उलूक टाइम्स: भटकना
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शुक्रवार, 8 मई 2015

एक सीधे साधे को किनारे से ही कहीं को निकल लेना होता है


धुरी से खिसकना
एक घूमते हुऐ लट्टू का
नजर आता है बहुत साफ
उसके लड़खड़ाना शुरु करते ही
घूमते घूमते 

एक पन्ने पर लिखी एक इबारत
लट्टू नहीं होती है
ना ही बता सकती है खिसकना
किसी का उसका अपनी धुरी से

दिशा देने के लिये किसी को
दिशा हीन होना बहुत जरूरी होता है
बिना खोये खुद को कैसे ढूँढ लेना है
बहुत अच्छी तरह से तभी पता होता है

शब्द अपने आप में भटके हुऐ नहीं होते हैं
भटकते भटकते ही 
इस बात को समझना होता है

भटक जाता है  मुसाफिर सीधे रास्ते में 
एक दिशा में ही चलते रहने वाला

सबसे अच्छा
भटकने के लिये
खुद को भटकाने वालों के
भटकाने के लिये छोड़ देना होता है

लिखा हुआ किसी का कहीं कोई
लट्टू नहीं होता है
घूमता हुआ भी लगता है तो भी
उसकी धुरी को
बिल्कुल भी नहीं देखना होता है

सीधे सीधे एक सीधी बात को
सीधे रास्ते से किसी को समझाने के दिन
लद गये है ‘उलूक’

भटकाने वाली
गहरी तेज बहाव की बातों की
लहरों को दिखाने वाले को ही
आज के जमाने को
दिशायें दिखाने के लिये कहना होता है ।

चित्र साभार: forbarewalls.com

रविवार, 21 दिसंबर 2014

खुद को ढूँढने के लिये खोना जरूरी है


एक नहीं
कई बार होता है
आभास भटकने का
समझ में भी आता है
बहुत साफ साफ दिखता भी है

जैसे साफ निर्मल पानी में
अपना अक्स ही इनकार करता हुआ
खुद ही का प्रतिबिम्ब होने से
बस थोड़े से लालच के कारण
जिसे स्वीकार करना मुश्किल होता है

और हमेशा की तरह
कोशिश व्यर्थ चली जाती है
बेचने की एक सत्य को
पता होने के बावजूद भी
कि सत्य कभी भी नहीं बिका है

बिकता हमेशा झूठ ही रहा है
और वो भी कम कम नहीं
हमेशा ही बहुत ऊँचे दामों में 
बिना किसी बाजार और
दुकान में सजे हुऐ

जिसे खरीदते समय
किसी को भी कभी
थोड़ी सी भी झिझक
नहीं होती है

सोच और कलम के लिये
कभी कहीं कोई बाजार
ना हुआ है ना कभी होगा

फिर भी गुजरते हुऐ
बाजारों के बीच लटके हुऐ 
झूठे इनामों सम्मानों की 
दुकानों की चकाचौंध
और ठेकेदारों की
निविदाओं के लिये
लगाई जा रही बोलियों से
जब भी कलम लेखन 
और लेखक का ध्यान भटकता है

थोड़ी देर के लिये ही सही
सत्य नंगा हो जाता है
खुद का खुद के लिये
खुद के ही सामने
और रास्ता दिखना शुरु हो जाता है
तेज रोशनी से चौंधिया के अंधी
हो गई आँखो को भी ।

चित्र साभार: www.gograph.com