कल
के लिये
आज
कुछ
इतिहास
जो
सच है
बस
उसे
छोड़कर
कुछ भी
चलेगा
होनी चाहिये
मगर
कुछ ना कुछ
शुद्ध
बिना मिलावट
की
कोई भी
आसपास की
रद्दी
की
टोकरी
में
फेंकी गयी
ज्यादा
चलेगी
ही नहीं
बकायदा
दौड़ेगी
होनी चाहिये
एक
खूबसूरत
समय की
बदसूरत
बकवास
सारे
आबंटित
कामों को त्याग
विशेष
काम पर लगे
सारे
आसपास के
तगड़े घोड़ों
की
प्रतिस्पर्धाएं
अर्जुन बने
चार सौ बीसी
के
धनुष
मक्कारी
के तीर
हवा में
ध्यान लगाये
समाधिस्थ
नजर आते
मछलियों
की आँखें
ढूँढते
कलयुगी
तीरंदाज
सोये हुऐ
दिन दोपहरी
बिना पिये
नशे में
शुद्ध हवा
पानी वाले पहाड़
बर्फ से लबालब
खासमखास
सिकुड़ति
हुई
पंक्तियों से
भागते
लम्बी
होती हुई
पंक्तियों
पर
पर
जमा
होते हुऐ
शूरवीर
देखिये
अपने
आस पास
‘उलूक’
रात के प्रहरी
बुरी बात है
करना
दिन
की
बात ।

लोग बो तो रहे हैं इतिहास पर हर बार की तरह अपने अपने वाद अनुसार ...
जवाब देंहटाएंसटीक लिखा है ...
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 17 दिसंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-12-2019) को "आओ बोयें कल के लिये आज कुछ इतिहास" (चर्चा अंक-3553) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
वाह!! अद्भुत। आपकी लिखने की शैली...रचना को और प्रभावशाली बनाती है।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
२३ मार्च २०२० के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
बेहतरीन सृजन
जवाब देंहटाएंवाह!लाजवाब!
जवाब देंहटाएंलम्बी पंक्तियों पर आ गए है सब।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर लेखन।
यह कविता मुझे सीधी आँखों में देखकर सवाल करती हुई लगती है। आप भविष्य के लिए आज बोने की बात करते हैं और साथ ही मिलावटी इतिहास पर तीखा तंज भी कसते हैं। मुझे आपकी भाषा में मौजूद बेचैनी और व्यंग्य दोनों साथ महसूस होते हैं। अर्जुन, मछली की आँख और कलयुगी तीरंदाज़ जैसे बिंब सोच को झकझोर देते हैं।
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