उलूक टाइम्स: एक सीधे साधे को किनारे से ही कहीं को निकल लेना होता है

शुक्रवार, 8 मई 2015

एक सीधे साधे को किनारे से ही कहीं को निकल लेना होता है


धुरी से खिसकना
एक घूमते हुऐ लट्टू का
नजर आता है बहुत साफ
उसके लड़खड़ाना शुरु करते ही
घूमते घूमते 

एक पन्ने पर लिखी एक इबारत
लट्टू नहीं होती है
ना ही बता सकती है खिसकना
किसी का उसका अपनी धुरी से

दिशा देने के लिये किसी को
दिशा हीन होना बहुत जरूरी होता है
बिना खोये खुद को कैसे ढूँढ लेना है
बहुत अच्छी तरह से तभी पता होता है

शब्द अपने आप में भटके हुऐ नहीं होते हैं
भटकते भटकते ही 
इस बात को समझना होता है

भटक जाता है  मुसाफिर सीधे रास्ते में 
एक दिशा में ही चलते रहने वाला

सबसे अच्छा
भटकने के लिये
खुद को भटकाने वालों के
भटकाने के लिये छोड़ देना होता है

लिखा हुआ किसी का कहीं कोई
लट्टू नहीं होता है
घूमता हुआ भी लगता है तो भी
उसकी धुरी को
बिल्कुल भी नहीं देखना होता है

सीधे सीधे एक सीधी बात को
सीधे रास्ते से किसी को समझाने के दिन
लद गये है ‘उलूक’

भटकाने वाली
गहरी तेज बहाव की बातों की
लहरों को दिखाने वाले को ही
आज के जमाने को
दिशायें दिखाने के लिये कहना होता है ।

चित्र साभार: forbarewalls.com

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-05-2015) को "सिर्फ माँ ही...." {चर्चा अंक - 1971} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. बिलकुल सत्य कथन...बहुत सुन्दर

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  3. अतिसुन्दर लेख
    http://merisyahikerang.blogspot.in/2013_06_01_archive.html
    कुछ पंक्तियाँ मेरे द्वारा ।

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  4. यह रचना पढ़ते हुए मुझे लगा जैसे जीवन की सच्चाई को लट्टू के रूपक में बहुत गहराई से समझाया गया है। भटकना यहाँ कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया बन जाता है। शब्दों की यह यात्रा बताती है कि दिशा वही समझ पाता है जिसने कभी दिशा खोई हो।

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