फिर उसे सारे समाज में फैलाते हैं 

वो बात अलग है
अपने घर के सारे आईने
कपड़े में लपेट कर नदी में बहा आते हैं 

हमें अपना चेहरा याद नहीं रहता है
हम सामने वाले का चेहरा चेहरों को याद दिलाते हैं 

समाज नहीं देखता है हमें
हराम की खाते हुऐ सालों साल तक 
हम काम में लगे हुऐ किसी भी आदमी को
हराम का खा रहा है की कहानी का नायक बनवाते हैं 

जमाना हम से चल रहा है
हम जमाने को चलाते हैं 
हम से नहीं चल पाता है जो भी
उसका चलना फिरना बन्द करवाते हैं 

हमारी फोटो अखबार वाले
हमारे घर से ले जाते हैं
सुबह की खबर हम ही छपवाते हैं 
शाम होते ही साथ बैठते हैं हम और वो
काँच के कुछ गिलास टकराते हैं 

बदनाम हम नहीं हो सकते हैं कभी भी
हम बदनाम करवाते हैं 
धन्धे कहाँ बन्द हो रहें हैं हजूर
हम धन्धों के अन्दर भी धन्धे पनपाते हैं 

‘उलूक’ तू लिख और लिख कर इधर उधर चिपका 
हम तेरे जैसे एक नहीं
कई की अपने हिसाब से छवि बना कर
दीवार दीवार चिपकाते हैं 

हम छवि बनाते हैं
हम छवि बना बना कर फैलाते हैं
खुली आँखों पर परदे डलवा कर उजाला बेच खाते हैं । 

चित्र साभार: https://www.canstockphoto.com/

ulooktimes.blogspot.com २३-०८-२०२०

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

अथ श्री बरगद कथा

 पता
नहीं चलता है 

मगर
कुछ लोग
समय के साथ
बरगद हो जाते हैं

ऐसा नहीं है
कि लोग
 बरगद होना नहीं चाहते हैं 

लोग
जन्म से 
बरगद ही होते हैं

बस
उगना
फिर बड़ा हो कर
विशाल आकार लेकर
आसमान और जमीन के बीच
फैल जाना

सब नहीं कर पाते हैं

कुछ
बरगद होकर
शुरु कर देते हैं

दूसरों को बरगद बनाना

इसे
 कार्यक्रम कहें या क्रियाकर्म
फर्क
ज्यादा नहीं होता है

पूरा ढिंढोरा
पीटा जाता है
समाज के हर बरगद हो चुकों को
न्यौता भेजा जाता है

नींव रखी जाती है
एक करोड़
बरगद के जंगल बनाने
और
सामाजिक पर्यावरण को बचाने

फिर
मजबूत किये जाने के
सपने दिखा कर
दूरगामी उद्देश्य का
एक बहुत बड़ा खाका
पेश किया जाता है

सांयकालीन सत्र में
अखबारी बरगदों के साथ
संगीतमय समां बंधवा कर
सुबह की खबरों का
ठेका दिया जाता है

ये सारा
खुलेआम किया जाता है
जोर शोर से पर्दे उखाड़ कर
प्रचारित प्रसारित किया जाता है

सभा समाप्त होती है
पर्दा गिरा दिया जाता है 

अब शुरु होता है
आकृष्ट करना
लोगों को
बरगद हो लेने के सुनहरे मौके का

एक
बरगदी सपना
फैलाया जाता है 
बरगद बनाने शुरु किये जाते हैं

सबसे पहले
जमीन की मिट्टी से
उसे अलग किया जाता है

चारों ओर से घेर कर
थोड़ी मिट्टी थोड़ा पानी थोड़ी हवा
की जगह में

एक
गमले में
बरगद होने के लिये
छोड़ दिया जाता है

समय काटने
के इन्तजामात
किये जाते हैं

बीच बीच में
पूरा जवान हो चुके
बरगद का चित्र दिखाया जाता है

ध्यान
बंटते ही
बढ़ते पनपते
जवान बरगद की
बढ़ती शाखाओं और जड़ों को
कलम कर दिया जाता है

बरगद बनता है
समय निकलता है 

बरगद
कब बोनसाई हो गया
‘उलूक’ 
बस ये
कोई नहीं जान पाता है

बस
ऐसे ही किसी दिन
एक नया
कोई
बरगद होने के सपने के जालों में
फंस कर चला आता है

बोनसाई
उखाड़ कर
कहीं फेंक दिया जाता है

एक
नया सपना
उगने फैलने
फिर
छंटने कटने के लिये
प्रस्तुत हो जाता है

अखबार सुबह का
 बरगद बनाने
और
जंगल उगाने के लिये
किसी को
सरकारी सम्मान मिलने के
समाचार से
पटा नजर आता है ।

चित्र साभार: https://www.patrika.com/

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१४/०८/२०२० को
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शनिवार, 7 दिसंबर 2019

खुदने दो कब्र चारों तरफ अपने दूर देश की खबर में मरे को जिंदा कर देने का बहुत कुछ छुपा होता है



हो सकता है 

आवारा 
नजर 
आ रहे हों 

पर 
सच मानिये 

हैं नहीं 

बंधे हुऐ हैं 
पट्टे गले में 

और 
जंजीर भी है 

खूंटे 
से बंधी 
हुई भी 
नहीं है 

हाथ में है 
किसी के 

यानि 
आजादी है 

आने जाने 
की 
साथ में 

जहाँ 
ले जाने 
वाला 
जायेगा 

वहाँ 
तक तो 
कम से कम 

पट्टे 
और 
जंजीर से 

मतलब 
ना 
निकाल 
लिया जाये 

कि 
जानवर 
की ही बात है 

और 
हाथ में है 
किसी के से 
अर्थ 
नहीं निकलता है 

कि 
उसके 
गले में 
नहीं है पट्टा 

पट्टे दर पट्टे 
जंजीर दर जंजीर 

पूरी 
होती है 
एक 
बहुत बड़ी लकीर 

यहाँ से वहाँ 
कहीं
बहुत दूर तक 

जहाँ 
मिलता है 
आसमान 
पहाड़ से 

और 
उससे भी आगे 

समझ में 
जो
नहीं आती है 

फिर भी 
ये 
नासमझी में 

उसी तरह 
लिख दी जाती है 

समझ में 
आ जाती 
तो 
काहे लिखी जाती 

इसीलिये 
बकवास में 
गिनी जाती है 
कही जाती है 

जमाना 
उस 
समझदार का है 

जिसका 
पता ना चले 

उसका 
किस के हाथ में 
सिरा टिका है 

जिसे 
चाहिये होता है 
एक झुंड 

जिसके 
सोचने देखने पूछने कहने 
का हर रास्ता 

उसने 
खुद ही 
बन्द किया होता है 

जंजीर 
के 
इशारे होते हैंं

बँधा हुआ 
इशारे इशारे 
चल देता है 

किसी को 
किसी से 
कुछ नहीं 
पूछना होता है 

हर किसी 
को 

बस अपने 
पट्टे 

और 
अपनी जंजीर 

का 
पता होता है 

चैन 
से 
जीने के लिये 

उसी को 
केवल 
भूलना होता है 

‘उलूक’
पूरी जिंदगी 
कट जाती है 

खबर 
दूर देश की 
चलती चली जाती है 

अपने 
बगल में ही 
खुद रही कब्र 
से 
मतलब रखना 

उसपर 
बहस करना 

उसकी 
खबर को 

अखबार 
तक 

पहुँचने 
देने 
वाले से 

बड़ा बेवकूफ 

कोई 
नहीं होता है । 

शनिवार, 31 अगस्त 2019

ठीक नहीं ‘उलूक’ थोड़ा सा समझने के लिये इतने सारे साल लगाना



आभार पाठक
 'उलूक टाइम्स' पर जुलाई 2016 के अब तक के अधिकतम 217629 हिट्स को 
अगस्त 2019 के 220621 हिट्स ने पीछे छोड़ा 
पुन: आभार 
पाठक


सुना गया है
अब हर कोई एक खुली हुयी किताब है 

हर पन्ना जिसका
झक्क है सफेद है और साफ है 

सभी लिखते हैं
आज कुछ ना कुछ
बहुत बड़ी बात है 

कलम और कागज ही नहीं रहे बस
बाकी सब इफरात है 

कोई नहीं लिखता है कहीं
किसी भी अन्दर की बात को 

ढूँढने निकलता है
एक सूरज को मगर
वो भी किसी रात को 

सोचता है साथ में
सब दिन दोपहर में
कभी आ कर उसे पढ़ें

कुछ वाह करें
कुछ लाजवाब
कुछ टिप्पणी
कुछ स्वर्णिम गढ़ें

समझ में
सब के सब कुछ
बहुत अच्छी तरह से आता है 

जितने से
जिसका काम चलता है
उतना समझ गया होता है
उसे
ढोल नगाड़े साथ ला कर
खुल कर
जरूर बताता है 

जहाँ फंसती है जान
होता है
बहुत बड़ी जनसंख्या से जुड़ा
कोई उनवान
शरमाना दिखा कर
अपने ही किसी डर के खोल में
घुस जाता है 

किस अखबार को
कौन कितना पढ़ता है
सारे आँकड़े
सामने आ जाते हैं 

किस अखबार में
कैसे अपनी खबर कोई
हर हफ्ते छपवा ले जाता है
कैसे हो रहा है होता है
ऐसा कोई
पूछने ही नहीं जाता है 

कोई
नजर नहीं आता है का मतलब
नहीं होता है
कि
समझ में नहीं आता है 

उलूक के लिये
बस
एक राय 

लिखना लिखाना छपना छपाना कहीं भीड़ कहीं खालिस सा वीराना
‘उलूक’ ठीक नहीं थोड़ा सा समझने के लिये इतने सारे साल लगाना 

चित्र साभार: https://www.123rf.com/

गुरुवार, 13 जून 2019

अपने अपने मतलब अपनी अपनी खबरें अपना अपना अखबार होता है बाकी बच गया इस सब से वो समाचार होता है

कागज
पर लिखा

जमीन का
कुछ भी

उसके लिये
बेकार होता है

चाँद तारों
पर जमा जमाया

जिसका
कारोबार होता है

दुनियाँ
जहाँ पर
नजर रखता है

बहुत ज्यादा
समझदार होता है

घर की
मोहल्ले की बातें

छोटे लोगों का
रोजगार होता है

बेमतलब
कुछ भी
कह डालिये

तुरंत
पकड़ लेता है
कलाकार होता है

मतलब
की छान

बचा
लौटा देता है

जितने
से उसका
सरोकार होता है

भीड़
के शोर का
फर्क नहीं पड़ता है

चुगलखोर
आदत से
लाचार होता है

दिख
नहीं रहा है

कुछ कह
नहीं रहा है

का मतलब

सुधर जाने
का संकेत
नहीं होता है

ऊपर नीचे
होता हुआ
बाजार होता है

गिरोह
यूँ ही नहीं
बनता है
एक जैसों का

चोर
का साथी
गिरहकट जैसी

पुरानी
कहावत के लिये

पुराना सरदार
जिम्मेदार होता है

तकनीक
का जमाना है

हाथ
साफ होते हैं

कोयले का
व्यापार होता है

‘उलूक’
की खींसे
होती नहीं हैं

क्या निपोरे

चुगलखोरी
की अपनी
आदत से

बस
लाचार होता है ।

चित्र साभार: apps.apple.com

सोमवार, 4 मार्च 2019

कुछ नहीं कहने वाले से अच्छा कुछ भी कह देने वाले का भाव एकदम उछाल मारता हुवा देखा जाता है

तबीयत
ठीक रहती है
तो

बड़ा झूठ
बहुत आसानी से
पचाया जाता है

बकवास
लिखी जाती रहती है
तो


सच भी
नंगा होने में शरमाता है

जिंदगी
निकलती जाती है

झूठ ही
सबसे बड़ा
सच होता है
समझ में आता जाता है

हर कोई
एक नागा साधू होता है

कपड़े
सब के पास होते हैंं
तो

दिखाने भी होते हैं

इसीलिये
पहन कर आया जाता है

बहुत कुछ
होता है जो
कहीं भी नहीं
पाया जाता है

नहीं होना ही
सबसे अच्छा होता है

बिना
पढ़ा लिखा भी
बहुत कुछ
समझा जाता है

साँप
के दाँत
तोड़ कर
आ जाता है

बत्तीस
नहीं थे
छत्तीस हैं
बता कर जाता है

साँप
तो

मार खाने
के बाद
गायब हो जाता है

साँपों की
बात करने वाला

जगह जगह
मार खाता है
गरियाया जाता है

लकीर
पीटने वाला
सब से समझदार
समझा जाता है
माना जाता है

पीटते पीटते
फकीर हो जाता है

ऊपर वाला भी
देखता रह जाता है

एक जगह
खड़ा रहने वाला

हमेशा शक की
नजरों से देखा जाता है

थाली में
बैगनों के साथ
लुढ़कते रहने वाला ही

सम्मानित
किया जाता है

‘उलूक’
कपड़े लत्ते की
सोचते सोचते

गंगा नहाने
नदी में उतर जाता है

महाकुँभ
की भीड़ में
खबरची के
कैमरे में आ जाता है
पकड़ा जाता है

घर में
रोज रोज
कौन कौन
नहाता है

अखबार
में नहीं
बताया जाता है

बकवास
करते रहने से

खराब
तबीयत का
अन्दाज नहीं
लगाया जाता है

तबीयत
ठीक रहती है
तो

एक
बड़ा झूठ भी
आसानी से
पचाया जाता है

चित्र साभार: http://hatobuilico.com

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

हुवा हुवा का शोर हुवा कहीं हुवा कुछ जैसे और बड़ा जबरजोर हुवा

फिर
हुवा हुवा
का शोर हुवा

इधर से

गजब का
जोर हुवा

उधर से
जबरजोर हुवा

हुवा हुवा
सुनते ही

मिलने लगी

आवाजें
हुवा हुवा की

हुवा हुवा में

हुवा हुवा से

माहौल
सारा जैसे
सराबोर हुवा

चुटकुला एक

एक
बार फिर
अखबार में

खबर
का घूँघट ओढ़

दिखा आज
छपा हुवा

खबरों
को उसके
अगल बगल की

पता ही
नहीं चला

कब हुवा
कैसे हुवा
और
क्या हुवा

पानी
नदी का
बहने लगा

खुद ही
नहा धोकर

सब कुछ
सारा

आस पास
ऊपर नीचे का

पवित्र हुवा
पावन हुवा

पापों
के कर्ज में
डूबों का

सब कुछ
सारा माफ हुवा

ना
बम फटे
ना
गोली चली
ना
युद्ध हुवा

बस
चुटकुला
खबर
बन कर

एक बार
और

शहीद हुवा
इन्साफ हुवा

जंगल उगे
कागज में

मौसम भी

कुछ
साफ हुवा

हवा
चली
जोर की

फोटो में
बादल उतरा

पानी
बरसा

रिमझिम
रिमझिम
गिरते गिरते
भाप हुवा

पकाने
परोसने
खिलाने
वाले

शुरु हुऐ
समझाना

ऐसा हुवा

हुवा
जो भी

सदियों
बाद हुवा

‘उलूक’
पूछना
नहीं हुवा

कुछ भी बस

करते
रहना हुवा

हुवा हुवा

हो गया
हो गया

सच्ची
मुच्ची में

है हुवा हुवा ।

चित्र साभार: https://www.123rf.com

बुधवार, 30 जनवरी 2019

जरूरत नहीं है समझने की बहुत लम्बे समय से इकट्ठा किये कूड़े की उल्टी आज आ ही जा रही है


(उलूक को बहुत दूर तक दिखायी नहीं  देता है । कृपया दूर तक फैले देश से जोड़ कर मूल्याँकन करने का कष्ट ना करें। जो  लोग  पूजा में व्यस्त हैं  अपनी आँखे बंद रखें। बैकुण्ठी  के फिर से अवतरित होने के लिये मंत्र जपने शुरु करें)


कई
दिन हो गये

जमा करते करते

कूड़ा
फैलाने की

हिम्मत ही नहीं
आ पा रही है

दो हजार
उन्नीस में


सुना गया है


चिट्ठाकारी
पर
कोई

ईनाम

लेने के लिये

लाईन लगाइये


की मुनादी

करवायी
जा रही है


कई दिन से
ख्वाब में

मक्खियाँ ही
मक्खियाँ
नजर आ रही हैं


गिनना शुरु
करते ही
पता
चल रहा है

कुछ मकड़ी
हो चुकी हैं

खबरची
की खबर
बता रही है


मक्खियाँ
मकड़ी होते ही

मेज की
दूसरी ओर
चली जा रही हैं


साक्षात्कार
कर रही हैं

सकारात्मकता
के पाठ

कैसे
पढ़ाये जायेंगे

समझा रही हैं


मक्खियों
का राजा
मदमस्त है

लग रहा है
बिना अफीम
चाटे ही

गहरी नींद
आ रही है


खून
चूसने में
मजा नहीं है

खून
सुखाने के

तरीके
सिखा रही हैं


मकड़ियाँ
हो चुकी

मक्खियों के
गिरोह के

मान्यता प्राप्त
होने का सबूत

खबरचियों
की टीम
जुटा रही है


मकड़ी
नहीं हो सकी
मक्खियाँ

बुद्धिजीवियों
में अब
गिनी
जा रही हैं


इसलिये
उनके
कहने सुनने

लिखने पढ़ने
की बात

की बात
करने की

जरूरत ही
नहीं समझी
जा रही है


अखबार में

बस
मकड़ियों
की खबर

उनके
सरदार
के इशारों
से ही
छापी
जा रही है


गिरोह
की बैठकों
में तेजी
आती हुयी
नजर आ रही है


फिर किसी
बड़ी लूट की

लम्बी योजना पर
मुहर लगवाने के लिये

प्रस्ताव की
कापियाँ

सरकार
के पास
भेजी
जा रही हैं


अंग्रेजों के
तोड़ो और
राज करो
के सिद्धांत का

नया उदाहरण
पेश करने
की तैयारी है


एक
पुरानी दुकान की
दो दुकान बना कर

दो दुकानदारों
के लिये दो कुर्सी

पेश करने की
ये मारामारी है


गिरोह
की खबरें
छापने के लिये

क्या
मिल रहा है
खबरची को

खबर
नहीं बता रही है


हो सकता है

लम्बी लूट
की योजना में

उनको भी
कहा गया हो

उनकी भी
कुछ भागीदारी है


थाना कोतवाली
एफ आई आर
होने का
कोई डर हो

ऐसी बात
के लिये
कोई जगह
छोड़ी गयी हो

नजर
नहीं आ रही है


गिरोह
के मन मुताबिक
लुटने के लिये तैयार

प्रवेश
लेने वाले
अभ्यर्थियों की

हर साल
एक लम्बी लाईन

खुद ही
खुदकुशी
करने के लिये
जब
आ ही जा रही है


‘उलूक’
तू लिख

‘उलूक’
तू मत लिख

कुछ अलग
नहीं होना है
किसी भी जगह

इस देश में
सब वही है

सबकी
सोच वही है

तेरी खुजली

तुझे ही
खुजलानी है

इतनी सी अक्ल

तुझे पता नहीं

क्यों नहीं
आ पा रही है ।

चित्र साभार:
https://www.canstockphoto.com

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

सेब को अनार है कह देने वालों की भर्ती गिरोह का सरदार करवा रहा है

गिरोह

पर्दे के
पीछे से

जल्दी ही

कुछ उल्टा
करने
जा रहा है

सामने से
हो रही

अच्छी 

सीधी
बातों से

समझ
आ रहा है

अखबार

सरदार की
भेजी खबर को 


सजा कर
दिखा रहा है

जरूरत मंदों
के लिये

संवेदना
देख कर

सब गीला
हो जा रहा है

शहर में
कुछ नया
अजूबा होने
के आसार

मौसम विभाग
सुना रहा है

आंकड़े
बगल के देश
के मेलों में बिके

गधों के
ला ला कर
दिखा रहा है

जमीने
किस की
खरीदी हुई हैं

किस के
हैं मकान
मैदान के
शहर में

जायजा
लिया
जा रहा है

पहाड़
से उतार
मैदान में

राजा के
दरबार को
ले जाने का

आदेश
जल्दी ही
आने जा रहा है

पहाड़ों
को वीरान
करने की
एक नयी
कोशिश है

किसी
को बहुत
मजा
आ रहा है

गिरोह
पढ़ा रहा है 


सेब को
अनार
कहलवाना
किसी को 

कोई
‘उलूक’ को

अनार है
अनार है
कह कर

एक सेब
रोज
दिखा रहा है । 


चित्र साभार: www.kisspng.com

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

दिसम्बर ने दौड़ना शुरु कर दिया तेजी से बस जल्दी ही साल की बरसी मनायी जायेगी

फिर
एक साल
निकल लिया

संकेत

होनी के
होने के
नजर आना
शुरु हुए

अपनी ही
सोच में

खुद की
सोच का ही

कुछ
गीला हिस्सा

शायद
फिर से
आग
पकड़ लिया

धुआँ
नहीं दिखा

बस
जलने की
खुश्बू
आती हुयी

जैसा कुछ
महसूस हुआ

निकल लिया
उसी ओर को

सोचता हुआ
देखने के लिये

अगर हुआ है
कुछ
तो क्या हुआ

लेकिन

इस
सब के बीच

बस
इतना सा
संतोष हुआ

कि
खुश्बू
सोच लिया

अच्छा किया

सकारात्मकता
की रेखा
को छूता रहा

सोच को
अपना पैर
बाहर को नहीं
रखने दिया

इससे
पहले
बदबू की
सोचती

सोच

टाँग
पकड़ कर

अन्दर का

अन्दर को
ही खींंच लिया

समझाकर

दिमाग
को खुद के

अपनी ही
मुट्ठी बनाकर

अपने ही हाथ की

जोर से ठोक लिया

हौले से
हो रहे
जोर के शोर से

कुछ
हिलने का

जैसा
अनुभव किया

फिर
झिझक कर

याद किया

जमाने पहले
गुरुजी का पढ़ाया
शिष्टाचार का पाठ

और वही
अपने आप
बड़बड़ते हुऐ
खुद ही
खुद के लिये
बोल लिया

अभी
सोच में
आया ही था

कि
सभी तो
लिख दिया

और
अभी अभी
फिर से

लिखने
लिखाने को

कोने से

कलम
दबा कर
खिसक लिया

एक पुरानी
किताब को
फिर बेमन से
खोल लिया

***********

रहने दे
मत खाया कर
कसम ‘उलूक’
नहीं लिखने की

लिख
भी देगा
तब भी

साल
इसी तरह
गुजरते
चले जायेंगे

करने
वालों की
ताकत और
सक्रियता में

वृद्धि
चक्रवृद्धि
होती रही है

लिखने
लिखाने की
कलमें घिसेंगी

घिसती
चली जायेंगी

अखबार
रोज का रोज

सबेरे
दरवाजे पर
टंका मिलेगा

खबरें
छपवाने वालों
की ही छपेंगी

साल भर
की समीक्षा
की किताब के
हर पन्ने पर
वही चिपकी हुई
नजर आयेंगी

हर साल
इसी तरह
दिसम्बर की
विदाई की जायेगी ।।

चित्र साभार: http://clipart-library.com/

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

पता ही नहीं चलता है कि बिकवा कोई और रहा है कुछ अपना और गालियाँ मैं खा रहा हूँ

शेर
लिखते होंगे
शेर
सुनते होंगे
शेर
समझते भी होंगे
शेर हैं
कहने नहीं
जा रहा हूँ


एक शेर
जंगल का देख कर
लिख देने से शेर
नहीं बन जाते हैं

कुछ
लम्बी शहरी
छिपकलियाँ हैं

जो आज
लिखने जा रहा हूँ

भ्रम रहता है
कई सालों
तक रहता है

कि अपनी
दुकान का
एक विज्ञापन

खुद ही
बन कर
आ रहा हूँ

लोग
मुस्कुराहट
के साथ मिलते हैं

बताते भी नहीं है
कि खुद की नहीं
किसी और की
दुकान चला रहा हूँ

दुकानें
चल रही हैं
एक नहीं हैं
कई हैं

मिल कर
चलाते हैं लोग

मैं बस अपना
अनुभव बता रहा हूँ

किस के लिये बेचा
क्या बेच दिया
किसको बेच दिया
कितना बेच दिया

हिसाब नहीं
लगा पा रहा हूँ

जब से
समझ में आनी
शुरु हुई है दुकान

कोशिश
कर रहा हूँ
बाजार बहुत
कम जा रहा हूँ

जिसकी दुकान
चलाने के नाम
पर बदनाम था

उसकी बेरुखी
इधर
बढ़ गयी है बहुत

कुछ कुछ
समझ पा रहा हूँ

पुरानी
एक दुकान के
नये दुकानदारों
के चुने जाने का

एक नया
समाचार
पढ़ कर
अखबार में
अभी अभी
आ रहा हूँ

कोई कहीं था
कोई कहीं था

सुबह के
अखबार में
उनके साथ साथ
किसी हमाम में
होने की
खबर मिली है
वो सुना रहा हूँ

कितनी
देर में देता
है अक्ल खुदा भी

खुदा भगवान है
या भगवान खुदा है
सिक्का उछालने
के लिये जा रहा हूँ

 ‘उलूक’
देर से आयी
दुरुस्त आयी
आयी तो सही

मत कह देना
अभी से कि
कब्र में
लटके हुऐ
पावों की
बिवाइयों को
सहला रहा हूँ ।

चित्र साभार: https://www.gograph.com

रविवार, 15 जुलाई 2018

किसी किसी आदमी की सोच में हमेशा ही एक हथौढ़ा होता है

दो और दो
जोड़ कर
चार ही तो
पढ़ा रहा है
किसलिये रोता है

दो में एक
इस बरस
जोड़ा है उसने
एक अगले बरस
कभी जोड़ देगा
दो और दो
चार ही सुना है
ऐसे भी होता है

एक समझाता है
और चार जब
समझ लेते हैं
किसलिये
इस समझने के
खेल में खोता है

अखबार की
खबर पढ़ लिया कर
सुबह के अखबार में

अखबार वाले
का भी जोड़ा हुआ
हिसाब में जोड़ होता है

पेड़
गिनने की कहानी
सुना रहा है कोई
ध्यान से सुना कर
बीज बोने के लिये
नहीं कहता है

पेड़ भी
उसके होते हैं
खेत भी
उसके ही होते हैं

हर साल
इस महीने
यहाँ पर यही
गिनने का
तमाशा होता है

एक भीड़ रंग कर
खड़ी हो रही है
एक रंग से
इस सब के बीच

किसलिये
उछलता है
खुश होता है

इंद्रधनुष
बनाने के लिये
नहीं होते हैं

कुछ रंगों के
उगने का
साल भर में
यही मौका होता है

एक नहीं है
कई हैं
खीचने वाले
दीवारों पर
अपनी अपनी
लकीरें

लकीरें खीचने
वाला ही एक
फकीर नहीं होता है

उसने
फिर से दिखानी है
अपनी वही औकात

जानता है
कुछ भी कर देने से
कभी भी यहाँ कुछ
नहीं होना होता है

मत उलझा
कर ‘उलूक’
भीड़ को
चलाने वाले
ऐसे बाजीगर से
जो मौका मिलते ही
कील ठोक देता है

अब तो समझ ले
बाजीगरी बेवकूफ

किसी किसी
आदमी की
सोच में
हमेशा ही एक
हथौढ़ा होता है ।

चित्र साभार: cliparts.co

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

नकारात्मकता फैला कर सकारात्मकता बेचने वालों के लिये सजदे में सर झुका जा रहा था

बिल्लियों के
अखबार में
बिल्लियों ने
फिर छ्पवाया

सुबह का
अखबार
रोज की तरह

आज भी
सुबह सुबह
उसी तरह से
शर्माता हुआ
जबर्दस्ती
घर के दरवाजे से
कूदता फाँदता
हुआ ही आया

खबर
शहर के कुछ
हिसाब की थी
कुछ किताब की थी
शरम लिहाज की थी
शहर के पन्ने में ही
बस दिखायी गयी थी

चूहों की पढ़ाई
को लेकर आ रही
परेशानियों की बात
बिल्लियों के
अखबार नबीस के द्वारा
बहुत शराफत के साथ
रात भर पका कर
मसाले मिर्च डाले बिना
कम नमक के साथ
बिना काँटे छुरी के
सजाई गयी थी

मुद्दा
दूध के बंटवारे
को लेकर हो रहे
फसाद का नहीं है

खबर में
समझाया गया था

बिल्लियाँ
घास खाना
शुरु कर जी रही हैं
बिल्लियों का
वक्तव्य भी
लिखवाया गया था

सफेद
चूहों को अलग
और
काले चूहों को
कुछ और अलग
बताया गया था

खबर जब
कई दिनों से
सकारात्मक सोच
बेचने वालों की
छपायी जा रही थी

पता नहीं बीच में
नकारात्मक उर्जा
को किसलिये
ला कर
फैलाया जा रहा था

बात
चूहों के
शिकार की
जब थी ही नहीं

बेकार में
दूध के बटवारे
को लेकर पता नहीं
किस बात का
हल्ला
मचवाया जा रहा था

चूहे चूहों को गिन कर
पूरी गिनती के साथ
बिल से निकल कर
रोज की तरह वापस
अपने ही बिल में
घुस जा रहे थे

दूध और
मलाई के निशान
बिल्लियों की मूँछों
में जब आने ही
नहीं दिये जा रहे थे

बिल्लियों के
साफ सुथरे धंधों को
किसलिये
इतना बदनाम
करवाया जा रहा था

ईमानदारी की
गलतफहमियाँ
पाला ‘उलूक’

बे‌ईमानी के
लफड़े में
अपने हिस्से का
गणित लगाता हुआ

रोज की तरह
चूहे बिल्ली के
खेल की खबर
खबरची
अखबार की गंगा
और डुबकी
सोच कर

हर हर गंगे
मंत्र के जाप के
एक हजार आठ
पूरे करने का
हिसाब लगा रहा था।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

सुबह का अखबार पकाये हुऐ ताजे समाचार और प्रिय कागा तेरी सुरीली आवाज एक जैसी आदतों में शामिल आदतें

काँव काँव
कर्कश होती है

कभी कह भी
दिया होता है
किसी ने तो

ऐसा भी तो
नहीं होता है
कि मुँडेर पर
आना ही
छोड़ दो
निर्मोही

मोह
होता ही है
भंग
होने के लिये

चल
लौट आ
और बैठ ले
सुबह सवेरे
पौ फटते ही

मेरे ही दरवाजे
के सामने के
पेड़ की किसी
एक डाल पर

कर लेना
जैसी मन
चाहे आवाज

एक नहीं कई
होती हैं बातें
ढल जाती हैं
कब आदतों में

पता तब चलता है
जब उड़ जाता है

कोई
तेरी तरह का
अचानक
अनजानी
दिशा को
नहीं लौटने की
कसम
रख कर जैसे
आसपास कहीं

सन्नाटा मन
मोहक होता
होगा बहुत
जैसा भ्रम

तेरे जैसे काले
बेसुरी मानी
जाने वाली
आवाज वाले के

मुँह मोड़ लेने के
बाद ही टूटता है

माया मोह
समझ में
आ जाना
बहुत बड़ी
बात है रे

तू समझ लिया
और उड़ लिया

‘उलूक’
बैठा है
अभी भी
इन्तजार में

अखबार के
समाचार के
रंग ढंग
बदलने के

मानकर
कि कुछ दिन
चुपचाप

आँख बन्द कर
बैठने के बाद

सूरज
सुबह का
नहाया धोया सा

चमकदार
दिखना
शुरु हो
जाता है ।

चित्र साभार: http://www.alamy.com

रविवार, 21 जनवरी 2018

‘बीस साल तक आपके घर का कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी दीमक’ : जब इस तरह के समाचार को देखते हैं

कभी
अखबार
को देखते हैं

कभी
अखबार
में छपे
समाचार
को देखते हैं

पन्ने
कई होते हैं
खबरें
कई होती हैं 

पढ़ने वाले
अपने
मतलब के

छप रहे
कारोबार
को देखते हैं

सीधे चश्मे से
सीधी खबरों
पर जाती है
सीधे साधों
की नजर

केकड़े कुछ
टेढ़े होकर

अपने जैसी
सोच पर
असर डालने
वाली
टेढ़ी खबर
के टेढ़े
कलमकार
को देखते हैं

रोज ही कुछ
नया होता है
हमेशा खबरों में

आदत के मारे
कुछ पुरानी
खबरों
से बन रहे

सड़
रही खबरों
के अचार
को देखते हैं

‘हिन्दुस्तान’
लाता है
कभी कभी
कुछ
सदाबहार खबरें

कुछ
आती हैं
समझ में
कुछ
नहीं आती हैं 

समझे बुझे
ऐसी खबरों
के खबरची
खबर छाप कर
जब अपनी
असरदार
सरकार को
देखते हैं

‘उलूक’
और
उसके

साथी दीमक
आसपास की
बाँबियों के

चिलम
लिये हाथ में

फूँकते
समय को

उसके धुऐं से
बन रहे छल्लों
की धार
को देखते हैं ।

चित्र साभार: दैनिक ‘हिंदुस्तान’ दिनाँक 21 जनवरी 2018

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

बदलना चाहता है कोई अगर कुछ उसके बदलने से पहले बदलने को ही बदल दो

इससे पहले
कोई समझले
क्या कह
दिया है
विषय ही
बदल दो

समय
रुकता नहीं है
सब जानते हैं
समझते नहीं हैं
मौका देखकर
समय को
ही बदल दो

शातिर कभी
खून
करता नहीं है
खून ही
बदल देता है
सीख लो अगर
सीख सको
मत करो खून
बस खून
ही बदल दो

समय
सिखाता है
परिवर्तन भी
लाता है

सुपारी
देने वाले
बेवकूफ
होते हैं

सुधारवादी
बैठे बैठे
सामने वालों का
बिना कुछ कहे
खून सुखाता है

जरूरी है
कत्ल कर देना
सम्वेदनाओं का

बहुत वेदना देती हैं

सामने सामने
आँखों आँखों में
कह भी
दिया जाता है

कितना
बेवकूफ होता है
मार खाता है
फिर भी अपनों
के पास फिर से
सुखाने
चला आता है

उसका देखना
ही बदल दो

बहुत ही
अपना होता है
पुचकारता
चला जाता है
फाँसी कभी
नहीं होने देगा
खड़े खड़े
समझाता है

लटका दिया
गया है जमीर
‘उलूक’
उसका
बिना पूछे
किसी से

अखबार का
एक समाचार
सुबह का
ये बताता है

अखबार का
कुछ नहीं
कर पायेगा
कहीं कुछ भी
पता होता है

बदल दो कुछ

कोई रस्सी
ही सही
रस्सी
बदल दो ।

चित्र साभार: Dreamstime.com

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

होता है उलूक भी खबर लिये कई दिनों तक जब यूँ ही नदारत हो रहा होता है

होता है

सभी के
साथ होता है


कोई
गा देता है
कोई रो देता है

कोई
खुद के
खो गये होने के
आभास जैसा
मुँह बनाये लटकाये

शहर
की किसी
अंधेरी गली
की ओर
घूमने जाने
की बात करते हुए

चौराहे
की किसी
पतली गली
की ओर
हो रहा होता है


कोई
रख देता है
बोने के लिये बीज

सभी
चीजों के

नहीं
बनते हैं
जानते हुए
बूझते हुए
पेड़ पौंधे
जिनके

कुछ को
आनन्द आता है
जूझते हुए

हुए के साथ

होने
ना होने का
बही खाता बनाये

हर खबर
की कबर
खोदने वाला
भी भूल सकता है

खबरें
भी लाशें
हो जाती है

सड़ती हैं
फूलती हैं
गलती हैं
पड़ी पड़ी

अखबार
समाचार टी वी
रेडियो पत्रकार

निकल निकल
कर गुजर जाते हैं

उसके
अगल बगल से

कुछ
उत्साहित

उसे
उसी के
होंठों पर
बेशरमी
के साथ

सरे आम
भीड़ के
सामने सामने
चूमते हुए भी

अपनी
अपनी ढपली
पीटते सरोकारी लोग

झंडे
दर झंडे जलाते

पीटते
फटी आवाज
के साथ

फटी
किस्मत के
कुछ घरेलू बीमार

लोगों की
तीमारदारी
के रागों को

शहर भी
इन सब
सरोकारों के साथ
जहाँ लूला काना
अंधा हो चुका होता है

सरोकारी
‘उलूक’ भी
अपनी चोंच को
तीखा करता हुआ

एक
खबर को
बगल में दबाये हुए

एक
कबर को
खोदने में
कई दिनों से
लगा होता है

सब को
सब मालूम

सब को
सब पता होता है

मातम होना है

पर मातम होने
तक का इंतजार

किसी
को भी
नहीं होता है

ना खून होता है
ना आँसू होते हैं

ना ही
कोई होता है
जो जार जार
रोता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

सोमवार, 23 मई 2016

लिखना हवा से हवा में हवा भी कभी सीख ही लेना

कफन
मरने के
बाद ही
खरीदे
कोई

मरने
वाले के लिये
अच्छा है

सिला सिलाया
मलमल का
खूबसूरत सा
खुद पहले से
खरीद लेना

जरूरी है
थोड़ा सा कुछ
सम्भाल कर
जेब में उधर
ऊपर के लिये
भी रख लेना

सब कुछ इधर
का इधर ही
निगल लेने से
भी कुछ नहीं होना

अंदाज आ ही
जाना है तब तक
पूरा नहीं भी तो
कुछ कुछ ही सही
यहाँ कितना कुछ
क्या क्या
और किसका
सभी कुछ
है हो लेना

रेवड़ियाँ होती
ही हैं हमेशा से
बटने के लिये
हर जगह ही

अंधों के
बीच में ही
खबर होती
ही है

अंधों के
अखबारों में
अंधों के लिये ही

आँख वालों
को इसमें
भी आता है
ना जाने
किसलिये इतना
बिलखना रोना

लिखने वाले
लिख गये हैं
टुकडे‌ टुकड़े में
पूरा का पूरा
आधे आधे का
अधूरा भी
हिसाब सारा
सब कुछ कबीर
के जमाने से ही

कभी तो माना
कर जमाने के
उसूलों को
‘उलूक’

किसी एक
पन्ने में पूरा
ताड़ का पेड़
लिख लेने से
सब कुछ
हरा हरा
नहीं होना ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कविता और छंद से ही कहना आये जरूरी नहीं है कुछ कहने के लिये जरूरी कुछ उदगार होते हैं



बहुत
अच्छे होते हैं 
समझदार
होते हैं 

किसी
अपने 
जैसे के लिये 
वफादार
होते हैं 

ज्यादा
के
लिये नहीं 
थोड़े थोड़े
के लिये 

अपनी
सोच में 
खंजर
और 
बात में लिये 
तलवार
होते हैं 

सच्चे
 होते हैं 

ना खुदा
के
होते हैं 
ना भगवान
के
होते हैं 

ना दीन
के
होते हैं 
ना ईमान
के
होते हैं 

बहुत
बड़ी
बात होती है 

घर में
एक
नहीं भी हों 

चोरों के
सरदार
के 
साथ साथ

चोरों के 
परिवार
के
होते हैं 

रोज
सुबह के 
अखबार
के
होते हैं 

जुबाँ से
रसीले 
होठों से
गीले 

गले
मिलने को 
किसी के भी 
तलबगार
होते हैं 

पहचानता है 
हर कोई

समाज 
के लिये
एक 
मील का पत्थर 
एक सड़क 

हवा में
 बिना 
हवाई जहाज 
उड़ने
के लिये 
भी
तैयार होते हैं 

गजब
होते हैंं 
कुछ लोग 

उससे गजब 
उनके
आसपास 

मक्खियों
की तरह 
किसी
आस में 
भिनाभिनाते 

कुछ
कुछ के 
तलबगार
होते हैं 

कहते हैं

किसी 
तरह लिखते हैं 

किसी तरह 
ना
कवि होते हैं 
ना
कहानीकार होते हैं 

ना ही
किसी उम्मीद 

और
ना किसी
सम्मान 
के
तलबगार
होते हैं 

उलूक
तेरे जैसे
देखने

तेरे जैसे
सोचने 

तेरा जैसे
कहने वाले 

लोग
और आदमी 
तो

वैसे भी
नहीं 
कहे जाने चाहिये 

संक्रमित
होते हैं 

बस बीमार

और 
बहुत ही 
बीमार होते हैं । 

चित्र साभार: cliparts.co