उलूक टाइम्स: आओ बोयें कल के लिये आज कुछ इतिहास

चिट्ठा अनुसरणकर्ता

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

आओ बोयें कल के लिये आज कुछ इतिहास


आओ बोयें 

कल 
के लिये 

आज 
कुछ 
इतिहास 

जो 
सच है 
बस 
उसे 
छोड़कर 

कुछ भी 
चलेगा 

होनी चाहिये 
मगर 

कुछ ना कुछ 
शुद्ध 
बिना मिलावट 
की 

कोई भी 
आसपास की 

रद्दी 
की 
टोकरी 
में 
फेंकी गयी 

ज्यादा
चलेगी 
ही नहीं 
बकायदा 
दौड़ेगी 

होनी चाहिये 

एक 
खूबसूरत 
समय की 
बदसूरत 
बकवास 

सारे 
आबंटित 
कामों को त्याग 

विशेष 
काम पर लगे 

सारे 
आसपास के 
तगड़े घोड़ों 
की 
प्रतिस्पर्धाएं 

अर्जुन बने 
चार सौ बीसी 
के 
धनुष 

मक्कारी 
के तीर 

हवा में 
ध्यान लगाये 

समाधिस्थ 
नजर आते 

मछलियों 
की आँखें 
ढूँढते 

कलयुगी 
तीरंदाज 

सोये हुऐ 
दिन दोपहरी 

बिना पिये 
नशे में 

शुद्ध हवा 
पानी वाले पहाड़ 

बर्फ से लबालब 
खासमखास 

सिकुड़ति 
हुई 
पंक्तियों से 
भागते 

लम्बी 
होती हुई 
पंक्तियों
पर 

जमा
होते हुऐ 
शूरवीर 

देखिये 
पने 
आस पास 

‘उलूक’ 
रात के प्रहरी 

बुरी बात है 

करना 
दिन 
की 
बात ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. लोग बो तो रहे हैं इतिहास पर हर बार की तरह अपने अपने वाद अनुसार ...
    सटीक लिखा है ...

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 17 दिसंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-12-2019) को    "आओ बोयें कल के लिये आज कुछ इतिहास"   (चर्चा अंक-3553)     पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  4. वाह!! अद्भुत। आपकी लिखने की शैली...रचना को और प्रभावशाली बनाती है।

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    २३ मार्च २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  6. लम्बी पंक्तियों पर आ गए है सब।
    बहुत सुंदर लेखन।

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